फ़ुरसत निकालना भी एक कला है। गधे हैं जो फ़ुरसत नहीं निकाल पाते। फ़ुरसत के बिना साहित्य चिंतन नहीं हो सकता, फ़ुरसत के बिना दिन में सपने नहीं देखे जा सकते। फ़ुरसत के बिना अच्छी-अच्छी, बारीक-बारीक, महान बातें नहीं सूझतीं।
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मेरा स्वभाव या सिद्धांत या प्रवृत्ति कुछ ऐसी है (मेरे ख़याल से जो शायद सही भी है) कि जो व्यक्ति साहित्यिक दुनिया से जितना दूर रहेगा, उसमें अच्छा साहित्यिक बनने की संभावना उतनी ही ज़्यादा बढ़ जाएगी। साहित्य के लिए साहित्य से निर्वासन आवश्यक है।
साहित्य-सृजेता को स्वतंत्र होना ही चाहिए, तभी उसका स्वर निर्भय और स्वतंत्र होगा। शासन का पिछलग्गू साहित्य, समाज को पतन की ओर ले जाएगा।
एम.ए. करने से नौकरी मिलने तक जो काम किया जाता है, उसे रिसर्च कहते हैं।
आलोचक का धर्म साहित्यिक नेतागिरी करना नहीं है, वरन् जीवन का मर्मज्ञ बनना और उसी विशेषता की सहायता से कला-समीक्षा करना भी है।
भारतीय साहित्य में उन लोगों की वाणी को ही प्रधानता मिली है, जिन्होंने आध्यात्मिक असंतोषों और अतृप्तियों को दूर करने की दिशा में, विवेक-वेदना-स्थिति से ग्रस्त होकर काम किया है।
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साहित्य में बुढ़ापा सफ़ेद बालों या झुर्रियों का नाम नहीं है। साहित्य में बुढ़ापे का अर्थ है—नवीन चेतना ग्रहण करने की शक्ति का लोप। अपनी मान्यताओं और मूल्यों को बदलने की भीरुता, आज के बदले विगत कल में ही जीने का मोह, प्रतिभा का शैथिल्य—यह सब न हो, तो साहित्य में बूढ़ा आदमी परिपक्व कहलाता है।
विशुद्ध व्याकरण और परिभाषा आदि के द्वारा घटना का बखान करने से ही यदि घटना का पूरा बखान हो जाता तो साहित्य समाचार-पत्रों में ही बंद रहता।
लेखक अपनी अर्थहीन रचनाओं द्वारा और प्रकाशक अपनी अर्थ-लोलुप प्रवृत्ति द्वारा; तथा पाठक अपने पिछड़ेपन के द्वारा भी, साहित्य-सृजन के लिए प्रतिकूल परिस्थिति उत्पन्न कर देते हैं।
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कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर; लोकसामान्य भावभूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत् की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है।
रचना-प्रक्रिया के भीतर न केवल भावना, कल्पना, बुद्धि और संवेदनात्मक उद्देश्य होते हैं; वरन वह जीवनानुभव होता है जो लेखक के अंतर्जगत का अंग है, वह व्यक्तित्व होता है जो लेखक का अंतर्व्यक्तित्व है, वह इतिहास होता है जो लेखक का अपना संवेदनात्मक इतिहास है और केवल यही नहीं होता।
शमशेर की आत्मा ने अपनी अभिव्यक्ति का एक प्रभावशाली भवन अपने हाथों तैयार किया है, उस भवन में जाने से डर लगता है—उसकी गंभीर प्रयत्नसाध्य पवित्रता के कारण।
‘जनता का साहित्य’ का अर्थ, जनता को तुरंत ही समझ में आनेवाले साहित्य से हरगिज़ नहीं है।
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भारत जैसे विराट मानवीय क्षेत्र के अनुभवों, गहरी भावनाओं, आशाओं, आकांक्षाओं और यातनाओं आदि को हमारा उपन्यास अभी अंशतः ही समेट पाया है—और जितना तथा जिस प्रकार उसे समेटा गया है उसमें प्रतिभा एवं कौशल के कुछ दुर्लभ उदाहरणों को छोड़कर, अब भी बहुत अधकचरापन है।
भाषिक अभिव्यक्ति का रूप-रस, कविता द्वारा ही बचाया जा सकता है।
