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संवाद पर उद्धरण

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मैं जीवन के बाद के जीवन की कल्पना नहीं कर पाता : जैसे ईसाई या अन्य धर्मों के लोग विश्वास रखते हैं और मानते हैं जैसे कि सगे-संबंधियों और दोस्तों के साथ हुई बातचीत जिसे मौत आकर बाधित कर देती है, और जो आगे भी जारी रहती है।

एडवर्ड मुंक
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कामकलाओं में कुशल, वाचाल और चापलूस व्यक्ति—अपरिचित होने पर भी स्त्रियों के चित्त को शीघ्र ही जीत लेता है या वश में कर लेता है।

वात्स्यायन
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मुहावरे युगों के जातीय अनुभव से बनते हैं और व्यक्ति की ज़बान पर जाते हैं। युग बदलता है तो मुहावरा बना रहता है, पर अर्थ बदल जाता है।

हरिशंकर परसाई
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वाणी में सत्य रहेगा, तो उस वाणी का फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है। जहाँ नहीं बोलना है, वहाँ मौन की शक्ति होनी चाहिए। ऐसी शक्ति नहीं होगी, तो वहाँ शब्द व्यर्थ जाएगा।

विनोबा भावे
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किसी किसी प्रकार की भाषा, संवाद के माध्यम हर आदगी बना ही लेता है।

आशीष नंदी
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संवाद उन लोगों के बीच भी नहीं हो सकता, जिनमें एक तरफ़ दूसरों को अपना शब्द बोलने का अधिकार देने वाले हों; और दूसरी तरफ़ वे, जिनसे अपना शब्द बोलने का अधिकार छीन लिया गया हो।

पॉलो फ़्रेरा
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स्त्रियों की सभा में व्याख्यान देने का भी मौक़ा कौन चूकना चाहेगा। यदि सभाओं में, श्रोताओं में स्त्रीजाति होती, तो हमारे युग में ही वक्ताओं की पैदाइश शायद एक-चौथाई रह जाती।

हरिशंकर परसाई
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प्रेम, विनम्रता और विश्वास पर आधारित संवाद एक समस्तरीय संबंध बन जाता है, जिसका तार्किक परिणाम होता है—संवादकर्ताओं में एक-दूसरे पर भरोसा।

पॉलो फ़्रेरा
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संचार के नज़रिए से देखें; तो भी पत्रकारिता की भूमिका में विखंडन ही ज़्यादा ठहरता है, जुड़ाव कम।

कृष्ण कुमार
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संवाद आशा के बिना भी संभव नहीं।

पॉलो फ़्रेरा
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बोलने में मर्यादा मत छोड़ना। गालियाँ देना तो कायरों का काम है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल
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क्रोध में आदमी अपने मन की बात नहीं करता, वह केवल दूसरे का दिल दुखाना चाहता है।

प्रेमचंद
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शब्द संवाद को संभव बनाने वाला एक उपकरण मात्र नहीं, उससे कुछ अधिक भी है।

पॉलो फ़्रेरा
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वार्तालाप से बुद्धि विकसित होती है किंतु प्रतिभा की पाठशाला तो एकांत ही है।

एडवर्ड गिब्बन
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सनीचर ने सिर झुकाकर कुछ कहना शुरू कर दिया। वार्तालाप की यह वही अखिल भारतीय शैली थी जिसे पारसी थियेंटरों ने अमर बना दिया है। इसके सहारे एक आदमी दूसरे से कुछ कहता है और वहीं पर खड़े हुए तीसरे आदमी को कानोंकान ख़बर नहीं होती; यह दूसरी बात है कि सौ गज़ की दूरी तक फैले हुए दर्शकगण उस बात को अच्छी तरह सुनकर समझ लेते हैं और पूरे जनसमुदाय में स्टेज पर खड़े हुए दूसरे आदमी को छोड़कर, सभी लोग जान लेते हैं कि आगे क्या होनेवाला है।

श्रीलाल शुक्ल
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सभी अच्छी किताबों का अध्ययन करना, अतीत के श्रेष्ठ मस्तिष्कों के साथ संवाद करने जैसा है।

इमैनुएल कांट
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अवलोकन, संभाषण, विलास, परिहास, क्रीड़ा, आलिंगन तो दूर रहे, स्त्रियों का स्मरण भी मन को विकृत करने में पर्याप्त है।

कृष्ण बिहारी मिश्र
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बृहदारण्यक उपनिषद् में; याज्ञवल्क्य के साथ जनक की सभा में, उस समय के सबसे बड़े ज्ञानियों के साथ बहस को गार्गी ने ब्रह्मोद्य कहा है।

