स्त्री और पुरुष में मैं वही प्रेम चाहता हूँ, जो दो स्वाधीन व्यक्तियों में होता है। वह प्रेम नहीं, जिसका आधार पराधीनता है।
मानवीय संबंध का ज़बरदस्ती कोई नाम देना, उसके महत्व को घटा डालने वाली बात होती है।
मैं जीवन के बाद के जीवन की कल्पना नहीं कर पाता : जैसे ईसाई या अन्य धर्मों के लोग विश्वास रखते हैं और मानते हैं जैसे कि सगे-संबंधियों और दोस्तों के साथ हुई बातचीत जिसे मौत आकर बाधित कर देती है, और जो आगे भी जारी रहती है।
पुरुष और स्त्री का संबंध केवल आध्यात्मिक न होकर व्यावहारिक भी है, इस प्रत्यक्ष सत्य को समाज न जाने कैसे अनदेखा करता रहा है।
जब किसी महिला को अहसास होता है कि वह सचमुच प्रेम पाने की हक़दार है, तो वह एक दरवाज़ा खोल रही है; ताकि पुरुष उसे प्रेम दे सके, लेकिन जब विवाह में दस बरस तक महिला ही प्रेम देती रहती है और उसे बदले में कुछ नहीं मिलता, तब जाकर उसे यह अहसास होता है कि वह ज़्यादा की हक़दार है।
छाया का कार्य आधार में अपने आपको इस प्रकार मिला देना है, जिसमें वह उसी के समान जान पड़े और संगिनी का अपने सहयोगी की प्रत्येक त्रुटि को पूर्ण कर, उसके जीवन को अधिक से अधिक पूर्ण बनाना।
सभी विफल व्यक्ति—विक्षिप्त व्यक्ति, मनोरोगी, अपराधी, शराबी, समस्याग्रस्त बच्चे, आत्महत्या करने वाले, विकृत और वेश्याएँ—इसलिए विफल हैं, क्योंकि उनमें सामाजिक संबंध की कमी है।
अपने पूर्ण से पूर्ण गौरव से गौरवांवित स्त्री भी इतनी पूर्ण न होगी कि पुरुषोचित स्वभाव को भी अपनी प्रकृति में समाहित कर ले, अतएव मानव-समाज में साम्य रखने के लिए, उसके अपनी प्रकृति से भिन्न स्वभाव वाले का सहयोग श्रेय रहेगा—इस दशा में प्रतिद्वंद्विता संभव नहीं।
आजकल तलाक़ बहुत आम हैं, इसलिए यह और भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि पुरुष आश्वासन देने का ध्यान रखें। जिस तरह छोटे परिवर्तन करके; पुरुष महिलाओं का समर्थन कर सकते हैं, उसी तरह महिलाओं को भी करना चाहिए।
पुरुष समाज का न्याय है, स्त्री दया, पुरुष प्रतिशोधमय क्रोध है, स्त्री क्षमा, पुरुष शुष्क कर्तव्य है, स्त्री सरस सहानुभूति और पुरुष बल है, स्त्री हृदय की प्रेरणा।
पुरुष; सौंदर्य के अधिकतर विशुद्ध दृष्टिगत गुण के द्वारा ही यौन दृष्टि से प्रभावित होते हैं, पर स्त्रियाँ ऐसी दृष्टिगत छापों से ही अधिकतर प्रभावित होती हैं, जो मौलिक रूप से अधिकतर यौन अनुभूति यानी स्पर्शनुभूति के गुणों को अभिव्यक्त करती हैं।
किसी भी रिश्ते की शुरुआत में महिला अपने मनपसंद पुरुष को आँख के हल्क़े इशारे से बता देती है कि तुम मुझे सुखी बना सकते हो। यह इशारा करके वह दरअसल उनका संबंध शुरू करती है। यह निगाह पुरुष को क़रीब आने के लिए प्रोत्साहित करती है। इससे पुरुष के मन से संबंध बनाने का डर दूर हो जाता है, और वह आगे क़दम उठाता है। दुर्भाग्य से; जब एक बार रिश्ता जुड़ जाता है और समस्याएँ सामने आने लगती हैं, तो महिला यह भूल जाती है कि वह संदेश अब भी पुरुष के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है, इसलिए वह इसे भेजने की उपेक्षा कर देती है।
मैं ख़ुद इस बात का घोर समर्थक हूँ कि विवाह के बाद सभी हितों का मिलन ही एक आदर्श स्थिति है, लेकिन हितों के मिलन का अर्थ यह नहीं हुआ कि जो मेरा है, वह तुम्हारा है; पर जो तुम्हारा है, वह सिर्फ़ तुम्हारा है।
