अहंकार पर उद्धरण
यहाँ प्रस्तुत चयन में
अहंकार विषयक कविताओं को संकलित किया गया है। रूढ़ अर्थ में यह स्वयं को अन्य से अधिक योग्य और समर्थ समझने का भाव है जो व्यक्ति का नकारात्मक गुण माना जाता है। वेदांत में इसे अंतःकरण की पाँच वृत्तियों में से एक माना गया है और सांख्य दर्शन में यह महत्त्व से उत्पन्न एक द्रव्य है। योगशास्त्र इसे अस्मिता के रूप में देखता है।
गौरवांवित बनो, किंतु गर्वित मत हो जाओ।
तुम्हारा 'मै' पन जाते ही अदृष्ट ख़त्म हुआ। दर्शन भी नहीं, अदृष्ट भी नहीं।
जो कहता है कि मैं जानता हूँ, वह वस्तुतः जानता नहीं है।
‘मैं’ से बड़ा और कोई असत्य नहीं। उसे छोड़ना ही संन्यास है। संसार नहीं, ‘मैं’ छोड़ना है क्योंकि वस्तुतः मैं-भाव ही संसार है।
सद्गुरु की परीक्षा करने के लिए उनके निकट संकीर्ण-संस्कारविहीन होकर, प्रेमभरा हृदय लेकर, दीन एवं जहाँ तक संभव हो, निरहंकार होकर जाने से उनकी दया से कोई संतुष्ट हो सकता है।
अहं अपनी मृत्यु के द्वारा आत्मा के अमरत्व को व्यक्त करता है।
हे राजन्! जिसके हाथ, पैर और मन अपने वश में हों तथा जो विद्वान् तपस्वी और यशस्वी हो, वही तीर्थसेवन का फल पाता है। जो प्रतिग्रह से दूर हो, जो अपने पास जो कुछ है उसी से संतुष्ट रहे और जो अहंकार रहित हो, वही तीर्थं का फल पाता है। जो दंभ आदि दोषों से रहित हो, कर्तृत्व के अहंकार से रहित हो, अल्पाहारी हो और जितेंद्रिय हो, वह सब पापों से मुक्त होकर तीर्थ का फल पाता है। जिसमें क्रोध न हो, जो सत्यवादी और दृढ़व्रती हो तथा जो सब प्राणियों के प्रति आत्मभाव रखता हो, वही तीर्थ का फल पाता है।
जब तेरे हृदय से अहंकार निकल गया, उस समय वह अंदर आ जाएगा। तुझ पर उसका प्रकाश स्वयं प्रकट हो जाएगा।
-
संबंधित विषय : आत्म-शुद्धि
मैं न जन्म लेता हूँ, न बड़ा होता हूँ, न नष्ट होता हूँ। प्रकृति से उत्पन्न सभी धर्म देह के कहे जाते हैं। कर्तृत्व आदि अहंकार के होते हैं। चिन्मय आत्मा के नहीं। मैं स्वयं शिव हूँ।
आंतरिक दीनता के समान अहंकार को वश में करने का दूसरा कुछ भी नहीं।
पुरुष, प्रकृति, बुद्धि, पाँच विषय, दस इंद्रियों, अहंकार, अभिमान और पंच महाभूत इन पच्चीस तत्त्वों का समूह ही 'प्राणी', नाम से कहा जाता है।
दुर्बलतम शरीरों में अहंकार प्रबलतम होता है।
जभी देखो, मनुष्य तुम्हें प्रणाम करते हैं और उससे तुम्हें कोई विशेष आपत्ति नहीं होती, मौखिक रूप से एक-आधबार आपत्ति कर लेते हो ठीक ही-मन में, किंतु ऐसा विशेष कुछ भाव नहीं होता तभी ठीक समझो। अंतर में चोर के समान 'हमबड़ाई' प्रवेश कर गई है; जितना शीघ्र हो, तुम सावधान हो जाओ, अन्यथा निश्चय ही अधःपतन में जाओगे।
अपूर्णता का गौरव ही दुःख है।
जिसकी दुम में अफ़सर जुड़ गया, समझ लो, अपने को अफ़लातून समझने लगा।
पहले निरहंकार होने की चेष्टा करो; बाद में 'सोऽहं' कहो, नहीं तो 'सोऽहं' तुम्हें और भी अधःपतन में ले जा सकता है।
प्रेम भक्ति की ही क्रमोन्नति है। भक्ति का गाढ़त्व ही प्रेम है। अहंकार जहाँ जितना पतला है, भक्ति का स्थान भी वहाँ उतना ही अधिक है।
अद्वैत सिद्धांत ही हमारे लिए माँ का दूध है। जन्म से ही हम द्वेष, भेदबुद्धि और अहं से रहित हैं।
यदि आप दूसरों की सहायता करना चाहते हैं, तो आपको अपने अहंकार को त्यागना होगा।
मेरे लिए सबसे ख़तरनाक स्थिति वो है, जब ये लगे कि मैंने कुछ समझ लिया है।
गर्व का पतन निश्चित है।
हम मानव के नाते देखते है कि हमारा समस्त तर्कसंगत ज्ञान अहंबोध के अधीन है।