राधावल्लभ त्रिपाठी
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लेक्चर का मज़ा तो तब है जब सुननेवाले भी समझें कि यह बकवास कर रहा है और बोलनेवाला भी समझे कि मैं बकवास कर रहा हूँ। पर कुछ लेक्चर देनेवाले इतनी गंभीरता से चलते कि सुननेवाले को कभी-कभी लगता था यह आदमी अपने कथन के प्रति सचमुच ही ईमानदार है।

श्रीलाल शुक्ल
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संवाद विनम्रता के बिना भी संभव नहीं है।

पॉलो फ़्रेरा
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यह हमारी गौरवपूर्ण परंपरा है कि असल बात; दो-चार घंटे की बातचीत के बाद अंत में ही निकलती है।

श्रीलाल शुक्ल
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नाटक में शब्दों से मोह हो जाता है। यह फ़ालतू का मोह जानलेवा हो जाता है। अभिनेता के लिए भी, निर्देशक के लिए भी, यह बात मुझे रंजीत कपूर ने बताई थी।

स्वदेश दीपक
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जब कोई आदमी बातचीत में ऐसा रुख़ अपना ले जैसा कि पेशेवर गवाह कचहरी में सच कहने की क़सम खाकर जिरह में दिखाते हैं, तो आगे सवाल पूछना बेकार है।

श्रीलाल शुक्ल
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उनकी बातचीत किसी एक ऐसी घटना के बारे में होती रही 'दोपहर', 'फंटूश', 'चकाचक', ‘ताश’, और ‘पैसे’ का ज़िक्र उसी बहुतायत से हुआ जो प्लानिंग कमीशन के अहलकारों में ‘इवैल्युएशन’, ‘कोआर्डिनेशन’, ‘डवटेलिंग’ या साहित्यकारों में ‘परिप्रेक्ष्य’, ‘आयाम’, ‘युगबोध’, ‘संदर्भ’ आदि कहने में पाई जाती है।

श्रीलाल शुक्ल
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विचार के मंच का इस्तेमाल किसी एक विषय पर बार-बार सोचने के लिए नहीं हो सकता। कोइ मंचाधीश ऐसा करता है तो आशंका फैल जाती है कि उसका कोई स्वार्थ है।

कृष्ण कुमार
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जनता से संवाद करना; तो उसके साथ की जाने वाली कोई रियायत है, और उसे दिया जाने वाला कोई उपहार।

पॉलो फ़्रेरा
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हम बचपन से गद्य बोलते रहे हैं, लेकिन गद्य कैसी दुरूह चीज़ है—यह प्रथम गद्यकारों की पचना देखकर ही समझ सकते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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संवाद के बिना कोई संप्रेषण नहीं होता, और संप्रेषण के बिना कोई सच्ची शिक्षा नहीं हो सकती।

पॉलो फ़्रेरा
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पढ़ना, मौन वार्तालाप के अतिरिक्त क्या है ?

वाल्टर सैवेज लैंडर
  • संबंधित विषय : मौन
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कम बातें कीजिए, कम में बातें कीजिए और काम की ही बातें कीजिए।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर
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लोक एषणा या लोक रंजन ऐसी बला है कि कैसे ही आप चोखे-से-चोखे सच कहने वाले या सच्चा बर्ताव रखने वाले हो, कुछ-न-कुछ बनावट किए बिना चल ही नहीं सकता।

बालकृष्ण भट्ट
  • संबंधित विषय : लोक
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वार्तालाप में अच्छा स्वभाव वाग्विदग्धता की अपेक्षा अधिक सुखकर होता है और वह व्यक्तित्व को एक ऐसी आत्मा प्रदान करता है जो सौंदर्य की अपेक्षा अधिक प्यारी होती है।

थॉमस एडिसन
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यदि मैं दूसरों को हमेशा अज्ञानी बताऊँ और अपने अज्ञान को देखूँ, तो मैं संवाद कैसे कर सकता हूँ?

पॉलो फ़्रेरा
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जो बात कही जा सकती है वह स्पष्ट रूप से भी कही जा सकती है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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जो विश्व को नाम देना चाहते हों और जो उसे नाम देना चाहते हों, ऐसे लोगों के बीच संवाद नहीं हो सकता।

पॉलो फ़्रेरा
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वार्तालाप के प्रवाह के मध्य किसी को हस्तक्षेप करने से बड़ी अशिष्टता नहीं हो सकती।

जॉन लॉक
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प्रति-वृत्त का अर्थ है टकराहट।

श्रीनरेश मेहता
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भाषाओं की जानकारी के बिना पढ़ने और लोगों से बातचीत करने की योग्यता का विकास नहीं हो सकता।

एरिक हॉब्सबॉम

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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