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कविता पर उद्धरण

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कवि को लिखने के लिए कोरी स्लेट कभी नहीं मिलती है। जो स्लेट उसे मिलती है, उस पर पहले से बहुत कुछ लिखा होता है। वह सिर्फ़ बीच की ख़ाली जगह को भरता है। इस भरने की प्रक्रिया में ही रचना की संभावना छिपी हुई है।

केदारनाथ सिंह
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भाषा के पर्यावरण में कविता की मौजूदगी का तर्क जीवन-सापेक्ष है : उसके प्रेमी और प्रशंसक हमेशा रहेंगे—बहुत ज़्यादा नहीं, लेकिन बहुत समर्पित!

कुँवर नारायण
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विषम समयों में कविता की चुप्पी भी एक चीत्कार की तरह ध्वनित होती रही है। यह चुप्पी केवल कविता की चुप्पी नहीं, एक सामाजिक चेतना की घुटन भरी चीख़ है।

कुँवर नारायण
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कविता का एक मतलब यह भी है कि आप आज तक और अब तक कितना आदमी हो सके।

धूमिल
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अपनी व्यक्तिगत सत्ता की अलग भावना से हटाकर; निज के योगक्षेम के संबंध से मुक्त करके, जगत् के वास्तविक दृश्यों और जीवन की वास्तविक दशाओं में जो हृदय समय-समय पर रमता रहता है, वही सच्चा कविहृदय है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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रचना-प्रक्रिया के भीतर केवल भावना, कल्पना, बुद्धि और संवेदनात्मक उद्देश्य होते हैं; वरन वह जीवनानुभव होता है जो लेखक के अंतर्जगत का अंग है, वह व्यक्तित्व होता है जो लेखक का अंतर्व्यक्तित्व है, वह इतिहास होता है जो लेखक का अपना संवेदनात्मक इतिहास है और केवल यही नहीं होता।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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‘यह सुरक्षित कुसुम ग्रहण करने योग्य है; यह ग्राम्य है, फलतः त्याज्य है; यह गूँथने पर सुंदर लगेगा; इसका यह उपयुक्त स्थान है और इसका यह’—इस प्रकार जैसे पुष्पों को भली-भाँति पहचानकर माली माला का निर्माण करता है, उसी प्रकार सजग बुद्धि से काव्यों में शब्दों का विन्यास करना चाहिए।

भामह
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कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर; लोकसामान्य भावभूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत् की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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दरअसल इस संक्राति-युग में भी; जो कवि मध्यवर्गीय मनःस्थिति को लेकर भावुकता से भरी हुई अनेक सफल कविताएँ लिख लेते हैं, उनके बारे में यह समझना चाहिए कि या तो वे वास्तविकता का अतिसरलीकरण करते हैं, अथवा वे उसकी उलझनों से घबड़ाकर ऊपरी सतह की रंगीनियों में रस लेते हैं।

नामवर सिंह
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एक सुभाषित है—'कवितारसमाधुर्य्यम् कविर्वेत्ति’, कविता का रस-माधुर्य सिर्फ़ कवि जानता है। ठीक उसी प्रकार सुर में सुर मिलना चाहिए, नहीं तो वाद्ययंत्र कहेगा ‘गा’ और गले से निकलेगा ‘धा’।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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जायसी की दृष्टि में प्रेम अत्यंत गूढ़ और अथाह है। ज़ाहिर है, ऐसे प्रेम की कविता लिखना भी आसान नहीं होगा।

मैनेजर पांडेय
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आत्मा की सब अनुभूतियाँ ऐस्थेटिक नहीं होतीं, इसलिए वे काव्य-रूप में व्यक्त नहीं होतीं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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महाकवि विद्यापति मध्यकाल के पहले ऐसे कवि हैं, जिनकी पदावली में जन-भाषा में जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है।

मैनेजर पांडेय
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भाषिक अभिव्यक्ति का रूप-रस, कविता द्वारा ही बचाया जा सकता है।

लीलाधर जगूड़ी
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सर्जक या रचनाकार के लिए ‘नॉनकन्फर्मिस्ट’ होना ज़रूरी है। इसके बिना उसकी सिसृक्षा प्राणवती नहीं हो पाती और नई लीक नहीं खोज पाती।

कुबेरनाथ राय
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अंतःकरण की वृतियों के चित्र का नाम कविता है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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दूसरे कवि अधिक-से-अधिक आँसुओं से प्रेम की कविता लिखते हैं, लेकिन जायसी ने आँखों से टपकने वाले लहू से प्रेम की कविता लिखी है।

