ग़रीबी पर उद्धरण
ग़रीबी बुनियादी आवश्यकताओं
के अभाव की स्थिति है। कविता जब भी मानव मात्र के पक्ष में खड़ी होगी, उसकी बुनियादी आवश्यकताएँ और आकांक्षाएँ हमेशा कविता के केंद्र में होंगी। प्रस्तुत है ग़रीब और ग़रीबी पर संवाद रचती कविताओं का यह चयन।
साहित्यकार के हक़ में ग़रीबी को एक साहित्यिक मूल्य मान लिया गया है।
निस्संदेह मैं तो हिंदू युवकों को वीरों और हुतात्माओं के उस गौरवमय पागलखाने में प्रविष्ट कराना चाहता हूँ जहाँ त्याग को लाभ, ग़रीबी को अमीरी और मृत्यु को जीवन समझा जाता है। मैं तो ऐसे पक्के और पवित्र पागलपन का प्रचार करता हूँ। पागल! हाँ, मैं पागल हूँ। मैं ख़ुश हूँ कि मैं पागल हूँ।
धन उधार देकर समाज का शोषण करने वाले धनपति को जिस दिन 'महाजन' कहा गया होगा, उस दिन ही मनुष्यता की हार हो गयी। 'महाजन' कहना मनुष्यत्व की हीनता स्वीकार करके ही तो संभव हुआ।
विश्वविद्यालयों में तो गुरु-कृपा से ही डिग्री मिलती है। सब जानते हैं, पढ़ने से कुछ नहीं होता। अगर आचार्य की कृपा हो जाए, तो प्रतिद्वंद्वी विद्यार्थी का अँगूठा काटकर वह प्रिय विद्यार्थी को दे देता है। राजा के लड़के और भील के लड़के में जो अंतर तब था, वही अब है।
इतिहासकार को हरेक के साथ न्याय करने का अपना मिशन कभी भूलना नहीं चाहिए। निर्धन और संपत्तिवान सब उसकी क़लम के आगे बराबर हैं; उसके सामने किसान अपनी दरिद्रता की भव्यता के साथ उपस्थित होता है, और धनवान अपनी मूर्खता की क्षुद्रता के साथ।
असल में देखें तो दुनिया में सिर्फ़ दो ही जातियाँ हैं—पहली है अमीरों की और दूसरी है ग़रीबों की।
दरिद्रनारायण का अर्थ है ग़रीबों का ईश्वर, ग़रीबों के हृदय में निवास करने वाला ईश्वर। इस नाम का प्रयोग दिवंगत देशबंधु दास ने एक बार सत्य-दर्शन के पावन क्षणों में किया। इस नाम को मैंने अपने अनुभव से नहीं गढ़ा है बल्कि यह मुझे देशबंधु से विरासत के रूप में प्राप्त हुआ है।
नगर जीवन ग़रीब को अधिकांश रूप से नीचे ही गिराने वाला है। यदि वह बेकार हो जाए, तो वह भिखमंगों की संख्या बढ़ाता है और यदि रोज़गार से लगा रहता है, तो कम-से-कम दुराचार अवश्य बढ़ाता है।
संसार में शरीरधारियों की दरिद्रता ही मृत्यु है और न ही आयु है।
किसी वर्ग की सुविधा और लाभ के लिए, संसार के झोपड़ों में रहने वाले लोगों का शरीर और मन भेंट नहीं दिया जा सकता।
दरिद्रनारायण के दर्शन करने हों, तो किसानों के झोंपड़ों में जाओ।
भारतवर्ष के सभी अनर्थों की जड़ है—ग़रीबों की दुर्दशा।
ग़रीबी में मनुष्य जितना बनता है, उतना अमीरी में नहीं बनता।
जगत् में प्रायः धनवानों में खाने और पचाने की शक्ति नहीं रहती है और दरिद्रों के पेट में काठ भी पच जाता है।
आधुनिक काल का ग़रीब, दया का पात्र नहीं समझा जाता; बल्कि उसे कचरे की तरह हटा दिया जाता है। बीसवीं सदी की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में पहली ऐसी संस्कृति की निर्मिति हुई, जिसके लिए भिखारी होना—कुछ नहीं होने का तक़ाज़ा है।
जो केवल ऐश्वर्य के पालने में पले हैं, वे ग़रीबों के दुःखों को नहीं जान सकते।
ईश्वर का सबसे अच्छा नाम दरिद्रनारायण है।
निर्धन अनुभव करने में ही निर्धनता है।
दरिद्रता सब पापों की जननी है तथा लोभ उसकी सबसे बड़ी संतान है।
भारत जैसे देश में ग़रीब या बेरोज़गार होना बड़ी बात नहीं। तभी जब कोई लेखनीधारी नागरिक अपनी विपन्नता के आत्मदयापूर्ण विवरण पेश करता है तो मुझे लगता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से उन सबका अपमान कर रहा है जो उससे भी कड़े अभावों को झेल रहे हैं पर उसकी तरह आत्म-प्रकाशन नहीं कर पा रहे हैं।
सबसे बड़ी बुराई तथा निकृष्टतम अपराध निर्धनता है।
शास्त्रोक्त शब्दों से जिनकी वाणी सुंदर है; और शिष्यों के पढ़ाने योग्य जिनकी विद्या है और वे स्वयं भी प्रसिद्ध हैं, ऐसे कवि-विद्वान् जिस राजा के देश में निर्धन रहते हैं, तो यह उस राजा की मुर्खता ही है।
