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भाषा पर उद्धरण

भाषा मानव जाति द्वारा

प्रयुक्त वाचन और लेखन की प्रणाली है जिसका उपयोग वह अपने विचारों, कल्पनाओं और मनोभावों को व्यक्त करने के लिए करता है। किसी भाषा को उसका प्रयोग करने वाली संस्कृति का प्रतिबिंब कहा गया है। प्रस्तुत चयन में कविता में भाषा को एक महत्त्वपूर्ण इकाई के रूप में उपयोग करती कविताओं का संकलन किया गया है।

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हमेशा पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी से निराश रही है। नई पीढ़ी भी पुरानी पीढ़ी बनकर निराश होती रही है।

त्रिलोचन
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मनुष्य ने नियम-कायदों के अनुसार; अपने सजग ज्ञान द्वारा भाषा की सृष्टि नहीं की, और न उसके निर्माण की उसे आत्म-चेतना ही थी। मनुष्य की चेतना के परे ही प्रकृति, परम्परा, वातावरण, अभ्यास व अनुकरण आदि के पारस्परिक संयोग से भाषा का प्रारम्भ और उसका विकास होता रहा।

विजयदान देथा
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भाषिक अभिव्यक्ति का रूप-रस, कविता द्वारा ही बचाया जा सकता है।

लीलाधर जगूड़ी
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लेखक का कर्तव्य है पाठक को अपनी भाषिक संस्कृति से जोड़ना।

कुबेरनाथ राय
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बच्चों को भाषा पढ़ाने का भला क्या मतलब हो सकता है, सिवाय इस दृष्टि-विस्तार के, क्योंकि भाषा तो वे पहले से जानते हैं। हमें पढ़ना-लिखना सिखाने के आग्रह को भाषा सिखाने का मुख्य उद्देश्य यही समझना चाहिए।

कृष्ण कुमार
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भाषा नदी की धारा जैसी होती है, उस पर किसी का नाम खोदकर नहीं रखा जा सकता।

रवींद्रनाथ टैगोर
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मैं इसलिए यह कहना जरूरी समझता हूँ कि जब से संस्कृत और लोकभाषाओं के बीच संवाद समाप्त हुआ है—भाषाओं की क्षति हुई है।

नामवर सिंह
  • संबंधित विषय : लोक
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संतोष की भाषा धीमी होती है, क्योंकि वह शब्दों और मौन दोनों में व्यक्त होती है।

रघुवीर चौधरी
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विभिन्न धर्म अलग-अलग भाषाएँ हैं, जिनमें प्रत्येक की अपनी सच्चाई हो सकती है और सच्चाई की कमी हो सकती है और ऐसा सोचना मूर्खतापूर्ण है कि ईश्वर किसी प्रकार से परिभाषित है, जिसके बारे में आप कुछ भी कह सकते हैं।

यून फ़ुस्से
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भाषा की कितनी दयनीय दरिद्रता है! सितारों की तुलना हीरे से करना!

गुस्ताव फ़्लॉबेयर
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भाषा स्वयं सुनती है।

यून फ़ुस्से
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मनुष्य ने नियम-कायदों के अनुसार; अपने सजग ज्ञान द्वारा भाषा की सृष्टि नहीं की, और न उसके निर्माण की उसे आत्म-चेतना ही थी। मनुष्य की चेतना के परे ही प्रकृति, परम्परा, वातावरण, अभ्यास व अनुकरण आदि के पारस्परिक संयोग से भाषा का प्रारम्भ और उसका विकास होता रहा।

विजयदान देथा
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किसी विशुद्ध ‘बकवास’ को प्रदर्शित करना, और बोध के द्वारा भाषा की सीमाओं से सिर फोड़ने से आई चोटों को दिखाना दर्शन के परिणाम हैं। इन चोटों से हमें खोज की महत्ता पता चलती है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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जब मैं भाषा के माध्यम से विचार करता हूँ तो मौखिक अभिव्यक्तियों के अतिरिक्त मेरे मन में कोई दूसरे ‘अर्थ’ नहीं होते : भाषा तो स्वयं ही विचार की वाहक होती है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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क्या निजी भाषा के नियम, नियमों की प्रतिच्छाया हैं?—जिस तुला पर प्रतिच्छाया को तोला जाता है, वह तुला की प्रतिच्छाया नहीं होती।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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जो दिन भर एक ऐसी भाषा और शब्दावली का प्रयोग करता है जिसके शब्द बरसों के इस्तेमाल से अपनी सारी नई संभावनाएँ खो चुके हैं, जिसका सारा चिंतन और आचरण निर्दिष्ट पद्धति और पूर्वदृष्टांत का पिछलगुआ हो, जिसकी धारणाएँ और विवेक पूर्वानुभव से या किसी ऊपरी सत्ता से अनुशाषित हों, वह धीरे-धीरे अपने व्यक्तित्व में उन तत्त्वों को आत्मसात् करेगा ही जो बुनियादी तौर पर अच्छे सर्जनात्मक लेखन के ख़िलाफ़ हैं।

