जनता की, जनता के द्वारा, जनता के लिए सरकार कैसे अपने ही लिए हो जाती है—यह अब्राहम लिंकन को नहीं मालूम था, हमें मालूम है।
कोई-कोई सनकी राजा ऐसे होते थे कि अपने नौकर को कोड़ों से ख़ूब पीटते थे, मगर उनकी चिकित्सा के लिए डॉक्टर तैयार रखते थे। अपनी सरकार भी सनकी ज़मींदार है। शिक्षक को ख़ूब कष्ट होने देगी, मगर कल्याण-निधि ज़रूर खोल देगी।
तबादले की एक बँधी-बँधाई नैतिक पद्धति है। अफ़सर या मंत्री से संबंध होने से तबादले होते हैं। फिर तबादले करने के रेट बँधे हैं। लोककर्म विभाग के रेट ऊँचे हैं, शिक्षा-विभाग के रेट कम हैं—यह एक ईमानदार प्रक्रिया है।
स्त्रियों को सरकार के विचार-विमर्श में बिना किसी प्रत्यक्ष हिस्सेदारी के मनमाने ढंग से शासित किए जाने के बजाय उनके प्रतिनिधि सरकार में होने चाहिए।
समस्त अत्याचारी सरकारें एक दूसरे का उपकार करने के लिए सदा तैयार रहती ही हैं।
अब कोई आदमी सुरक्षित नहीं है। एक दिन ऐसा आएग, जब इस देश के आधे आदमियों की जाँच हो रही होगी और बाक़ी आधे जाँच कमीशनों में होंगे।
किसी सरकार या पार्टी को वे लोग मिलते हैं, जिनके वे हक़दार होते हैं और जल्द या बाद में लोगों को वह सरकार मिलती है, जिसके वे हक़दार होते हैं।
सरकार का विरोध करना भी, सरकार से लाभ लेने और उसमें संरक्षण प्राप्त करने की एक तरक़ीब है। लेखक न अब 'बेचारा' रह गया है, न भोला। वह जानता है कि सरकार का विरोध करने से कभी-कभी समर्थन से अधिक फ़ायदे मिलते हैं।
आज राजा का राज्य उस समय तक है, जब तक वह प्रजा के अनुसार चलता है।
सरकार से भ्रष्टाचार की शिकायत करोगे तो, भ्रष्टाचार बंद नहीं करेगी—कमेटी बिठाएगी। अन्नाभाव की शिकायत करोगे, तो अन्न पैदा नहीं कराएगी—अन्न कमेटी बिठाएगी। सरकारी काम ऐसा ही होता है।
यदि सरकार सहिष्णु होती है, तो जनता बुरे मार्गों से दूर रहती है। यदि सरकार की तरफ़ से अनावश्यक हस्तक्षेप होता है, तो लोग शासन को नियमों का उलंघन करने लगते हैं।
जो सरकार अपने क़ानून तोड़ देती है, वह आपको भी आसानी से तोड़ सकती है।
चतुर सरकार मुँह पर कपड़ा डालकर, लचकती-फचकती फ़ूर्ती से कमीशन की गली से निकल जाती है, और उधर समस्याएँ हुड़दंग करती रहती हैं।
भविष्य परमेश्वर के हाथ में है, सरकार के हाथ में नहीं है।
जनता अपने भाग्य की आप मालिक है। वह अपने कामों को आप करेगी, व्यक्ति या समूह उस पर आज्ञा नहीं चला सकेंगे। उसकी आज्ञा के सामने सम्राट और भिखारी दोनों बराबर होंगे।
सरकार ने हरिजनों व आदमियों की समस्या पर इस तरह कमीशन बिठाया है, जैसे अभी पहली बार मालूम हुआ है कि कुछ ऐसे प्राणी भी हैं, जो हरिजन और आदिवासी कहलाते हैं।
सड़क पर दंगा होता हो, तो चतुर आदमी गली में से निकल जाता है। कमीशन वह गली है, जिसमें से सरकार छिपकर निकल जाती क्योंकि आम सड़क पर समस्याएँ जमघट किए हैं।
अनंत स्केंडल हैं इस पवित्र भूमि में। हिमालय जिसका मुकुट है, जिसके चरण सागर धोता है, गंगा-यमुना जिसके हृदय प्रदेश में शोभित हैं, जिसमें राम और कृष्ण जैसे अवतार हुए, जिसमें दुर्योधन, शकुनि, विभीषण पैदा हुए—उस देव-भूमि में सरकार बदलने से स्केंडल नहीं रुक सकते।