डर यही है कि अपनी श्रेष्ठता, पुण्य या धन के अभिमान से हमारा दान अपमानित न हो, अधर्म में परिणत न हो। इसीलिए उपनिषद् में कहा है ‘भ्रिया देयम्’—भय करते हुए दान दो।
जिसके चित्त में ‘नहीं’ है, वह समग्र से एक नहीं हो पाता है। सर्व के प्रति ‘हाँ’ अनुभव करना जीवन की सबसे बड़ी क्रांति है क्योंकि वह ‘स्व’ को मिटाती है और ‘स्वयं’ से मिलाती है।
जब तक किसी भी रूप में ‘मैं’ का अस्तित्व है—अत्यंत स्थूल रूप में या अत्यंत सूक्ष्म रूप में—तब तक हिंसा मौजूद रहेगी।
प्रकृत सत्य-प्रचारक का अहंकार, अपने आदर्श में रहता है और ढोंगी-प्रचारक का अहंकार आत्मप्रचार में।
किसी के द्वारा प्रतिहत होने पर, जो अपने को प्रतिष्ठित करना चाहता है—वही है अहं।
जिस वस्तु को मनुष्य दे नहीं सकता, उसे ले लेने की स्पर्द्धा से बढ़कर दूसरा दंभ नहीं।
अहंकारी धनी मलिनता का दास होता है, इसीलिए ज्ञान की उपेक्षा करता है।
केवल महत्ता का प्रदर्शन, मन पर अनुचित प्रभाव का बोझ है।
छोटेपन में अहंकार का दर्प इतना प्रचंड होता है कि वह अपने को ही खंडित करता रहता है।
अच्छा गृहस्थ, भला सामाजिक मनुष्य, भला देशभक्त होने के लिए शुरू में ही अहं को त्यागना होगा। अहं को त्यागने से ही अहं का विस्तार होता है।
प्रचार का अहंकार, प्रकृत-प्रचार का अंतराय (बाधक) है। वही प्रकृत प्रचारक है—जो अपने महत्व की बात भूलकर भी जबान पर नहीं लाता, और शरीर द्वारा सत्य का आचरण करता है, मन से सत्-चिंता में मुग्ध रहता है एवं मुख से मन के भावानुयायी सत्य के विषय में कहता है।
अहंकार एकमात्र जटिलता है। जिन्हें सरल होना है, उन्हें इस सत्य को अनुभव करना होगा।
धनवान यदि अहंकारी होता है, वह दुर्दशा में अवनत होता है।
अहं से आज़ादी आसान तो नहीं, लेकिन बतौर आदर्श यह ज़रूरी है।
अभिमानी व्यक्ति स्वयं को ही खा जाता है।
हेकड़ी, अथवा और ज़्यादा ठीक-ठीक कहें, तो 'अहंकार'—किसी को अपने ऊपर हो जाने वाले अनुचित गर्व का नाम है।
गर्व का पतन निश्चित है।
जो हम करते हैं वह दूसरे भी कर सकते हैं—ऐसा मानें। न मानें तो हम अहंकारी ठहरेंगे।
असत् आदर्श में अपना अहंकार न्यस्त न करो, अंयथा तुम्हारा अहंकार और भी कठिन होगा।
मन, बुद्धि और अहंकार का लय प्रलय है।
महानता अहंकार रहित होती है। तुच्छता अहंकार की सीमा पर पहुँच जाती है।
यदि अहं भाव करता हूँ तो हे ईश्वर! तू प्राप्त नहीं होता और यदि तू प्राप्त हो जाता है तो अहं-भाव नहीं रह पाता।
जब भी तुम्हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी आजमाओ : जो सबसे ग़रीब और कमज़ोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो क़दम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। यानि क्या उससे उन करोड़ो लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है?
अहं को जितना दूर रखोगे, तुम्हारे ज्ञान या दर्शन की सीमा उतनी ही विस्तृत होगी।
जिसके हृदय में भक्ति है; वह समझ नहीं पाता कि वह भक्त है, और दुर्बल, निष्ठाहीन केवल भाव-प्रवण, मोटा-अहं-युक्त हृदय सोचता है—मैं ख़ूब भक्त हूँ।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
संबंधित विषय
- अज्ञान
- अनुभव
- अहंकार
- आकांक्षा
- आज़ादी
- आत्म
- आत्मज्ञान
- आत्म-सम्मान
- आत्म-संयम
- आत्मा
- आनंद
- उदारता
- उपासना
- कृतज्ञता
- क्रोध
- गुरु
- गर्व
- चेतना
- ज्ञान
- जीवन
- झूठ
- दुख
- दूरी
- धनी
- नक़ल
- नैतिकता
- प्रेम
- पुरुष
- प्रार्थना
- बचपन
- बुद्धिजीवी
- भलाई
- मुक्त
- मनुष्य
- मूर्ख
- महात्मा गांधी
- माँ
- मातृभाषा
- रवींद्रनाथ ठाकुर
- व्यक्तिगत
- शैतान
- शांति
- सच
- स्त्री
- समाज
- स्वार्थ
- संसार
- सौंदर्य
- हिंसा