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आनंद पर उद्धरण

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आनंदविहीन मंगलभावना स्वयं बुझ जाती है, तथा व्यक्ति में श्रेष्ठता की भावना जाती है।

मैनेजर पांडेय
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जब कोई रस से उत्पन्न सौंदर्य के अनुभव का आनंद लेता है, उसी क्षण 'संसार' विलीन हो जाता है।

दुर्गा भागवत
  • संबंधित विषय : रस
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हमारे हृदय में ज्ञान, प्रेम और कर्म का जिस मात्रा में पूर्ण मिलन होता है, उसी मात्रा में हमारे हृदय में पूर्ण आनंद रहता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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कविता प्रत्येक वस्तु को मनोहरता में रूपांतरित कर देती है। वह सुंदरतम वस्तु की आभा को और अधिक दीप्त कर देती है तथा जो सबसे विकृत है, उसमें भी सौंदर्य का संचार कर देती है। वह उल्लास और भय, विषाद और आनंद, शाश्वतता और परिवर्तन—इन सभी विरोधी तत्त्वों को एक सूत्र में बाँध देती है। अपने कोमल अनुशासन के अंतर्गत वह समस्त विसंगतियों को सामंजस्य में परिवर्तित कर लेती है। जिस किसी वस्तु को कविता स्पर्श करती है, उसका रूपांतरण हो जाता है। उसकी ज्योति में आने वाली हर चीज़ उसकी संवेदना से अनुप्राणित होकर नया स्वरूप ग्रहण कर लेती है। उसकी अद्भुत शक्ति जीवन की ओर अग्रसर विष को भी अमृत में परिणत कर देती है। वह संसार पर पड़ी जड़ अभ्यस्तता की परत को भेदकर वस्तुओं के आत्मस्वरूप में निहित उस एकाकी और सुप्त सौंदर्य को दृश्य कर देती है।

पी. बी. शेली
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नागरक को चाहिए कि वह महीने में एक-दो बार किसी निश्चित तिथि को सुंदर वेश-भूषा से सज-धज कर, घोड़े पर चढ़कर, नौकर-चाकरों तथा वेश्याओं के साथ उद्यान-यात्रा के लिए प्रस्थान करे। वहाँ पहुँच कर नित्यकर्म का संपादन कर मुर्ग़ा, तित्तर, बटेर, बुलबुल आदि पालतू पक्षियों की युद्धकला देखे; जूआ, शतरंज आदि खेलों को खेलते हुए वेश्याओं के साथ मनोरंजन का सुख अनुभव करे, फिर शाम को घर लौट आए।

वात्स्यायन
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ज्ञान, प्रेम और शक्ति—इन तीन धाराओं का जहाँ एक साथ संगम होता है, वहीं पर आनंदतीर्थ बन जाता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जब कोई पुरुष किसी महिला से प्रेम करता है, तो वह प्रेम और संतुष्टि से दमकने लगती है।

जॉन ग्रे
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किसी भी इंसान की ख़ुशी के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि उसे अपनी स्वाभाविक इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने की स्वतंत्रता हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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हमें समग्र के लिए अंश का त्याग करना है―नित्य के लिए क्षणिक का, प्रेम के लिए अहंकार का, आनंद के लिए सुख का त्याग करना है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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मनुष्य के अंत:करण का धर्म यही है कि वह परिश्रम से केवल सफलता नहीं, बल्कि आनंद भी प्राप्त करता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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कामोपभोग का लक्ष्य सुखप्राप्ति है तथा धर्म और अर्थ का फल भी सुखप्राप्ति है।

वात्स्यायन
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खाना और पढ़ना दो सुख हैं जो अद्भुत रूप से समान हैं।

सी. एस. लुईस
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ख़ुशी का पूरा आनंद लेने के लिए आपके पास इसे बाँटने वाला कोई होना चाहिए।

मार्क ट्वेन
  • संबंधित विषय : सुख
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जो सचमुच में रूपदक्ष होते हैं, उनके आनंद की कोई सीमा नहीं रहती है, आँख, मन सभी के द्वारा वे एक रूप चिरकाल तक नए-नए रूपों में अचरज भरे भाव से देखते जाते हैं।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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जितनी अधिक अस्पष्टता होगी, आनंद उतना ही अधिक होगा।

