अपने में विश्वास और जिसको दुश्मन मानें उसका उद्धार करने में हमारी रक्षा होती है।
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‘स्व’ से ऊपर उठना, ख़ुद की घेरेबंदी तोड़कर कल्पना-सज्जित सहानुभूति के द्वारा अन्य के मर्म में प्रवेश करना—मनुष्यता का सबसे बड़ा लक्षण है।
तुम मँझौली हैसियत के मनुष्य हो और मनुष्यता के कीचड़ में फँस गये हो। तुम्हारे चारो ओर कीचड़-ही-कीचड़ है।
यदि मनुष्य का जन्म लेकर मैं मानवीय अस्तित्व के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकूँ, यदि मैं उसकी नियति को चरितार्थ नहीं कर सकूँ, तो उसकी सार्थकता ही क्या है?
जो अल्पमत में हैं उनकी हमें ज़्यादा दरकार होनी चाहिए, यही तालीम मैं अबतक देता आया हूँ।
हममें से हर एक को भंगी बनकर सेवा करनी चाहिए। जो मनुष्य पहले भंगी नहीं बनता, वह ज़िंदा रह नहीं सकता है और न रहने का उसे हक़ है।
मैं उनमें से नहीं हूँ जो नाम को केवल नाम समझते हैं।
मानवीय संवेदना के मूल स्वभाव को ठीक से समझे बिना सब कुछ को ख़ारिज कर देने का औद्धत्य कभी फलप्रसू नहीं होता।
कला की कोई भी क्रिया, मनुष्य और जीवन-धारण के लिए अनिवार्य नहीं है। इसलिए कला ही मनुष्य को वह क्षेत्र प्रदान करती है, जिसमें वह अपने व्यक्तित्व का सच्चा विकास कर सकता है।
एक सुसंस्कृत दिमाग़ को अपने दरवाज़े और खिड़कियाँ खुली रखनी चाहिए।
जब इंसान भूखा रहता है, जब मरता रहता है, तब संस्कृति और यहाँ तक कि ईश्वर के बारे में बात करना मूर्खता है।
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सत्पुरुषों की महानता उनके अंतःकरण में होती है, न कि लोगों की प्रशंसा में।
हम पैदा हुए हैं सेवा करने के लिए। हम तय करें कि हम अपने मुल्क को ऊँचा ले जाएँगे, गिराएँगे नहीं।
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धन उधार देकर समाज का शोषण करने वाले धनपति को जिस दिन 'महाजन' कहा गया होगा, उस दिन ही मनुष्यता की हार हो गयी। 'महाजन' कहना मनुष्यत्व की हीनता स्वीकार करके ही तो संभव हुआ।
अपनी वाणी, व्यवहार और विचारों पर ध्यान दो और यह सदा स्मरण रखो कि ईश्वर सभी जगह मौजूद है।
पवित्रता ही आध्यात्मिक सत्य है। “पवित्र हृदयवाले धन्य हैं, क्योंकि वे ईश्वर का दर्शन करेंगे।” इस एक वाक्य में सब धर्मों का निचोड़ है। यदि तुम इतना ही सीख लो, तो भूतकाल में जो कुछ इस विषय में कहा गया है और भविष्यकाल में जो कुछ कहा जा सकता है, उस सबका ज्ञान तुम प्राप्त कर लोगे। तुम्हें और किसी ओर दृष्टिपात करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि तुम्हें उस एक वाक्य से ही सभी आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति हो चुकी। यदि संसार के सभी धर्म-शास्त्र नष्ट हो जाएँ, तो अकेले इस वाक्य से ही संसार का उद्धार हो सकता है।
मानव को अपने राष्ट्र की सेवा के ऊपर किसी विश्व-भावना व आदर्श को पहला स्थान नहीं देना चाहिए।... देशभक्ति तो मानवता के लक्ष्य विश्वबंधुत्व का ही एक पक्ष है।
हर एक मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे मनुष्य को इसी तरह, अर्थात् ईश्वर समझकर सोचे और उससे उसी तरह अर्थात् ईश्वर-दृष्टि से बर्ताव करे; उसे घृणा न करे, उसे कलंकित न करे और न उसकी निंदा ही करे। किसी भी तरह से उसे हानि पहुँचाने की चेष्टा भी न करे। यह केवल संन्यासी का ही नहीं, वरन् सभी नर-नारियों का कर्त्तव्य है।
