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अनुभव पर उद्धरण

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मेरा स्वभाव या सिद्धांत या प्रवृत्ति कुछ ऐसी है (मेरे ख़याल से जो शायद सही भी है) कि जो व्यक्ति साहित्यिक दुनिया से जितना दूर रहेगा, उसमें अच्छा साहित्यिक बनने की संभावना उतनी ही ज़्यादा बढ़ जाएगी। साहित्य के लिए साहित्य से निर्वासन आवश्यक है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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रचना-प्रक्रिया के भीतर केवल भावना, कल्पना, बुद्धि और संवेदनात्मक उद्देश्य होते हैं; वरन वह जीवनानुभव होता है जो लेखक के अंतर्जगत का अंग है, वह व्यक्तित्व होता है जो लेखक का अंतर्व्यक्तित्व है, वह इतिहास होता है जो लेखक का अपना संवेदनात्मक इतिहास है और केवल यही नहीं होता।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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ऐतिहासिक अनुभूति के द्वारा मनुष्य के अपने आयाम असीम हो जाते हैं—उसका दिक् और काल उन्नत हो जाता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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आलोचक के लिए सर्व-प्रथम आवश्यक है—अनुभवात्मक जीवन-ज्ञान, जो निरंतर आत्म-विस्तार से अर्जित होता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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यदि लेखक के पास संवेदनात्मक महत्व-बोध नहीं है, या क्षीण है, तो विशिष्ट अनुभवों की अभिव्यक्ति क्षीण होगी।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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अनुभव करो; किंतु अभिभूत मत हो पड़ो, अन्यथा चल नहीं पाओगे। यदि अभिभूत होना है, तो ईश्वरप्रेम में हो जाओ।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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अनुभव और दंड ऐसी सीख देते हैं जो अन्य उपायों से संप्रेषित नहीं होती।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
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ऐतिहासिक-अनुभूति वह कीमिया है, जो मनुष्य का संबंध सूर्य के विस्फोटकारी केंद्र से स्थापित कर देती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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त्यागने की संतुष्टि और अनुभव की संतुष्टि में बहुत बड़ा अंतर है।

रघुवीर चौधरी
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अनुभवहीनता से उत्पन्न गुंजाइश के मर्म में जीवन को राह दिखाने वाली ज्योति निवास करती है।

कृष्ण कुमार
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ख़ुशी का अनुभव करते हुए हमें उसके प्रति चेतन होने में कठिनाई होती है। जब ख़ुशी गुज़र जाती है और हम पीछे मुड़कर उसे देखते और अचानक से महसूस करते हैं—कभी-कभार आश्चर्य के साथ—कितने ख़ुश थे हम।

निकोस कज़ानज़ाकिस
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अनुभव अर्थात् मनुष्यों द्वारा अपनी ग़लतियों को दिया जाने वाला नाम।

ऑस्कर वाइल्ड
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सच बात तो यह है कि आत्मपरक रूप से विश्वपरक, जगतपरक होने की लंबी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति ही कला है—अभिव्यक्ति-कौशल के क्षेत्र में और अनुभूति अर्थात् अनुभूत वस्तु-तत्व के क्षेत्र में।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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सिर्फ़ विश्वास करने से काम नहीं चलता। आश्वस्त भी होना चाहिए—अनुभव से।

रघुवीर चौधरी
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पूर्वकल्पित धारणाओं से किसी को समझना सही नहीं है। सच्ची पहचान उसके आचरण से ही मिल सकती है। लेकिन व्यवहार प्रासंगिक है। क्या यह व्यक्तित्व के सुसंगत पहलुओं का परिचय दे सकता है? अन्यथा व्यवहार भी भ्रामक है। धारणा भी भ्रामक है। अनुभव भी भ्रामक है… तो सच क्या है? लेकिन सत्य भी धारणा ही है, है ना? बिना धारणा के मैं दौड़ नहीं सकता।

रघुवीर चौधरी
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जो किसी मुख के लावण्य, वन-स्थली की सुषमा, नदी या शैलतटी की रमणीयता, कुसुमविकास की प्रफुल्लता, ग्रामदृश्यों की सरल माधुरी देख मुग्ध नहीं होता, जो किसी प्राणी के कष्ट-व्यंजक रूप और चेष्टा पर करुणार्द्र नहीं होता; जो किसी पर निष्ठुर अत्याचार होते देख क्रोध से नहीं तिलमिलाता—उसमें काव्य का सच्चा प्रभाव ग्रहण करने की क्षमता कभी नहीं हो सकती।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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मनुष्य के व्यापार परिमित और संकुचित हैं। अतः बाह्य प्रकृति के अनंत और असीम व्यापारों के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अंशों को तारतम्यपूर्वक दिखाकर, कल्पना को शुद्ध और विस्तृत करना कवि का धर्म है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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सुविधाजीवी कवियों के शब्द अघाये आदमी की डकार होते हैं, लेकिन त्रिलोचन की कविता में शब्द आँखों से टपकनेवाले लहू की बूँदें हैं।

