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सभ्यता पर उद्धरण

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पाखंडी लोग कितनी आसानी से इस जगत् को धोखे में डाल देते हैं। सभ्यता के प्राथमिक विकास-काल से लेकर भोली-भाली मानव-जाति पर, जाने कितना छल-कपट किया जा चुका है।

स्वामी विवेकानन्द
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सभ्यता इस तरह होनी चाहिए कि आदमी को अपने जीवन का अर्थ खोजने के लिए आज़ादी मिले।

श्याम मनोहर
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धर्म स्त्री पर टिका है, सभ्यता स्त्री पर निर्भर है और फ़ैशन की जड़ भी वही है। बात क्यों बढ़ाओ, एक शब्द में कहो—दुनिया स्त्री पर टिकी है।

जैनेंद्र कुमार
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भारत की सभ्यता अद्भुत इस माने में रही है कि इतना स्थिर समाज, इतनी सदियों तक चीन के अलावा और कहीं क़ायम नहीं रहा। लेकिन इस सामाजिक स्थिरता के साथ-साथ; जितनी राज्य-गत अराजकता और अस्थिरता भारत में रही है, उतनी पृथ्वी पर और कहीं नहीं रही।

राजेंद्र माथुर
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हम जो बातें पढ़ते हैं वे सभ्यता की हिमायत करने वालों की लिखी बातें होती हैं। उनमें बहुत होशियार और भले आदमी हैं। उनके लेखों से हम चौंधिया जाते हैं। यों एक के बाद दूसरा आदमी उसमें फँसता जाता है।

महात्मा गांधी
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समग्रता में भाषा, रूपक की सतत प्रक्रिया है। अर्थ-मीमांसा का इतिहास, संस्कृति के इतिहास का एक पहलू है। भाषा एक ही समय में एक जीवित वस्तु, जीवन और सभ्यताओं के जीवाश्मों का संग्रहालय है।

अंतोनियो ग्राम्शी
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महान सभ्यता जब बीच में आकर सड़ती है, तब उसमें अछूत-प्रथा, सती-प्रथा और दहेज-प्रथा की बीमारियाँ पैदा होती हैं।

हरिशंकर परसाई
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जिस सभ्यता में सीधा-सादा आम आदमी भी खोज करने की क्षमता रखता है, वह सभ्यता महान है।

श्याम मनोहर
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जो भी ज्ञान है; उससे चुनकर मनुष्य जीने के लिए जिस व्यवस्था का निर्माण करता है, उसी को सभ्यता कहते हैं।

श्याम मनोहर
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सभ्य संसार के प्रत्येक स्थान में, किसी-न-किसी समय और किसी-न-किसी रूप में स्वतंत्रता की व्यापकता का बोल-बाला अवश्य हुआ।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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सभ्यता के हर बड़े केंद्र में सौंदर्य का राष्ट्रीय आदर्श, अद्भुत दिशाओं में पल्लवित होता रहता है और वैदेशिक आदर्शों तथा फ़ैशनों को, देशी आदर्शों तथा फ़ैशनों के मुक़ाबले में तरजीह दी जाती है।

हेवलॉक एलिस
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समाज की सभ्यता का अर्थ है—जीवन के व्यवहारों को सरल, सुलभ बनाने वाली भाषा।

श्याम मनोहर
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जिस क्रम से मनुष्य सभ्यता के मार्ग पर अग्रसर होता गया, उसी क्रम से समाज के नियम अधिकाधिक परिष्कृत होते गए और पूर्ण विकसित तथा व्यवस्थित समाज में वे केवल व्यावहारिक सुविधा के साधनमात्र रह कर, सदस्यों के नैतिक तथा धार्मिक विकास के साधन भी हो गए।

महादेवी वर्मा
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आधुनिक सभ्यता और शिक्षा ने मानवीय विकास में जो भूमिका निभाई है; वह तब तक अधूरी और अपूर्ण ही रहेगी, जब तक कि ताक़त के क़ानून वाली पुरानी सभ्यता के गढ़ पर हमला नहीं किया जाता। और वह गढ़—गृहस्थ और दांपत्य-जीवन है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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सभ्यता की मूलभूत मान्यताओं को रद्द करो, ख़ासकर सामान इकट्ठा करते रहने के महत्त्व को।

