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दुख पर उद्धरण

दुख की गिनती मूल मनोभावों

में होती है और जरा-मरण को प्रधान दुख कहा गया है। प्राचीन काल से ही धर्म और दर्शन ने दुख की प्रकृति पर विचार किया है और समाधान दिए हैं। बुद्ध के ‘चत्वारि आर्यसत्यानि’ का बल दुख और उसके निवारण पर ही है। सांख्य दुख को रजोगुण का कार्य और चित्त का एक धर्म मानता है जबकि न्याय और वैशेषिक उसे आत्मा के धर्म के रूप में देखते हैं। योग में दुख को चित्तविक्षेप या अंतराय कहा गया है। प्रस्तुत संकलन में कविताओं में व्यक्त दुख और दुख विषयक कविताओं का चयन किया गया है।

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अपने जीवन से मनुष्य को सबसे बड़ी शिक्षा यह लेनी चाहिए कि संसार में दुःख है, किंतु उसे सुख में बदलना उसके हाथ में है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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दुःख सबको माँजता है

और—

चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने, किंतु जिनको माँजता है उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रखें।

अज्ञेय
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पीड़ा जिस वजह से होती है वह एक दिन या एक वर्ष में नहीं बनती। देह हो या देश, उसकी पीड़ा पैदा होने और पकने में लंबा समय लेती है। पीड़ा एक सिलसिले का नाम है।

कृष्ण कुमार
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अपने सुख में सुखी होने की और अपने दु:ख में दु:खी होने की तन्मयता कवि को हो, तो वह कवि नहीं बन सकता।

विनोबा भावे
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सच पूछिए तो करुण को एक-रस कहने के पीछे एक जगत्-दृष्टि या संवेदना है—जिसे ट्रैजिक या दुःखमयी संवेदना कह सकते हैं।

मुकुंद लाठ
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असंगति जब हमारे मन के ऊपरी स्वर पर आघात करती है; तब हमको कौतुक जान पड़ता है, गहरे स्तर पर आघात करती है तो हमको दुःख होता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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दुखों में अज्ञान-दुःख सबसे बड़ा दुःख है।

अश्वघोष
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काम ऊर्ध्वतर होता हुआ निर्मल ज्योतिष्मान् होता जाता है। वैसे ही दु:ख उलटी दिशा में गंभीर से गंभीरतर होता हुआ, प्रगाढ़ और पारदर्शक होता जाता है। ऐसा पारर्दशक कि वह सार्वभौमता का दर्पण बन जाए—निर्मल, प्रसन्न और गंभीर दु:ख।

कुबेरनाथ राय
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सुख देखते ही तीनों लोकों में दुःख के चिन्ह लुप्त हो जाते हैं, एवं दुःख उपस्थित होते ही कहीं भी लेशमात्र भी सुख दिखाई नहीं देता।

रवींद्रनाथ टैगोर
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मैंने दुखों, जीवन के ख़तरों और मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में, सज़ा के बारे में… कम उम्र में ही जान लिया। इस सबकी उम्मीद गुनाहगार नर्क में करते हैं।

एडवर्ड मुंक
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ख़ुशी के साथ प्रायः दुःख का पुछल्ला लगा रहता है।

अमृतलाल वेगड़
  • संबंधित विषय : सुख
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जीवन के बारे में सभी विचार कठोर हैं, क्योंकि जीवन कठोर है। मैं इस बात से दुखी हूँ, लेकिन इसे बदल नहीं सकती।

मार्गरेट एटवुड
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नारी पुरुष से पूजा नहीं चाहती। वह जीवन में सहयोग चाहती है दुःख और सुख के साथ। तन और मन का विलीनीकरण। दो जीवनों का एक होना।

हरिकृष्ण प्रेमी
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जो लोग पूरी तरह से समझदार और ख़ुश हैं, दुःख की बात है वे अच्छा साहित्य नहीं लिखते हैं।

कोलेट
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घोर अंधकार में जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सुशोभित होता है उसी प्रकार दुःख का अनुभव कर लेने पर सुख का आगमन आनंदप्रद होता है किंतु जो मनुष्य सुख भोग लेने के पश्चात् निर्धन होता है वह शरीर धारण करते हुए भी मृतक के समान जीवित रहता है।

शूद्रक
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मैं, मृत्यु को ज़िंदा रहकर, दुःख सहकर, ग़लतियाँ करके, ज़ोखिम उठाकर, देकर, गँवाकर स्थगित करती हूँ।

अनाइस नीन
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कामना, भय, लोभ अथवा जीवन-रक्षा के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। धर्म नित्य है जबकि सुख-दुःख अनित्य हैं, जीव नित्य है तथा बंधन का हेतु अनित्य है।

