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किसान को—जैसा कि ‘गोदान’ पढ़नेवाले और दो बीघा ज़मीन' जैसी फ़िल्में देखनेवाले पहले से ही जानते हैं—ज़मीन ज़्यादा प्यारी होती है। यही नहीं, उसे अपनी ज़मीन के मुक़ाबले दूसरे की ज़मीन बहुत प्यारी होती है और वह मौक़ा मिलते ही अपने पड़ोसी के खेत के प्रति लालायित हो उठता है। निश्चय ही इसके पीछे साम्राज्यवादी विस्तार की नहीं, सहज प्रेम की भावना है जिसके सहारे वह बैठता अपने खेत की मेड़ पर है, पर जानवर अपने पड़ोसी के खेत में चराता है।

श्रीलाल शुक्ल
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हमारे साहित्य में एक बहुचर्चित स्थापना यह है कि भारतीय उपन्यास मूलतः किसान चेतना की महागाथा है—वैसे ही जैसे उन्नसवीं सदी के योरोपीय उपन्यास को मध्यम वर्ग का महाकाव्य कहा गया था।

श्रीलाल शुक्ल
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एक निरी कामकाजी दृष्टि के द्वारा एक कामकाजी व्यक्ति को खेत, कृषि-विज्ञान और नीतिशास्त्र की किताबों के पन्नों की तरह दिखाई देते हैं, खेतों की हरियाली किस तरह से गाँव के कोने तक फैल गई है—उसे भावुक ही देखता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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सिर्फ़ महाकाव्यों में ही लोग एक-दूसरे को मार डालने के पहले गालियों का आदान-प्रदान करते हैं। जंगली आदमी, और किसान, जो काफी कुछ जंगली जैसा ही होता है, तभी बोलते हैं जब उन्हें दुश्मन को चकमा देना होता है।

ओनोरे द बाल्ज़ाक
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सूर के काव्य में जिस किसान-जीवन का चित्रण है, उसका एक विशेष सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ है। वह संदर्भ सामंती व्यवस्था का है, जिसके भीतर किसान-जीवन के अनुभवों का स्वरूप बना है। सूर की विशेषता यह है कि उन्होंने सामंती-व्यवस्था के संदर्भ के साथ, किसान-जीवन के अनुभवों का चित्रण किया है।

मैनेजर पांडेय
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जैसे प्रकृति के बिना किसान का जीवन अधूरा होता है, वैसे ही प्रकृति की उपेक्षा करनेवाली किसान-जीवन की कविता भी अधूरी होगी—यह बात किसान-जीवन की समग्रता का कवि जानता है।

मैनेजर पांडेय
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दरिद्रनारायण के दर्शन करने हों, तो किसानों के झोंपड़ों में जाओ।

सरदार वल्लभ भाई पटेल
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चमार, मोची वग़ैरा के धंधे देहात में ही चलने चाहिए, और ये सभी धंधे किसान या ग्रामवासी के सहायक उद्योग हो सकते है।

महात्मा गांधी
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कृषिप्रधान संस्कृति में महत्त्वाकांक्षा के पनपने की ज़्यादा जगह नहीं है।

श्रीलाल शुक्ल
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संसार के अन्य किसी समुदाय के साथ इतना अधिक अत्याचार और अन्याय नहीं किया गया, जितना कि कृषकों के साथ किया गया है।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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जो किसान मूसलाधार बरसात में काम करता है, कीचड़ में खेती करता है, मरखने बैलों से काम लेता है और सर्दी-गर्मी सहता है, उसे डर किसका?

सरदार वल्लभ भाई पटेल
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हिंदुस्तान में किसान राष्ट्र की आत्मा है। उस पर पड़ी निराशा की छाया को हटाया जाए तभी हिंदुस्तान का उद्धार हो सकता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम यह अनुभव करें कि किसान हमारा है और हम किसान के हैं।

बाल गंगाधर तिलक
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संसार कुछ भी करता फिरे, हल पर ही आश्रित है। अतएव कष्टप्रद होने पर भी कृषि कर्म ही श्रेष्ठ है।

तिरुवल्लुवर
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किसान का शहर की ओर भागना उसकी असफलता का ढिंढोरा है। ऐसा करके वह घर का रहेगा घाट का।

महात्मा गांधी
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किसान को बैल की मौत बूढ़े बाप से ज़्यादा अखरती है।

धूमिल
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बनिस्बत इसके कि गाँव की खेती अलग-अलग सौ टुकड़ों में बंट जाए, क्या बेहतर नहीं है कि सौ परिवार गाँव की खेती सहयोग से करें।

महात्मा गांधी
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मैं किसानों को भिखारी बनते नहीं देखना चाहता। दूसरों की मेहरबानी से जो कुछ मिल जाए, उसे लेकर जीने की इच्छा की अपेक्षा अपने हक़ के लिए मर-मिटना मैं ज़्यादा पसंद करता हूँ।

सरदार वल्लभ भाई पटेल
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जहाँ किसान सुखी नहीं है, वहाँ राज्य भी सुखी नहीं है और साहूकार भी सुखी नहीं है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल
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किसान के बराबर सर्दी, गर्मी, मेह, और मच्छर-पिस्सू वगैरा का उपद्रव कौन सहन करता है?

