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समाज पर उद्धरण

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जिन्होंने सभ्यता को रुटीन के रूप में स्वीकार कर लिया है, उनके भीतर कोई बेचैनी नहीं उठती। वे दिन-भर दफ्तरों में काम करते हैं और रात में क्लबों के मज़े लेकर आनन्द से सो जाते हैं और उन्हें लगता है, वे पूरा जीवन जी रहे हैं।

रामधारी सिंह दिनकर
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योग्य आदमियों की कमी है। इसलिए योग्य आदमी को किसी चीज़ की कमी नहीं रहती। वह एक ओर छूटता है तो दूसरी ओर से पकड़ा जाता है।

श्रीलाल शुक्ल
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बेईमानी इतनी पुरानी बात हो गई है कि अब कोई बेईमानी की बात करे, तो लगता है बड़ा पिछड़ा हुआ आदमी है।

हरिशंकर परसाई
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आचार्य शुक्ल जिसे मर्यादा कहते हैं, वह वास्तव में रूढ़ि है।

मैनेजर पांडेय
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नितांत बर्बर समाज में स्त्री पर पुरुष वैसा ही अधिकार रखता है, जैसा वह अपनी अन्य स्थावर संपत्ति पर रखने को स्वतंत्र है।

महादेवी वर्मा
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मनुष्य ने नियम-कायदों के अनुसार; अपने सजग ज्ञान द्वारा भाषा की सृष्टि नहीं की, और उसके निर्माण की उसे आत्म-चेतना ही थी। मनुष्य की चेतना के परे ही प्रकृति, परम्परा, वातावरण, अभ्यास अनुकरण आदि के पारस्परिक संयोग से भाषा का प्रारम्भ और उसका विकास होता रहा।

विजयदान देथा
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सभ्यता इस तरह होनी चाहिए कि आदमी को अपने जीवन का अर्थ खोजने के लिए आज़ादी मिले।

श्याम मनोहर
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जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन के स्थान पर कृत्रिम, यांत्रिक जीवन का वरण करके तृप्त नहीं होता, उसके भीतर प्रश्न उठते ही रहते हैं और वह अनुत्तरित प्रश्नों के अरण्य में भटकता हुआ कहीं भी शान्ति नहीं पाता है।

रामधारी सिंह दिनकर
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कविता एक सामूहिक उद्वेग और सामूहिक आवश्यकता की सहज अभिव्यक्ति है और यह व्यवस्था संपूर्ण रूप से वैयक्तिक है।

विजयदान देथा
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एक पुरुष के प्रति अन्याय की कल्पना से ही सारा पुरुष समाज उस स्त्री से प्रतिशोध लेने को उतारू हो जाता है और एक स्त्री के साथ क्रूरतम अन्याय का प्रमाण पाकर भी सब स्त्रियाँ उसके अकारण दंड को अधिक भारी बनाए बिना नहीं रहतीं।

महादेवी वर्मा
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संगीत का विशेष, पनपता-बढ़ता इसलिए है कि स्वर और स्वर के संबंध—जिनसे संगीत बनता है—उनकी उधेड़बुन, हर परंपरा की अपनी होती है।

मुकुंद लाठ
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पुरुषों और स्त्रियों को जिस समाज में वे रहते हैं, मुख्यतः उसकी राय और शिष्टाचार के अनुरूप शिक्षित होना चाहिए।

मैरी वोलस्टोनक्राफ़्ट
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समाज में रहने वाला मनुष्य; समाज की अनिच्छा से ही क्यों हो, साझेदार बनता है।

महात्मा गांधी
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समाज की स्थिरता का कारण रूढ़ियों का ही स्थैर्य होता है।

रामधारी सिंह दिनकर
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कोई समाज और धर्म स्त्रियों के नहीं। बहन! सब पुरुषों के हैं। सब हृदय को कुचलने वाले क्रूर हैं, फिर भी मैं समझती हूँ कि स्त्रियों का एक धर्म है, वह है आघात सहने की क्षमता रखना। दुर्देव के विधान ने उसके लिए यही पूर्णता बना दी है। यह उनकी रचना है।