मैनेजर पांडेय
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कविता आदमी को मार देती है। और जिसमें आदमी बच गया है, वह अच्छा कवि नहीं है।

धूमिल
  • संबंधित विषय : कवि
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कवि मात्र जन्म से ही कवि नहीं होता, उसे अभ्यास भी करना पड़ता है; किन्तु अभ्यास उन्हीं को फलता है, जो जन्म से भी कवि हैं।

रामधारी सिंह दिनकर
  • संबंधित विषय : कवि
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काव्यप्रणयन की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को व्याकरण का ज्ञान अर्जित करने का प्रयत्न करना चाहिए।

भामह
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ध्यान रखना चाहिए कि कवि किस सतह से बोल रहा है, यह हमेशा महत्वपूर्ण होता है और यही उसके निवेदनों या चित्रणों को द्योतित करता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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कविता एक सामूहिक उद्वेग और सामूहिक आवश्यकता की सहज अभिव्यक्ति है और यह व्यवस्था संपूर्ण रूप से वैयक्तिक है।

विजयदान देथा
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काव्य क्षेत्र में किसी 'वाद' का प्रचार, धीरे-धीरे उसकी सारसत्ता को ही चर जाता है। कुछ दिनों में लोग कविता लिखकर 'वाद' लिखने लगते हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कविता में कहाँ कितना फ़्रॉड होता है, यह मैं जानता हूँ। फ़्रॉड को आप कौशल भी कह सकते हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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कविता तो जीवन का प्रमाण मात्र है। अगर आपका जीवनदीप अच्छी तरह से जल रहा है, तो कविता सिर्फ़ राख है।

लियोनार्ड कोहेन
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इधर जब से सांप्रदायिकता की महामारी फैली है और मस्जिद-मंदिर का झगड़ा खड़ा हुआ है; तब से कबीरदास का महत्त्व साधारण जनता के साथ-साथ, विद्वानों की भी समझ में आने लगा है।

मैनेजर पांडेय
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एक कवि सब कलाकारों का आदिस्वरूप होता है। कविता सब कलाओं की कला है।

ऋत्विक घटक
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सत्यकाव्य का प्रणयन पुरुषार्थचतुष्टय एवं कलाओं में निपुणता, आनंद और कीर्ति प्रदान करता है।

भामह
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कविता विचारहीन नहीं हो सकती, परंतु विचारात्मक प्रतिबद्धता को मैं कविता के लिए अनिवार्य नहीं मानता।

केदारनाथ सिंह
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रस ही कविता का सबसे बड़ा गुण है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • संबंधित विषय : रस
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जो कवि केवल सौंदर्य का प्रेमी है, वह शुद्ध कलाकार बन जाता है।

रामधारी सिंह दिनकर
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कविता ऐसे वाक्यांशों को बदल सकती है जो दुनिया को घुमाते हैं।

सामंथा हार्वे
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सन्निवेश के वैशिष्टय के कारण कभी-कभी सदोष कथन भी सुंदर बन जाता है—जैसे फूलों की माला के मध्य गूँथे हुए हरे पत्ते।

भामह
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कविता के रंग चित्रकला के प्रकृति-रंग नहीं होते।

राजकमल चौधरी
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कविता की रचना सुनने से जुड़ी है।

यून फ़ुस्से
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वह सभी उपन्यासों की नायिका थी, सभी नाटकों की नायिका थी, सभी काव्य-पुस्तकों की अस्पष्ट ‘वह’ थी।

गुस्ताव फ़्लॉबेयर
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जो केवल मुक्ताभास-हिमबिंदुमंडित मरकताभशाद्वलजाल, अत्यंत विशाल गिरिशिखर से गिरते हुए जलप्रपात के गंभीर गर्त से उगी हुई; सीकर नीहारिका के बीच विविध-वर्णस्फुरण की विशालता, भव्यता और विचित्रता में ही अपने हृदय के लिए कुछ पाते हैं, वे तमाशबीन हैं—सच्चे भावुक या सहृदय नहीं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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सूर को कबीर की तरह वात्सल्य और माधुर्य की अभिव्यक्ति के लिए; बालक तथा बहुरिया बनने की आवश्यकता नहीं है, और जायसी की तरह प्रेम की अलौकिक आभा दिखाने की चिंता भी नहीं।

