कवि को लिखने के लिए कोरी स्लेट कभी नहीं मिलती है। जो स्लेट उसे मिलती है, उस पर पहले से बहुत कुछ लिखा होता है। वह सिर्फ़ बीच की ख़ाली जगह को भरता है। इस भरने की प्रक्रिया में ही रचना की संभावना छिपी हुई है।
भाषा के पर्यावरण में कविता की मौजूदगी का तर्क जीवन-सापेक्ष है : उसके प्रेमी और प्रशंसक हमेशा रहेंगे—बहुत ज़्यादा नहीं, लेकिन बहुत समर्पित!
विषम समयों में कविता की चुप्पी भी एक चीत्कार की तरह ध्वनित होती रही है। यह चुप्पी केवल कविता की चुप्पी नहीं, एक सामाजिक चेतना की घुटन भरी चीख़ है।
अपनी व्यक्तिगत सत्ता की अलग भावना से हटाकर; निज के योगक्षेम के संबंध से मुक्त करके, जगत् के वास्तविक दृश्यों और जीवन की वास्तविक दशाओं में जो हृदय समय-समय पर रमता रहता है, वही सच्चा कविहृदय है।
रचना-प्रक्रिया के भीतर न केवल भावना, कल्पना, बुद्धि और संवेदनात्मक उद्देश्य होते हैं; वरन वह जीवनानुभव होता है जो लेखक के अंतर्जगत का अंग है, वह व्यक्तित्व होता है जो लेखक का अंतर्व्यक्तित्व है, वह इतिहास होता है जो लेखक का अपना संवेदनात्मक इतिहास है और केवल यही नहीं होता।
कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर; लोकसामान्य भावभूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत् की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है।
दरअसल इस संक्राति-युग में भी; जो कवि मध्यवर्गीय मनःस्थिति को लेकर भावुकता से भरी हुई अनेक सफल कविताएँ लिख लेते हैं, उनके बारे में यह समझना चाहिए कि या तो वे वास्तविकता का अतिसरलीकरण करते हैं, अथवा वे उसकी उलझनों से घबड़ाकर ऊपरी सतह की रंगीनियों में रस लेते हैं।
‘यह सुरक्षित कुसुम ग्रहण करने योग्य है; यह ग्राम्य है, फलतः त्याज्य है; यह गूँथने पर सुंदर लगेगा; इसका यह उपयुक्त स्थान है और इसका यह’—इस प्रकार जैसे पुष्पों को भली-भाँति पहचानकर माली माला का निर्माण करता है, उसी प्रकार सजग बुद्धि से काव्यों में शब्दों का विन्यास करना चाहिए।
एक सुभाषित है—'कवितारसमाधुर्य्यम् कविर्वेत्ति’, कविता का रस-माधुर्य सिर्फ़ कवि जानता है। ठीक उसी प्रकार सुर में सुर मिलना चाहिए, नहीं तो वाद्ययंत्र कहेगा ‘गा’ और गले से निकलेगा ‘धा’।
जायसी की दृष्टि में प्रेम अत्यंत गूढ़ और अथाह है। ज़ाहिर है, ऐसे प्रेम की कविता लिखना भी आसान नहीं होगा।
आत्मा की सब अनुभूतियाँ ऐस्थेटिक नहीं होतीं, इसलिए वे काव्य-रूप में व्यक्त नहीं होतीं।
महाकवि विद्यापति मध्यकाल के पहले ऐसे कवि हैं, जिनकी पदावली में जन-भाषा में जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है।
भाषिक अभिव्यक्ति का रूप-रस, कविता द्वारा ही बचाया जा सकता है।
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अंतःकरण की वृतियों के चित्र का नाम कविता है।
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दूसरे कवि अधिक-से-अधिक आँसुओं से प्रेम की कविता लिखते हैं, लेकिन जायसी ने आँखों से टपकने वाले लहू से प्रेम की कविता लिखी है।
कविता आदमी को मार देती है। और जिसमें आदमी बच गया है, वह अच्छा कवि नहीं है।
सर्जक या रचनाकार के लिए ‘नॉनकन्फर्मिस्ट’ होना ज़रूरी है। इसके बिना उसकी सिसृक्षा प्राणवती नहीं हो पाती और नई लीक नहीं खोज पाती।
कवि मात्र जन्म से ही कवि नहीं होता, उसे अभ्यास भी करना पड़ता है; किन्तु अभ्यास उन्हीं को फलता है, जो जन्म से भी कवि हैं।
काव्यप्रणयन की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को व्याकरण का ज्ञान अर्जित करने का प्रयत्न करना चाहिए।
कविता एक सामूहिक उद्वेग और सामूहिक आवश्यकता की सहज अभिव्यक्ति है और यह व्यवस्था संपूर्ण रूप से वैयक्तिक है।
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काव्य क्षेत्र में किसी 'वाद' का प्रचार, धीरे-धीरे उसकी सारसत्ता को ही चर जाता है। कुछ दिनों में लोग कविता लिखकर 'वाद' लिखने लगते हैं।
ध्यान रखना चाहिए कि कवि किस सतह से बोल रहा है, यह हमेशा महत्वपूर्ण होता है और यही उसके निवेदनों या चित्रणों को द्योतित करता है।
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कविता में कहाँ कितना फ़्रॉड होता है, यह मैं जानता हूँ। फ़्रॉड को आप कौशल भी कह सकते हैं।