जयशंकर प्रसाद
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भारत में जितना व्यवस्थित धंधा ब्राह्मण का है, उतना मारवाड़ी का भी नहीं।

हरिशंकर परसाई
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लेखक—जो कोई भी सही अर्थ में आधुनिक है और बुद्धिजीवी है, उसे अपने जीवन और अपने समाज के हर मोर्चे पर पूरी सचाई, पूरी ईमानदारी के साथ पक्षधर होकर, क्रांतिकारी होकर, अपने वर्ग, अपने समूह, अपने जुलूस का मुखपात्र, प्रवक्ता होकर सामने आना होगा—उसे आख़िरी क़तार में सिर झुकाए हुए खड़े रहना नहीं होगा।

राजकमल चौधरी
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समाज में जब कोई प्रबल, संक्रामक भावना जाग उठती है तो वह किसी वेष्टन को नहीं मानती।

रवींद्रनाथ टैगोर
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पुरुष और स्त्री का संबंध केवल आध्यात्मिक होकर व्यावहारिक भी है, इस प्रत्यक्ष सत्य को समाज जाने कैसे अनदेखा करता रहा है।

महादेवी वर्मा
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समाज ने स्त्री-मर्यादा का जो मूल्य निश्चित कर दिया है, केवल वही उसकी गुरुता का मापदंड नहीं। स्त्री की आत्मा में उसकी मर्यादा की जो सीमा अंकित रहती है, वह समाज के मूल्य से बहुत अधिक गुरु और निश्चित है, इसी से संसार भर का समर्थन पाकर जीवन का सौदा करने वाली नारी के हृदय में भी सतीत्व जीवित रह सकता है और समाज भर के निषेध से घिर कर धर्म का व्यवसाय करने वाली सती की साँसें भी तिल-तिल करके असती के निर्माण में लगी रह सकती हैं।

महादेवी वर्मा
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अपने पूर्ण से पूर्ण गौरव से गौरवांवित स्त्री भी इतनी पूर्ण होगी कि पुरुषोचित स्वभाव को भी अपनी प्रकृति में समाहित कर ले, अतएव मानव-समाज में साम्य रखने के लिए, उसके अपनी प्रकृति से भिन्न स्वभाव वाले का सहयोग श्रेय रहेगा—इस दशा में प्रतिद्वंद्विता संभव नहीं।

महादेवी वर्मा
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पतित कही जाने वाली स्त्रियों के प्रति समाज की घृणा, हाथी के दाँत के समान बाह्य प्रदर्शन के लिए हैं और उसका उपयोग स्वयं उसकी मिथ्या प्रतिष्ठा की रक्षा तक सीमित है।

महादेवी वर्मा
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विवश आर्थिक पराधीनता; अज्ञात रूप में व्यक्ति के मानसिक तथा अन्य विकास पर ऐसा प्रभाव डालती रहती है, जो सूक्ष्म होने पर भी व्यापक तथा परिणामतः आत्मविश्वास के लिए विष के समान है।

महादेवी वर्मा
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तबादले की एक बँधी-बँधाई नैतिक पद्धति है। अफ़सर या मंत्री से संबंध होने से तबादले होते हैं। फिर तबादले करने के रेट बँधे हैं। लोककर्म विभाग के रेट ऊँचे हैं, शिक्षा-विभाग के रेट कम हैं—यह एक ईमानदार प्रक्रिया है।

हरिशंकर परसाई
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वर्तमान समाज जिस स्त्री को निर्वासन-दंड देना चाहता है; उसके फूटे कपाल को ऐसे लोहे से दाग देता है, जिसका चिह्न जन्म-जन्मांतर के आँसुओं से भी नहीं धुल पाता।

महादेवी वर्मा
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स्त्री के लिए एक दुर्वह बंधन घर में है और उससे असह्य दूसरा बाहर—यह मानना असत्य ही नहीं, अपने प्रति तथा समाज के प्रति अन्याय भी होगा।

महादेवी वर्मा
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आपदग्रस्ता नारी के सम्मान की रक्षा में मिट जाने वालों की संख्या नगण्य ही है, परंतु अपनी कुचेष्टाओं से उसका अनादर करने वाले पग-पग पर मिलेंगे।