मैनेजर पांडेय
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वैज्ञानिक वर्तमान युग बनाते हैं और कवि उनके भूत और भविष्य की आलोचना करते हैं—इसी मार्मिक और चुभने वाली आलोचना को कविता कहते हैं।

श्यामसुंदर दास
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सुंदर अर्थ की शोभा बढ़ाने में जो अलंकार प्रयुक्त नहीं, वे काव्यालंकार नहीं हैं। वे ऐसे ही हैं, जैसे शरीर पर से उतारकर किसी अलग कोने में रखा हुआ गहनों का ढेर। किसी भाव या मार्मिक भावना से असम्पृक्त अलंकार, चमत्कार या तमाशे हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कविता हमारे मनोभावों को उच्छ्वसित करके, हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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काव्य का स्वरूप लेखक की मर्ज़ी पर नहीं, रसिक की मर्ज़ी पर ही निर्भर रहता है।

विनोबा भावे
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छायावाद के कवि शब्दों को तोलकर रखते थे, प्रयोगवाद के कवि शब्दों को टटोल कर रखते थे, नई कविता के कवि शब्दों को गोलकर रखते थे—सन् साठ के बाद के कवि शब्दों को खोल कर रखते हैं।

धूमिल
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व्यक्तिवाद ने छायावादी कवि में यदि एक और वैयक्तिक अभिव्यक्ति की आकांक्षा उत्पन्न की, तो दूसरी ओर संपूर्ण दृष्टिकोण को व्यक्तिनिष्ठ बना दिया।

नामवर सिंह
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कविता की अनैतिकता को लेकर किए गए सारे सवाल, दरअस्ल इस भ्रम पर आधारित हैं कि कविता इंसान के नैतिक विकास को किस तरह सहायता प्रदान करती है। नैतिक शास्त्र उन तत्त्वों को क्रमबद्ध करता है; जिसे कविता तैयार करती है, वह सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों की रूपरेखा तैयार करता है तथा आदर्श प्रस्तुत करता है। परंतु केवल श्रेष्ठ सिद्धांतों के अभाव के कारण ही लोग एक-दूसरे से नफ़रत नहीं करते, एक-दूसरे को हीन नहीं मानते, बुराई नहीं करते, छल नहीं करते और एक-दूसरे को ग़ुलाम नहीं बनाते। कविता का प्रभाव एक भिन्न और लगभग ईश्वरीय रीति से कार्य करता है। वह हमारे दिमाग़ को उन अनगिनत विचारों और संभावनाओं का केंद्र बना देती है, जिन्हें अन्यथा हम समझ नहीं पाते।

पी. बी. शेली
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अनुप्रास और यमक आदि शब्दाडंबर कविता के आधार नहीं, जो उनके होने से कविता निर्जीव हो जाए, या उससे कोई अपरिमेय हानि पहुँचे। कविता का अच्छा या बुरा होना विशेषतः, अच्छे अर्थ और रस-बाहूल्य पर अवलंबित है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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कविता विद्वान की कला है।

वॉलेस स्टीवंस
  • संबंधित विषय : कला
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कवि का काम तो शिक्षा देना है और दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से तो वह गान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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कविता प्रत्येक वस्तु को मनोहरता में रूपांतरित कर देती है। वह सुंदरतम वस्तु की आभा को और अधिक दीप्त कर देती है तथा जो सबसे विकृत है, उसमें भी सौंदर्य का संचार कर देती है। वह उल्लास और भय, विषाद और आनंद, शाश्वतता और परिवर्तन—इन सभी विरोधी तत्त्वों को एक सूत्र में बाँध देती है। अपने कोमल अनुशासन के अंतर्गत वह समस्त विसंगतियों को सामंजस्य में परिवर्तित कर लेती है। जिस किसी वस्तु को कविता स्पर्श करती है, उसका रूपांतरण हो जाता है। उसकी ज्योति में आने वाली हर चीज़ उसकी संवेदना से अनुप्राणित होकर नया स्वरूप ग्रहण कर लेती है। उसकी अद्भुत शक्ति जीवन की ओर अग्रसर विष को भी अमृत में परिणत कर देती है। वह संसार पर पड़ी जड़ अभ्यस्तता की परत को भेदकर वस्तुओं के आत्मस्वरूप में निहित उस एकाकी और सुप्त सौंदर्य को दृश्य कर देती है।

पी. बी. शेली
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कविता तार्किक नहीं होती, जिसका मनचाहा उपयोग किया जा सके।

पी. बी. शेली

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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