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हमारे साहित्य में एक बहुचर्चित स्थापना यह है कि भारतीय उपन्यास मूलतः किसान चेतना की महागाथा है—वैसे ही जैसे उन्नसवीं सदी के योरोपीय उपन्यास को मध्यम वर्ग का महाकाव्य कहा गया था।
आज की दुनिया में जिस हद तक शोषण बढ़ा हुआ है; जिस हद तक भूख और प्यास बढ़ी हुई है, उसी हद तक मुक्ति-संघर्ष भी बढ़ा हुआ है और उसी हद तक बुद्धि तथा हृदय की भूख-प्यास भी बढ़ी हुई है। आज के युग में साहित्य का यह कार्य है कि वह जनता के बुद्धि तथा हृदय की इस भूख-प्यास का चित्रण करे और उसे मुक्तिपथ पर अग्रसर करने के लिए ऐसी कला का विकास करे, जिससे जनता प्रेरणा प्राप्त कर सके और जो स्वयं जनता से प्रेरणा ले सके।
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साहित्यकारों के वर्ग में भी वास्तविक प्रतिभावान साहित्यिक बहुत थोड़े होते हैं।
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जो लोग 'जनता का साहित्य' से यह मतलब लेते हैं कि वह साहित्य जनता के तुरंत समझ में आए, जनता उसका मर्म पा सके, यही उसकी पहली कसौटी है—वे लोग यह भूल जाते हैं कि जनता को पहले सुशिक्षित और सुसंस्कृत करना है।
सक्षम सुंदर अभिव्यक्ति तो अविरत साधना और श्रम के फलस्वरूप उत्पन्न होती है।
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आज भारत की सारी व्यवस्था, अर्थ, राजनीति, शिक्षा, संस्कृति और साहित्य, प्रत्येक क्षेत्र में ‘छिन्नमूल’ नवशिक्षित बुद्धजीवियों के हाथ में आ गई है और वे जन्मतः भारतीय होते हुए भी मानसिक बौद्धिक रूप से ‘आउट साइडर’ हैं।
जिस दिन साहित्य को मैं अपनी प्राथमिक ज़मीन मानकर नहीं लिखूँगा, मेरे लिए पूरे उत्साह और ईमानदारी से लिखना असंभव हो जाएगा।
साहित्य में सच्ची नागरिकता रचनाओं की ही होती है; और रचनाएँ अंततः सार्थक या निरर्थक होती है, न कि नई और पुरानी।
ध्यान रखना चाहिए कि कवि किस सतह से बोल रहा है, यह हमेशा महत्वपूर्ण होता है और यही उसके निवेदनों या चित्रणों को द्योतित करता है।
काव्य क्षेत्र में किसी 'वाद' का प्रचार, धीरे-धीरे उसकी सारसत्ता को ही चर जाता है। कुछ दिनों में लोग कविता लिखकर 'वाद' लिखने लगते हैं।
कविता-कहानी-नाटक के बाज़ार में जिन्हें समझदारों का राजपथ नहीं मिलता; वे आख़िर देहात में खेत की पगडंडियों पर चलते हैं, जहाँ किसी तरह का महसूल नहीं लगता।
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साहित्यकार के हक़ में ग़रीबी को एक साहित्यिक मूल्य मान लिया गया है।
अपने से ऊपर उठकर सोचने-समझने की शक्ति, भावना तथा मन की संवेदना—ये दो छोर हैं स्रष्टा मन के।
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यदि कोई वामपंथी विशेषज्ञ यह नुस्ख़ा सुझाए कि आप महाभारत की कथाओं को अपनी याददाश्त से बाहर निकाल दीजिए और फिर देश बनाइए, तो यह काम ब्रह्मा और विश्वकर्मा मिलकर भी नहीं कर सकते।
साहित्य का विषय व्यक्तिगत होता है, श्रेणीगत नहीं। यहाँ पर मैं ‘व्यक्ति’ शब्द के धातुमूलक अर्थ पर ही ज़ोर देना चाहता हूँ।
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साहित्य में विषयवस्तु निश्चेष्ट हो जाती है, यदि उसमें प्राण न रहे।
रचना के 'आइडिया' के आविष्कार के लिए तो अवश्य 'विद्रोही मन' चाहिए। परंतु रचना का कार्य (प्राॅसेस) आइडिया के आविष्कार के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता।
साहित्य व्याकरण के सिद्धांतों को पुष्ट अवश्य करता है; किंतु वह उससे स्वतंत्र, आनंदमय रचना है।