हमारे अतीत की भावनाएँ केवल तभी नहीं उभरती हैं, जब हमारा प्रेम प्रसंग शुरू होता है। यह बाक़ी समय भी होता है, जब हम सचमुच अच्छा, ख़ुश या प्रेमपूर्ण महसूस कर रहे हों। इन सकारात्मक समय में दंपति बिना कारण लड़ते दिख सकते हैं, जबकि उन्हें ख़ुश होना चाहिए।
जब ग़लतफ़हमियाँ पैदा हों, तो याद रखें कि हम अलग भाषाएँ बोलते हैं; पार्टनर की बात का असली अर्थ क्या है या वह सचमुच क्या कहना चाहता है, उसका अनुवाद करने में थोड़ा समय लगाएँ। इसके लिए निश्चित रूप से अभ्यास की ज़रूरत होती है, लेकिन यह इतना महत्त्वपूर्ण काम है कि आपको इसे करना चाहिए।
कुछ समय तक अंतरंगता की भूख संतुष्ट होने के बाद, अब पुरुष को स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की भूख महसूस होने लगती है।
प्यार की शुरुआत बसंत की तरह होती है। हमें ऐसा महसूस होता है कि हम हमेशा सुखी रहेंगे। हम अपने पार्टनर से बेइंतहा प्यार करते हैं और कल्पना भी नहीं कर सकते कि कभी ऐसा दिन भी आएगा, जब हम उससे प्यार नहीं करेंगे। यह मासूमियत का समय है। प्रेम अमर लगता है। यह जादुई समय होता है, जब हर चीज़ आदर्श दिखती है और बिना प्रयास के अच्छी तरह काम करती है। हमारा पार्टनर हमें आदर्श नज़र आता है। हम बिना प्रयास के एक लय में रहते हैं और अपनी ख़ुशक़िस्मती पर आनंदित होते हैं।
भारतवर्षीय संहिता में नर-नारी का संयत संबंध, कठिन अनुशासन के भीतर आदिष्ट है—कालिदास के काव्य में वही सौंदर्य के उपकरण में गठित है।
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समाज की दो आधार शिलाएँ हैं—अर्थ का विभाजन और स्त्री-पुरुष का संबंध। इनमें से यदि एक की भी स्थिति में विषमता उत्पत्र होने लगती है, तो समाज का संपूर्ण प्रासाद हिले बिना नहीं रह सकता।
जब कोई पुरुष किसी महिला से प्रेम करता है, तो समय-समय पर उसे ख़ुद को दूर खींचने की ज़रूरत होती है और उसके बाद ही वह उसके ज़्यादा क़रीब आ सकता है।
यह सब संसार असार व क्षणिक है। पक्षी आँगन में दाना चुगने के लिए आते हैं और चुग कर उड़ जाते हैं।लड़कियाँ घरौंदे बनाती हैं, गुड्डों-गुड़ियों के विवाह करती हैं और फिर सब खिलौनों को तोड़ डालती हैं। यात्री आकर किसी वृक्ष के नीचे रात को विश्राम लेते हैं और प्रातःकाल होते ही उठकर चले जाते हैं। मार्ग में बहुत से लोगों से भेंट होती है परंतु इन लोगों से कोई मोह या संबंध नहीं जोड़ता। इसी प्रकार जब तक इस संसार में प्रारब्धानुसार जीवित रहता है तब तक उदासीन व अलिप्त रहना चाहिए।
हमारे समाज में अपने स्वार्थ के कारण, पुरुष मनुष्यता का कलंक हैं और स्त्री अपनी अज्ञानमय निस्पंद सहिष्णुता के कारण पाषाण-सी उपेक्षणीय। दोनों के मनुष्यत्व-युक्त मनुष्य हो जाने से ही जीवन की कला विकास पा सकेगी, जिसका ध्येय मनुष्य की सहानुभूति, सक्रियता, स्नेह आदि गुणों को अधिक-से-अधिक व्यापक बना देना है।
चुम्बन की बाज़ी में नायक के विश्वास के साथ असावधान हो जाने पर, मौक़ा पाकर नायिका नायक के अधर को पकड़कर, अपने दाँतों के अंदर दबोच कर अपनी जीत पर हँसे, ज़ोर से चिल्लाए, धमकाए, ताना मारे, व्यंग्य कसे और नाचने लगे तथा भौहों को नचाती, चंचल नेत्रों से हँसती हुई, मुख से बार-बार, तरह-तरह के व्यंग्य वचन बोले। इस प्रकार के प्रणय-कलह से कामेच्छा जागृत होती है और अनुराग में वृद्धि होती है।
पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं, यह समझे बिना महिलाएँ बड़ी आसानी से पुरुषों की प्रतिक्रियाओं की ग़लत व्याख्या कर सकती हैं। एक आम दुविधा तब उत्पन्न होती है, जब वह कहती है 'चलो बात करते हैं,' लेकिन यह सुनते ही वह तुरंत भावनात्मक दूरी बढ़ा लेता है।
