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संस्कृति पर उद्धरण

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महाकवि विद्यापति मध्यकाल के पहले ऐसे कवि हैं, जिनकी पदावली में जन-भाषा में जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है।

मैनेजर पांडेय
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वेद और लोक, इन दोनों के बीच संवाद के द्वारा भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है। कभी तनाव भी रहा है, द्वन्द भी रहा है लेकिन चाहे वह द्वन्द हो, चाहे वह तनाव हो—इन सबके साथ बराबर एक संवाद बना रहा हैं।

नामवर सिंह
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आर्य संस्कृति और आर्यों में ‘ऋग्वेद’ का प्रमुख देवता इन्द्र था। यद्यपि ब्रह्मा, विष्णु, महेश—तीनों का नाम लिया जाता है। ब्रह्मा की महिमा धीरे-धीरे घटती गई। इन्द्र की महिमा घटती गई और कृष्ण आते गए। इसका मूल स्रोत कहीं लोकजीवन से जोड़कर देखना चाहिए।

नामवर सिंह
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लेखक का कर्तव्य है पाठक को अपनी भाषिक संस्कृति से जोड़ना।

कुबेरनाथ राय
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आज भारत की सारी व्यवस्था, अर्थ, राजनीति, शिक्षा, संस्कृति और साहित्य, प्रत्येक क्षेत्र में ‘छिन्नमूल’ नवशिक्षित बुद्धजीवियों के हाथ में गई है और वे जन्मतः भारतीय होते हुए भी मानसिक बौद्धिक रूप से ‘आउट साइडर’ हैं।

कुबेरनाथ राय
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जनसंघ के अंधविश्वासी लोग कहते हैं कि गाय भारतीय संस्कृति की अंग है, तो वह जानते नहीं कि अनजाने में कितनी बड़ी सच्चाई कह गए हैं।

राजेंद्र माथुर
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जिस गृहस्थ का अतिथि पूजित होकर जाता है, उसके लिए उससे बड़ा अन्य धर्म नहीं है-मनीषी पुरुष ऐसा कहते हैं।

वेदव्यास
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अतिथि कैसा भी हो, उसका आतिथ्य करना श्रेष्ठ धर्म है।

अश्वघोष
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घर आए व्यक्तियों को प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखे, मन से उनके प्रति उत्तम भाव रखे, मीठे वचन बोले तथा उठकर आसन दे। गृहस्थ का सही सनातन धर्म है। अतिथि की अगवानी और यथोचित रीति से आदर सत्कार करे।

वेदव्यास
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ईश्वर के रूप में राम का परित्याग करके भारत का काम चल सकता है, लेकिन एक संस्कृति-पुरुष के नाते, एक काव्य-प्रतीक के नाते, राम का परित्याग करके कैसे काम चल सकता है? एक नास्तिक, विदेशी समाजशास्त्री जितनी संवेदना राम के चरित्र को दे सकता है; यदि उतनी भी हम देंगे, तो क्या राष्ट्र को तोड़ने के पाप के भागी बनेंगे?

राजेंद्र माथुर
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समग्रता में भाषा, रूपक की सतत प्रक्रिया है। अर्थ-मीमांसा का इतिहास, संस्कृति के इतिहास का एक पहलू है। भाषा एक ही समय में एक जीवित वस्तु, जीवन और सभ्यताओं के जीवाश्मों का संग्रहालय है।

अंतोनियो ग्राम्शी
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आज हम जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं, उसके निर्माण में भक्ति आंदोलन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

मैनेजर पांडेय
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पुरुष-संस्कृति पारस्परिकता के बिना स्त्रियों की भावनात्मक ताक़त पर पोषित होने वाली परजीवी संस्कृति थी और है।

शुलामिथ फ़ायरस्टोन
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संस्कृति के मूल बीज कभी मरते नहीं हैं।

कुबेरनाथ राय
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मूलतत्त्व की बहुविध कल्पना, मीमांसा और दर्शन—भारतीय संस्कृति और साहित्य का व्यापक सत्य है।

वासुदेवशरण अग्रवाल
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संस्कार की धरती के बिना मनुष्य; मनुष्य ही नहीं हो सकता—प्राणी भर रह जाता है।

मुकुंद लाठ
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जिस प्रकार गंगा की धारा को पर्वत-प्रदेशीय, या उत्तरप्रदेशीय या बिहारी, या बंगाली कहना निरर्थक है, उसी प्रकार सत्य, धर्म और संस्कृति प्रभृति महासंपद् भी अविच्छेद्य और सीमातीत है।

