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व्यंग्य पर उद्धरण

व्यंग्य अभिव्यक्ति की

एक प्रमुख शैली है, जो अपने महीन आघात के साथ विषय के व्यापक विस्तार की क्षमता रखती है। काव्य ने भी इस शैली का बेहद सफल इस्तेमाल करते हुए समकालीन संवादों में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। इस चयन में व्यंग्य में व्यक्त कविताओं को शामिल किया गया है।

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जनता की, जनता के द्वारा, जनता के लिए सरकार कैसे अपने ही लिए हो जाती है—यह अब्राहम लिंकन को नहीं मालूम था, हमें मालूम है।

हरिशंकर परसाई
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एम.ए. करने से नौकरी मिलने तक जो काम किया जाता है, उसे रिसर्च कहते हैं।

हरिशंकर परसाई
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बेईमानी इतनी पुरानी बात हो गई है कि अब कोई बेईमानी की बात करे, तो लगता है बड़ा पिछड़ा हुआ आदमी है।

हरिशंकर परसाई
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बेइज़्ज़ती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो, तो आधी इज़्ज़त बच जाती है।

हरिशंकर परसाई
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दिन-रात गर्द के बवंडर उड़ाती हुई जीपों की मार्फ़त इतना तो तय हो चुका है कि हिंदुस्तान, जो अब शहरों ही में बसा था, गाँवों में भी फैलने लगा है।

श्रीलाल शुक्ल
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हमारे न्याय-शास्त्र की किताबों में लिखा है कि जहाँ-जहाँ धुआँ होता है, वहाँ-वहाँ आग होती है। वहीं यह भी बढ़ा देना चाहिए कि जहाँ बस का अड्डा होता है, वहाँ गंदगी होती है।

श्रीलाल शुक्ल
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किसान को—जैसा कि ‘गोदान’ पढ़नेवाले और दो बीघा ज़मीन' जैसी फ़िल्में देखनेवाले पहले से ही जानते हैं—ज़मीन ज़्यादा प्यारी होती है। यही नहीं, उसे अपनी ज़मीन के मुक़ाबले दूसरे की ज़मीन बहुत प्यारी होती है और वह मौक़ा मिलते ही अपने पड़ोसी के खेत के प्रति लालायित हो उठता है। निश्चय ही इसके पीछे साम्राज्यवादी विस्तार की नहीं, सहज प्रेम की भावना है जिसके सहारे वह बैठता अपने खेत की मेड़ पर है, पर जानवर अपने पड़ोसी के खेत में चराता है।

श्रीलाल शुक्ल
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योग्य आदमियों की कमी है। इसलिए योग्य आदमी को किसी चीज़ की कमी नहीं रहती। वह एक ओर छूटता है तो दूसरी ओर से पकड़ा जाता है।

श्रीलाल शुक्ल
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तुम मँझौली हैसियत के मनुष्य हो और मनुष्यता के कीचड़ में फँस गये हो। तुम्हारे चारो ओर कीचड़-ही-कीचड़ है।

श्रीलाल शुक्ल
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तर्क और आस्था की लड़ाई हो रही थी और कहने की ज़रूरत नहीं कि आस्था तर्क को दबाए दे रही थी।

श्रीलाल शुक्ल
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जो अपने घर में ही सुधार न कर सका हो, उसका दूसरों को सुधारने की चेष्टा करना बड़ी भारी धूर्तता है।

प्रेमचंद
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विरोधी से भी सम्मानपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। देखो न, प्रत्येक बड़े नेता का एक-एक विरोधी है। सभी ने स्वेच्छा से अपना-अपना विरोधी पकड़ रखा है। यह जनतंत्र का सिद्धांत है।

श्रीलाल शुक्ल
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कीचड़ की चापलूसी मत करो। इस मुग़ालते में न रहो कि कीचड़ से कमल पैदा होता है। कीचड़ में कीचड़ ही पनपता है। यह जगह छोड़ो। यहाँ से पलायन करो।

श्रीलाल शुक्ल
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अच्छा भोजन करने के बाद मैं अक्सर मानवतावादी हो जाता हूँ।

हरिशंकर परसाई
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भारत में जितना व्यवस्थित धंधा ब्राह्मण का है, उतना मारवाड़ी का भी नहीं।

हरिशंकर परसाई
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राजनीति से संन्यास, उससे बड़ी राजनीति करने के लिए लिया जाता है।

