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संत तुकाराम

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महाराष्ट्र के संत कवि। भक्ति के अभंग पदों के लिए प्रसिद्ध।

महाराष्ट्र के संत कवि। भक्ति के अभंग पदों के लिए प्रसिद्ध।

संत तुकाराम की संपूर्ण रचनाएँ

दोहा 29

लोभी के चित धन बैठे, कामिनि के चित काम।

माता के चित पूत बैठे, तुका के मन राम॥

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तुका बड़ो मानूं, जिस पास बहुत दाम।

बलिहारी उस मुख की, जिस ते निकसे राम॥

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चित्त मिले तो सब मिले, नहिं तो फुकट संग।

पानी पत्थर एक ही ठोर, कोर भीजे अंग॥

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तुका दास तिनका रे, राम भजन नित आस।

क्या बिचारे पंडित करो रे, हात पसारे आस॥

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राम-राम कह रे मन, और सुं नहिं काज।

बहुत उतारे पार आगे, राखि तुका की लाज॥

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पद 8

उद्धरण 51

अभ्यास के बिना साध्य की प्राप्ति हो, यह संभव नहीं है।

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अंधे की लाठी पकड़ने वाला अंधा हो तो दोनों ही गड्ढे में गिरते हैं।

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मनुष्य इस संसार में दो दिन का अतिथि है।

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धर्म का अर्थ है प्राणियों पर दया।

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प्राणियों का पालन और दुष्टों का संहार इसी का नाम है 'दया'।

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