चक पैलनिक
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समय-समय पर प्रत्येक धर्म में ऐसे सुधारक उत्पन्न हुए हैं; जो सब प्रकार के प्रतीकों और अनुष्ठानों का विरोध करते आए हैं, पर उनके प्रयत्न निष्फल रहे हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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साहित्य की अखंड दीर्घ परंपरा सभ्यता का लक्षण है। यह परंपरा शब्द की भी होती है और अर्थ की भी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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मानव-इतिहास के ज़्यादातर हिस्से में, जीवन का अनुमान केवल तीस वर्ष से कुछ ज़्यादा था, लेकिन आज विकसित देशों में, हम अस्सी के दशक के बीच की उम्र तक पहुँचने की उम्मीद कर सकते हैं। तुलनात्मक रूप से ग़रीब देशों में भी आज पैदा होने वाला व्यक्ति; सबसे अमीर देशों के नागरिकों के दादा-दादी की तुलना में, लंबे जीवन की उम्मीद कर सकता है। विज्ञान के लेखक स्टीवेन जॉनसन कहते हैं कि यह कुछ ऐसा है, मानो हम में से प्रत्येक एक अतिरिक्त संपूर्ण जीवन हासिल कर रहा हो।

वेंकी रामकृष्णन
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कोई भाषा मनुष्य जाति को उतना ऊँचा उठाने, मनुष्य को यथार्थ में मनुष्य बनाने और संसार को सुसभ्य और सद्भावनाओं से युक्त बनाने में उतनी सफल नहीं हुई, जितनी कि आगे चलकर हिंदी होने वाली है।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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हर जाति की सभ्यता की आंतरिक प्रार्थना यही होती है कि उसमें श्रेष्ठ महापुरुषों का आविर्भाव हो।

रवींद्रनाथ टैगोर
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लोकजीवन की धारा जब एक बँधे मार्ग पर कुछ काल तक अबाध गति से चलने पाती है, तभी सभ्यता के किसी रूप का पूर्ण विकास और उसके भीतर सुख-शांति की प्रतिष्ठा होती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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मनुष्य-जाति का बर्बरता की स्थिति से निकल कर, मानवीय गुणों तथा कला-कौशल की वृद्धि करते हुए, सभ्य और सुसंस्कृत होते जाना ही उसका विकास है।

महादेवी वर्मा
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समकालीन भारतीय यथार्थ, जिसे मैं सभ्यता (सिविलिजेशन) कहता हूँ—से शुरू होकर साहित्य का संस्कृति तक पहुँचना—कथा-साहित्य को पर्याप्तता प्रदान करता है।

श्याम मनोहर
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मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य-असभ्य सभी जातियों में, किसी-न-किसी रूप में पाई जाती है। चाहे इतिहास हो, विज्ञान हो, दर्शन हो, पर कविता का प्रचार अवश्य रहेगा।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जो समाज सभ्य नहीं होता है; उस समाज में स्वभाव से बलिष्ठ व्यक्ति भी दुर्बल हो जाता है, कारण उस समाज के व्यक्ति अपने आपको यथेष्ठ मात्रा में प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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सभ्यता का कथा-साहित्य कालबाह्य हो सकता है, संस्कृति का कथा-साहित्य कभी कालबाह्य नहीं होता—वह अभिजात होता है।

श्याम मनोहर
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सभ्यता का अर्थ है—जीने का तरीक़ा, जीने की व्यवस्था।

श्याम मनोहर
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समाज की ज्ञानोन्मुखता ही सभ्यता है।

श्याम मनोहर
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हम यह सोचकर नहीं जीते कि हम जिस शहर में रहते हैं, वह एक दिन मिट जाएगा। फिर भी शहर और पूरा समाज, साम्राज्य और सभ्यता-उपक्रम विकसित होते हैं और ख़त्म हो जाते हैं। ठीक वैसे, जैसे कोशिकाएँ मरती हैं।

वेंकी रामकृष्णन
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जहाँ तक अभी मालूम हो सका है, आदर्श अवस्था विरले ही किसी सही दिमाग़ और उचित रूप से स्वाभाविक जीवन-यापन करने वाली जाति में पाई जाती है, चाहे हम इसके लिए आज के असभ्य लोगों को देखें या उन प्राचीन सभ्य जातियों को देखें, जिनमें हमारी अपनी जड़ें स्थित हैं।

हेवलॉक एलिस
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जो सभ्यता प्रकृति पर विजय पाने में ही अपना गौरव प्राप्त करती है, वह सुनने, देखने और अनुभूत करने की क्षमता को ही नष्ट कर देती है।

निर्मल वर्मा
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प्रत्येक प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का पतन, विनाश और अंत, जीवन के गतिशील सिंद्धांतों और आदर्शों में अनास्था के फलस्वरूप होता है।

मैनेजर पांडेय
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अति भय असभ्यता का पहला लक्षण है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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प्रत्येक देश और समाज के मुहावरे उसकी सभ्यता, संस्कृति और ऐतिहासिक-भौगोलिक, स्थिति की उपज हैं। पर अँग्रेज़ी की नक़ल में भी हमें इसका भी ध्यान नहीं रहता।

श्रीलाल शुक्ल
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समस्या-उठाऊ शिक्षा मनुष्यों को ऐसे प्राणी मानती है, जो संभवन की प्रक्रिया में है। अर्थात् वे अभी अधूरे हैं, अपूर्ण हैं, और ऐसे यथार्थ के अंदर तथा उसके साथ रहते हैं, जो उन्हीं की तरह अधूरा और संभव होता हुआ यथार्थ है।

पॉलो फ़्रेरा
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एक सभ्य समाज में मूल अधिकारों पर अमल करने के लिए, बंदूकों से रक्षा की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

महात्मा गांधी
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कलाओं की जो उपादेयता मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन में है, वही समाज के लिए भी है। यदि कवि, गायक तथा दूसरे कलाकार हुए होते, तो सभ्य मानव-समाज की मानसिक वृत्तियाँ इतनी तीव्र और सुसंस्कृत हुई होतीं।

श्यामसुंदर दास
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मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य-असभ्य सभी जातियों में, किसी-न-किसी रूप में, पाई जाती है। चाहे इतिहास हो, विज्ञान हो, दर्शन हो, पर कविता का प्रचार अवश्य रहेगा।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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तुम लोग इज़्ज़तों में और पर्दों में रहकर जाने किन-किन व्यर्थताओं को अपने साथ लपेट लेते हो और उनमें गौरव मानते हो। यह सब तुम लोगों की झूठी सभ्यता है, ढकोसला है। फिर कहते हो, हम सच को पाना चाहते हैं। तुम्हारा सच कपड़ों में है, लिबास में है और सच्चाई से डरने में है।

जैनेंद्र कुमार
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भारत में आर्य जाति के लोग पहले अरण्य-निवासी थे, फिर ग्रामवासी हुए और उसके बाद नगरवासी।

रवींद्रनाथ टैगोर
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गंगा तो विशेष कर भारत की नदी है, जनता की प्रिय है, जिससे लिपटी हुई हैं भारत की जातीय स्मृतियाँ, उसकी आशाएँ और उसके भय, उसके विजयगान, उसकी विजय और पराजय! गंगा तो भारत की प्राचीन सभ्यता का प्रतीक रही है, निशानी रही है, सदा बलवती, सदा बहती, फिर वही गंगा की गंगा।

जवाहरलाल नेहरू
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आक्रांत मनुष्य का सामाजिक 'मैं', प्रत्येक सामाजिक 'मैं' की भाँती, सामाजिक संरचना के सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों में निर्मित होता है और इसीलिए उसमें आक्रांत संस्कृति का द्वैत प्रतिबिंबित होता है।

पॉलो फ़्रेरा
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मनुष्य के भीतर जो कुछ वास्तविक है, उसे छिपाने के लिए जब वह सभ्यता और शिष्टाचार का चोला पहनता है, तब उसे संभालने के लिए व्यस्त होकर कभी-कभी अपनी आँखों में ही उसको तुच्छ बनना पड़ता है।

जयशंकर प्रसाद
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मनु का नाम आते ही हमें अपनी सभ्यता के उस धुँधले प्रभात का स्मरण हो जाता है; जिसमें सूर्य की उषाकालीन किरणों के प्रकाश में मानव और देव, दोनों साथ-साथ विचरते हुए दिखाई देते हैं।

वासुदेवशरण अग्रवाल
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कहानी का स्थान महज़ साहित्य की दृष्टि से केंद्रीय नहीं है, मनुष्य की सभ्यता में भी केंद्रीय है। सभ्यता की चर्चा करनी हो तो हमें एक कहानी के रूप में करनी होगी।

कृष्ण कुमार
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भारतीय समाज-व्यवस्था मूलतः असमतावादी थी और शोषण पर आश्रित थी। वर्ण और जाति का आधार शुचिता की भावना थी; किंतु समाज के स्तरभेद के ऐतिहासिक विकास में, शुद्ध-अशुद्ध के विचार के साथ—आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के समीकरण भी जुड़े थे।

श्यामाचरण दुबे
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अपनी आदिम अवस्था में मनुष्य की इच्छा-शक्ति के साथ लोकहित का संबंध चाहे रहा हो, पर समाज की सभ्यता की वृद्धि होने पर तो उसकी इच्छाएँ लोक-मंगल की ओर अवश्य उन्मुख हुईं।

श्यामसुंदर दास
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'ईसप' की एक कहानी है जिसमें एक काणा हिरन है। जिस दिशा में उसकी फूटी आँख है, वहीं से बाण उस पर लगता है। वर्तमान मानव-सभ्यता का 'काणा' पक्ष है उसकी विषयलोलुपता।

रवींद्रनाथ टैगोर
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सभ्यता या समाज अनेक श्रेणियों में सूत्रबद्ध मानव का समुदाय है, जिसके भीतर एक ढाँचा है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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हिन्दुस्तान की सभ्यता का झुकाव नीति को मजबूत करने की ओर है, पश्चिम की सभ्यता का झुकाव अनीति को मजबूत करने की ओर है, इसलिए मैंने उसे हानिकारक कहा है।

महात्मा गांधी

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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