मैनेजर पांडेय
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जो लोग सौंदर्य के उपभोग में उन्मत्त हैं, उनकी यंत्रणा कैसी है, इसका अनुभव मैं भोजन करने के लिए बैठने पर ही करता हूँ। मेरे जीवन में घोर दुःख यह है कि अन्न-व्यंजन थाली में रखते-रखते ही ठंडे हो जाते हैं। उसी प्रकार सौंदर्य-रूपी मोटे चावल का भात है, प्रेम-रूपी केला के पत्तल पर डालते ही ठंडा हो जाता है—फिर कौन रुचि से उसे खाए? अंत में वेश-भूषा-रूपी इमली की चटनी मिलाकर, ज़रा अदरक-नमक के क़तरे डालकर किसी तरह निगल जाना पड़ता है।

बंकिम चंद्र चटर्जी
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कविता सृष्टि-सौंदर्य का अनुभव कराती है, और मनुष्य को सुंदर वस्तुओं में अनुरक्त करती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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हमारे अनुभव में घटमान विश्व केवल हमारी चेतना में अस्तित्ववान है, उस का कोई भौतिक आधार नहीं है।

एम. एन. राय
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कवि के लिए संपूर्ण प्रकृति, गूढ़ संकेतों से भरी हुई प्रेरित होती है और आलोकपूर्ण नवीन ज्ञान का प्रभाव उसे स्वप्न में चौंका जाता है।

नामवर सिंह
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बुद्धि की उन्नति करने में तो हमें पुस्तकों से बहुत सहायता प्राप्त होती है, पर आत्मा की उन्नति करने में पुस्तकों की सहायता प्राय: नहीं के बराबर ही रहती है।

स्वामी विवेकानन्द
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जीवंत, आँख के सामने घटित होने वाले इतिहास को भी, कैसे हमारे अपने लोग एक पुराण की रूपावली-शब्दावली में ही देखते-परखते-महसूस करते रहे है—यह तो शायद हम सभी जानते होंगे। किंतु हमारे उस 'जानने' को इतने तीव्र, सघन और संश्लिष्ट रूप में रचकर; उसे हमारे अंत:चक्षुओं के सामने प्रत्यक्ष करा देने की क्षमता, उपन्यासकार में ही होती है।

रमेशचंद्र शाह
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साहित्य में आध्यात्मिक भावबोध या उसकी ज़रूरत का अहसास, दर्शन को अनुभूति के भीतर चरितार्थ करके या दर्शन को अनुभूति में घुलाकर ही संभव और कृतिकार्य हो सकता है।

रमेशचंद्र शाह
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अनुभूति की जिस तीव्रता में; बाहर-भीतर सर्वत्र अंधकार ही अंधकार दिखाई पड़े, वह नितांत ऐंद्रिय संवेदन कही जाएगी।

नामवर सिंह
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काव्य का जो चरम लक्ष्य; सर्वभूत को आत्मभूत कराके अनुभव कराना है (दर्शन के समान केवल ज्ञान कराना नहीं), उसके साधन में भी अहंकार का त्याग आवश्यक है। जब तक इस अहंकार से पीछा छूटेगा, तब तक प्रकृति के सब रूप मनुष्य की अनुभूति के भीतर नहीं सकते।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कवि, परंपरा से प्राप्त विषयवस्तु को आत्मानुभूति, चिंतन और मनन द्वारा काव्यवस्तु बनाता है।

मैनेजर पांडेय
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भय का अनुभव केवल उन्हें ही होगा जिनको विश्वास नहीं है।

रघुवीर चौधरी
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साहित्यिक में अनासक्ति नहीं होगी, तो वह दुनिया को नाप नहीं सकेगा। साहित्यिक को संसार के खेल में द्रष्टा होना चाहिए।

विनोबा भावे
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जो काव्य कवि की अनुभूत्ति से संबंध रखते हैं श्रोता की, उनमें केवल कल्पना और बुद्धि के सहारे भावों के स्वरूप का प्रदर्शन होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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बुराइयों को जाने बग़ैर, अच्छाइयों की पहचान और उनका पोषण संभव नहीं। कवि को गर्हित, निकृष्ट, वर्जित और निषिद्ध का भी पीछा करना चाहिए।