वेदव्यास
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मेरे लिए सिनेमा और कुछ नहीं, सिर्फ़ एक अभिव्यक्ति है। ये मेरे लिए अपने लोगों के कष्टों और दु:खों को लेकर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करने का माध्यम है। कल को सिनेमा के अलावा भी इंसान की बुद्धि शायद कुछ ऐसा बना ले; जो सिनेमा से भी ज़्यादा मज़बूती, बल और तात्कालिकता से लोगों की ख़ुशियों, दु:खों, आकाँक्षाओं, सपनों, आदर्शों को अभिव्यक्त कर सके—तब वो ही आदर्श माध्यम बन जाएगा।

ऋत्विक घटक
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अगर किसी महिला को दु:ख में सहारा न मिले, तो वह सचमुच सुखी नहीं रह सकती।

जॉन ग्रे
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रागलोक का दु:ख रस की साध्वावस्था है, परंतु रागोत्तर सार्वभौम वेदना का दु:ख, रस की सिद्धावस्था है।

कुबेरनाथ राय
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कविता प्रत्येक वस्तु को मनोहरता में रूपांतरित कर देती है। वह सुंदरतम वस्तु की आभा को और अधिक दीप्त कर देती है तथा जो सबसे विकृत है, उसमें भी सौंदर्य का संचार कर देती है। वह उल्लास और भय, विषाद और आनंद, शाश्वतता और परिवर्तन—इन सभी विरोधी तत्त्वों को एक सूत्र में बाँध देती है। अपने कोमल अनुशासन के अंतर्गत वह समस्त विसंगतियों को सामंजस्य में परिवर्तित कर लेती है। जिस किसी वस्तु को कविता स्पर्श करती है, उसका रूपांतरण हो जाता है। उसकी ज्योति में आने वाली हर चीज़ उसकी संवेदना से अनुप्राणित होकर नया स्वरूप ग्रहण कर लेती है। उसकी अद्भुत शक्ति जीवन की ओर अग्रसर विष को भी अमृत में परिणत कर देती है। वह संसार पर पड़ी जड़ अभ्यस्तता की परत को भेदकर वस्तुओं के आत्मस्वरूप में निहित उस एकाकी और सुप्त सौंदर्य को दृश्य कर देती है।

पी. बी. शेली
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प्रकृति मानव के समस्त सुख-दुःख में 'अनंत' का स्वर मिलाए रखती है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जो लोग सौंदर्य के उपभोग में उन्मत्त हैं, उनकी यंत्रणा कैसी है, इसका अनुभव मैं भोजन करने के लिए बैठने पर ही करता हूँ। मेरे जीवन में घोर दुःख यह है कि अन्न-व्यंजन थाली में रखते-रखते ही ठंडे हो जाते हैं। उसी प्रकार सौंदर्य-रूपी मोटे चावल का भात है, प्रेम-रूपी केला के पत्तल पर डालते ही ठंडा हो जाता है—फिर कौन रुचि से उसे खाए? अंत में वेश-भूषा-रूपी इमली की चटनी मिलाकर, ज़रा अदरक-नमक के क़तरे डालकर किसी तरह निगल जाना पड़ता है।

बंकिम चंद्र चटर्जी
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हम प्रायः अपनी सनातन धारणा का जितना अधिक मूल्य समझते हैं, उतना दूसरे व्यक्ति के अभाव और दुःख का नहीं। यही कारण है कि जब तक व्यक्तिगत असंतोष सीमातीत होकर हमारे संस्कार-जनित विश्वासों को आमूल नष्ट नहीं कर देता, तब तक हम उसके अस्तित्व की उपेक्षा ही करते रहते हैं।

महादेवी वर्मा
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यदि समग्र भाव से समस्त नारी जाति के दुःख-सुख और मंगल-अमंगल की तह में देखा जाए, तो पिता, भाई और पति की सारी हीनताएँ और सारी धोखेबाज़ियाँ क्षण भर में ही सूर्य के प्रकाश के समान आप से आप सामने आ जाती हैं।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय
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मानसिक सुख के साथ शारीरिक दुःख उपेक्षणीय हो सकता है और शारीरिक सुख के साथ मानसिक पीड़ा सहनीय, परंतु दोनों सुख या दोनों दुःख—मनुष्यों को जड़ बनाए बिना नहीं रहते।

महादेवी वर्मा
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संसार से तटस्थ रहकर; शांति-सुखपूर्वक लोक-व्यवहार-संबंधी उपदेश देनेवालों का उतना अधिक महत्त्व हमारे हिंदू-धर्म में नहीं है, जितना संसार के भीतर घुसकर उसके व्यवहारों के बीच सात्विक सौंदर्य की ज्योति जगानेवालों का है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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लोक में फैली दुःख की छाया को हटाने में; ब्रह्म की आनंदकला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचंडता में भी गहरी आर्द्रता साथ लगी रहती है। विरुद्धों का यही सामंजस् कर्मक्षेत्र का सौंदर्य है, जिसकी ओर आकर्षित हुए बिना मनुष्य का हृदय नहीं रह सकता।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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संसार-बंधन के दुःखों की रचना को विध्वंस करने हेतु; प्रलयाग्नि के सदृश ब्रह्मानंद पद में प्रवेश के उद्योग के बिना ,और बाक़ी सब वणिग्व्यापार है। प्रयोजनवाली बात केवल ब्रह्म का चिंतन है।