दंपतियों को बहस नहीं करनी चाहिए। जब दो लोगों में सेक्स का संबंध न हो, तो बहस या वाद-विवाद करते समय विरक्त और तटस्थ रहना ज़्यादा आसान होता है। लेकिन पति-पत्नी भावनात्मक रूप से और ख़ास तौर पर शारीरिक रूप से जुड़े होते हैं, इसलिए जब वे बहस करते हैं, तो वे आसानी से चीज़ों को बहुत व्यक्तिगत रूप से ले सकते हैं और लेते भी हैं। बुनियादी सलाह : कभी बहस मत करो। इसकी बजाय किसी भी मसले के सभी पहलुओं पर चर्चा करें। आप जो चाहते हैं, उसके लिए ज़ोर दें, लेकिन कभी बहस न करें।
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यदि कठोर शब्दों या अपशब्दों का प्रयोग करने के बावजूद भी; नायिका नायक से प्रेम संबंध जोड़ना चाहती है, तो उसे पुनः वश में करने का प्रयत्न करना चाहिए।
जहाँ तक सामाजिक प्राणी का संबंध है; स्त्री उतनी ही अधिक अधिकार-संपन्न है, जितना पुरुष—चाहे वह अपने अधिकारों का उपयोग करे या न करे।
प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता और बंधन दोनों चाहिए; स्वार्थ तथा परार्थ दोनों की आवश्यकता है, अन्यथा वह जीवन-मुक्त होकर भी किसी को कुछ नहीं दे पाता।
प्रॉपगैंडा आमतौर पर अभिजात्य हितों से बहुत नज़दीक से जुड़े रहते हैं। 1919-20 के ‘लाल डर’ ने दुनिया भर में पहले विश्वयुद्ध के बाद सेल और दूसरे कारख़ानों में चल रहे संघ-निर्माणों को रोकने का काम बहुत अच्छे तरीक़े से किया। इसी तरह ट्रूमन-मैककार्थी के पैदा किए गए ‘लाल डर’ (वामपंथ को अतिवादी बताते हुए लोगों को चेतावनी देना) ने शीतयुद्ध का उद्घाटन करने और युद्ध से जुड़ी एक स्थायी अर्थ-व्यवस्था को खड़ा करने में भारी मदद की… उन्होंने सोवियत संघ से असहमत होने वालों की हालत पर लगातार अपना ध्यान बनाए रखा। यही उन्होंने कम्बोडिया में हो रही दुश्मनों की हत्या और बुल्गारिया से संबंधों के संदर्भ में किया। इससे वियतनाम सिंड्रोम तोड़ने में मदद मिली, सुरक्षा के नाम पर हथियारों की जमाख़ोरी को सही ठहराया जा सका और एक आक्रामक विदेश नीति लागू की जा सकी। और यह सब करके उच्च वर्ग में हो रहे आय के पुनर्वितरण से सबका ध्यान बँटाया जा सका—रीगन की घरेलू आर्थिक नीति की जड़ में यही था।
मैंने कितनी ही बार सोचा है कि क्या व्यक्तियों से संबंध बनाना संभव है, जब किसी के मन में किसी के लिए भी कोई भावना न रही हो; अपने माता पिता के लिए भी नहीं। अगर किसी को कभी भी गहराई से प्यार नहीं किया गया, तो क्या उसके लिए सामूहिकता में रहना संभव है? क्या इन सबका मेरे जैसे युद्धप्रिय के ऊपर कोई प्रभाव नहीं रहा? क्या इस सबसे मैं और बंध्य नहीं हुआ? क्या इन सबसे एक क्रांतिकारी के रूप में मेरी गुणवत्ता कम नहीं हुई? मैं जिसने हर चीज़ को बौद्धिकता और शुद्ध गणित के पैमाने पर रख दिया।
जब हम रिश्तों में दर्द का सामना करते हैं तो हमारी पहली प्रतिक्रिया अक्सर प्रतिबद्धता बनाए रखने के बजाय बंधनों को तोड़ देने की होती है।
स्मरण का संबंध अंधकार से अधिक है।
अच्छी तरह से प्यार करना केवल रोमांटिक रिश्ते में ही नहीं, सभी सार्थक रिश्तों में ज़रूरी है।
जब पुरुष और महिलाएँ अपनी भिन्नताओं को समझ लेते हैं; उनका सम्मान करते हैं और उन्हें स्वीकार कर लेते हैं, तो प्रेम को पल्लवित और विकसित होने का मौक़ा मिल जाता है।
मनुष्य जाति की चित्तवृत्तियाँ अनित्य होती हैं, एक बार टूटने पर भी फिर संबंध जुड़ सकता है।
जब महिला अपने विचार बताती है, तो वह स्वाभाविक रूप से पुरुष को बोलने के लिए प्रोत्साहित करती है, लेकिन जब पुरुष महसूस करता है कि उसके बोलने की माँग की जा रही है, तो उसका दिमाग़ खाली हो जाता है।
जिसके साथ हमारा सामान्य परिचय मात्र होता है, वह हमारे पास भले बैठा रहे; किंतु उसके और हमारे बीच समुद्र जैसा व्यवधान बना रहता है, वह होता है अचैतन्य का समुद्र, उदासीनता का समुद्र।
स्त्री की कोमलतामई सदाशयता और सहानुभूति, समाज के संतप्त जीवन के लिए शीतल अनुलेप का कार्य करती है—इसमें संदेह नहीं।
मनुष्य यदि मनुष्य को सहयोग देना स्वीकार न करता, तो न मानवता की ऐसी अद्भुत कहानी लिखी जाती और न मनुष्य अपनी आदिम अवस्था से आगे बढ़ सकता।
प्रेमपूर्ण संबंधों का एक विरोधाभास यह है कि जब सब कुछ अच्छा चल रहा होता है और हमें यह महसूस होता है कि सामने वाला हमसे प्रेम करता है, तो हम अचानक पाते हैं कि हम अपने पार्टनर से भावनात्मक दूरी बनाने लगे हैं या उन पर अप्रिय तरीक़ों से प्रतिक्रिया करते हैं।
महिलाएँ सहज बोध से जानती हैं कि अगर उनका पार्टनर उनके दर्द को सुनकर समझ ले; तो वह ऐसे परिवर्तन कर लेगा, जो वह कर सकता है।
जिस संबंध से पति-पत्नी दोनों को समान सुख की अनुभूति हो; परस्पर खेल, हँसी-विनोद करे, एक-दूसरे को बराबर समझें—वह संबंध विवाह करने योग्य होता है।
पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं। जब वे ख़ुद को दूर खींच लेते हैं, तो रबर बैंड की तरह उनके दूर जाने की भी एक सीमा होती है। उस सीमा पर पहुँचने के बाद, वे रबर बैंड जितनी ही तेज़ी से लौट आते हैं। पुरुषों के अंतरंगता चक्र को समझने के लिए, रबर बैंड की तुलना आदर्श है। यह चक्र है क़रीब आना, ख़ुद को दूर खींचना और फिर दोबारा क़रीब आना।
महिला को यह पता ही नहीं होता कि उसके अविश्वास से पुरुष को कितनी चोट पहुँचती है।
बरसों तक हमने अपनी दर्द भरी भावनाओं का दमन किया है। फिर एक दिन हम प्रेम करने लगते हैं और प्रेम हमें इतना सुरक्षित महसूस कराता है कि हम खुल जाते हैं और अपनी भावनाओं के बारे में जागरूक हो जाते हैं। प्रेम हमें खोलता है और हम अपने दर्द को महसूस करने लगते हैं।
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हमारे प्रेम के पूरे ग्रीष्म काल में हमें यह महसूस होता है कि हमारा पार्टनर उतना आदर्श नहीं है, जितना हमने सोचा था और हमें अपने संबंध पर काम करना होगा। न सिर्फ़ हमारा पार्टनर दूसरे ग्रह से आया है, बल्कि वह एक ऐसा इंसान भी है, जो ग़लतियाँ करता है और जिसमें कई दोष भी हैं।
अपने पार्टनर के साथ जुड़ने के बाद, पुरुष कुछ हद तक ख़ुद को खो देता है।
जब किसी महिला की लहर ऊपर उठती है, तो उसे महसूस होता है जैसे वह प्रचुर प्रेम दे सकती है, लेकिन जब यह गिरती है, तो वह आंतरिक खोखलापन महसूस करती है और उस ख़ाली जगह को सामने वाले के प्रेम से भरने की ज़रूरत होती है। नीचे आने का यह समय भावनात्मक घरेलू सफ़ाई का समय होता है।
प्रेम किसी व्यक्ति के साथ संबंधों का नाम नहीं है; यह एक ‘दृष्टिकोण’ है, एक ‘चारित्रिक रुझान’ है—जो व्यक्ति और दुनिया के संबंधों को अभिव्यक्त करता है; न कि प्रेम के सिर्फ़ एक ‘लक्ष्य’ के साथ उसके संबंधों को।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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