आचार्य क्षितिमोहन सेन
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अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने साहित्य से प्रेम होना बुरी बात नहीं है, पर जो प्रेम ज्ञान द्वारा चालित और श्रद्धा द्वारा अनुगमित होता है, वही प्रेम अच्छा है। केवल ज्ञान बोझ है, केवल श्रद्धा अंधा बना देती है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी
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समीक्षा की संस्कृति मनुष्य के सांस्कृति विकास, बल्कि उसकी संस्कृति और विकास के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई चेष्टा है।

कुँवर नारायण
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कविता की अनैतिकता को लेकर किए गए सारे सवाल, दरअस्ल इस भ्रम पर आधारित हैं कि कविता इंसान के नैतिक विकास को किस तरह सहायता प्रदान करती है। नैतिक शास्त्र उन तत्त्वों को क्रमबद्ध करता है; जिसे कविता तैयार करती है, वह सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों की रूपरेखा तैयार करता है तथा आदर्श प्रस्तुत करता है। परंतु केवल श्रेष्ठ सिद्धांतों के अभाव के कारण ही लोग एक-दूसरे से नफ़रत नहीं करते, एक-दूसरे को हीन नहीं मानते, बुराई नहीं करते, छल नहीं करते और एक-दूसरे को ग़ुलाम नहीं बनाते। कविता का प्रभाव एक भिन्न और लगभग ईश्वरीय रीति से कार्य करता है। वह हमारे दिमाग़ को उन अनगिनत विचारों और संभावनाओं का केंद्र बना देती है, जिन्हें अन्यथा हम समझ नहीं पाते।

पी. बी. शेली
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राजनीति वाले संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकते। शोधक और अन्वेषक संस्कृति निर्माण करते हैं।

श्याम मनोहर
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भाषा बोलना एक दुनिया और एक संस्कृति को अपनाना है।

फ्रांत्ज़ फ़ैनन
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मानवीय शरीर की भाँति संस्कृति का शरीर भी जड़ और चेतन के संयोग से निर्मित होता है।

वासुदेवशरण अग्रवाल
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जब हम अपने वैश्विक दृष्टिकोण में चंद्रमा के अँधेरे पक्ष को शामिल कर लेंगे, केवल तभी हम सर्वव्यापी संस्कृति पर गंभीरता से बात कर सकते हैं।

शुलामिथ फ़ायरस्टोन
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संस्कृति एक विशेषाधिकार है। शिक्षा एक विशेषाधिकार है। पर हम नहीं चाहते कि ऐसा हो। संस्कृति के सामने सभी युवा एक समान होने चाहिए।

अंतोनियो ग्राम्शी
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ग़लत नज़रिया होने पर शुरुआत में जो संस्कृति अच्छी चीज़ होती है; वो केवल गतिहीन हो जाती है, बल्कि आक्रामक कभी-कभी संघर्ष और घृणा का बीज बो देती है।

जवाहरलाल नेहरू
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हमारी संस्कृति ने सिर्फ़ मिलनसार होने को गुण बना दिया। हमने आंतरिक यात्रा, केंद्र के लिए खोज को हतोत्साहित कर दिया है। हमने अपनी जड़ को खो दिया है। उसे फिर से तलाश करना है।

अनाइस नीन
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भारत का सत्य परिचय उसी मनुष्य में मिलता है, जिसके हृदय में मनुष्य-मात्र के लिए सम्मान है, स्वीकृति है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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हमारी संस्कृति की यह तत्काल ज़रूरत है कि हम अपने आम पाठक की बौद्धिक-मानसिक दशा, अपने अँग्रेज़ी पाठक के व्यक्तित्व की बुनावट और पाठ-प्रक्रिया का अनुसंधान करें और उपायों की खोज करें।

श्याम मनोहर
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जानना ही संस्कृति है। जानने की उत्सुकता में ही प्राकृतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला शाखाएँ जैसी ज्ञानशाखाएँ बनी हुई हैं।

श्याम मनोहर
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जब धर्म, दर्शन, विविध शास्त्र ललित साहित्य के पुस्तकों को पढ़ने की प्रक्रिया पारिवारिक परिक्षेत्र में आरंभ होगी, तब परिवार में ज्ञान-प्रक्रिया का भी आरंभ होगा। परिवार से ही कवि, लेखक, वैज्ञानिक, कलाकार निर्माण होते हैं।

श्याम मनोहर
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समकालीन भारतीय यथार्थ, जिसे मैं सभ्यता (सिविलिजेशन) कहता हूँ—से शुरू होकर साहित्य का संस्कृति तक पहुँचना—कथा-साहित्य को पर्याप्तता प्रदान करता है।

श्याम मनोहर
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विज्ञापन क्रांति तक का अनुवाद अपनी भाषा में कर देता है।

