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धर्म पर उद्धरण

धारयति इति धर्म:—यानी

जिसने सब कुछ धारण कर रखा है, वह धर्म है। इन धारण की जाती चीज़ों में सत्य, धृति, क्षमा, अस्तेय, शुचिता, धी, इंद्रिय निग्रह जैसे सभी लक्षण सन्निहित हैं। धर्म का प्रचलित अर्थ ‘रिलीज़न’ या मज़हब भी है। प्रस्तुत चयन में धर्म के अवलंब पर अभिव्यक्त रचनाओं का संकलन किया गया है।

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धर्म का मुख्य स्तंभ भय है।

प्रेमचंद
  • संबंधित विषय : डर
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धर्म स्त्री पर टिका है, सभ्यता स्त्री पर निर्भर है और फ़ैशन की जड़ भी वही है। बात क्यों बढ़ाओ, एक शब्द में कहो—दुनिया स्त्री पर टिकी है।

जैनेंद्र कुमार
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धर्म के बिना तो हिंदुस्तान का या किसी भी देश का काम चल सकता है; लेकिन एक साझा मिथकावली के बिना, किसी देश का काम नहीं चल सकता।

राजेंद्र माथुर
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किसी भी धर्म में हुए प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन चरित्र में दोष मालूम होने पर, उस पर ज़ोर देकर उस धर्म को कोसना निंदकों का तरीक़ा है, परंतु ऐसे दोष को दूसरों के लिए आचरण में लाने के नियम की भाँति पेश करना अधर्म हैं और उसका विरोध किया जा सकता है।

महात्मा गांधी
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धर्म भय से ऊपर उठने का उपाय है; क्योंकि धर्म जीवन को जोड़ने वाला सेतु है।

ओशो
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अतिथि कैसा भी हो, उसका आतिथ्य करना श्रेष्ठ धर्म है।

अश्वघोष
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कोई समाज और धर्म स्त्रियों के नहीं। बहन! सब पुरुषों के हैं। सब हृदय को कुचलने वाले क्रूर हैं, फिर भी मैं समझती हूँ कि स्त्रियों का एक धर्म है, वह है आघात सहने की क्षमता रखना। दुर्देव के विधान ने उसके लिए यही पूर्णता बना दी है। यह उनकी रचना है।

जयशंकर प्रसाद
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यदि अन्य सभी धर्मग्रंथ जलकर भस्म हो जाएँ तो भी 'गीता' अमर गुटके के सात सौ श्लोक यह बताने के लिए काफ़ी हैं कि हिंदू धर्म क्या है और उसे जीवन में कैसे उतारा जा सकता है।

महात्मा गांधी
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शास्त्रों ने हमें दो बहुमूल्य वचन दिए हैं। उनमें से एक है—‘अहिंसा परमो धर्मः’ और दूसरा है—‘सत्यान्नास्ति परो धर्मः।’

महात्मा गांधी
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घुमक्कड़-धर्म ब्राह्मण-धर्म जैसा संकुचित धर्म नहीं है, जिसमें स्त्रियों के लिए स्थान नहीं हो। स्त्रियाँ इसमें उतना ही अधिकार रखती हैं, जितना पुरुष।

राहुल सांकृत्यायन
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मैं जीवन के बाद के जीवन की कल्पना नहीं कर पाता : जैसे ईसाई या अन्य धर्मों के लोग विश्वास रखते हैं और मानते हैं जैसे कि सगे-संबंधियों और दोस्तों के साथ हुई बातचीत जिसे मौत आकर बाधित कर देती है, और जो आगे भी जारी रहती है।

एडवर्ड मुंक
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एक संगठित धर्माचार्यों और पुरोहितों की परंपरा; जब भगवान के नाम पर अज्ञान और अंधविश्वास का राज चलाए, और राजनैतिक सत्ता इसमें सहयोग दे क्योंकि उसकी भी इससे रक्षा होती है—तब ये दोनों सत्ताएँ क्रूर और मानव-प्रगति-विरोधी होती हैं।

हरिशंकर परसाई
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मैं समझा दूँ कि धर्म से मेरा क्या मतलब है। मेरा मतलब हिंदू धर्म से नहीं है जिसकी मैं बेशक और सब धर्म से ज़्यादा क़ीमत आँकता हूँ। मेरा मतलब उस मूल धर्म से है जो हिंदू धर्म से कहीं कहीं उच्चतर है, जो मनुष्य के स्वभाव तक का परिवर्तन कर देता है, जो हमें अंतर के सत्य से अटूट रूप से बाँध देता है और जो निरंतर अधिक शुद्ध और पवित्र बनाता रहता है। वह मनुष्य की प्रकृति का ऐसा स्थायी तत्त्व है जो अपनी संपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए कोई भी क़ीमत चुकाने को तैयार रहता है और उसे तब तक बिल्कुल बेचैन बनाए रखता है जब तक उसे अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं हो जाता, अपने स्त्रष्टा के और अपने बीच का सच्चा संबंध समझ में नहीं जाता।

महात्मा गांधी
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धर्म कोई भी हो, भगवान या ख़ुदा का निवास काले धन की तिजोरी में और ग़ैरकानूनी शराब की बोतल में रहता है। भगवान क्षीर सागर में नहीं, ग़ैरकानूनी मदिरा सागर में विश्राम करते हैं।

हरिशंकर परसाई
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धर्माचरण द्वारा हल्के बने हुए पुरुष संसार सागर में जल में पड़ी नौका के समान तैरते रहते हैं, किंतु पाप से भारी बने हुए व्यक्ति पानी में फेंके गए शस्त्र की भाँति डूब जाते हैं।

वेदव्यास
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पुजारी जानता है; भगवान चाहे कहीं और हों, मगर मंदिर में तो क़तई नहीं है। मुसलमान जानता है कि ख़ुदा कहीं होगा तो मस्जिद के बाहर होगा, यहाँ तो नहीं है। मगर अपना धंधा इसी में सुरक्षित है कि लोगों को विश्वास दिलाएँ कि यज्ञ से उनका कल्याण होगा। मंदिर और मस्जिद में की गई पुकार भगवान एकदम सुनता है—सीधी ‘हॉट लाइन’ है।

हरिशंकर परसाई
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समाज ने स्त्री-मर्यादा का जो मूल्य निश्चित कर दिया है, केवल वही उसकी गुरुता का मापदंड नहीं। स्त्री की आत्मा में उसकी मर्यादा की जो सीमा अंकित रहती है, वह समाज के मूल्य से बहुत अधिक गुरु और निश्चित है, इसी से संसार भर का समर्थन पाकर जीवन का सौदा करने वाली नारी के हृदय में भी सतीत्व जीवित रह सकता है और समाज भर के निषेध से घिर कर धर्म का व्यवसाय करने वाली सती की साँसें भी तिल-तिल करके असती के निर्माण में लगी रह सकती हैं।

महादेवी वर्मा
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सारे धार्मिक अनुष्ठान मुनाफ़ाख़ोर, कालाबाज़ारी, जमाख़ोर, शोषक कराते हैं—ये आम आदमी को निष्क्रिय और मूर्ख बनाते हैं।

हरिशंकर परसाई
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भारतीय धर्म ने और भारतीय संस्कृति ने कभी नहीं कहा कि केवल हमारा ही एक धर्म सच्चा है और बाक़ी के झूठे हैं। हम तो मानते हैं कि सब धर्म सच्चे हैं, मनुष्य के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं। सब मिल कर इनका एक विश‍ाल परिवार बनता है। इस पारिवारिकता को और आत्मीयता को को जो चीज़ें खंडित करती है उनकी छोड़ देने के लिए सब को तैयार रहना ही चाहिए। हर एक धर्म-समाज अंतर्मुख होकर अपने दिल को टटोल कर देखे कि जागतिक मानवीय एकता का द्रोह हमसे कहाँ तक हो रहा है।

काका कालेलकर
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मनुष्य का सर्वोपरि उद्देश्य, सर्वश्रेष्ठ पराक्रम धर्म ही है और यह सब से आसान है।

स्वामी विवेकानन्द
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धर्म संपूर्ण जीवन की पद्धति है। धर्म जीवन का स्वभाव है। ऐसा नहीं हो सकता कि हम कुछ कार्य तो धर्म की मौजूदगी में करें और बाक़ी कामों के समय उसे भूल जाएँ।

रामधारी सिंह दिनकर
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धर्म कुछ संकुचित संप्रदाय नहीं है, केवल बाह्याचार नहीं है। विशाल, व्यापक धर्म है ईश्वरत्व के विषय में हमारी अचल श्रद्धा, पुनर्जन्म में अविरल श्रद्धा, सत्य और अहिंसा में हमारी संपूर्ण श्रद्धा।

महात्मा गांधी
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मैं सब धर्मो को सच मानता हूँ। मगर ऐसा एक भी धर्म नहीं है जो संपूर्णता का दावा कर सके। क्योंकि धर्म तो हमें मनुष्य जैसी अपूर्ण सत्ता द्वारा मिलता है, अकेला ईश्वर ही संपूर्ण है। अतएव हिंदू होने के कारण अपने लिए हिंदू धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए भी मैं यह नहीं कह सकता कि हिंदू धर्म सबके लिए सर्वश्रेष्ठ है; और इस बात को तो स्वप्न में भी आशा नहीं रखता कि सारी दुनिया हिंदू धर्म को अपनाए। आपकी भी यदि अपने ग़ैर-ईसाई भाइयों की सेवा करनी है तो आप उनकी सेवा करनी है तो आप उनकी सेवा उन्हें ईसाई बनाकर नहीं, बल्कि उनके धर्म की त्रुटियों को दूर करने में और उसे शुद्ध बनाने में उनकी सहायता करके भी कर सकते हैं।