लीलाधर जगूड़ी
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संवेदना, सरोकार और सौंदर्य की आकांक्षा के अभाव में सृजन संभव ही नहीं है।

ललित कार्तिकेय
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प्रतिभा लंबा धैर्य है और मौलिकता इच्छाशक्ति और गहन अवलोकन का प्रयास है।

गुस्ताव फ़्लॉबेयर
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मानव-चरित्र रचने के लिए मानव को देखना पड़ता है, मानव को समझना पड़ता है, उसके सुख-दु:ख, आशा, आकांक्षा, द्वंद्व, कुँठा सबको देखना होता है। जन-जीवन का बारीक अवलोकन करना होता है और साथ ही संवेदनात्मक दृष्टि रखनी पड़ती है।

हरिशंकर परसाई
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सौंदर्यानुभूति वास्तविक जीवन की मनुष्यता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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हर शब्द किसी अनुभव की याद है, किसी जाने-पहचाने यथार्थ की स्मृति जगाता है।

निर्मल वर्मा
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जब मन के अंदर अनुभूति की क्षमता नहीं रहती, तभी बाहर की विपत्तियाँ प्रबल हो उठती हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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अनुभूति ही कला का मूल बीज है। अनुभूति के भी मूल में मानव की सौंदर्यखोजी प्रवृत्ति है, इसीलिए कला की दृष्टि सौंदर्य-विधायिनी है।

देवीशंकर अवस्थी
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सच्चे कवि राजाओं की सवारी, ऐश्वर्य की सामग्री में ही सौंदर्य नहीं ढूँढ़ा करते। वे फूस के झोपड़ों, धूल-मिट्टी में सने किसानों, बच्चों के मुँह में चारा डालते हुए पक्षियों, दौड़ते हुए कुत्तों और चोरी करती हुई बिल्लियों में कभी-कभी ऐसे सौंदर्य का दर्शन करते हैं, जिसकी छाया महलों और दरबारों तक नहीं पहुँच सकती।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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गति देखी तो नहीं जा सकती, अनुभव करना होता है।

रघुवीर चौधरी
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अनुभव सबसे क्रूर शिक्षक है। लेकिन तुम सीखते हो, मगर क्या तुम सच में सीखते हो।

सी. एस. लुईस
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कविता भाषा में बँधती है और भाषा जीवन से बँधती है—जीवित वर्तमान के अनुभव तथा उन स्मृतियों के रूप में, जिन्हें वह झटककर अपने से अलग नहीं कर सकता।

कुँवर नारायण
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मैंने अपना साहित्यिक अस्तित्व ऐसे व्यक्ति जैसा बनाना शुरू कर दिया, जो इस तरह रहता है जैसे उसके अनुभव किसी दिन लिखे जाने थे।

ऐनी एरनॉ
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कोई भी कवि परंपरा से विषयवस्तु प्राप्त करता है, लेकिन वह उसे काव्यवस्तु स्वयं बनाता है।

मैनेजर पांडेय
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मूर्खों के साथ कभी बहस मत करो। वे आपको अपने स्तर तक गिरा देंगे और आपको अनुभव से हरा देंगे।

मार्क ट्वेन
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प्यार को कभी समझा नहीं गया है, चाहे इसे पूरी तरह से अनुभव किया गया हो और उस अनुभव को संप्रेषित किया गया हो।

शुलामिथ फ़ायरस्टोन
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इंद्रियों के अनुभव से जो ज्ञान पैदा होता है, वही ज्ञान है और वही ज्ञान संस्कृति का आधार है। यदि आप इंद्रिय सुख पर रोक लगा रहे हैं, तो आप आदमी की ज्ञानार्जन वृत्ति पर भी रोक लगा रहे हैं।

एम. एन. राय
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जिसे विश्वानुभूति हुई है और जो सर्वभूत हृदय होगा, जिसके मन में संकुचितता नहीं होगी—वही साहित्यिक होगा।

विनोबा भावे
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वस्तुजगत का यथावत् चित्रण वस्तुजगत का अनुभव हो सकता है, लेकिन कला का अनुभव भी तभी होगा, जब हम उसमें हम किसी प्रकार की रचनात्मक प्रतिभा और प्रेरणा को असंदिग्ध रूप से पहचान सकें।

कुँवर नारायण

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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