हरिशंकर परसाई
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लीडरी ऐसा बीज है जो अपने घर से दूर की ज़मीन में ही पनपता है।

श्रीलाल शुक्ल
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भागो-भागो यथार्थ तुम्हारा पीछा कर रहा है।

श्रीलाल शुक्ल
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साहित्यकार के हक़ में ग़रीबी को एक साहित्यिक मूल्य मान लिया गया है।

श्रीलाल शुक्ल
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ज़ोर से बोलने का वही नतीजा हुआ जो प्रायः होता है। विपक्ष धीरे-धीरे बोलने लगा।

श्रीलाल शुक्ल
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इस देश में कोई युवक नहीं जानता कि उसका आख़िर होगा क्या? वह यह भी जानता है बी. ए. करने से कुछ होता नहीं है। जब तक फेल होता जाता है, विद्यार्थी कहलाता है—जब पास हो जाएगा तब बेकार कहलाएगा।

हरिशंकर परसाई
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विश्वविद्यालयों में तो गुरु-कृपा से ही डिग्री मिलती है। सब जानते हैं, पढ़ने से कुछ नहीं होता। अगर आचार्य की कृपा हो जाए, तो प्रतिद्वंद्वी विद्यार्थी का अँगूठा काटकर वह प्रिय विद्यार्थी को दे देता है। राजा के लड़के और भील के लड़के में जो अंतर तब था, वही अब है।

हरिशंकर परसाई
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यह ‘मिसफिट्स’ का युग है भाई। जिसे जुआड़ख़ाना चलाना चाहिए, वह मंत्री है। जिसे डाकू होना चाहिए, वह पुलिस अफ़सर है। जिसे दलाल होना चाहिए, वह प्रोफ़ेसर है।जिसे जेल में होना चाहिए, वह मज़िस्ट्रेट है। जिसे कथावाचक होना चाहिए, वह उपकुलपति है। जिसे जहाँ नहीं होना चाहिए, वह ठीक वहीं है।

हरिशंकर परसाई
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ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, सब माया है—यह शंकराचार्य सिखाते हैं, पर सोने के सिंहासन पर बैठते हैं और सोने के कमंडल से पानी पीते हैं।

हरिशंकर परसाई
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किसी देश की जनता को अन्न और दवा से वंचित करके मार डालना, समस्या का शांतिपूर्ण हल खोजना है।

हरिशंकर परसाई
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संस्कृत के पुराने कवि, टकसाली बातें कहने के शौक़ीन हुआ करते थे। उन बातों को आज कहावत कहा जाएगा, तब सुभाषित कहा जाता था। उनमें से एक प्रसिद्ध सुभाषित है, ‘उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी’। यानी, लक्ष्मी उद्योगी पुरुषसिंह के ही पास जाति है।

श्रीलाल शुक्ल
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पुजारी जानता है; भगवान चाहे कहीं और हों, मगर मंदिर में तो क़तई नहीं है। मुसलमान जानता है कि ख़ुदा कहीं होगा तो मस्जिद के बाहर होगा, यहाँ तो नहीं है। मगर अपना धंधा इसी में सुरक्षित है कि लोगों को विश्वास दिलाएँ कि यज्ञ से उनका कल्याण होगा। मंदिर और मस्जिद में की गई पुकार भगवान एकदम सुनता है—सीधी ‘हॉट लाइन’ है।

हरिशंकर परसाई
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भक्ति, वीरता और सैक्स की मिली-जुली मानसिकता; फ़िल्मी हीरो को नेता, उद्धारक और पथ-प्रदर्शक बना देती है।

हरिशंकर परसाई
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धर्म कोई भी हो, भगवान या ख़ुदा का निवास काले धन की तिजोरी में और ग़ैरकानूनी शराब की बोतल में रहता है। भगवान क्षीर सागर में नहीं, ग़ैरकानूनी मदिरा सागर में विश्राम करते हैं।

हरिशंकर परसाई
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कोई-कोई सनकी राजा ऐसे होते थे कि अपने नौकर को कोड़ों से ख़ूब पीटते थे, मगर उनकी चिकित्सा के लिए डॉक्टर तैयार रखते थे। अपनी सरकार भी सनकी ज़मींदार है। शिक्षक को ख़ूब कष्ट होने देगी, मगर कल्याण-निधि ज़रूर खोल देगी।