सरकार इस तरह कमीशन बिठाती है, जैसे हम कुल्ला करते हैं। जाँच कमीशन सरकार का कुल्ला ही है। मुँह साफ़ करने के लिए कुल्ला कर लिया, और नक़ली दाँतों का सेट लगा लिया।
जिस राजा का व्यवहार ऐसे प्रत्येक कार्य से भरा है, जो अत्याचार की व्याख्या है—वह स्वतंत्र जाति का शासक होने योग्य नहीं है।
सरकार कहती है; मक्खी मारो, मगर मक्खी बची हों तो मारें। सचिवालय से लेकर तहसील तक इतने कर्मचारी मक्खी मारा करते हैं कि अब मारने के लिए मक्खी ढूँढ़नी पड़ेगी।
पार्लियामेंट का काम इतना सरल होना चाहिए कि दिन-ब-दिन उसका तेज बढ़ता जाए और लोगों पर उसका असर होता जाए, लेकिन इससे उल्टे इतना तो सब क़ुबूल करते हैं कि पार्लियामेन्ट के मेम्बर दिखावटी और स्वार्थी पाये जाते हैं।
जब मैं विदेश में रहता हूँ, तो मेरा यह नियम है कि अपने देश की सरकार की आलोचना या उस पर प्रहार नहीं करता। जब मैं स्वदेश वापस आता हूँ तो खोए समय की कमी पूरी कर लेता हूँ।
सत्तातंत्र द्वारा तथाकथित ‘सांस्कृतिक विकास’ के नाम पर संस्कृति को संरक्षण दिए जाने के ख़तरे स्पष्ट हैं।
सरकारी व्यवस्था में काम करने वाले लोग, ताक़त के ऊँचे पदों तक पहुँचने से बहुत पहले ही मान लेते हैं कि कोई बड़ा परिवर्तन करना संभव नहीं है।
हिंसा की भूख और प्यास बढ़ाना सत्ता का कर्तव्य बन गया है।
जितना समय और पैसा पार्लियामेन्ट खर्च करती है, उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए।
जनता ग़रीबी से उबरने का रास्ता पूछती है, सरकार उसके हाथ में 'निरोध' का पैकेट थमा देती है।
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निस्संदेह सशक्त सरकार और राजभक्त जनता से उत्कृष्ट राज्य का निर्माण होता है। परंतु बहरी सरकार और गूँगे लोगों से लोकतंत्र का निर्माण नहीं होता।
प्राण लेने का अधिकार तो ईश्वर को है। सरकार की तोप बंदूक़ें हमारा कुछ नहीं कर सकतीं।
संस्कृति के उदात पक्षों के संरक्षण और उसके स्वस्थ विकास में, उपर्युक्त ख़तरों के बावजूद, सत्ता की एक निश्चित भूमिका है। पर विकृति वहाँ से शुरू होती है जब सत्तातंत्र और उसका एक विशिष्ट पुर्जा, यानी नौकरशाही अपने को संस्कृति का शास्ता और उद्धारक मानने लगती है और यह तय करने लगती है कि किसे उभारा जाए और किसे पछाड़ा जाए।
पुल पार उतरने के लिए नहीं, बल्कि उद्घाटन के लिए बनाए जाते हैं। पार उतरने के लिए उसका उपयोग हो जाता है—प्रासंगिक बात है।
पैसा खाने वाला सबसे डरता है। जो सरकारी कर्मचारी जितना नम्र होता है, वह उतने ही पैसे खाता है।
सत्तातंत्र कोई काम केवल ‘करणीयता के कारण ही कार्य है’—के सिद्धांत पर कार्य नहीं करता।
शराबियों की सरकार शराबबंदी नहीं करेगी। उसे अपनी आमदनी की चिंता है। शराब तो हमें ही बंद करनी होगी। इसके लिए शराब पीने वालों का बहिष्कार कीजिए।
उपाय अंततः वही अधिक सार्थक होगा जिसमें सरकारी प्रशासन से आत्मानुशासन के मूल्य पर अधिक बल हो।
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शराब पीने वाले का, पिलाने वाली सरकार का हमें बहिष्कार करना चाहिए।
जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता की सरकार।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere