राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं है। राष्ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है, उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं।
भारतीय राष्ट्रवाद बहुत ही क्षणभंगुर है। अपनी योजनाओं तक में विश्वास नहीं करता। राष्ट्रवादी आंदोलन, राजनीतिक जद्दोजहद ख़ुद इसका अकाट्य प्रमाण है कि भारतीय लोग भी वैसे ही जीवन स्तर और व्यवस्थित जीवन के इच्छुक हैं, जितने कि अन्य लोग।
पश्चिमी सभ्यता भौतिकवादी है और पूर्वी सभ्यता आध्यात्मिक है―भारतीय राष्ट्रवादियों के ये दो प्रिय मंत्र हैं। वे लोग इस मंत्र को उस सीमा तक अलापते हैं, जब तक उससे घृणा न उत्पन्न हो जाए। मगर उनमें से कोई भी मंत्र के तथ्यों को साबित करने की कोशिश नहीं करता।
हम राष्ट्रीयता के अनुयायी हैं; पर वही हमारी सब कुछ नहीं, वह केवल हमारे देश की उन्नति का उपाय-भर है।
जब राष्ट्रवाद सफल होता है, तो कभी-कभी यह आक्रामक तरीक़े से बढ़ता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख़तरा बन जाता है।
भारत कभी भी सही अर्थों में राष्ट्रवादी नहीं रहा।
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राष्ट्रवाद एक बहुत बड़ा संकट है। यह विशेष बात है, जो सालों से भारत की समस्याओं का कारण रही है।
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देशभक्ति दुष्टों की अंतिम शरणस्थली है।
राष्ट्रवाद एक संकीर्ण विचार है, अगर वह ख़ुद में किसी व्यापक अवधारणा से जुड़ा हुआ नहीं है।
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jis ke hote hue hote the zamāne mere