साहित्य की आधुनिक समस्या यह है कि लेखक शैली तो चरित्र की अपनाना चाहते हैं, किन्तु उद्दामता उन्हें व्यक्तित्व की चाहिए।
किसी दूसरे देश की आत्मा को जानने का सबसे अच्छा तरीक़ा उसका साहित्य पढ़ना है।
प्रारंभिक श्रेणी के लिए उपयुक्त साहित्य तो साहित्य है और सर्वोच्च श्रेणी के लिए उपयुक्त साहित्य, जनता का साहित्य नहीं है—यह कहना जनता से गद्दारी करना है।
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साहित्य जीवन का प्रतिबिंब है, इसीलिए हमें सबसे पहले जीवन की चिंता होनी चाहिए।
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भाषा एक बात है और वाणी दूसरी। साहित्य का संबंध वाणी से आता है। मनुष्य की वाणी जितनी विकसित होगी, उतना उसका जीवन विकसित होगा। कुल जीवन का आधार वाणी है।
लेखन; व्यापार कतई नहीं है—वह जीविका का साधन हो सकता है, लेकिन वह बहुत अंशों में तपस्या है। इसलिए जिसे आत्मा पर बंधन महसूस होते हों, तो वह छोड़कर चला जाए।
साहित्य अपने काल का प्रतिबिम्ब होता है। जो भाव और विचार लोगों के हृदयों को स्पंदित करते हैं, वही साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं।
हम सहज ही भूल जाते हैं कि जाति-निर्णय विज्ञान में होता है, जाति का विवरण इतिहास में होता है। साहित्य में जाति-विचार नहीं होता, वहाँ पर और सब-कुछ भूलकर व्यक्ति की प्रधानता स्वीकार कर लेनी होगी।
वाणी जिसका उच्चारण करती है, वह वाङ्मय है। उसमें कुत्ते का भुँकना भी आएगा। लेकिन जनता के पापों को जो शब्द धोएगा, वही सारस्वत होगा। पापों को धोनेवाला जो शब्द सरस्वती की कृपा से निकलेगा, वह वाग्विसर्ग सारस्वत है।
उपन्यास और कहानी की अपेक्षा नाटक मुझे कम कठिन विधा लगती है।
जो केवल मुक्ताभास-हिमबिंदुमंडित मरकताभशाद्वलजाल, अत्यंत विशाल गिरिशिखर से गिरते हुए जलप्रपात के गंभीर गर्त से उगी हुई; सीकर नीहारिका के बीच विविध-वर्णस्फुरण की विशालता, भव्यता और विचित्रता में ही अपने हृदय के लिए कुछ पाते हैं, वे तमाशबीन हैं—सच्चे भावुक या सहृदय नहीं।
साहित्यशक्ति, शब्द-शक्ति मनुष्य तभी प्रकट कर सकता है, जब वह सामान्य मन से ऊपर उठकर जनता के मानस की तरफ़ देखे।
कोई इंजीनियर रद्दी माल लगाकर ग़ैर-ज़िम्मेदारी से कच्चे पुल का निर्माण करे; तो वह जिस अपराध का भागी होगा, उसी अपराध का भागी वह कवि भी होगा, जो राष्ट्रीयता की सच्ची भावना की अनुभूति के बिना रस्म-अदाई के लिए ओजहीन राष्ट्रीय-काव्य रचेगा।
जीवंत, आँख के सामने घटित होने वाले इतिहास को भी, कैसे हमारे अपने लोग एक पुराण की रूपावली-शब्दावली में ही देखते-परखते-महसूस करते रहे है—यह तो शायद हम सभी जानते होंगे। किंतु हमारे उस 'जानने' को इतने तीव्र, सघन और संश्लिष्ट रूप में रचकर; उसे हमारे अंत:चक्षुओं के सामने प्रत्यक्ष करा देने की क्षमता, उपन्यासकार में ही होती है।
साहित्यिक द्रष्टा है। वह किसी रंग से रंगा हुआ नहीं रहता। वह किसी रंग से रंगा हुआ हो, तो सृष्टि को न्याय नहीं दे सकेगा।
जो भावुक या सहृदय होते हैं, अथवा काव्य के अनुशीलन से जिनके भावप्रसार का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है—उनकी वृत्तियाँ उतनी स्वार्थबद्ध नहीं रह सकतीं।
वैज्ञानिक वर्तमान युग बनाते हैं और कवि उनके भूत और भविष्य की आलोचना करते हैं—इसी मार्मिक और चुभने वाली आलोचना को कविता कहते हैं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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