महादेवी वर्मा
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भारतीय धर्म ने और भारतीय संस्कृति ने कभी नहीं कहा कि केवल हमारा ही एक धर्म सच्चा है और बाक़ी के झूठे हैं। हम तो मानते हैं कि सब धर्म सच्चे हैं, मनुष्य के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं। सब मिल कर इनका एक विश‍ाल परिवार बनता है। इस पारिवारिकता को और आत्मीयता को को जो चीज़ें खंडित करती है उनकी छोड़ देने के लिए सब को तैयार रहना ही चाहिए। हर एक धर्म-समाज अंतर्मुख होकर अपने दिल को टटोल कर देखे कि जागतिक मानवीय एकता का द्रोह हमसे कहाँ तक हो रहा है।

काका कालेलकर
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एक वर्ग ऐसा रहा है, जो आदमी को हमेशा इस्तेमाल करता रहा है। पहले वह फ़िंक्शन के जरिए उसे एक्स्प्लायट करता था। उस के बाद फ़ेथ (विश्वास) के जरिये इस्तेमाल करता रहा, और अब फ़ैक्ट (तथ्य) के नाम पर इस्तेमाल कर रहा है।

धूमिल
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जिस समाज में धन के साथ पाप का समझौता ही प्रतिष्ठा का कारण है, वहाँ समाज का गुरु अवहेलना का पात्र हो, यह आश्चर्य की बात तो नहीं है—दु:ख की अवश्य है। और वह इस देश के दुर्भाग्य पर है, जो एक बार किसी समय अपने ज्ञान के आलोक से संसार को चकाचौंध करके, अब धीरे-धीरे अंधकार ही पसंद करता जा रहा है।

हरिशंकर परसाई
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भक्ति आंदोलन के विकास में तीन मुख्य सहायक तत्त्व है : उस काल के सामाजिक जीवन के नए परिवर्तन, आचार्यों का दार्शनिक चिंतन और भक्त कवियों की सृजनशीलता।

मैनेजर पांडेय
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हम पुरुषों की वर्गीय तहों के जितना नीचे जाएँगे, उतना ही पुरुषों का 'पुरुष होने का घमंड' बढ़ता दिखेगा। और यह सबसे ज्यादा उन पुरुषों में मिलेगा, जिनमें पत्नी और बच्चों को छोड़कर और किसी पर राज करने की तो हिम्मत है, योग्यता।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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आज जो अच्छे हैं, उनमें बहुत थोड़े सच्चे अच्छे हैं। जो बुरे हैं, उनमें बहुत थोड़े सच्चे बुरे हैं। अच्छे लोग ज़्यादा हैं और बुरे कम हैं। अच्छे में सच्चे कम हैं और बुरे में सच्चे बहुत कम हैं। कुल मिलाकर सच्चे लोग बहुत कम हैं।

विनोबा भावे
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रूढ़ियाँ केवल शास्त्र की ही नहीं होतीं, लोक की भी होती हैं।

मैनेजर पांडेय
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सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक कल्याण की एक ही नींव है, और वह यह जानना कि ‘मैं और मेरा भाई एक हैं।’ यह सब देशों और सब जातियों के लिए सत्य है।

स्वामी विवेकानन्द
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यह पूजा-परस्ती जो आज की सबसे झूठी पूजाओं में से एक है; शायद तब तक क़ायम रहेगी, जब तक कोई ठोस मनोविज्ञान इस 'इंस्टिंक्ट' का पर्दाफ़ाश नहीं कर देता, जिसे 'प्रकृति का इरादा' और 'ईश्वर का आदेश मान कर नतमस्तक हुआ जा रहा है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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पुरुष समाज का न्याय है, स्त्री दया, पुरुष प्रतिशोधमय क्रोध है, स्त्री क्षमा, पुरुष शुष्क कर्तव्य है, स्त्री सरस सहानुभूति और पुरुष बल है, स्त्री हृदय की प्रेरणा।