जॉन बर्जर
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लोकजीवन की धारा जब एक बँधे मार्ग पर कुछ काल तक अबाध गति से चलने पाती है, तभी सभ्यता के किसी रूप का पूर्ण विकास और उसके भीतर सुख-शांति की प्रतिष्ठा होती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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लगभग सभी संस्कृतियों में उपवास और सामान्य रूप से कहें, तो संयम को लंबे और स्वस्थ जीवन का आधार माना गया है और लालच को बुराई।

वेंकी रामकृष्णन
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इस देश में फ़िल्म सस्ते मनोरंजन का सबसे घटिया साधन बन गई है। इसलिए मैं इस देश में फ़िल्मों के भविष्य को लेकर काफ़ी चिंतित हूँ।

ऋत्विक घटक
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कविता वैसे भी अन्य शाब्दिक कलाओं की अपेक्षा, सबसे ज़्यादा अपनी भाषाई संस्कृति से घनिष्ठ होती है।

कुँवर नारायण
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एक महान आलोचक अपनी संस्कृति का भी आलोचक होता है। वह कलाकृति के स्वायत्त अनुभव को मानवीय संस्कृति की निरंतरता में—जिसे हम परंपरा कहते हैं—उसके भीतर परिभाषित करता है।

निर्मल वर्मा
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जिसके संस्कार एक परंपरा में दीक्षित हों; उसके लिए दूसरी परंपरा में रसबोध के सामान्य तक पहुँचना—सहृदय-भाव की एक साधना बन जा सकती है।

मुकुंद लाठ
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सूर का काव्य, हिंदी जाति के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास से दिलचस्पी रखने वालों के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण है।

मैनेजर पांडेय
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लोकतंत्र का सवाल आर्थिक, राजनीतिक सवाल भी है, पर अब वह एक बुनियादी नैतिक और सांस्कृतिक सवाल भी है।

ललित कार्तिकेय
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बोलने का मतलब है… सबसे बढ़कर किसी संस्कृति को ग्रहण करना, सभ्यता के भार को सहारा देना।

फ्रांत्ज़ फ़ैनन
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बहुसांस्कृतिकता हमारी संस्कृति का अनिवार्य पक्ष है। यह हमारी भाषा, हमारे रहन-सहन, हमारे विश्वास का एक ज़रूरी हिस्सा है, इसलिए मेरा काम भविष्य को खुला रखने के लिए संघर्ष करने का है।

आशीष नंदी
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भारत की भूमि आध्यात्मिक है। हर एक व्यक्ति आध्यात्मिक है और हवा ऐसी है कि हर एक को कभी कभी अध्यात्म करना है। इतना कि कोई भी व्यक्ति स्वीकार करता है कि जीवन में अध्यात्म ही अहम है, और बाक़ी सबकुछ बाद में है।

श्याम मनोहर
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भारतीय परंपरा का सार और नमनशीलता उसकी निरंतरता में उतनी नहीं, जितनी कि उसकी स्वाभाविकता शांतिप्रियता और विचार मिश्रण की प्रवृत्तियों में निहित है, जो आधुनिकता के चमचमाते पक्षों की अपेक्षा, उसके सर्वाधिक सजीव पक्षों को आत्मसात् करने की ओर अग्रसर रही हैं।

कुँवर नारायण
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व्यावहारिक आलोचना की मर्यादा यह है कि वह उस 'भाषा' का मूल्य पहचान सके, जिसमें एक कलाकृति हमारे युग की संस्कृति पर आलोचना करती है।

निर्मल वर्मा
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सांस्कृतिक दृष्टि से कहें तो भारत अनेक भाषाओं, अनेक विश्वासों और फलतः अनेक परंपराओं का योग है।

कुँवर नारायण
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हमारे संस्कारों में जीवन के लिए आवश्यक सिद्धांत ऐसे सूत्र रूप में समा जाते हैं, जो प्रयोग रूपी टीका के बिना स्पष्ट हो पाते हैं और उपयोगी।

महादेवी वर्मा
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जीवन से रागमय, संघर्षमय संबंध के अभाव में अनुभवों का अभाव भी होता है। असल संस्कृति और स्मृति उसी से बनती है।

ललित कार्तिकेय
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संस्कृति विशेष में नए विचार किस प्रकार ग्रहण होते हैं, या ग्रहण नहीं हो पाते हैं—यह बहुत कुछ उन आचार-विचार आदि पर भी निर्भर है; जो उस संस्कृति में परंपरा के रूप में, जातीय स्मृति के रूप में और भाषा में जीवित रहते हैं।

कुँवर नारायण

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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