आत्म पर उद्धरण
आत्म का संबंध आत्मा
या मन से है और यह ‘निज’ का बोध कराता है। कवि कई बातें ‘मैं’ के अवलंब से कहने की इच्छा रखता है जो कविता को आत्मीय बनाती है। कविता का आत्म कवि को कविता का कर्ता और विषय—दोनों बनाने की इच्छा रखता है। आधुनिक युग में मनुष्य की निजता के विस्तार के साथ कविता में आत्मपरकता की वृद्धि की बात भी स्वीकार की जाती है।
अपने स्वयं के शिल्प का विकास केवल वही कवि कर सकता है, जिसके पास अपने निज का कोई ऐसा मौलिक-विशेष हो, जो यह चाहता हो कि उसकी अभिव्यक्ति उसी के मनस्तत्वों के आकार की, उन्हीं मनस्तत्वों के रंग की, उन्हीं के स्पर्श और गंध की ही हो।
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‘स्व’ से ऊपर उठना, ख़ुद की घेरेबंदी तोड़कर कल्पना-सज्जित सहानुभूति के द्वारा अन्य के मर्म में प्रवेश करना—मनुष्यता का सबसे बड़ा लक्षण है।
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शांति को चाहो। लेकिन ध्यान रहे कि उसे तुम अपने ही भीतर नहीं पाते हो, तो कहीं भी नहीं पा सकोगे। शांति कोई बाह्य वस्तु नहीं है।
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तुम्हारे पास क्या है; उससे नहीं, वरन् तुम क्या हो उससे ही तुम्हारी पहचान है।
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वह (स्त्री) ख़ुद से तब प्यार कर पाती है, जब कोई पुरुष उसे प्यार के क़ाबिल पाता है।
यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दूसरों में रुचि का कारण मनुष्य की स्वयं में रुचि है। यह संसार स्वार्थ से जुड़ा है। यह ठोस वास्तविकता है लेकिन मनुष्य केवल वास्तविकता के सहारे नहीं जी सकता। आकाश के बिना इसका काम नहीं चल सकता। भले ही कोई आकाश को शून्य स्थान कहे…
सफल होने के लिए—एक कलाकार के पास—साहसी आत्मा होनी चाहिए। …वह आत्मा जो हिम्मत करती है और चुनौती देती है।
भाषा स्वयं सुनती है।
प्यार करने का चुनाव जुड़ने का विकल्प है—दूसरे में ख़ुद को खोजने का विकल्प।
मैं अनावश्यक चीज़ों को छोड़ दूँगी, मैं अपना धन दे दूँगी, मैं अपने बच्चों के लिए अपनी जान दे दूँगी; लेकिन मैं ख़ुद को नहीं दूँगी।
घायल दिल पहले कम आत्म-सम्मान पर क़ाबू पाकर आत्म-प्रेम सीखता है।
मेरे इतने लोकप्रिय होने का कारण यह है कि मैं दूसरों को वह लौटाती हूँ जो उन्हें स्वयं में खोजने की आवश्यकता होती है।
जब मैं भाषा के माध्यम से विचार करता हूँ तो मौखिक अभिव्यक्तियों के अतिरिक्त मेरे मन में कोई दूसरे ‘अर्थ’ नहीं होते : भाषा तो स्वयं ही विचार की वाहक होती है।
मैं जब तक जीवित रहूँगा, उनकी नक़ल नहीं करूँगा या उनसे अलग होने के लिए ख़ुद से नफ़रत नहीं करूँगा।
कैसे मैं, जो जीवन को इतनी तीव्रता से चाहता है, स्वयं को लंबे समय तक किताबों की निरर्थक बातों और स्याही से काले पड़े पन्नों में उलझा हुआ छोड़ सकता था!
मन की अथाह गहराई में उतरकर लिखो, जो मन में आए वह लिखो।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बड़ी अच्छी चीज़ है, बड़ी अच्छी और अत्यंत ऊँची; परंतु राष्ट्र की स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए उसे संकुचित कर देना एक ऐसा त्याग है, जिसकी समता नहीं हो सकती, जो सब त्यागों में श्रेष्ठ है।
व्यक्ति किसी और से प्यार करने और किसी और से प्यार प्राप्त करने के सरल कृत्यों से ख़ुद से प्यार करना सीखता है।
मेरी मुश्किलें मेरी अपनी हैं।
स्मरण-शक्ति के साथ लिखो और ख़ुद के आश्चर्य के लिए लिखो।
क्या यह सच नहीं है कि लेखक केवल अपने बारे में लिख सकता है?
आदमी ध्यान आकर्षित करने के लिए युद्ध करते हैं। सभी हत्याएँ आत्म-घृणा की अभिव्यक्ति हैं।
सरल मन वाले दीवाने संत सरीखे बनो।
इंसान का गुण स्वयं का विस्तार करने, स्वयं से बाहर निकलने और अन्य लोगों में और उनके लिए मौजूद रहने की क्षमता में निहित है।
आप कितनी भी दूर की यात्रा कर लें, आप कभी भी ख़ुद से दूर नहीं हो सकते।
जब भी आप अपने आस-पास सुंदरता का निर्माण कर रहे होते हैं, आप अपनी आत्मा को बहाल कर रहे होते हैं।
जब हमें नहीं पता होता कि किससे नफ़रत करें, हम ख़ुद से शुरुआत करते हैं।
प्रेम की प्राप्ति के लिए एक ज़रूरी शर्त है—अपनी ‘आत्म-मुग्धता’ से उबरने में सफलता।
लोकरुचि अथवा लोक-उक्तियों के अनुसार जो अपना जीवन-यापन करते हैं, वे अपने पड़ोसियों की प्रशंसा के पात्र भले ही बन जाएँ, पर उनका जीवन औरों के लिए नहीं होता है।
स्वयं को जानने का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति के साथ कार्य करते हुए स्वयं का अध्ययन करना है।
अगर आप अपनी फ़ुरसत को खो रहे हैं, तो ख़बरदार! हो सकता है कि आप अपनी आत्मा को खो रहे हों।
ख़ुद के प्रति समर्पण ही सच्ची शक्ति है—वह शक्ति जो भीतर से आती है।
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आमूल-परिवर्तनवादी कभी आत्मपरकतावादी नहीं होता।
मैं वही हूँ जो मेरे आस-पास है।
दे दिया जाता हूँ।
जब आप समग्र रूप से सावधान होते हैं, तो वहाँ कोई 'स्व' नहीं हो सकता।
स्व सदा सीमित होता है और इसीलिए यह द्वंद्व का कारण है। हमारे समस्त संघर्ष, दुःख, चिंता आदि का यही है केंद्रीय बिंदु।
कविता में 'मैं' की व्याख्या केवल आत्मकेंद्रण या व्यक्तिवाद के अर्थ में करना, उसके बृहत्तर आशयों और संभावनाओं—दोनों को संकुचित करना है।
आत्मसंस्कृति ही शिल्प है। इस शिल्प के द्वारा मनुष्य सारे संसार को छंदोंमय बना लेते हैं।
किसी भी युग में; किसी भी मनुष्य ने अपने स्वत्वों का अपहरण होते देखकर, क्षुद्रता की छाप लगाए फिरना स्वीकार नहीं किया।
दुनिया में कोई व्यक्ति अपना निर्माण स्वयं नहीं करता।
आज उपकृत हुआ हूँ; इसलिए कल फिर स्वार्थांध होकर अपकृत होने का बहाना कर, अकृतज्ञता को मत्त बुला लो। इससे बढ़कर इतरता और क्या है? जिस किसी से पूछ लो।
डरने वाला व्यक्ति स्वयं ही डरता है, उसको कोई डराता नहीं है।
आपको ख़ुद पर काम करने की ज़रूरत है। जब तक आप ख़ुद को नहीं भर लेते, तब तक आपके पास किसी दूसरे को देने के लिए कुछ नहीं होता है।
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सौंदर्य बाहर की कोई वस्तु नहीं है, मन के भीतर की वस्तु है।
कला में वस्तुतः आत्माभिव्यक्ति नहीं हुआ करती। अभिव्यक्ति होती है, किंतु जीने और भोगनेवाले अपने मन की, अपनी आत्मा की, वह सच्ची अभिव्यक्ति है—यह कहने का साहस नहीं हो पाता।
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आत्मानुभूति का विस्तृत रूप सहअनुभूति है।
गौरवांवित बनो, किंतु गर्वित मत हो जाओ।
अपनी भव्यता को गले लगाने का समय यही है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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