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बच्चा एक अनकही कहानी होता है, उसकी कहानी हमारे दिए शब्दों में नहीं कही जा सकती। उसे अपने शब्द ढूँढ़ने का समय और स्थान चाहिए, ढूँढ़ने के लिए ज़रूरी आज़ादी और फ़ुर्सत चाहिए। हम इनमें से कोई शर्त पूरी नहीं करते। हम उन्हें अपने उपदेश सुनने से फ़ुर्सत नहीं देते, उन्हें सुनने की फ़ुर्सत हमें हो–यह संभव ही नहीं।

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नेता और अफ़सर और इनके चुने हुए विशेषज्ञ मिलकर तय करते है कि अब और कहाँ धरती का उत्पीड़न करना है ताकि कोई पैसा बनाए, कोई मौज करने आए, कोई कूड़ा बीनने, कोई सड़क बनाने।

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घबराहट का वक़्त है, इसे लोकतंत्र का उत्सव कहने वाला ज़रूर कोई घटिया कवि होगा।

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पीड़ा जिस वजह से होती है वह एक दिन या एक वर्ष में नहीं बनती। देह हो या देश, उसकी पीड़ा पैदा होने और पकने में लंबा समय लेती है। पीड़ा एक सिलसिले का नाम है।

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बच्चों को भाषा पढ़ाने का भला क्या मतलब हो सकता है, सिवाय इस दृष्टि-विस्तार के, क्योंकि भाषा तो वे पहले से जानते हैं। हमें पढ़ना-लिखना सिखाने के आग्रह को भाषा सिखाने का मुख्य उद्देश्य यही समझना चाहिए।

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संविधान सुधार दिया गया, उच्चतम न्यायालय कह चुका, पर हमें बच्चों की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही। वे हमारे बीच रहते हैं; हमारी परछाइयों के घेरे में क़ैद। परछाई से बाहर तभी जाने दिए जाते हैं जब परछाई उन पर पड़ चुकी होती है और उनकी आवाज़ पूरी तरह एक स्वीकृत ज़बान में गढ़ी जा चुकती है। क्या आश्चर्य कि ऐसे समाज में बाल साहित्य न्यून मात्रा में है।

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चाय ऐसा सर्वगुणसंपन्न पेय है कि उसका गिलास हाथ में लेते ही क्लांत पथिक तरोताज़ा हो जाता है।

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जो दृश्य हमें वैसे नहीं दिखता क्योंकि उस दृश्य में हम ख़ुद रहते हैं—रचनाकार दिखा देता है। इस तरह वह हमें एक नया मौक़ा देता है।

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रघुवीर सहाय का एक रूप आधुनिक मिज़ाज के प्रतिनिधि का है, दूसरा आधुनिकता के समीक्षक का।

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जगहों की दूरी आदिकाल से मानव को चिढ़ाती आई है। दूर-दूर जाने की इच्छा उतनी ही बलवती रही है जितनी दूरियों को घटाने की कोशिश।

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अनुभवहीनता से उत्पन्न गुंजाइश के मर्म में जीवन को राह दिखाने वाली ज्योति निवास करती है।

जब ग़ुलाम इतना सयाना और समझदार हो जाए कि बग़ावत पर आमादा हो जाए तो मालिक को नए सिरे से कल्पनाशील बनना पड़ता है।

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जनता अच्छी तरह जानती है कि नेता भावनाओं के व्यापारी होते हैं, फिर भी उनकी बातों में जाती है।

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हिंदी संघर्ष की भाषा रही है।

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कोई इलाक़ा कितना ही साधनहीन हो, उसके अभिजन उपभाग की विश्व-श्रृंखला से जुड़ेंगे और अपने साथ जीने वाले जनसामान्य से उनके संबंध कानूनी सुरक्षा और हिंसा की वैधता पर आधारित होंगे।

संचार के नज़रिए से देखें; तो भी पत्रकारिता की भूमिका में विखंडन ही ज़्यादा ठहरता है, जुड़ाव कम।

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किसी भाषा का भाग्य उसे बरतने वाले समाज के भाग्य से जुड़ा होता है। यद्यपि भाषा किसी समाज की तस्वीर ही नहीं; तक़दीर और उसे प्रभावित करने वाली तरक़ीब भी होती है, पर समाज का चरित्र; उसकी संरचना और वे परिस्थितियाँ जो संरचना पर असर डालती है, भाषा के स्वास्थ्य और भविष्य की दिशा बनाती है।

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'यूनिवर्सिटी' या 'विश्वविद्यालय' की अवधारणा शाब्दिक स्तर पर भी यह चेतावनी देती है कि शिक्षा के वैचारिक संसार की भौगोलिक सीमाएँ तय करना बेमानी है।

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राष्ट्र-निर्माण का काम जारी है, पर आज यह काम भाषा के कोमल आकर्षण से कहीं ज़्यादा बलशाली, धर्म और शत्रुता जैसे आवेगों की राजनीति कर रही है।

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जनता शिक्षित हो या अशिक्षित—स्मृति सबकी बराबर होती है।

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आधुनिक हिंदी के निर्माण में पत्रकारिता का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, पर आज पत्रकारिता हिंदी को प्रतिदिन क्षत-विक्षत करने की मुहिम बन गई है।

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हमारी ज़मीन में रसायनों का ज़हर इस क़दर फैल चुका है कि प्रकृति का स्वतंत्र जीवन-चक्र अब उसमें चल ही नहीं सकता।

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आधुनिक भारत का विकास; घरों के ख़ाली हो जाने की, परिवार के सिकुड़कर सूख जाने की कहानी है।

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देश-दुनिया में सर्वत्र छितरे व्यक्ति के निरुपायता—बोध की संचार की गति का प्रच्छन्न योगदान है।

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क़स्बे अब शहर बन गए हैं पर महानगरों के पास आने की जगह और दूर चले गए हैं, भले नई संचार व्यवस्था यह दावा करते नहीं थकती कि उसने भौगोलिक और सामाजिक दूरियाँ मिटा दी हैं।

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साहित्य उस जगह का नाम है जहाँ जाकर आप अनकही की अभिव्यक्ति के लिए शब्द ढूँढ़ सकते हैं।

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स्कूल में हर दौर का नाम होता था। हम जिस दौर में भागे जा रहे हैं, उसे क्या नाम दें—यह सवाल समाजशास्त्रीय दृष्टि से बड़ा महत्व रखता है। सरकारी लोग और आम समाज वैज्ञानिक इसे आधुनिकीकरण का नाम देते हैं।

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बहुत कम बच्चे इतनी हिंदी सीख पाएँगे कि वे निराला को पढ़कर ‘जागो फिर एक बार’ को अर्थ दे सकें।

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वह उत्तर प्रदेश जिसे मैं अपनी थाती समझकर प्यार करता था–सिर्फ़ किताबों में बचा है। मुझ तक वह पहुँचा भी किताबों के रास्ते था।

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इंतज़ार एक ऐसी अनुभूति है जिसे पूरी तरह ग्रहण करने के लिए संचार और यातायात के साधनों की कमी ज़रूरी है।

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हम बाल अधिकार की बात भले करें, रचना का बुनियादी अधिकार देने की मनस्थिति में हम फ़िलहाल नहीं हैं, क्योंकि रचना का अर्थ होता है–अपना मन ख़ुद बनाने का अधिकार। इस अधिकार का उपयोग करना करना भी अधिकार में शामिल है।

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औरत पर संस्कृति का आतंक, हज़ारों साल पहले अग्नि-परीक्षा और चीरहरण जैसे प्रसंगों से स्थापित हो गया था।

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हमारी धरती एक बहुत बड़ी वेदना से गुज़री है और हम उस वेदना से बेख़बर रहते हुए जिए चले जा रहे हैं।

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स्याही और गोंद, काग़ज़ और लिफ़ाफ़ा और उस पर लगे टिकट—मेरी स्मृतियों में उतने ही ज़िंदा हैं जितना हमारे मुहल्ले का डाकिया।

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सरकारी व्यवस्था में काम करने वाले लोग, ताक़त के ऊँचे पदों तक पहुँचने से बहुत पहले ही मान लेते हैं कि कोई बड़ा परिवर्तन करना संभव नहीं है।

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किसी किसी जादू या टोने में यक़ीन किए बग़ैर, कवि या लेखक बने रहना शायद ही संभव हो।

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इतिहास की मुख्यधारा होने के नाते हम जानते थे कि विकास का स्वप्न निरापद नहीं होता। उसकी क़ीमत मनुष्य और समाज के अलावा प्रकृति को भी देनी पड़ती है।

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समाज का बीहड़ हमें हमेशा इतना डराए रखता है कि हम बग़ैर चौकन्ना हुए कभी कुछ कह नहीं सकते।

आतंक के आलावा सामूहिक निर्णय का बल और उसके आगे झुकने की विवशता भी बच्चों के समझ के बाहर की चीज़ है।

शब्दों की भारी फ़िज़ूलख़र्ची इस युग में हुई है, हो रही है, इस कारण शब्द की सार्थकता में अविश्वास बढ़ा है और निरे कर्म के प्रति आकर्षण इतना बढ़ा है कि कर्मी उन अच्छे-भले उद्यमों का अनिवार्य प्रत्यय बन गया है जिनमें पहले से कर्म की प्रधानता थी।

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पढ़ने का एक उद्देश्य उस सुख या आनंद की तलाश है जो केवल साहित्य दे सकता है।

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शिक्षा पकिस्तान में भारत के प्रति संदेह और घृणा फैलाने का साधन बनी रही है।

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कहानी का स्थान महज़ साहित्य की दृष्टि से केंद्रीय नहीं है, मनुष्य की सभ्यता में भी केंद्रीय है। सभ्यता की चर्चा करनी हो तो हमें एक कहानी के रूप में करनी होगी।

झूठ के सहारे जीवन की रक्षा या आततायी की हत्या करना–दर्शन तथा अध्यात्म के साए में ही सार्थक ठहर सकता है।

लिखना समय से संवाद करना है।

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लोकतंत्र का अर्थ अब एकछत्र सत्ता हो गया है, अभिव्यक्ति के मायने हैं प्रतिध्वनि, और अधिकार का नया समकालीन अर्थ है संकोच।

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कहानी का आकर्षण बुनियादी स्वभाव का अंग है और इस अंग का विकास बचपन में अपने आप शुरू हो जाता है।

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नदी के साथ चलना उन असंख्य चीज़ों की पुनर्रचना का अवसर बन जाता है, जिन्हें हम पहले से जानते रहे हैं।

दिनभर के सफ़र के बाद यात्री कहीं पहुँचता है तो उसे थकान के साथ संतोष महसूस होता है।

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हिंदी एक भाषा के अलावा एक चेतना का भी नाम थी जिसका रिश्ता राष्ट्रवाद की उठान से बैठ गया था। कालांतर में रिश्ता एक फंदा बन गया।

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