योगी को चाहिए कि वे तन-मन-वचन से किसी के विरुद्ध हिंसाचरण न करें। दया मनुष्य-जाति में ही आबद्ध न रहे, वरन् उसके परे भी वह जाए और सारे संसार का आलिंगन कर ले।
मनुष्य का लक्षण ही अगर धर्मशील होना है—जैसा कि हमारे यहाँ चिंतन में गहराई से उभर कर आता है—तो मनुष्य धर्म-निरपेक्ष हो ही नहीं सकता, हाँ, वह धर्म के अनैक्य की; भिन्न क्षेत्रों की बात कर सकता है, जैसी कि की गई है। ‘सेक्यूलर’ शब्द कर्म के किसी ऐसे क्षेत्र की ओर संकेत नहीं करता, जो उस कोटि से बाहर हो, जिसे मनुष्य के लक्षण के रूप में ‘धर्म’ कहा गया है।
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सज्जनता तथा करूणा-संपन्न होने का अर्थ है—दूसरों के प्रति सहानूभूति रखना, मनुष्य मात्र के प्रति प्रेम रखना, और अपने स्वार्थ का त्याग करना।
हम सहज ही भूल जाते हैं कि जाति-निर्णय विज्ञान में होता है, जाति का विवरण इतिहास में होता है। साहित्य में जाति-विचार नहीं होता, वहाँ पर और सब-कुछ भूलकर व्यक्ति की प्रधानता स्वीकार कर लेनी होगी।
कबीर के लोकधर्म में, व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्कर्ष से अधिक महत्त्वपूर्ण है—समाज में मनुष्यत्व का जागरण।
मानव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, वह किसी देश के संकीर्ण दायरे में आबद्ध नहीं।
मानव-समाज का सर्व प्रधान तत्त्व है, मनुष्य-मात्र का ऐक्य। सभ्यता का अर्थ है, एकत्र होने का अनुशीलन।
जहाँ कहीं महानता, हृदय की विशालता, मन की पवित्रता एवं शांति पाता हूँ, वहाँ मेरा मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता है।
मनुष्यत्व के पराभव को अंतहीन, प्रतिकारहीन और चरम समझना मेरी दृष्टि में अपराध है।
मनुष्य जब मनुष्यता और उसके ऐतिहासिक रूपों की अंतर्वस्तु को अलग करने की ग़लती नहीं करता, तो चिंतन और कर्म उसके लिए अवश्य करणीय हो जाते हैं।
घुमक्कड़ प्रकृति या मानवता को तटस्थ दृष्टि से नहीं देखता, उनके प्रति उसकी अपार सहानुभूति होती है और यदि वह वहाँ पहुँचता है; तो केवल अपनी घुमक्कड़ी प्यास ही पूरा नहीं करता, बल्कि दुनिया का ध्यान उन पिछड़ी जातियों की ओर आकृष्ट करता है।
एक व्यक्ति के महान होने के लिए उसमें तीव्र और व्यापक कल्पनाशक्ति का होना आवश्यक है, जिससे वह स्वयं को दूसरों की स्थिति में रख सके। उसे अपने समाज के सुख-दुःख को अपना ही समझने की संवेदना विकसित करनी चाहिए।
यह जीवन आता और जाता है—नाम, यश, भोग, यह सब थोड़े दिन के हैं। संसारी कीड़े की तरह मरने से अच्छा है, कहीं अधिक अच्छा है—कर्तव्य क्षेत्र में सत्य का उपदेश देते हुए मरना। आगे बढ़ो।
मनुष्य का सर्वोपरि उद्देश्य, सर्वश्रेष्ठ पराक्रम धर्म ही है और यह सब से आसान है।
संकीर्णता के निकट जाने से मन संकीर्ण हो जाता है, एवं विस्तृति के निकट जाने से मन विस्तृति लाभ करता है। उसी प्रकार भक्त के निकट जाने से मन उदार होता है, और जितनी उदारता है उतनी ही शांति।
मानव में रूप, गुण और यौवन के होते हुए भी यदि उदारता नहीं है, तो सभी विशेषताएँ निरर्थक हो जाती हैं।
हमारे समाज में अपने स्वार्थ के कारण, पुरुष मनुष्यता का कलंक हैं और स्त्री अपनी अज्ञानमय निस्पंद सहिष्णुता के कारण पाषाण-सी उपेक्षणीय। दोनों के मनुष्यत्व-युक्त मनुष्य हो जाने से ही जीवन की कला विकास पा सकेगी, जिसका ध्येय मनुष्य की सहानुभूति, सक्रियता, स्नेह आदि गुणों को अधिक-से-अधिक व्यापक बना देना है।
