मैं जीवन के बाद के जीवन की कल्पना नहीं कर पाता : जैसे ईसाई या अन्य धर्मों के लोग विश्वास रखते हैं और मानते हैं जैसे कि सगे-संबंधियों और दोस्तों के साथ हुई बातचीत जिसे मौत आकर बाधित कर देती है, और जो आगे भी जारी रहती है।
कामकलाओं में कुशल, वाचाल और चापलूस व्यक्ति—अपरिचित होने पर भी स्त्रियों के चित्त को शीघ्र ही जीत लेता है या वश में कर लेता है।
मुहावरे युगों के जातीय अनुभव से बनते हैं और व्यक्ति की ज़बान पर आ जाते हैं। युग बदलता है तो मुहावरा बना रहता है, पर अर्थ बदल जाता है।
जब महिला अपने विचार बताती है, तो वह स्वाभाविक रूप से पुरुष को बोलने के लिए प्रोत्साहित करती है, लेकिन जब पुरुष महसूस करता है कि उसके बोलने की माँग की जा रही है, तो उसका दिमाग़ खाली हो जाता है।
वाणी में सत्य रहेगा, तो उस वाणी का फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है। जहाँ नहीं बोलना है, वहाँ मौन की शक्ति होनी चाहिए। ऐसी शक्ति नहीं होगी, तो वहाँ शब्द व्यर्थ जाएगा।
किसी न किसी प्रकार की भाषा, संवाद के माध्यम हर आदगी बना ही लेता है।
संवाद उन लोगों के बीच भी नहीं हो सकता, जिनमें एक तरफ़ दूसरों को अपना शब्द बोलने का अधिकार न देने वाले हों; और दूसरी तरफ़ वे, जिनसे अपना शब्द बोलने का अधिकार छीन लिया गया हो।
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जब कोई महिला किसी दूसरी महिला की बात सुनती है, तो वह वक्ता को आश्वस्त करती रहेगी कि वह सुन रही है और उसे उसकी परवाह है। बोलने वाली जब ठहरती है, तो सहज बोध से महिला श्रोता उसे आश्वस्त करने के लिए तसल्ली देने वाली प्रतिक्रियाएँ देती है, जैसे "ओह, उह, आह, आह-हा या हम्म।"
संवाद किसी भी रिश्ते का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व होता है, इसलिए बहस रिश्ते का सबसे विनाशकारी तत्त्व हो सकता है, क्योंकि हम किसी के जितने ज़्यादा क़रीब होते हैं, उसे चोट पहुँचाना या उससे चोट पहुँचना उतना ही ज़्यादा आसान होता है।
स्त्रियों की सभा में व्याख्यान देने का भी मौक़ा कौन चूकना चाहेगा। यदि सभाओं में, श्रोताओं में स्त्रीजाति न होती, तो हमारे युग में ही वक्ताओं की पैदाइश शायद एक-चौथाई रह जाती।
संचार के नज़रिए से देखें; तो भी पत्रकारिता की भूमिका में विखंडन ही ज़्यादा ठहरता है, जुड़ाव कम।
संवाद आशा के बिना भी संभव नहीं।
संबंध बनाने और संवाद करने के नए व स्वस्थ तरीक़े सीखना अनिवार्य है।
प्रेम, विनम्रता और विश्वास पर आधारित संवाद एक समस्तरीय संबंध बन जाता है, जिसका तार्किक परिणाम होता है—संवादकर्ताओं में एक-दूसरे पर भरोसा।
बोलने में मर्यादा मत छोड़ना। गालियाँ देना तो कायरों का काम है।
क्रोध में आदमी अपने मन की बात नहीं करता, वह केवल दूसरे का दिल दुखाना चाहता है।
शब्द संवाद को संभव बनाने वाला एक उपकरण मात्र नहीं, उससे कुछ अधिक भी है।
वार्तालाप से बुद्धि विकसित होती है किंतु प्रतिभा की पाठशाला तो एकांत ही है।
सनीचर ने सिर झुकाकर कुछ कहना शुरू कर दिया। वार्तालाप की यह वही अखिल भारतीय शैली थी जिसे पारसी थियेंटरों ने अमर बना दिया है। इसके सहारे एक आदमी दूसरे से कुछ कहता है और वहीं पर खड़े हुए तीसरे आदमी को कानोंकान ख़बर नहीं होती; यह दूसरी बात है कि सौ गज़ की दूरी तक फैले हुए दर्शकगण उस बात को अच्छी तरह सुनकर समझ लेते हैं और पूरे जनसमुदाय में स्टेज पर खड़े हुए दूसरे आदमी को छोड़कर, सभी लोग जान लेते हैं कि आगे क्या होनेवाला है।