श्रीलाल शुक्ल
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जो काव्य सर्वसाधारण की समझ के बाहर होता है, वह बहुत कम लोकमान्य होता है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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भाषा एक बात है और वाणी दूसरी। साहित्य का संबंध वाणी से आता है। मनुष्य की वाणी जितनी विकसित होगी, उतना उसका जीवन विकसित होगा। कुल जीवन का आधार वाणी है।

विनोबा भावे
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देश-प्रेम हो और भाषा-प्रेम की चिंता न हो, यह असंभव है।

महात्मा गांधी
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भाषा के प्रश्न को सतही या कामचलाऊ दृष्टि से ग्रहण नहीं करना चाहिए।

कुबेरनाथ राय
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भाषा के बिना काव्य की कल्पना नहीं की जा सकती और न भाव-जगत् के अभिव्यक्ति के अतिरिक्त, भाषा का कोई दूसरा प्रयोजन जान पड़ता है।

श्यामसुंदर दास
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भक्तिकाव्य की एक विशेषता हिंदी भाषा के काव्यत्व का उत्कर्ष है।

मैनेजर पांडेय
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गोष्ठियों में लोकप्रचलित सरल भाषा में काव्य, कला-विषयक चर्चा करता हुआ नागरक, लोक में सर्वमान्य होता है।

वात्स्यायन
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भाषा पहले है और व्याकरण बाद में। भाषा से आगे व्याकरण की न सीमा है और न गति।

विजयदान देथा
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समाज की सभ्यता का अर्थ है—जीवन के व्यवहारों को सरल, सुलभ बनाने वाली भाषा।

श्याम मनोहर
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शिल्प या भाषा वहीं कठिनाई उत्पन्न करते हैं, जहाँ वे कविता के रचनात्मक तर्क से निकले हुए नहीं लगते—कथ्य पर उपर से आरोपित लगते हैं, या फिर वहाँ; जहाँ कवि के पास भाषा और शिल्प तो हो, पर ज़रूरी कुछ कहने को न हो।

कुँवर नारायण
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समय, गति, परिवर्तन, आत्मा, मन, रचनाशीलता आदि की प्रकृति को विज्ञान जब भी समझने चलता है, तो उसकी विचार-पद्धति और भाषा चल को अचल में बदल देती है—जबकि रचना-शक्ति एक निरंतर प्रवाहित ऊर्जा है।

कुँवर नारायण
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छायावाद के कवि शब्दों को तोलकर रखते थे, प्रयोगवाद के कवि शब्दों को टटोल कर रखते थे, नई कविता के कवि शब्दों को गोलकर रखते थे—सन् साठ के बाद के कवि शब्दों को खोल कर रखते हैं।

धूमिल
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हिंदी की सेवा का अर्थ है, उस मानव-समाज की सेवा, जिसके विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम हिंदी है। मनुष्य ही बड़ी चीज़ है, भाषा उसी की सेवा के लिए है। साहित्य-सृष्टि का भी यही अर्थ है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी
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अनुप्रास और यमक आदि शब्दाडंबर कविता के आधार नहीं, जो उनके न होने से कविता निर्जीव हो जाए, या उससे कोई अपरिमेय हानि पहुँचे। कविता का अच्छा या बुरा होना विशेषतः, अच्छे अर्थ और रस-बाहूल्य पर अवलंबित है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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किसी देश की शब्द-परंपरा अर्थात् भाषा; कुछ काल तक चलकर जो अर्थ विधान करती है, वही उस देश का साहित्य कहलाता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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संतोष की भाषा धीमी होती है, क्योंकि वह शब्दों और मौन दोनों में व्यक्त होती है।

रघुनाथ चौधरी
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ईश्वर जब हमारी भाषाएँ नहीं समझता तो हमारी प्रार्थनाएँ क्या समझता होगा? पर अगर ईश्वर इतनी सारी भाषाओं में कवियों की प्रार्थनाएँ समझता है, तो ईश्वर सबसे बड़ा अनुवादक है। उसका अनुवाद अनुभाग, सर्वाधिक संवेदनशील और सबसे एक साथ संवाद जारी रखने में सक्षम एवं सक्रिय है। हो सकता है उसका कोई प्रवक्ता आकर कहे कि ईश्वर पर नहीं, अपनी भाषा पर संदेह करो।

लीलाधर जगूड़ी
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क्या हमें किसी ऐसे व्यक्ति की कल्पना नहीं करना चाहिए, जिसने कभी संगीत नहीं सुना हो, और जो एक दिन अचानक शोपां की कोई अंतर्गुम्फित रचना सुने और यह मान बैठे कि यह एक ऐसी गुप्त भाषा है, जिसके अर्थों को दुनिया उससे छुपाए रखना चाहती है?