हिंदू-मुस्लिम विद्वेष या राजनीतिक विडंबना को दूर करने का प्रयत्न तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक कि प्रत्येक देशवासी, भारतवर्ष के वातावरण को सौहार्द और पारस्परिक औदार्य से परिप्लावित न कर देगा।
भक्ति ला देती है ज्ञान; ज्ञान से होता है सर्वभूतों में आत्मबोध, सर्वभूतों में आत्मबोध होने से ही आती है अहिंसा और अहिंसा से ही आता है प्रेम। तुम जितना भर इनमें से जिस किसी एक का अधिकारी होगे, उतना ही भर इन सभी के अधिकारी होगे।
शिक्षा के क्षेत्र में एक पुरुष अपनी स्वभाव-सुलभ कठोरता से असफल रह सकता है, परंतु माता के सहज स्नेह से पूर्ण हृदय लेकर; जब एक स्त्री उसी उग्रता का अनुकरण करके अपने उत्तरदायित्व को भूल जाती है, तब उसकी स्थिति दयनीय के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहती।
जब संकट आता है, जब बम गिरते हैं या बाढ़ आती है—तभी हम मनुष्य अपने श्रेष्ठतम रूप में प्रकट होते हैं।
जिस क्रम से मनुष्य सभ्यता के मार्ग पर अग्रसर होता गया, उसी क्रम से समाज के नियम अधिकाधिक परिष्कृत होते गए और पूर्ण विकसित तथा व्यवस्थित समाज में वे केवल व्यावहारिक सुविधा के साधनमात्र न रह कर, सदस्यों के नैतिक तथा धार्मिक विकास के साधन भी हो गए।
स्वयं अच्छे बनो और जो कष्ट पा रहे हैं, उनके प्रति दया-संपन्न होओ। जोड़-गाँठ करने की चेष्टा मत करो, उससे भवरोग दूर नहीं होगा। वास्तव में हमें जगत् के अतीत जाना पड़ेगा।
अपने देश के प्रति मेरा जो प्रेम है, उसके कुछ अंश में मैं अपने जन्म के गाँव को प्यार करता हूँ। और मैं अपने देश को प्यार करता हूँ पृथ्वी— जो सारी की सारी मेरा देश है—के प्रति अपने प्रेम के एक अंश में। और मैं पृथ्वी को प्यार करता हूँ अपने सर्वस्व से, क्योंकि वह मानवता का, ईश्वर का, प्रत्यक्ष आत्मा का निवास-स्थान है।
यदि देश का प्रत्येक शिक्षित युवक, ऊँच-नीच के घृणित विचारों को छोड़कर; अपने आस-पास रहने वाले चार बालकों अथवा बालिकाओं को भी प्रतिवर्ष अशिक्षित से शिक्षित बना देने का संकल्प कर लेवे, तो परिणाम अत्यंत उत्साहवर्द्धक हो।
यदि तुम मनुष्यों से प्रेम करते हो और वे मैत्री का व्यवहार नहीं करते, तो अपने प्रेम की समीक्षा करो। यदि तमु शाशन करते हो और लोग नियंत्रित नहीं होते, तो अपनी बुद्धि की जाँच करो। यदि तुम दूसरों के प्रति शिष्टता का व्यवहार करते हो और वे तुम्हारे प्रति नहीं करते तो, अपने आत्म-सम्मान की समीक्षा करो। यदि तुम्हारे कार्य निरर्थक होते हैं, तो उसके कारण को अपने अंदर ढूँढ़ो।
मृत्यु वास्तव में मानवता के लिए एक महान वरदान है, इसके बिना कोई वास्तविक प्रगति नहीं हो सकती।
सौंदर्यानुभूति वास्तविक जीवन की मनुष्यता है।
सामान्य मनुष्य में जो त्याग, करुणा, सहानुभूति, परोपकार, साहस आदि होते हैं—उन्हीं पर यह दुनिया टिकी है।
मनुष्य ही लाया है ग्रंथ को ग्रंथ नहीं लाया किसी मनुष्य को!
समाजोत्सव देखने के लिए बाहर से आए हुए आगंतुकों का पूजन, सत्कार, सम्मान करना चाहिए और विपत्ति में उनकी सहायता करनी चाहिए—यही समाज का मुख्य धर्म है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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