महात्मा गांधी
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राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है। राष्ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है, उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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धन की प्रभुता या पूँजीवाद जितना गर्हित है, उतना ही गर्हित रूप धर्म और अधिकार का हो सकता है; फिर उसके विषय में तो कहना ही व्यर्थ है, जिसे धन, धर्म और अधिकार—तीनों प्रकार की प्रभुता प्राप्त हो चुकी हो।

महादेवी वर्मा
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हमें अपनी तीन अवस्थाएँ दिखाई देती हैं। तीनों ही बड़े स्तरों पर मानव जीवन का निर्माण कर डालती हैं। एक अवस्था है प्राकृतिक, दूसरी धार्मिक नैतिकता की और तीसरी होती है आध्यात्मिकता की।

रवींद्रनाथ टैगोर
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हे राजा! धन से धर्म का पालन, कामना की पूर्ति, स्वर्ग की प्राप्ति, हर्ष की वृद्धि, क्रोध की सफलता, शास्त्रों का श्रवण और अध्ययन तथा शत्रुओं का दमन—ये सभी वही कार्य सिद्ध होते हैं।

वेदव्यास
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महानतम लक्ष्य, जो मेरे जीवन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—वह है शूद्रों को बनियों और ब्राह्मणों के चंगुल से मुक्त कराना।

पेरियार ई. वी. रामासामी
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हर तरह के चोर कर्म—घूस, कालाबाज़ारी, मुनाफ़ाख़ोरी, राजनैतिक बेईमानी, पाखँड—सबकी साधना धर्म की मदद से होती है

हरिशंकर परसाई
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एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करने को मैं उचित नहीं मानता। मेरी कोशिश किसी दूसरे के धार्मिक विश्वास को हिलाने की या उनकी नींव खोदने की नहीं, बल्कि उसे अपने धर्म का एक अच्छा अनुयायी बनाने की होनी चाहिए। इसका तात्पर्य है सभी धर्मों की सच्चाई में विश्वास और इस कारण उन सबके प्रति आदरभाव का होना। इसका यह बी मतलब है कि हममें सच्ची विनयशीलता होनी चाहिए, इस तथ्य की ल्वीकृति होनी चाहिए कि चूँकि सभी धर्मों को हाड़-माँस के अपूर्ण माध्यम से दिव्य-ज्ञान प्राप्त हुआ है, इसलिए सभी धर्मों में कम या ज़्यादा मात्रा में मानवीय अपूर्णताएँ मौजूद हैं।

महात्मा गांधी
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मेरी राय में हिंदू धर्म में दिखाई पड़ने वाली अस्पृश्यता का वर्तमान रूप, ईश्वर और मनुष्य के ख़िलाफ़ किया गया भयंकर अपराध है और इसलिए वह एक ऐसा विष है जो धीरे-धीरे हिंदू धर्म के प्राण को ही निःशेष किए दे रहा है।

महात्मा गांधी
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धर्म आस्तिक और आस्थावान व्यक्ति के लिए; जीवन संचालन के कतिपय आदर्शों, सिद्धांतों और मूल्यों का समच्चय है।

मैनेजर पांडेय
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'एक विभाजित' समूह हैं; जो उसी जाति व्यवस्था से संक्रमित हैं, जिसमें वे भी उतनी ही आस्था रखते हैं, जितनी सवर्ण हिंदू रखते हैं। अस्पृश्यों के बीच मौजूद जाति व्यवस्था ने परस्पर प्रतिद्वंद्विता और ईर्ष्या को जन्म दिया है और इसने साझा कार्यवाइयों को असंभव बना दिया है।'

भीमराव आंबेडकर
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यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और निर्लोभता—ये धर्म के आठ प्रकार के मार्ग बताए गए हैं। इनमें से पहले चारों का तो कोई दंभ के लिए भी सेवन कर सकता है, परंतु अंतिम चार तो जो महात्मा नहीं है, उनमें रह ही नहीं सकते।

वेदव्यास
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मुझे इस बात का मुकम्मल तौर पर यक़ीन हो चुका है कि हिंदुओं के बीच रहते हुए; डिप्रेस्ड क्लासेज़ को बराबरी का दर्जा मिल ही नहीं सकता, क्योंकि हिंदू धर्म खड़ा ही असमानता की बुनियादी पर है।

भीमराव आंबेडकर
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कामना, भय, लोभ अथवा जीवन-रक्षा के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। धर्म नित्य है जबकि सुख-दुःख अनित्य हैं, जीव नित्य है तथा बंधन का हेतु अनित्य है।

वेदव्यास
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जिस प्रकार गंगा की धारा को पर्वत-प्रदेशीय, या उत्तरप्रदेशीय या बिहारी, या बंगाली कहना निरर्थक है, उसी प्रकार सत्य, धर्म और संस्कृति प्रभृति महासंपद् भी अविच्छेद्य और सीमातीत है।

आचार्य क्षितिमोहन सेन
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धर्म का जन्म अज्ञान और डर से हुआ—आदिम मनुष्य के प्रकृति और जगत के बारे में अज्ञान और डर से। फिर धर्म संस्थागत हुआ, राजसत्ता के साथ मिला, शोषण का जरिया बना।

हरिशंकर परसाई
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समाज धर्म के कारण से संगठित रहते हैं चाहे लोग उसका (धर्म का प्रदर्शन करें या उसे अपने हृदय में रखें। जब धर्म समाप्त हो जाता है तब पारस्परिक विश्वास भी नष्ट हो जाता है, लोगों का आचरण भ्रष्ट हो जाता है और उसका फल राष्ट्र को भुगतना पड़ता है। धर्म सुलाने वाला नहीं है अपितु शक्ति का आधार-स्तंभ है।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
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दया और क्षमा भी मानव के धर्म हैं, तो शक्तिवान होना और उपयुक्त समय पर देश और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग करना भी धर्म है।

हरिकृष्ण प्रेमी
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प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता और बंधन दोनों चाहिए; स्वार्थ तथा परार्थ दोनों की आवश्यकता है, अन्यथा वह जीवन-मुक्त होकर भी किसी को कुछ नहीं दे पाता।

महादेवी वर्मा
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धर्म का पालन करते हुए ही जो धन प्राप्त होता है, वही सच्चा धन है जो अधर्म से प्राप्त होता है वह धन तो धिक्कार देने योग्य है। संसार में धन की इच्छा से शाश्वत धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए।

वेदव्यास
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मेरी देशभक्ति कोई वर्जनशील वस्तु नहीं है। वह तो सर्वग्रहणशील है और मैं ऐसी देशभक्ति को स्वीकार नहीं करूँगा जिसका उद्देश्य दूसरे राष्ट्रों के दुख का लाभ उठाना या उनका शोषण करना हो। मेरी देशभक्ति की जो कल्पना है वह हर हालत में हमेशा, बिना अपवाद के समस्त मानव-जाति के व्यापकतम हित के अनुकूल है। यदि ऐसा हो तो उस देशभक्ति का कोई मूल्य नहीं होगा। इतना ही नहीं, मेरा धर्म तथा धर्म से नि:सृत मेरी देशभक्ति, समस्त जीवों को अपना मानती है।

महात्मा गांधी
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कामोपभोग का लक्ष्य सुखप्राप्ति है तथा धर्म और अर्थ का फल भी सुखप्राप्ति है।

वात्स्यायन
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प्रत्येक जाति में मनुष्य को बाल्यकाल ही में एक धर्म-संघ का सदस्य बना देने की मूर्खतापूर्ण प्रथा चली रही है। जब उसमें जिज्ञासा नहीं, प्रेरणा नहीं, तब उसके धर्मग्रहण करने का क्या तात्पर्य हो सकता है?

जयशंकर प्रसाद
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धर्म और कविता में अंतर स्पष्ट है। कविता हृदय की सहज संवेदना है (इस घिसी-पिटी परिभाषा के लिए पाठक क्षमा करें), जबकि धर्म एक रूढ़ि है।

राजेंद्र माथुर
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अधीर बनो, उतावली करो। धैर्यपूर्ण, एकनिष्ठ तथा शांतिपूर्ण कर्म के द्वारा ही सफलता मिलती है।

स्वामी विवेकानन्द
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धर्म से अर्थ प्राप्त होता है। धर्म के सुख का उदय होता है। धर्म से ही मनुष्य सब कुछ पाता है। इस संसार में धर्म ही सार है।

वाल्मीकि
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जो आदमी अपना धर्म पालन करता है, धर्म ही उसका बदला है।

महात्मा गांधी
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धर्म के अलौकिक होने के कारण, धर्म के बोधक शास्त्र का होना उचित है। अर्थसिद्धि के लिए उपाय आवश्यक हैं और उपायों की जानकारी शास्त्र से होती है।

वात्स्यायन

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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