सरदार वल्लभ भाई पटेल
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सादा मेहनत-मजदूरी का, किसान का जीवन ही सच्चा जीवन है।

महात्मा गांधी
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किसानों को शहर के कृत्रिम जीवन और लकदक के चक्कर में नहीं पड़न चाहिए। उनकी सादगी और सरलता ही उनका भूषण है।

महात्मा गांधी
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भक्ति कविता का संसार से जो सम्बन्ध है, मुझे एक किसान की टिनेसिटी (तपस्या) मालूम होती हैं कि तकलीफ़ होने के बावजूद खेत से जुड़ा है।

नामवर सिंह
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कृषकों का जीवन ही जीवन है। अन्य सब दूसरों की वंदना करके भोजन पाकर उनके पीछे चलने वाले ही हैं।

तिरुवल्लुवर
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हिंदुस्तान में खेती के लिए बहुतेरे कुदरती ख़तरे हैं।

महात्मा गांधी
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अन्न पैदा करने में किसान भी ब्रह्मा के समान है। खेती उसके ईश्वरीय प्रेम का केंद्र है। उसका सारा जीवन पत्ते-पत्ते में, फूल-फूल में बिखर रहा है।

सरदार पूर्ण सिंह
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प्रेमचंद का समूचा साहित्य भारतीय किसान की महागाथा है, राष्ट्रीय पूँजीवाद की गौरवगाथा नहीं है।

नामवर सिंह
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चरखे से आमदनी भले ही फूटी कौड़ी के बराबर ही होती हो, पर किसान का तो आधा साल बेकार जाता है।

महात्मा गांधी
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किसान किसी की तलवार बल के बस तो कभी हुए हैं और होंगे। वे तलवार चलाना नहीं जानते, किसी की तलवार से वे डरते हैं। वे मौत को हमेशा अपना तकिया बनाकर सोने वाली महान प्रजा हैं। उन्होंने मौत का डर छोड़ दिया है, इसलिए सबका डर छोड़ दिया है।

महात्मा गांधी
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खेती की तरक्की के लिए गोचर-भूमि की सुविधा भी आवश्यक है।

महात्मा गांधी
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किसान का प्रकृति के साथ ‘सौन्दर्य प्रेम’ का ही संबंध नहीं है, बल्कि प्रकृति उसके जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता है।

विजयदान देथा
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किसान समझें कि अनाज बोना है तो अपने ही पेट के लिए नहीं, सब लोगों के लिए।

महात्मा गांधी
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खेती की भाँति ही, सब उद्योगों के विषय में उद्यम की वर्तमान दृष्टि ही भूल से भरी हुई है।

महात्मा गांधी
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हमारे किसानों की निरक्षरता की दुहाई देना एक फ़ैशन-सा हो गया है, लेकिन किसान निरक्षर होकर भी बहुत से साक्षरों से ज्यादा चतुर है। साक्षरता अच्छी चीज़ है और उससे जीवन की कुछ समस्याएँ हल हो जाती हैं, लेकिन यह समझना कि किसान निरा मूर्ख है, उसके साथ अन्याय करना है। वह परोपकारी है, त्यागी है, परिश्रमी है, किफ़ायती है, दूरदर्शी है, हिम्मत का पूरा है, नीयत का साफ़ है, दिल का दयालु है, बात का सच्चा है, धर्मात्मा है, नशा नहीं करता, और क्या चाहिए। कितने साक्षर हैं जिनमें ये गुण पाए जाएँ। हमारा तज़रबा तो ये है कि साक्षर होकर आदमी काइयाँ, बदनीयत, क़ानूनी और आलसी हो जाता है।

प्रेमचंद
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इस धरती पर अगर किसी को सीना तानकर चलने का अधिकार हो, तो वह धरती से धन-धान्य पैदा करने वाले किसान को ही है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल
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हिंदुस्तान की आर्थिक और राजकीय नीति, खेती के उद्योग को नष्ट कर रही है।

महात्मा गांधी
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खेती हिंदुस्तान का प्राणरूप धंधा है।

महात्मा गांधी
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हिंदुस्तान के किसानों का आज खेती से बचने वाला छः महीने का समय निरर्थक जाता है।

महात्मा गांधी
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किसानों को विडंबनाएँ इसलिए सहन करनी पड़ती हैं कि उनके लिए जीविका के और सभी द्वार बंद हैं।

प्रेमचंद
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कृष्ण-कथा मूलतः कृषि से जुड़ी कल्पना की रचना है, इसलिए उसमें किसान जीवन की वास्तविकताओं और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति मिलती है।

मैनेजर पांडेय
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मूर्ख किसान का भी अच्छे खेत में पड़ा बीज वृद्धि को प्राप्त हो जाता है।।

विशाखदत्त
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कृषक सारे संसार के लिए किल्ली के समान है, क्योंकि वह अन्य सभी का भार वहन कर रहा है।

तिरुवल्लुवर
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सारी दुनिया किसान के आधार पर टिकी हुई है। दुनिया के आधार किसान और मज़दूर पर है। फिर भी सबसे ये दोनों बेज़ुबान होकर अत्याचार सहन करते हैं। ज़्यादा ज़ुल्म कोई सहता है, तो ये दोनों हो सहते हैं। क्योंकि ये दोनों बेज़ुबान होकर अत्याचार सहन करते हैं।

सरदार वल्लभ भाई पटेल
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समाजवाद की परिस्थिति में किसानों की निजी मिलकियत की व्यवस्था समाजवादी कृषि की सार्वजनिक मिलकियत में बदल जाती है; सोवियत संघ में ऐसा हो चुका है और बाक़ी सारी दुनिया में भी ऐसा ही होगा।

माओ ज़ेडॉन्ग
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रूसी किसान जब अपने सिर को खुजलाता है, तब इसके कई मतलब होते हैं।

निकोलाई गोगोल

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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