सभी अच्छी किताबों का अध्ययन करना, अतीत के श्रेष्ठ मस्तिष्कों के साथ संवाद करने जैसा है।
अवलोकन, संभाषण, विलास, परिहास, क्रीड़ा, आलिंगन तो दूर रहे, स्त्रियों का स्मरण भी मन को विकृत करने में पर्याप्त है।
लेक्चर का मज़ा तो तब है जब सुननेवाले भी समझें कि यह बकवास कर रहा है और बोलनेवाला भी समझे कि मैं बकवास कर रहा हूँ। पर कुछ लेक्चर देनेवाले इतनी गंभीरता से चलते कि सुननेवाले को कभी-कभी लगता था यह आदमी अपने कथन के प्रति सचमुच ही ईमानदार है।
बृहदारण्यक उपनिषद् में; याज्ञवल्क्य के साथ जनक की सभा में, उस समय के सबसे बड़े ज्ञानियों के साथ बहस को गार्गी ने ब्रह्मोद्य कहा है।
यह हमारी गौरवपूर्ण परंपरा है कि असल बात; दो-चार घंटे की बातचीत के बाद अंत में ही निकलती है।
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संवाद विनम्रता के बिना भी संभव नहीं है।
नाटक में शब्दों से मोह हो जाता है। यह फ़ालतू का मोह जानलेवा हो जाता है। अभिनेता के लिए भी, निर्देशक के लिए भी, यह बात मुझे रंजीत कपूर ने बताई थी।
जब कोई आदमी बातचीत में ऐसा रुख़ अपना ले जैसा कि पेशेवर गवाह कचहरी में सच कहने की क़सम खाकर जिरह में दिखाते हैं, तो आगे सवाल पूछना बेकार है।
उनकी बातचीत किसी एक ऐसी घटना के बारे में होती रही 'दोपहर', 'फंटूश', 'चकाचक', ‘ताश’, और ‘पैसे’ का ज़िक्र उसी बहुतायत से हुआ जो प्लानिंग कमीशन के अहलकारों में ‘इवैल्युएशन’, ‘कोआर्डिनेशन’, ‘डवटेलिंग’ या साहित्यकारों में ‘परिप्रेक्ष्य’, ‘आयाम’, ‘युगबोध’, ‘संदर्भ’ आदि कहने में पाई जाती है।
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विचार के मंच का इस्तेमाल किसी एक विषय पर बार-बार सोचने के लिए नहीं हो सकता। कोइ मंचाधीश ऐसा करता है तो आशंका फैल जाती है कि उसका कोई स्वार्थ है।
जनता से संवाद करना; न तो उसके साथ की जाने वाली कोई रियायत है, और न उसे दिया जाने वाला कोई उपहार।
हम बचपन से गद्य बोलते आ रहे हैं, लेकिन गद्य कैसी दुरूह चीज़ है—यह प्रथम गद्यकारों की पचना देखकर ही समझ सकते हैं।
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संवाद के बिना कोई संप्रेषण नहीं होता, और संप्रेषण के बिना कोई सच्ची शिक्षा नहीं हो सकती।
पढ़ना, मौन वार्तालाप के अतिरिक्त क्या है ?
कम बातें कीजिए, कम में बातें कीजिए और काम की ही बातें कीजिए।
लोक एषणा या लोक रंजन ऐसी बला है कि कैसे ही आप चोखे-से-चोखे सच कहने वाले या सच्चा बर्ताव रखने वाले हो, कुछ-न-कुछ बनावट किए बिना चल ही नहीं सकता।
वार्तालाप में अच्छा स्वभाव वाग्विदग्धता की अपेक्षा अधिक सुखकर होता है और वह व्यक्तित्व को एक ऐसी आत्मा प्रदान करता है जो सौंदर्य की अपेक्षा अधिक प्यारी होती है।
यदि मैं दूसरों को हमेशा अज्ञानी बताऊँ और अपने अज्ञान को न देखूँ, तो मैं संवाद कैसे कर सकता हूँ?
जो बात कही जा सकती है वह स्पष्ट रूप से भी कही जा सकती है।
जो विश्व को नाम देना चाहते हों और जो उसे नाम न देना चाहते हों, ऐसे लोगों के बीच संवाद नहीं हो सकता।
प्रति-वृत्त का अर्थ है टकराहट।
भाषाओं की जानकारी के बिना पढ़ने और लोगों से बातचीत करने की योग्यता का विकास नहीं हो सकता।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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