भर्तृहरि
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आपको केवल उन्हीं पुस्तकों को लिखना चाहिए जिनके न होने से आप दुखी हैं।

मारीना त्स्वेतायेवा
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अगर मैं ख़ुश हो सकता हूँ, तब मैं खुश हो जाऊँगा; अगर मुझे मुझे दुखी होना है, तब मुझे दुख उठाना ही पड़ेगा।

विलियम फॉकनर
  • संबंधित विषय : सुख
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और एक दिन ऐसा आएगा जब उन सभी चीज़ों का कोई निशान नहीं रहेगा जिसने मेरे जीवन को उलझाया और मुझे दुखी किया।

हरमन हेस
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जीवन को केवल वे लोग वास्तव में जानते हैं जो दुःख उठाते हैं, हार जाते हैं, विपत्ति सहन करते हैं और एक के बाद एक हार का सामना करते हैं।

अनाइस नीन
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वस्तुतः स्त्रियों को अपने इष्ट व्यक्ति (प्रियतम) के प्रवास से उत्पन्न दुःख अत्यंत असह्य होते हैं।

कालिदास
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मानव-चरित्र रचने के लिए मानव को देखना पड़ता है, मानव को समझना पड़ता है, उसके सुख-दु:ख, आशा, आकांक्षा, द्वंद्व, कुँठा सबको देखना होता है। जन-जीवन का बारीक अवलोकन करना होता है और साथ ही संवेदनात्मक दृष्टि रखनी पड़ती है।

हरिशंकर परसाई
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एक छोटे कलाकार के पास एक महान कलाकार के सभी त्रासिक दुःख और संताप होते हैं और वह महान कलाकार नहीं होता।

गर्ट्रूड स्टाइन
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जब मनुष्य संसार की समस्त वासनाओं में; यहाँ तक कि प्यार में भी निराश हो जाता है, तभी क्षण भर के लिए यह भाव स्फुरित होता है कि यह संसार भी कैसा भ्रम है, कैसा स्वप्न के समान है।

स्वामी विवेकानन्द
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प्रेम का एक प्रधान लक्षण यह होता है कि प्रेम आनंदपूर्वक दुःख को स्वीकार कर लेता है, क्योंकि दुःख के द्वारा, त्याग के द्वारा उसे पूर्ण सार्थकता मिलती है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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सती स्त्रियों, अपने दुःख को तुम संभाल कर रखना। वह दुःख नहीं, सुख है। तुम्हारा नाम लेकर बहुतेरे पार उतर गए हैं और उतरेंगे।

महात्मा गांधी
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हर आर्टिस्ट को एक दर्दभरी निजी प्रक्रिया से गुज़रने के बाद, अपना ख़ुद का सच समझना होता है। और यही है, जो उसे अभिव्यक्त करना है।

ऋत्विक घटक
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दूसरे मौक़े के लिए गिड़गिड़ाने से ज़्यादा मार्मिक और दयनीय इच्छा दूसरी नहीं होती।

जो हिल
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इस संसार की छोटी-सी कीचड़ भरी तलैया में; जहाँ दुःख, रोग तथा मृत्यु का चक्र निरंतर चलता रहता है, क्या है जिसकी इच्छा की जा सके?

स्वामी विवेकानन्द
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इस दुनिया में दुख का बड़ा कारण मूल पाप नहीं; बल्कि एक तरह की मूल, अकल्पनीय और ज़िद्दी मूर्खता है।

जॉर्ज सैंड
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जगत् के सृष्टि-कार्यों में जैसे उत्ताप महत्त्वपूर्ण है, वैसे ही मानव जीवन के गठन में दुःख भी एक बहुत बड़ी रासायनिक शक्ति है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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दुखी व्यक्ति कट्टरपंथी और उदास नास्तिक होता है।

जूलिया क्रिस्तेवा
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समाज यदि मनुष्यों का समूह मात्र नहीं है, तो मनुष्य भी केवल क्रियाओं का समूह नहीं। दोनों के पीछे सामूहिक और व्यक्तिगत इच्छा, हर्ष और दुःखों की प्रेरणा है।

महादेवी वर्मा
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इस जगत् में न तो सदा और सर्वत्र लहलहाता वसंतविकास रहता है, न सुखसमृद्धिपूर्ण हासविलास।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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नारीत्व की कोमलता नाम से पुकारी जाने वाली दुर्बलता के साथ सदा से बँधी हुई वेदना और तज्जनित आपत्ति, प्रत्येक युग तथा प्रत्येक परिस्थिति में नवीन रूप में आती रही है, परंतु उसकी वर्तमान दशा करुणतम है।

महादेवी वर्मा
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पुरुषों का क्षणिक दुःख तो क्षण भर में ही जाता है, लेकिन जिसे सदा दुःख सहना पड़ता है वह है नारी।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय
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जिसने भी प्रेम किया है, वह जीवन में आने वाले संपूर्ण दुख और आनंद के बारे में जानता है।

जॉर्ज सैंड

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere