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पानी पर उद्धरण

पानी या जल जीवन के अस्तित्व

से जुड़ा द्रव है। यह पाँच मूल तत्त्वों में से एक है। प्रस्तुत चयन में संकलित कविताओं में जल के विभिन्न भावों की प्रमुखता से अभिव्यक्ति हुई है।

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त्वचा, हड्डियों और भूरे रंग का पानी—इन तीनों के मेल में, पुरुष और स्त्री के बीच के सारे फ़र्क़ ख़त्म हो जाते हैं।

हेर्टा म्युलर
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मेरी आत्मा को छोड़कर, हर चीज़, धूल का हर कण, पानी की हर बूँद, भले ही अलग-अलग रूपों में हो, अनंत काल तक अस्तित्व में रहती है?

अमोस ओज़
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धर्माचरण द्वारा हल्के बने हुए पुरुष संसार सागर में जल में पड़ी नौका के समान तैरते रहते हैं, किंतु पाप से भारी बने हुए व्यक्ति पानी में फेंके गए शस्त्र की भाँति डूब जाते हैं।

वेदव्यास
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मानव स्वभाव पानी जैसा है। वह अपने बर्तन के आकार में ढल जाता है।

वॉलेस स्टीवंस
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सज्जनता कठोरता से अधिक, पानी चट्टान से अधिक और प्यार ताक़त से अधिक मज़बूत है।

हरमन हेस
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निस्संदेह जब बर्तन में पानी खौलता है तो उससे भाप निकलती है और चित्रित बर्तन से चित्रित भाप निकलती है। किंतु क्या हो जब कोई यह कहने का हठ करे कि चित्रित बर्तन में भी कुछ खौल रहा होना चाहिए।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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चलते हुए, पानी की तरह बनो। स्थिर हो, तो दर्पण की तरह बनो। प्रतिध्वनि की तरह उत्तर दो।

ब्रूस ली
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बहता पानी कभी बासी नहीं होता, इसलिए आपको चलते रहना होगा।

ब्रूस ली
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नीच कुल से भी उत्तम स्त्री को ग्रहण कर ले। विष के स्थान से भी अमृत मिले तो उसे पी ले, क्योंकि स्त्रियाँ, रत्न और जल ये धर्मतः दूषणीय नहीं होते।

वेदव्यास
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प्रतिभा एक ऐसा स्रोत है जिससे निरंतर निर्मल जल बहता रहता है, परंतु यदि इस स्रोत का सही उपयोग किया जाए तो इसकी उपादेयता समाप्त हो जाती है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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जीवित रहना बिना प्यास के पानी पीने के समान है।

ऐनी एरनॉ
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नदी देश को जल देती है; अन्न देती है, लेकिन इससे भी बड़ा उसका एक दान है—वह देश को गति देती है। सुदूर बाह्य-जगत् के साथ संबंध स्थापित करती है। स्थावर शरीर के बीच प्राण-धारा प्रवाहित करती है। जो देश नदी पर निर्भर है; उसमें यदि नदी की धारा सूख जाए तो मिट्टी कृपण बन जाती है, अन्न-उत्पादन की शक्ति क्षीण हो जाती है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जो रात बीत गई है, वह फिर नहीं लौटती, जैसे जल से भरे हुए समुद्र की ओर यमुना जाती ही है, उधर से लौटती नहीं।

वाल्मीकि
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एक ग़ुस्सा था रुके हुए पानी की तरह जिसके निकलने की कोई राह नहीं थी, इसलिए जहाँ वह रुका हुआ था, उन दीवारों को ही चाट रहा था।

अमृता प्रीतम
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मेघ वर्षा करते समय यह नहीं देखता कि वह भूमि उपजाऊ है या ऊसर। वह दोनों को समान रूप से सींचता है। गंगा का पवित्र जल उत्तम और अधम का विचार किए बिना सबकी प्यास बुझाता है।

संत तुकाराम
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आत्मा को तो शस्त्र काट सकते हैं, आग जला सकती है। उसी प्रकार तो इसको पानी गला सकता है और वायु सुखा सकता है। यह आत्मा कभी कटने वाला, जलने वाला, भीगने वाला और सूखने वाला तथा नित्य सर्वव्यापी, स्थिर, अचल एवं सनातन है।

वेदव्यास
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सहस्र वाले ने सौ, सौ वाले ने दस अथवा किसी ने यथाशक्ति थोड़ा-सा पानी भी दिया, तो भी ये सब तुल्य फल हैं।

वेदव्यास
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हे माता! तुम्हारी यह धूलि, जल, आकाश और वायु—सभी मेरे लिए स्वर्ग तुल्य हैं। तुम मेरे लिए मर्त्य की पुण्य मुक्ति भूमि एवं तीर्थस्वरूपा हो।

नलिनीबाला देवी
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पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कोई भक्त मेरे लिए अर्पित करता है, शुद्ध चित्त वाले भक्त द्वारा लाया वह पदार्थ मैं ग्रहण कर लेता हूँ।

वेदव्यास
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जो विद्याएँ कर्म का संपादन करती हैं, उन्हीं का फल दृष्टिगोचर होता है, दूसरी विद्याओं का नहीं। विद्या तथा कर्म में भी कर्म का ही फल यहाँ प्रत्यक्ष दिखाई देता है। प्यास से पीड़ित मनुष्य जल पीकर ही शांत होता है।

वेदव्यास
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मनुष्य भोजन, जल और शुद्ध हवा से जितना छुटकारा पा सकता है, उससे अधिक छुटकारा ईश्वर से नहीं पा सकता।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
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नमक पानी की थाह लेने गया तो वह स्वयं ही नहीं रहा, फिर कितना गहरा पानी है, यह नाप कैसे लेगा?

ज्ञानेश्वर
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नर्मदा का पानी, पानी नहीं माँ का दूध है।

अमृतलाल वेगड़
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जल विप्लव है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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नदियों द्वारा समुद्र में डाला गया जल मेघों द्वारा पुनः मिल जाता है परंतु बनिए के घर रखी गई धरोहर फिर नहीं मिलती है।

कल्हण
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समुद्र की तलाश में निकला पानी है नदी और नदी की तलाश में निकला पदयात्री है परकम्मावासी। एक एक दिन दोनों की तलाश पूरी होती है।

अमृतलाल वेगड़
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तब मेरा शीतल क्रोध उस जल के समान हो उठा, जिसकी तरलता के साथ, मिट्टी ही नहीं, पत्थर तक काट देने वाली धार भी रहती है।

महादेवी वर्मा
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जो देश नदी पर निर्भर है; उसमें यदि नदी की धारा सूख जाए तो मिट्टी कृपण बन जाती है—अन्न-उत्पादन की शक्ति क्षीण हो जाती है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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संतों के द्वारा दिया गया संताप भी भला होता है और दुष्टों के द्वारा दिया गया सम्मान भी बुरा होता है। सूर्य तपता है तो जल की वर्षा भी करता है। परंतु दुष्ट के द्वारा दिया गया भक्ष्य भी मछली का प्राण ले लेता है।

दयाराम
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मन में पानी के अनेक संस्मरण हैं।

रघुवीर सहाय
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साथ निवास करने वाले दुष्टों में जल तथा कमल के समान मित्रता का अभाव ही रहता है। सज्जनों के दूर रहने पर भी कुमुद और चंद्रमा के समान प्रेम होता है।

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
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क्या पृथ्वी पर पानी बरसाने के लिए भगवान मेंढकों की टर्र-टर्र की प्रतीक्षा करता है।

कालिदास
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जो सागर में जाते हैं, उन्होंने मोती जमा किए हैं। जो छिछले पानी वाले किनारे अपनाते हैं, उनके भाग्य में शंख और सीप होते हैं।

शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई
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संसार में उत्पन्न हुए प्राणियों के आपस में होनेवाले मिलनों का अंत निश्चय ही वियोग में होता है जैसे जल में बुलबुले प्रकट होते हैं और मिट जाते हैं।

वेदव्यास
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तेजस्वी लोग तड़ित के समान आघात पाकर जल में भी प्रज्वलित रहते हैं।

बाणभट्ट
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विपक्ष का विनाश किए बिना प्रतिष्ठा दुर्लभ रहती है। धूलि को कीचड़ बनाए बिना पानी नहीं ठहरता।

माघ
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बरसात का पानी एक जगह आबद्ध होकर रह जाए, अबाध गति से बहता रहे—इसके लिए नदियाँ ज़रूरी हैं। और नदियों का प्रवाह रक्त के प्रवाह की तरह सदा एक-सा बहता रहे—इसके लिए बाँध ज़रूरी हैं।

अमृतलाल वेगड़
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पानी का स्वरूप ही शीतल है।

रघुवीर सहाय
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मीठे पानी का श्रेष्ठ और सुदीर्घ स्रोत है नदी।

अमृतलाल वेगड़
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क्रोध निरुत्तर होकर पानी हो जाता है।

प्रेमचंद
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अभीष्ट वस्तु के लिए मन के स्थिर निश्चय को और नीचे की ओर जाने वाले जल के प्रवाह को कौन रोक सकता है?

कालिदास
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पानी, चट्टान, प्रपात, शोर और मोड़—ये पाँच तत्व हैं, जिनसे नर्मदा की देह का निर्माण हुआ है।

अमृतलाल वेगड़
  • संबंधित विषय : नदी
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पानी एक ऐसी चीज़ है जिसे बहुत देर तक बिना बोले भी देखा जा सकता है।

सिद्धेश्वर सिंह
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वाष्पीकरण एक सहज क्रिया है। यह सिर्फ़ द्रवों पर ही लागू हो ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं।

सिद्धेश्वर सिंह
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यदि तुम किसी को दूध नहीं पिला सकते तो मत पिलाओ, परंतु छाछ देने में क्या हानि है? यदि किसी को अन्न देने में समर्थ नहीं हो तो क्या प्यासे को पानी भी नहीं पिला सकते?

संत तुकाराम
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जैसे शुद्ध पानी में सोने और चांदी का वजन होता है, वैसे ही आत्मा मौन में अपना वजन परखती है, और हम जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं हमारे जो उनका कोई अर्थ नहीं होता उस मौन के सिवा जो उन्हें घेरे रहता है।

मौरिस मैटरलिंक
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जल समस्त प्रकृति की प्रेरक शक्ति है।

लियोनार्डो दा विंची
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मेघ के जल के समान दूसरा जल नहीं। आत्म-जल के समान दूसरा बल नहीं। चक्षु के समान दूसरा तेज़ नहीं। अन्न के समान कोई प्रिय नहीं।

चाणक्य
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जल और अग्नि के समान धर्म और क्रोध का एक स्थान पर रहना स्वभाव-विरुद्ध है।

बाणभट्ट

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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