महादेवी वर्मा
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भारतीय समाज की जाति की चारदीवारी इतनी ऊँची और मजबूत है कि उसे लाँघना असंभव है। जाति के बाहर कोई कितना भी बड़ा क्यों हो, उसका जीवन कूड़े की तरह होता है।

दुर्गा भागवत
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यदि हम कटु सत्य सह सकें, तो लज्जा के साथ स्वीकार करना होगा कि समाज ने स्त्री को जीविकोपार्जन का साधन निकृष्टतम दिया है। उसे पुरुष के वैभव की प्रदर्शनी तथा मनोरंजन का साधन बनकर ही जीना पड़ता है, केवल व्यक्ति और नागरिक के रूप में उसके जीवन का कोई मूल्य नहीं आँका जाता।

महादेवी वर्मा
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जिस सभ्यता में सीधा-सादा आम आदमी भी खोज करने की क्षमता रखता है, वह सभ्यता महान है।

श्याम मनोहर
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मैं ख़ुद इस बात का घोर समर्थक हूँ कि विवाह के बाद सभी हितों का मिलन ही एक आदर्श स्थिति है, लेकिन हितों के मिलन का अर्थ यह नहीं हुआ कि जो मेरा है, वह तुम्हारा है; पर जो तुम्हारा है, वह सिर्फ़ तुम्हारा है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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कोई भी क़ानून तब तक हमारे जीवन का हिस्सा नहीं हो सकता, जब तक कि वह हमारी सोच और हमारी भावनाओं का हिस्सा हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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निर्गुण और सगुण की दार्शनिक दृष्टियों के बीच कहीं-कहीं द्वंद्व है, लेकिन वह हर जगह लोक से शास्त्र का द्वंद्व नहीं है।

मैनेजर पांडेय
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समाज की सभ्यता का अर्थ है—जीवन के व्यवहारों को सरल, सुलभ बनाने वाली भाषा।

श्याम मनोहर
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मानव-स्वभाव की कुरूपताएँ तभी तक मर्यादा में रहती हैं, जब तक उनके सामने कोई सीमा-रेखा खिंची हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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नवयुग का आवाहन, राष्ट्रीयता जैसे विषय पर लिखने के लिए अपने भीतर वैसी अनुभूति जगानी पड़ती है, सामाजिक चिंतनधारा में बहा जाता है—किनारे पर खड़े होकर लहरों का हिसाब नहीं किया जाता।

हरिशंकर परसाई
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समाज तुम्हें जो छवि देता है उसके बजाय, अपनी ख़ुद की छवि गढ़ने का निर्णय लेने के लिए बहुत साहस और स्वतंत्रता की ज़रूरत है, लेकिन जैसे-जैसे तुम आगे बढ़ते जाते हो, यह आसान हो जाता है।

जेर्मेन ग्रीयर
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हमें उन पुरुषों की भावनाओं का सुराग़ भी मिल जाता है, जो स्त्रियों की समान स्वतंत्रता के नाम से चिढ़ते हैं। मेरे ख़्याल में उन्हें डर लगता है, इस बात से नहीं कि स्त्रियाँ विवाह से इन्कार कर देंगी—क्योंकि मुझे नहीं लगता कोई सचमुच ऐसा सोचेगा, बल्कि इस बात से कि वे चाहेंगी कि विवाह बराबरी की शर्तों पर तय हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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समाज ने स्त्री के संबंध में अर्थ का ऐसा विषम विभाजन किया है कि साधारण श्रमजीवी वर्ग से लेकर, संपन्न वर्ग की स्त्रियों तक की स्थिति दयनीय ही कही जाने योग्य है। वह केवल उत्तराधिकार से ही वंचित नहीं है, वरन् अर्थ के संबंध में सभी क्षेत्रों में एक प्रकार की विवशता के बंधन में बंधी हुई है।

महादेवी वर्मा
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हमारी राष्ट्रीय जागृति इसे प्रमाणित कर चुकी है कि अवसर मिलने पर गृह के कोने की दुर्बल बंदिनी, स्वच्छंद वातावरण में बल प्राप्त पुरुष से शक्ति में कम नहीं।

महादेवी वर्मा

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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