यदि तुम्हारे पास धन हैं, तो निर्धनों को बाँट दो। यदि धन पर्याप्त नही है तो मन की भेंट दो। यदि मन ठोक नहीं है तो तन अर्पित करो। यदि तन भी स्वस्थ नहीं है तो मीठे वचन ही बोलो। परंतु तुम्हें कुछ न कुछ देना ही है और परोपकार के लिए अवश्य ही स्वयं को न्यौछावर करना है।
ग़रीबी की ज़िल्लत नहीं रहती, अगर अजनबियों में ज़िंदगी बसर की जाए। यह जानने-पहचानने वालों की कर्नाखयाँ और कनबतियाँ हैं जो ग़रीबी को यंत्रणा बना देती हैं।
जिनका धन समान है, जिनकी विद्या एक सी है, उन्हीं में विवाह और मंत्री का संबंध हो सकता है। धनवान और निर्धन में कभी मित्रता नहीं हो सकती।
क़ानून निर्धन को पीसते हैं और धनवान क़ानून पर शासन करते हैं।
आलसी सोने वाले मनुष्य को दरिद्रता प्राप्त होती है तथा कार्य-कुशल मनुष्य निश्चय ही अभीष्ट फल पाकर ऐश्वर्य का उपभोग करता है।
दरिद्र देशों के सामूहिक जीवन में साहित्य बिल्कुल ही अप्रासंगिक है। ऐसे देश में अगर किसी साहित्यकार को यह दंभ हो कि वह साहित्य रचकर जनसाधारण के जीवन की कोई अनिवार्य आवश्यकता पूरी कर रहा है तो उसे अपनी क़लम चूल्हे में झोंक देनी चाहिए।
मैं किसानों को भिखारी बनते नहीं देखना चाहता। दूसरों की मेहरबानी से जो कुछ मिल जाए, उसे लेकर जीने की इच्छा की अपेक्षा अपने हक़ के लिए मर-मिटना मैं ज़्यादा पसंद करता हूँ।
दरिद्र देशों में मनुष्य सिर्फ़ रोटी के सहारे जीता है। कलाकारों और साहित्यकारों को उसका कृतज्ञ होना चाहिए कि वह दूसरे संकटों के साथ कला और साहित्य को भी झेल लेता है।
निर्धनता मनुष्य में चिंता उत्पन्न करती है, दूसरों से अपमान कराती है, शत्रुता उत्पन्न करती है, मित्रों में घृणा का पात्र बनाती है और आत्मीय जनों से विरोध कराती है। निर्धन व्यक्ति की घर छोड़कर वन चले जाने की इच्छा होती है, उसे स्त्री से भी अपमान सहना पड़ता है। ह्रदयस्थित शोकाग्नि एक बार ही जला नहीं डालती अपितु संतप्त करती रहती है।
कवि के घर निर्धनता से अकाल नहीं पड़ता। वह तो पड़ता है, नीरसता का मौसम आ जाने पर।
निर्धनों की आवश्यकताओं और कठिनाइयों को अमीर कभी नहीं समझ सकते।
जनता ग़रीबी से उबरने का रास्ता पूछती है, सरकार उसके हाथ में 'निरोध' का पैकेट थमा देती है।
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कोई भी लोकतंत्र अभाव, ग़रीबी और असमानता के साथ लंबे अरसे तक नहीं चल सकता।
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अभाव में, ग़रीबी में, दुःख में, परेशानी में आदमी जो कुछ करता है, उससे उसका मूल्यांकन नहीं किया जाता, यह उसके प्रति अन्याय है।
ग़रीबों के लिए रोटी ही अध्यात्म है।
सुख की अवस्था से जो दरिद्रता की दशा को प्राप्त होता है, वह तो शरीर से जीवित रहते हुए भी मृतक के समान ही जीता रहता है।
आक्रोश ग़रीबी का सबसे क़ीमती फूल है।
दैववश मनुष्य के भाग्य की जब होनावस्था (दरिद्रता) आ जाती है तब उसके मित्र भी शत्रु हो जाते हैं, यहाँ तक कि चिरकाल से अनुरक्त जन भी विरक्त हो जाता है।
कोई धर्म-संप्रदाय नवीनतम है इसीलिए उसे ग्रहण न करो। नवीन वस्तुएँ सदा सर्वोत्तम नहीं होतीं, क्योंकि वे समय की कसौटी पर नहीं कसी गई हैं।
'दरिद्रता के विरुद्ध युद्ध' वायदों में, राजनीति में, प्रेस-वक्तव्यों में प्रथम परंतु क्रियान्वयन में सबसे अंतिम रहा है।
हमारे समय के सबसे हानिकारक मिथकों में से एक यह है कि ग़रीब देश अमीर देशों की साज़िश के कारण ग़रीबी में रहते हैं; जो उन्हें अविकसित रखने के लिए कार्यों की व्यवस्था करते हैं, ताकि उनका शोषण किया जा सके।
कोई भी देश ग़रीब देश नहीं होता; बस संसाधनों के प्रबंधन की नाकाम व्यवस्थाएँ होती हैं, जिनकी वजहें उन्हें ग़रीब रखती हैं।
राजन्! श्रुति है कि दर्प अधर्म के अंश से उत्पन्न संपत्ति का पुत्र है। उस दर्प ने बहुत से देवताओं और असुरों को नष्ट कर दिया है।
एक ग़रीब आदमी किसी ऊँची इमारत की छत पर खड़े दृष्टिहीन आदमी जैसा होता है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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