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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भाषा बोलना एक दुनिया और एक संस्कृति को अपनाना है।

फ्रांत्ज़ फ़ैनन
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प्रत्येक भाषा आपको वास्तविकता के अपने हिस्से तक पहुँच प्रदान करती है।

यून फ़ुस्से
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हमें अंग्रेज़ी की आवश्यकता है, किंतु अपनी भाषा का नाश करने के लिए नहीं।

महात्मा गांधी
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आध्यात्मिक भोजन के लिए भी भारत के लोग जिस दिन अंग्रेज़ी का मुँह देखेंगे, उस दिन उनके डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी काफ़ी होगा। अंग्रेज़ी सीखिए-सिखाइए लेकिन उसे विश्वविद्यालयों में शिक्षा का माध्यम क्यों बनाते हैं?

रामविलास शर्मा
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आजकल सत्ता की भाषा काफ़ी नम्र हो चली है और जिसे दबाया जाता है, उसे 'उसी के हित में' दबाया जाता है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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जो कवि अच्छी शब्द-स्थापना करना नहीं जानता; अथवा यों कहिए कि जिसके पास काफ़ी शब्द-समूह नहीं है, उसे कविता करने का परिश्रम ही न करना चाहिए।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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कोई भी क्रांतिकारी विचारक केवल इस कारण कवि नहीं होता कि वह नवीन चिंतन करता है, या उसके शब्द सत्य की गहन झलक प्रस्तुत करते हैं; बल्कि इसलिए भी कि उसकी भाषा में एक सहज लय विद्यमान होती है, जो शाश्वत संगीत की प्रतिध्वनि-सी प्रतीत होती है।

पी. बी. शेली
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कविता वैसे भी अन्य शाब्दिक कलाओं की अपेक्षा, सबसे ज़्यादा अपनी भाषाई संस्कृति से घनिष्ठ होती है।

कुँवर नारायण
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‘चित्र’ ने हमें बाँध लिया है। और हम उससे बाहर नहीं निकल सकते क्योंकि वह हमारी भाषा में ही था और हमें ऐसा लगता है कि भाषा इसे निरपवाद रूप से दुहराती रहती है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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कविता भाषा में बँधती है और भाषा जीवन से बँधती है—जीवित वर्तमान के अनुभव तथा उन स्मृतियों के रूप में, जिन्हें वह झटककर अपने से अलग नहीं कर सकता।

कुँवर नारायण
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एक कलाकृति की सतह; उसकी भाषा के दृश्य-संकेत, उतना ही बड़ा सत्य है—जितनी उसके अर्थ की गहराई। दोनों अभिन्न रूप से कला के सम्मुख सत्य के साथ जुड़े हैं; बिना एक को जाने दूसरे को जानना असंभव है। दरअसल कला का रहस्य दोनों के अंतर्निहित रिश्ते में वास करता है।

निर्मल वर्मा
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सभ्य समाज की जो भाषा हो, उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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तुम्हारे चरित्र के किसी भी उदाहरण से यदि किसी का मंगल हो, तो उससे उसको गुप्त मत रखो। तुम्हारा सत्स्वभाव कर्म में प्रस्फ़ुटित हो, किंतु अपनी भाषा में व्यक्त न हो, नज़र रखो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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सूरदास की काव्यभाषा रूपक-प्रधान भाषा है।

मैनेजर पांडेय
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हमारी राष्ट्र-भाषा वही हो सकती है, जो देवनागरी और उर्दू—दोनों लिपियों में लिखी जाती है।

महात्मा गांधी
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सूर की भाषा बहुत चलती हुई और स्वाभाविक है। काव्यभाषा होने से यद्यपि उसमें कहीं-कहीं संस्कृत के पद; कवि के समय से पूर्व के परंपरागत प्रयोग तथा ब्रज से दूर-दूर के प्रदेशों के शब्द भी आ मिले हैं, पर उनकी मात्रा इतनी नहीं है कि भाषा के स्वरूप में कुछ अंतर पड़े या कृत्रिमता आवे।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere