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Vedvyas

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लोग, लोभ, काम, क्रोध, अज्ञान, हर्ष अथवा बालोचित चपलता के कारण धर्म के विरुद्ध कार्य करते तथा श्रेष्ठ पुरुषों का अपमान कर बैठते हैं।

जो अधिक धन या अधिक विद्या या अधिक ऐश्वर्य को प्राप्त करके भी गर्वरहित होकर व्यवहार करता है, उसी को पंडित कहा जाता है।

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जिस गृहस्थ का अतिथि पूजित होकर जाता है, उसके लिए उससे बड़ा अन्य धर्म नहीं है-मनीषी पुरुष ऐसा कहते हैं।

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घर आए व्यक्तियों को प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखे, मन से उनके प्रति उत्तम भाव रखे, मीठे वचन बोले तथा उठकर आसन दे। गृहस्थ का सही सनातन धर्म है। अतिथि की अगवानी और यथोचित रीति से आदर सत्कार करे।

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घर आए अतिथि को प्रसन्न दृष्टि से देखे। मन से उसकी सेवा करे। मीठी और सत्य वाणी बोले। जब तक वह रहे उसकी सेवा में लगा रहे और जब वह जाने लगे तो उसके पीछे कुछ तक जाए- यह सब गृहस्थ का पाँच प्रकार की दक्षिणा से युक्त यज्ञ है।

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अकेले स्वादिष्ट भोजन करे, अकेले किसी विषय का निश्चय करे, अकेले रास्ता चले और बहुत से लोग सोए हों तो उनमें अकेला जागता रहे।

यौवन, रूप, जीवन, धन-संग्रह, आरोग्य और प्रियजनों का समागम ये सब अनित्य हैं। विवेकशील पुरुषों को इनमें आसक्त नहीं होना चाहिए।

घर पर आए शत्रु का भी उचित आतिथ्य करना चाहिए। काटने के लिए आए हुए व्यक्ति पर से भी वृक्ष अपनी छाया को हटाता नहीं है।

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पिता स्त्री की कुमारावस्था में, पति युवावस्था में तथा पुत्र वृद्धावस्था में रक्षा करता है। स्त्री को स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए।

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जाति और कुल में सभी एक समान हो सकते हैं परंतु उद्योग, बुद्धि और रूप संपत्ति में सबका एक-सा होना संभव नहीं है।

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ब्राह्मण, गौ, कुटुंबी, बालक, स्त्री, अन्नदाता और शरणागत- ये अवध्य होते हैं।

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धर्माचरण द्वारा हल्के बने हुए पुरुष संसार सागर में जल में पड़ी नौका के समान तैरते रहते हैं, किंतु पाप से भारी बने हुए व्यक्ति पानी में फेंके गए शस्त्र की भाँति डूब जाते हैं।

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यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और निर्लोभता—ये धर्म के आठ प्रकार के मार्ग बताए गए हैं। इनमें से पहले चारों का तो कोई दंभ के लिए भी सेवन कर सकता है, परंतु अंतिम चार तो जो महात्मा नहीं है, उनमें रह ही नहीं सकते।

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बुद्धि से धन प्राप्त होता है और मूर्खता दरिद्रता का कारण है—ऐसा कोई नियम नहीं है। संसार चक्र के वृत्तांत को केवल विद्वान पुरुष ही जानते हैं, दूसरे लोग नहीं।

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हे राजा! धन से धर्म का पालन, कामना की पूर्ति, स्वर्ग की प्राप्ति, हर्ष की वृद्धि, क्रोध की सफलता, शास्त्रों का श्रवण और अध्ययन तथा शत्रुओं का दमन—ये सभी वही कार्य सिद्ध होते हैं।

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कामना, भय, लोभ अथवा जीवन-रक्षा के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। धर्म नित्य है जबकि सुख-दुःख अनित्य हैं, जीव नित्य है तथा बंधन का हेतु अनित्य है।

धर्म का पालन करते हुए ही जो धन प्राप्त होता है, वही सच्चा धन है जो अधर्म से प्राप्त होता है वह धन तो धिक्कार देने योग्य है। संसार में धन की इच्छा से शाश्वत धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए।

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प्रतिभाशालिनी बुद्धि बलवान को भी पछाड़ देती है। बुद्धि के द्वारा वर्धमान बल का पालन होता है। बढ़ता हुआ शत्रु भी बुद्धि के द्वारा परास्त होकर कष्ट उठाने लगता है। बुद्धि से सोचकर जो कर्म किया जाता है, वह सर्वोत्तम होता है।

जलती हुई आग से सुवर्ण की पहचान होती है, सदाचार से सत्य पुरुष की, व्यवहार से श्रेष्ठ पुरुष की, भय प्राप्त पर शूर की, आर्थिक कठिनाई में धीर की और कठिन आपत्ति में शत्रु एवं मित्र की परीक्षा होती है।

बलवान के साथ विरोध रखने वाले को, साधन-हीन दुर्बल मनुष्य को, जिसका सब कुछ हरण कर लिया गया है उसको, कामी को तथा चोर को रात में नींद नहीं आती।

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नीच कुल से भी उत्तम स्त्री को ग्रहण कर ले। विष के स्थान से भी अमृत मिले तो उसे पी ले, क्योंकि स्त्रियाँ, रत्न और जल ये धर्मतः दूषणीय नहीं होते।

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हे राजन्! साध्वी स्त्रियाँ 'महाभाग्यशालिनी होती हैं तथा संसार की माता समझी जाती हैं। वे अपने पतिव्रत के प्रभाव से वन और काननों सहित इस पृथ्वी को धारण करती हैं।

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जो धर्म करने के लिए धनोपार्जन की इच्छा करता है, उसका धन की इच्छा करना ही अच्छा है। कीचड़ लगा कर धोने की अपेक्षा मनुष्यों के लिए उसका स्पर्श करना ही श्रेष्ठ है।

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सारा जगत दंड से विवश होकर ही रास्ते पर रहता है क्योंकि स्वभावतः सर्वथा शुद्ध मनुष्य मिलना कठिन है। दंड के भय से डरा हुआ मनुष्य ही मर्यादा पालन में प्रवृत्त होता है।

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हे भारत! धर्म, अर्थ, भय, कामना तथा करुणा से दिया गया दान पाँच प्रकार का जानना चाहिए।

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जिसके पास धन होता है, उसी के बहुत से मित्र होते हैं। जिसके पास धन है, उसी के भाई-बंधु हैं। संसार में जिसके पास धन है, वही पुरुष कहलाता है। और, जिसके पास धन हैं, वही पंडित माना जाता है।

धन-संचय से ही धर्म, काम, लोक तथा परलोक की सिद्धि होती है। धन को धर्म से ही पाने की इच्छा करे, अधर्म से कभी नहीं।

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स्त्रियाँ घर की लक्ष्मी कही गई हैं। ये अत्यंत सौभाग्यशालिनी, आदर के योग्य, पवित्र तथा घर की शोभा हैं, अत: उनकी विशेष रूप से रक्षा करनी चाहिए।

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सज्जन पुरुषों के लिए दया करना ही महान् धर्म का लक्षण है।

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धन की इच्छा सबसे बड़ा दुःख है, किंतु धन प्राप्त करने में तो और भी अधिक दुःख है और जिसकी धन में आसक्ति हो गई है, उसे धन का वियोग होने पर उससे भी अधिक दुःख होता है।

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मनुष्य दूसरे के जिस कर्म की निंदा करे उसको स्वयं भी करे। जो दूसरे की निंदा करता है किंतु स्वयं उसी निद्य कर्म में लगा रहता है, वह उपहास का पात्र होता है।

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यदि धर्म को नष्ट किया जाए तो वह मनुष्य का नाश कर देता है। इसमें संशय नहीं है।

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लोकयात्रा का निर्वाह करने के लिए ही धर्म का प्रतिपादन किया गया है। सर्वथा हिंसा की जाए अथवा दुष्ट की हिंसा की जाए, यह प्रश्न उपस्थित होने पर जिसमें धर्म की रक्षा हो, वहीं कार्य श्रेष्ठ मानना चाहिए।

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कुछ विद्वानों का मत है कि वेदों में प्रतिपादित वस्तु ही धर्म है किंतु दूसरे लोग धर्म का यह लक्षण स्वीकार नहीं करते। हम किसी भी मत पर दोषारोपण नहीं करते। इतना अवश्य है कि वेद में सभी बातों का विधान नहीं है।

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धनंजय! किया हुआ पाप कहने से, शुभ कर्म करने से, पछताने से, दान करने से और तपस्या से भी नष्ट होता है।

यदि मनुष्य यथाशक्ति किसी धर्म-कार्य को करते हुए भी उसमें सफलता पा सके तो भी उसे उसका पुण्य अवश्य प्राप्त हो जाता है, इसमें मुझे संदेह नहीं है।

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राजन्! किसी समय धर्म ही अधर्म रूप हो जाता है। और कहीं अधर्म रूप दीखनेवाला कर्म ही धर्मरूप बन जाता है। इसलिए विद्वान पुरुष को धर्म और अधर्म का रहस्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।

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संसार में इससे बढ़कर हँसी की दूसरी बात नहीं हो सकती कि जो दुर्जन हैं, वे स्वयं ही सज्जन पुरुषों को 'दुर्जन' कहते हैं।

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मन, वचन और कर्म से सब प्राणियों के प्रति अद्रोह, अनुग्रह और दान—यह सज्जनों का सनातन धर्म है।

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अत्यंत लोभी का अर्थ और अधिक आसक्ति रखने वालों का काम—ये दोनों ही धर्म को हानि पहुँचाते हैं। जो मनुष्य काम से धर्म और अर्थ को अर्थ से धर्म और काम को तथा धर्म से अर्थ और काम को हानि पहुँचा कर धर्म, अर्थ और काम तीनों का यथोचित रूप से सेवन करता है, वह अतयंत सुख प्राप्त करता है।

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जिस चिह्न से जो देश युक्त होता है और जिससे जिसकी पहचान होती है, विद्वानों का कहना है कि उस देश का वही नाम रखना चाहिए।

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ज्ञान की अपेक्षा (परमेश्वर के स्वरूप का) ध्यान श्रेष्ठ है।

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जब संग्रह का अंत विनाश ही है, जब जीवन का अंत मृत्यु ही है और जब संयोग का अन्त वियोग ही है, तब इनमें कौन अपना मन लगावेगा?

राजन्! दूसरों की निंदा करना या चुग़ली खाना दुष्टों का स्वभाव ही होता है। श्रेष्ठ पुरुष तो सज्जनों के समीप दूसरों के गुणों का ही वर्णन करते हैं।

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राजन्! चाहे मनुष्य धन को छोड़े और चाहे धन ही मनुष्य को छोड़ दे—एक दिन ऐसा अवश्य होता है। इस बात को जानने वाला कौन मनुष्य धन के लिए चिंता करेगा?

(परमेश्वर के स्वरूप के) ध्यान की अपेक्षा कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है।

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प्राज्ञ पुरुष की वाणी के समान स्त्रियाँ स्वभाव से चंचल तथा दुःसेव्य होती हैं। उनका भाव जानना कठिन होता है।

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यदि धर्म का नाश किया जाए तो वह कर्ता को नष्ट कर देता है और रक्षित धर्म कर्ता की रक्षा करता है।

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धन प्राप्ति के सभी उपाय मन का मोह बढ़ाने वाले हैं। कृपणता, दर्प, अभिमान, भय और उद्वेग-इन्हें विद्वानों ने देहधारियों के लिए धनजनित दुःख माना है।

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जो वस्तु भविष्य में मिलने वाली है, उसे यही माने कि 'वह मेरी नहीं है' तथा जो मिलकर नष्ट हो चुकी हो, उसके विषय में भी यही भाव रखे कि 'वह मेरी नहीं थी'। जो ऐसा मानते हैं कि 'प्रारब्ध ही सबसे प्रबल है', वे ही विद्वान् हैं और उन्हें सत्पुरुषों का आश्रय कहा गया है।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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