मिलान कुंदेरा
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संसार का चमत्कार यह नहीं है कि यहाँ कष्ट और बाधाएँ हैं, बल्कि इसमें है कि यहाँ व्यवस्था, सौंदर्य, आनंद, कल्याण और प्रेम का वास है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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आनंद से अलग होकर कला नहीं हो सकती। लेकिन साथ ही, मनुष्यों के लिए भलाई करना नहीं भूल सकते।

ऋत्विक घटक
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स्त्री-पुरुष का संभोगसुख, लज्जा और लोकभय से परतंत्र होता है अर्थात् उनमें लोक-लज्जा और लोक-भय होता है, वे स्वतंत्र रूप से संभोग में प्रवृत्त नहीं होते। अतः उसके लिए उपायों की अपेक्षा होती है और उन उपायों का ज्ञान शास्त्र से होता है।

वात्स्यायन
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प्रेमानंद में प्रेमी अपनी आत्मा का प्रिय की आत्मा से संयोग करता है।

मैनेजर पांडेय
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ज्ञान की भित्ति अगर कठोर होती, तो वह एक बेतुका स्वप्न बन जाता और आनंद की भित्ति अगर कठोर होती, तो वह सरासर पागलपन बन जाता।

रवींद्रनाथ टैगोर
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अंतर में जो ऐक्य है, जो योग है, उसमें ही परमानंद है। इसको प्राप्त करना ही यथार्थ ज्ञान है।

आचार्य क्षितिमोहन सेन
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अपराह्न में तीसरा पहर गोष्ठी-विहार में जाने के लिए उपयुक्त है। नागरक को वहाँ वस्त्रालंकार से सज-धज कर जाना चाहिए।

वात्स्यायन
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किलकिंचित विलास से शिथिल हो प्रियतमा के संग रहना, कान से कोकिला के शब्द की कलकलाहट सुनना और चाँदनी का सुख उठाना—ऐसी सामग्री से चैत्रमास की विचित्र रातें, किसी पुण्यवान् के हृदय और नेत्रों को सुख देती हुई बीतती हैं।

भर्तृहरि
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आत्मा से संयुक्त एवं मन से अधिष्ठित श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण आदि पाँच ज्ञानेंद्रियों की अपने-अपने विषयों में जो अनुकूल प्रवृत्ति है—वही 'काम' है।

वात्स्यायन
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दुनिया को झपट्टा मार कर हमला करने और आनंद लेने के लिए बनाया गया है, और पीछे हटने के लिए कोई वजह नहीं है।

ऐनी एरनॉ
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जीवन-व्यापार में मनोरंजन हेतु, पाँच प्रकार की क्रीड़ाओं में नागरक के प्रवृत्त होना चाहिए—घटानिबंध, गोष्ठीसमवाय, समापानक, उद्यानगमन और समस्याक्रीड़ा।

वात्स्यायन
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तुम लाख़ गप करो; किंतु प्रकृत-उन्नति नहीं होने पर, तुम प्रकृत-आनंद कभी भी लाभ नहीं कर सकते।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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आनंद का जन्मदाता है रस, रस की सृष्टि करती है 'कला'।

देवीशंकर अवस्थी
  • संबंधित विषय : कला
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संकोच ही दुःख है, और प्रसारण ही है सुख। जिससे हृदय में दुर्बलता आती है, भय आता है—उसमें ही आनंद की कमी है और वही है दुःख।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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मुझे लगता है कि मानवता भूल गई है—यह ग्रह आनंद के लिए है।

एलिस वॉकर
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आलिङ्गनादि प्रासाङ्गिक सुख से अनुविद्ध; स्तनादि विशेष अंगो के स्पर्श से जो फलवती अर्थप्रतिति, अर्थात वास्तविक सुखोपलब्धि होती है—वह 'काम' है।

वात्स्यायन
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जिस आनंद से कर्म की उत्तेजना होती है और जो आनंद कर्म करते समय तक बराबर चला चलता है, उसी का नाम उत्साह है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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रसविधायक कवि का काम श्रोता या पाठक में भावसंचार करना नहीं, उसके समक्ष भाव का रूप प्रदर्शित करना है, जिसके दर्शन से श्रोता के हृदय में भी उक्त भाव की अनुभूति होती है, जो प्रत्येक दशा में आनंदस्वरूप ही रहता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
  • संबंधित विषय : कवि
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जहाँ हम अपने को भूल जाते हैं और समष्टि में लीन हो जाते हैं, वहाँ आनंद हासिल होता है। वह समष्टि जितनी संकुचित होगी, उतना आनंद ही संकुचित होगा।

विनोबा भावे
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उत्साह एक यौगिक भाव है, जिसमें साहस और आनंद का मेल रहता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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शिशु का जन्म आनंद में होता है, केवल कार्य-कारण में ही नहीं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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प्रेमी प्रिय में अपनी आत्मा को ही खोजता और पाता है।

मैनेजर पांडेय
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प्रेमकाल जीवन का आनंद काल ही है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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सबको आनंद देने वाली जो कला है, वही सही कला है। उसी तरह से जो आनंद हमें संस्कृति की ओर ले जाएगा, वही सही आनंद है।

विनोबा भावे
  • संबंधित विषय : कला
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जब तक आनंद का लगाव किसी क्रिया, व्यापार या उसकी भावना के साथ नहीं दिखाई पड़ता, तब तक उसे 'उत्साह' की संज्ञा प्राप्त नहीं होती।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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आत्मा यहाँ अपने आनंद के लिए है।

रूमी
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दर्शनशास्त्र के मत में एक ऐसा आनंद है, जो निरपेक्ष और अपरिणामी है। वह आनंद हमारे ऐहिक सुखोपभोग के समान नहीं है, तो भी वेदांत प्रमाणित करता है कि इस जगत् में जो कुछ आनंदकारी है; वह उसी यथार्थ आनंद का अंश मात्र है, क्योंकि एकमात्र उस आनंद का ही वास्तविक अस्तित्व है।

स्वामी विवेकानन्द
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अगर हम कुल आनंद का पृथक्करण करें, तो मालूम होगा कि जितने अंश में हम अपने को भूल जाते हैं; सारी दुनिया में लीन हो जाते हैं, उतने अंश में आनंद हासिल होता है।

विनोबा भावे
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भविष्य चाहे जितना भी सुखद हो, उस पर विश्वास करो, भूतकाल की भी चिंता करो, हृदय में उत्साह भरकर और ईश्वर पर विश्वास कर वर्तमान में कर्मशील रहो।

हेनरी वड्सवर्थ लॉन्गफ़ेलो
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वर्षा से दो विशेष प्रसन्न होते हैं—कवि और चोर।

श्रीलाल शुक्ल
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कवि को यदि रचना की प्रक्रिया से अलौकिक आनन्द की प्राप्ति नहीं हो, तो उसकी कविता से पाठकों को भी आनन्द नहीं मिलेगा। कला की सारी कृतियाँ पहले अपने-आपके लिए रची जाती हैं।

रामधारी सिंह दिनकर
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यदि कोई स्त्री लकड़ी के बने हुए कृत्रिम लिंग से संतुष्ट हो, तो लकड़ी के लिंग का प्रयोग करना चाहिए।

वात्स्यायन
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प्रायः धनी लोगों की अनेक स्त्रियाँ निरंकुश होती हैं। बाहरी सुखभोग प्राप्त होने पर भी, आंतरिक सुख अर्थात् संभोग रूप सुख से रहित होती हैं।

वात्स्यायन
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बृहद अर्थ में सुख अथवा मंगल वह अवस्था है, जिसकी प्राप्ति की आकांक्षा एक संवेदनशील और बुद्धिमान प्राणी का चेतनाशील मन करता है और जिसे पाकर वह संतोष का अनुभव करता है। सुख मुख्यतः दो प्रकार का माना जा सकता है—एक वह जो स्थायी, सार्वभौमिक और चिरस्थायी होता है; दूसरा वह जो क्षणभंगुर और सीमित होता है। उपयोगिता का संबंध या तो उस प्रथम प्रकार के सुख को उत्पन्न करने वाले साधनों से हो सकता है, अथवा दूसरे प्रकार से। यदि इसे पहले अर्थ में समझा जाए, तो जो कुछ हमारी भावनाओं को अधिक दृढ़ और निर्मल बनाता है, कल्पना का विस्तार करता है तथा चेतना को अधिक सजीव और प्रेरणामय बनाता है, वही वास्तव में उपयोगी कहलाने योग्य है।

पी. बी. शेली
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सुख के समय थोड़ा-थोड़ा आँखों को बंद कर, जो सुख का अनुभव दो युवा प्रेमियों को होता है—वह वास्तव में कामदेव का पुरुषार्थ है।

भर्तृहरि

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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