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ज्ञान पर उद्धरण

ज्ञान का महत्त्व सभी

युगों और संस्कृतियों में एकसमान रहा है। यहाँ प्रस्तुत है—ज्ञान, बोध, समझ और जानने के विभिन्न पर्यायों को प्रसंग में लातीं कविताओं का एक चयन।

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किसी के बारे में सब कुछ जान लेना, उसे फिर से अजनबी बना देता है।

निर्मल वर्मा
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‘यह सुरक्षित कुसुम ग्रहण करने योग्य है; यह ग्राम्य है, फलतः त्याज्य है; यह गूँथने पर सुंदर लगेगा; इसका यह उपयुक्त स्थान है और इसका यह’—इस प्रकार जैसे पुष्पों को भली-भाँति पहचानकर माली माला का निर्माण करता है, उसी प्रकार सजग बुद्धि से काव्यों में शब्दों का विन्यास करना चाहिए।

भामह
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चेख़व की तरह मुझे भी मनुष्य के भविष्य पर आस्था है। मेरी कला मनुष्य को निराश नहीं कर सकती। रवींद्रनाथ ठाकुर का यह संदेश में कभी नहीं भूल सकूंगा कि 'मानुषेर विश्वास हरण पाप।'

ऋत्विक घटक
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आलोचक के लिए सर्व-प्रथम आवश्यक है—अनुभवात्मक जीवन-ज्ञान, जो निरंतर आत्म-विस्तार से अर्जित होता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने से ही ज्ञान की विशेषताएँ टूटती रहेगी; उसकी सरहदें टूटती रहेंगी, लेकिन जिस दिन से आप केवल ज्ञात से ज्ञात की ओर जाएँगे, उस दिन आप केवल अपनी ही कील पर अपने ही आसपास घूमते रहेंगे।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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हम विचारों के स्तर पर जिससे घृणा करते हैं, भावनाओं के स्तर पर उसी से प्यार करते हैं।

गोरख पांडेय
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पंडिताई भी एक बोझ है; जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबाती है। जब वह एक जीवन का अंग बन जाती है, तब वह सहज हो जाती है, तब वह बोझ नहीं रहती।

हजारीप्रसाद द्विवेदी
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जो लोग तमस से भरे हुए हैं, अज्ञानी और सुस्त हैं, जिनका मन कभी किसी विचार पर स्थिर नहीं होता, जो केवल मनोरंजन की लालसा रखते हैं—उनके लिए धर्म और दर्शन मात्र मनोरंजन की वस्तुएँ हैं। ये लोग दृढ़ निश्चयी नहीं होते। वे कोई बात सुनते हैं, उसे बहुत अच्छा समझते हैं, फिर घर जाकर सब कुछ भूल जाते हैं। सफल होने के लिए आपको अदम्य दृढ़ता और दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

स्वामी विवेकानन्द
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अन्य शास्त्रों के ज्ञान से रहित; किंतु चतुष्षष्टि कला से अलंकृत कामकला का ज्ञाता पुरुष, नर-नारियों की कला-विषयक गोष्ठी में अग्रगण्य होकर सम्मानित होता है।

वात्स्यायन
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काव्यप्रणयन की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को व्याकरण का ज्ञान अर्जित करने का प्रयत्न करना चाहिए।

भामह
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कवित्व-शक्ति से विहिन व्यक्ति का शास्त्रज्ञान धनहीन के दान के समान, नपुंसक के अस्त्रकौशल के समान तथा ज्ञानहीन की प्रगल्भता के समान निष्फल होता है।

भामह
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अज्ञान की निवृत्ति में ज्ञान ही समर्थ है, कर्म नहीं, क्योंकि उसका अज्ञान से विरोध नहीं है और अज्ञान की निवृत्ति हुए बिना राग-द्वेष का भी अभाव नहीं हो सकता।

आदि शंकराचार्य
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दूसरे कवियों के शब्दप्रयोगों को देखकर; जो काव्यप्रणयन किया जाता है, भला उसमें कहाँ आनंद मिलेगा?

भामह
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बिना दूँढ़ने का श्रम किए, प्रिय वस्तु की अनुपमता और अमूल्यता का बोध हो ही नहीं सकता।

कुबेरनाथ राय
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विद्यार्थियों को अपने-अपने धर्म के मूल तत्त्व जानने चाहिए, अपने-अपने धर्म ग्रंथों का साधारण ज्ञान होना चाहिए।

महात्मा गांधी
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अल्प-समृद्ध, दरिद्र जो आलोचक है, वह अपने को चाहे जितना बड़ा समझे; साहित्य-क्षेत्र का अनुशासक समझे—वह वस्तुतः साहित्य-विश्लेषण के अयोग्य है, कला-प्रक्रिया के कार्य में अक्षम है—भले ही वह साहित्य का 'शिखर' बनने का स्वांग रचे, मसीहा बने।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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मुझसे सीखें, यदि मेरे उपदेशों से नहीं, तो मेरे उदाहरण से सीखें कि ज्ञान की खोज कितनी ख़तरनाक है और वह व्यक्ति जो अपने मूल शहर को ही दुनिया मानता है, वह उस व्यक्ति की तुलना में कितना ख़ुश है जो अपनी शक्ति से बड़ा होने की आकांक्षा रखता है।

मैरी वोलस्टोनक्राफ़्ट
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ज्ञान का कोई पक्ष नहीं है। सभी पक्ष अज्ञान के है। ज्ञान तो निष्पक्ष है।

ओशो
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प्यार—देखभाल, प्रतिबद्धता, ज्ञान, ज़िम्मेदारी, सम्मान और विश्वास का मेल है।

बेल हुक्स
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संदेह… एक बीमारी है जो ज्ञान से आती है और पागलपन की ओर ले जाती है।

गुस्ताव फ़्लॉबेयर
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अल्प ज्ञान ख़तरनाक वस्तु है।

अलेक्ज़ेंडर पोप
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शब्द कैसे कार्य करते हैं, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। हमें उनके प्रयोग का ‘निरीक्षण’ करना और उससे सीखना पड़ता है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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मैं समझा दूँ कि धर्म से मेरा क्या मतलब है। मेरा मतलब हिंदू धर्म से नहीं है जिसकी मैं बेशक और सब धर्म से ज़्यादा क़ीमत आँकता हूँ। मेरा मतलब उस मूल धर्म से है जो हिंदू धर्म से कहीं कहीं उच्चतर है, जो मनुष्य के स्वभाव तक का परिवर्तन कर देता है, जो हमें अंतर के सत्य से अटूट रूप से बाँध देता है और जो निरंतर अधिक शुद्ध और पवित्र बनाता रहता है। वह मनुष्य की प्रकृति का ऐसा स्थायी तत्त्व है जो अपनी संपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए कोई भी क़ीमत चुकाने को तैयार रहता है और उसे तब तक बिल्कुल बेचैन बनाए रखता है जब तक उसे अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं हो जाता, अपने स्त्रष्टा के और अपने बीच का सच्चा संबंध समझ में नहीं आ जाता।

महात्मा गांधी
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कवि के लिए संपूर्ण प्रकृति, गूढ़ संकेतों से भरी हुई प्रेरित होती है और आलोकपूर्ण नवीन ज्ञान का प्रभाव उसे स्वप्न में चौंका जाता है।

नामवर सिंह
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मानव मात्र की ज्ञान राशि का एक (अदृश्य) वृत्त बनता है, जो धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। आइंस्टीन जैसी कुछ ऐसी प्रतिभाएँ होती हैं, जो इस वृत के आकार में गुणात्मक परिवर्तन ला सकती हैं। सही माने में उस फ़िल्म को ही प्रयोगात्मक कह सकता हूँ, जो ज्ञानराशि के वृत में ऐसा ही परिवर्तन ला सके।

ऋत्विक घटक
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अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने साहित्य से प्रेम होना बुरी बात नहीं है, पर जो प्रेम ज्ञान द्वारा चालित और श्रद्धा द्वारा अनुगमित होता है, वही प्रेम अच्छा है। केवल ज्ञान बोझ है, केवल श्रद्धा अंधा बना देती है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी
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तरुणावस्था में ज्ञान की वृद्धि होती है और वृद्धावस्था में ज्ञान की परीक्षा।

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
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किताबें एक ऐसा नशा हैं, जो मन के लिए वरदान है।

रॉबर्ट डब्ल्यू. चेम्बर्स
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जो जीव अपने पक्ष को छोड़कर सद्‌गुरु के चरण में समर्पित होता है, वह जीव निज शुद्धात्मा के आश्रय से परमपद को पाता हैं।

श्रीमद् राजचंद्र
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माया के परदे को हटाने का ही अर्थ है—सृष्टि के रहस्य को अनावृत्त करना। जो इस प्रकार सृष्टि का अनावरण कर देता है, केवल वही सच्चा अद्वैत्वादी है। अन्य सब केवल मूर्तिपूजक हैं।

परमहंस योगानंद
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दर्शन का वास्तविक विषय मृत्यु है। सच्चा दार्शनिक मृत्यु के लिए इच्छुक रहता है, क्योंकि दार्शनिक ज्ञान चाहता है और इस शरीर में रहते हुए सच्चे ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्महत्या करने से हमें मुक्ति मिल सकती है। आत्महत्या से तो जिस ईश्वर ने हमें शरीर-रूपी कारागार में डाला है, उसके नियमों का उल्लंघन होगा। ज्ञान-प्राप्ति की दृष्टि से मृत्यु का स्वागत करो।

सुकरात
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मैं रवींद्रनाथ के बिना बोल नहीं सकता। उस आदमी ने मेरे जन्म के पहले ही मेरी सारी भावनाओं को निचोड़ लिया था। उसने समझ लिया था कि मैं क्या हूँ और उसने उसे शब्दबद्ध कर दिया था। मैंने पढ़ा और जाना कि सब कुछ कहा जा चुका है, और नया कहने के लिए मेरे पास कुछ भी बचा नहीं है।

ऋत्विक घटक
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भक्ति ला देती है ज्ञान; ज्ञान से होता है सर्वभूतों में आत्मबोध, सर्वभूतों में आत्मबोध होने से ही आती है अहिंसा और अहिंसा से ही आता है प्रेम। तुम जितना भर इनमें से जिस किसी एक का अधिकारी होगे, उतना ही भर इन सभी के अधिकारी होगे।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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हर अच्छी कविता की तरह सूर की कविता भी, श्रद्धा से अधिक समझ की माँग करती है।

मैनेजर पांडेय
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कबीर शास्त्रीय ज्ञान के बोझ से मुक्त है।

मैनेजर पांडेय
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हमारे समाज में अपने स्वार्थ के कारण, पुरुष मनुष्यता का कलंक हैं और स्त्री अपनी अज्ञानमय निस्पंद सहिष्णुता के कारण पाषाण-सी उपेक्षणीय। दोनों के मनुष्यत्व-युक्त मनुष्य हो जाने से ही जीवन की कला विकास पा सकेगी, जिसका ध्येय मनुष्य की सहानुभूति, सक्रियता, स्नेह आदि गुणों को अधिक-से-अधिक व्यापक बना देना है।

महादेवी वर्मा
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हमारे हृदय में ज्ञान, प्रेम और कर्म का जिस मात्रा में पूर्ण मिलन होता है, उसी मात्रा में हमारे हृदय में पूर्ण आनंद रहता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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देश-विशेष, समाज-विशेष तथा संस्कृति-विशेष के अनुसार, किसी के मानसिक विकास के साधन और सुविधाएँ उपस्थित करते हुए, उसे विस्तृत संसार का ऐसा ज्ञान करा देना ही शिक्षा है, जिससे वह अपने जीवन में सामंजस्य का अनुभव कर सके और उसे अपने क्षेत्र विशेष के साथ ही बाहर भी उपयोगी बना सके।

महादेवी वर्मा
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आठ बातों से मनुष्य शिक्षित कहलाता है: हर समय हँसने वाला न हो, सतत इंद्रिय-निग्रही हो, मर्मान्तक वचन न कहता हो, सुशील हो, दुराचारी न हो, रसलोलुप न हो, सत्य में रत हो, क्रोधी न हो, शांत हो—वह शिक्षित है।

महावीर
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विचारों की असीमित आपूर्ति आपके लिए उपलब्ध है। समूचा ज्ञान, आविष्कार और खोजें, ब्रह्मांडीय मस्तिष्क में संभावनाओं के रूप में मौजूद हैं और मानवीय मस्तिष्क द्वारा उन्हें बाहर निकालने का इंतज़ार कर रहीं हैं। हर चीज़ आपकी चेतना में है।

रॉन्डा बर्न
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कवि, लेखक और कलाकार यदि ज्ञान में टुटपुँजिए हों, तो उनकी कृतियों में गंभीरता नहीं आ सकती।

राहुल सांकृत्यायन
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कोरी साधुता का उपदेश पाखंड है, कोरी वीरता का उपदेश उद्दंडता है, कोरे ज्ञान का उपदेश आलस्य है, और कोरी चतुराई का उपदेश धूर्तता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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ज्ञान, प्रेम और शक्ति—इन तीन धाराओं का जहाँ एक साथ संगम होता है, वहीं पर आनंदतीर्थ बन जाता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जब तक समष्टि-रूप में हमें संसार के लक्ष्य का बोध नहीं होता; और हमारे अंतःकरण में सामान्य आदर्शों की स्थापना नहीं होती, तब तक हमें श्रद्धा का अनुभव नहीं होता।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कलाओं का ज्ञान प्राप्त करने मात्र से ही सौभाग्य की प्राप्ति होती है। देश-काल की परिस्थितियों के अनुसार इन कलाओं का प्रयोग संभव होगा, अन्यथा परिस्थितिवश असंभव भी हो सकता है।

वात्स्यायन
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जो भी ज्ञान है; उससे चुनकर मनुष्य जीने के लिए जिस व्यवस्था का निर्माण करता है, उसी को सभ्यता कहते हैं।

श्याम मनोहर
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किसी विषय में अधूरे ज्ञान से अच्छा है उस विषय में अज्ञान।

पब्लिलियस साइरस
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बलिदान किए बिना कोई भी बड़ा ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

सी. एस. लुईस
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मनुष्य जितना समझता है, उससे कहीं अधिक जानता है।

अल्फ़्रेड एडलर
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अपने अनुभव, भाषा और ज्ञान की गरिमा के बारे में कोई भय या शर्म मत रखो।

जैक केरुआक
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