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कविता तो जीवन का प्रमाण मात्र है। अगर आपका जीवनदीप अच्छी तरह से जल रहा है, तो कविता सिर्फ़ राख है।
एक कवि सब कलाकारों का आदिस्वरूप होता है। कविता सब कलाओं की कला है।
सत्यकाव्य का प्रणयन पुरुषार्थचतुष्टय एवं कलाओं में निपुणता, आनंद और कीर्ति प्रदान करता है।
इधर जब से सांप्रदायिकता की महामारी फैली है और मस्जिद-मंदिर का झगड़ा खड़ा हुआ है; तब से कबीरदास का महत्त्व साधारण जनता के साथ-साथ, विद्वानों की भी समझ में आने लगा है।
कविता विचारहीन नहीं हो सकती, परंतु विचारात्मक प्रतिबद्धता को मैं कविता के लिए अनिवार्य नहीं मानता।
जो कवि केवल सौंदर्य का प्रेमी है, वह शुद्ध कलाकार बन जाता है।
रस ही कविता का सबसे बड़ा गुण है।
सन्निवेश के वैशिष्टय के कारण कभी-कभी सदोष कथन भी सुंदर बन जाता है—जैसे फूलों की माला के मध्य गूँथे हुए हरे पत्ते।
कविता के रंग चित्रकला के प्रकृति-रंग नहीं होते।
कविता ऐसे वाक्यांशों को बदल सकती है जो दुनिया को घुमाते हैं।
कविता की रचना सुनने से जुड़ी है।
वह सभी उपन्यासों की नायिका थी, सभी नाटकों की नायिका थी, सभी काव्य-पुस्तकों की अस्पष्ट ‘वह’ थी।
कविता तार्किक नहीं होती, जिसका मनचाहा उपयोग किया जा सके।
कोई इंजीनियर रद्दी माल लगाकर ग़ैर-ज़िम्मेदारी से कच्चे पुल का निर्माण करे; तो वह जिस अपराध का भागी होगा, उसी अपराध का भागी वह कवि भी होगा, जो राष्ट्रीयता की सच्ची भावना की अनुभूति के बिना रस्म-अदाई के लिए ओजहीन राष्ट्रीय-काव्य रचेगा।
जो भावुक या सहृदय होते हैं, अथवा काव्य के अनुशीलन से जिनके भावप्रसार का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है—उनकी वृत्तियाँ उतनी स्वार्थबद्ध नहीं रह सकतीं।
जिसमें भाव का पता देनेवाला अथवा भाव जाग्रत करनेवाला, कोई शब्द या वाक्य अथवा प्रस्तुत प्रसंग के प्रति किसी प्रकार का भाव उत्पन्न कराने में समर्थ अप्रस्तुत वस्तु या व्यापार न हो, केवल दूर की सूझ या शब्दासाम्यमूलक विलक्षणता हो, वह उक्ति काव्याभास होगी।
सच्चा कवि उसी व्यक्ति या वस्तु का स्वरूप कल्पना में लाएगा, जिसके प्रति उसकी किसी प्रकार की अनुभूति होगी।
जो काव्य सर्वसाधारण की समझ के बाहर होता है, वह बहुत कम लोकमान्य होता है।
कवि, परंपरा से प्राप्त विषयवस्तु को आत्मानुभूति, चिंतन और मनन द्वारा काव्यवस्तु बनाता है।
मनुष्य के व्यापार परिमित और संकुचित हैं। अतः बाह्य प्रकृति के अनंत और असीम व्यापारों के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अंशों को तारतम्यपूर्वक दिखाकर, कल्पना को शुद्ध और विस्तृत करना कवि का धर्म है।
मानव प्रकृति के जितने अधिक रूपों के साथ गोस्वामीजी के हृदय का रागात्मक सामंजस्य हम देखते हैं, उतना अधिक हिंदी भाषा के और किसी कवि के हृदय का नहीं।
मनुष्य के कठोर, मधुर और तीक्ष्ण—दो पक्ष हैं और बराबर रहेंगे। काव्यकला की पूरी रमणीयता इन दोनों पक्षों के समन्वय के बीच, मंगल या सौंदर्य के विकास में दिखाई पड़ती है।
सुविधाजीवी कवियों के शब्द अघाये आदमी की डकार होते हैं, लेकिन त्रिलोचन की कविता में शब्द आँखों से टपकनेवाले लहू की बूँदें हैं।
जो किसी मुख के लावण्य, वन-स्थली की सुषमा, नदी या शैलतटी की रमणीयता, कुसुमविकास की प्रफुल्लता, ग्रामदृश्यों की सरल माधुरी देख मुग्ध नहीं होता, जो किसी प्राणी के कष्ट-व्यंजक रूप और चेष्टा पर करुणार्द्र नहीं होता; जो किसी पर निष्ठुर अत्याचार होते देख क्रोध से नहीं तिलमिलाता—उसमें काव्य का सच्चा प्रभाव ग्रहण करने की क्षमता कभी नहीं हो सकती।
प्रसाद के साहित्य में मुझे जो कमी महसूस होती है, वह कला की नहीं—कला और जीवन के बीच घनिष्ठता की है।
गोष्ठी-समवाय का आयोजन; वेश्या के घर पर अथवा अन्य समान विद्या, बुद्धि, शील, धन वाले समवयस्क मित्रों के घर पर करना चाहिए। सभा में विद्या और कलाओं में निपुण वेश्याओं के साथ वार्तालाप करते हुए, साहित्य, काव्य-समस्या, कथा-आख्यायिक, नृत्य, गीत, कला एवं नाट्यकला आदि विषयों पर चर्चा करनी चाहिए। इस प्रकार समान अनुराग, परिहासपूर्वक मधुर वार्तालाप के साथ गोष्ठी में व्यवहार करते हुए गोष्ठी-समवाय का आनंद लेना चाहिए।
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