हरिशंकर परसाई
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जिस समाज में धन के साथ पाप का समझौता ही प्रतिष्ठा का कारण है, वहाँ समाज का गुरु अवहेलना का पात्र हो, यह आश्चर्य की बात तो नहीं है—दु:ख की अवश्य है। और वह इस देश के दुर्भाग्य पर है, जो एक बार किसी समय अपने ज्ञान के आलोक से संसार को चकाचौंध करके, अब धीरे-धीरे अंधकार ही पसंद करता जा रहा है।

हरिशंकर परसाई
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समाज के सामने शोभा बनाने की भावना बड़ी बलवती होती है। किसी भी समय आदमी इसे नहीं भूलता कि दूसरे उसे देख रहे हैं और उनकी नज़रों में उसे जँचना चाहिए।

हरिशंकर परसाई
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तबादले की एक बँधी-बँधाई नैतिक पद्धति है। अफ़सर या मंत्री से संबंध होने से तबादले होते हैं। फिर तबादले करने के रेट बँधे हैं। लोककर्म विभाग के रेट ऊँचे हैं, शिक्षा-विभाग के रेट कम हैं—यह एक ईमानदार प्रक्रिया है।

हरिशंकर परसाई
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गाँधीवाद, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता की जो बात की जाती है, वह ख़ास अर्थ नहीं रखती। मूल है, जो भी हाथ पड़ जाए, सत्ता पा लेना।

हरिशंकर परसाई
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आदमी फ़िल्मी अभिनेता हो या नेता, तभी वह इच्छा-मात्र से रो सकता है।

श्रीलाल शुक्ल
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प्रंशसा के जाल में सरलता से फँसता है, मध्यम स्थिति का आदमी। जो बड़ा है—वह इसलिए कि प्रशंसा से उसका पेट आधा तो भर ही गया होगा, या इसलिए कि वह इस जाल को देख लेता है—फँसेगा नहीं। निपट निम्न श्रेणी का आदमी प्रशंसा को उपहास समझकर नाराज़ हो जाएगा, पर मध्यमार्गी जानता है कि वह निपट निकृष्ट नहीं है। उसके मन में बड़ा कहलाने की हविस भी होती है।

हरिशंकर परसाई
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छायावाद के कवि शब्दों को तोलकर रखते थे, प्रयोगवाद के कवि शब्दों को टटोल कर रखते थे, नई कविता के कवि शब्दों को गोलकर रखते थे—सन् साठ के बाद के कवि शब्दों को खोल कर रखते हैं।

धूमिल
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व्याकरण सीखना, तानाशाही में रहने का अभ्यास करने जैसा है।

जॉन क्लेयर
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साहित्य के आचार्यों की बात करनी चाहिए। ये रसवादी प्रकार के आचार्य हैं। ये रँडुए होकर भी अपने-आप हृदय में शृंगार रस न जाने कैसे पैदा कर लेते हैं? इन्हें आलम्बन भी नहीं चाहिए शायद, क्योंकि आलम्बन और चेतना का द्वंद्व होने लगता है।

हरिशंकर परसाई
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हर तरह के चोर कर्म—घूस, कालाबाज़ारी, मुनाफ़ाख़ोरी, राजनैतिक बेईमानी, पाखँड—सबकी साधना धर्म की मदद से होती है

हरिशंकर परसाई
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शोषकों के वर्ग-स्वार्थों को जब कोई चुनौती देता है; तो उस वर्ग के प्रवक्त्ता कहते हैं, यह आदमी ख़ुदा से लड़ रहा है। ख़ुदा को प्राइवेट संपत्ति का रक्षक और शोषण का एजेंट तभी से बना लिया गया था—जब मनुष्य ने उसके होने की कल्पना की थी।

हरिशंकर परसाई
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प्रशंसा चाहना शायद देवत्व है, तभी तो हर देवता की प्रशंसा के लिए दुनिया की हर भाषा में अगणित ग्रंथ रचे गए हैं।

हरिशंकर परसाई
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रस सिद्धांतवाले काइयाँ आचार्य के पास जब शोध छात्राएँ आती हैं, तब वह तुलसीदास के हवाले से जानता है कि प्रभु 'उमा-रमन' के बाद ही 'करुणायतन' होते हैं।

हरिशंकर परसाई
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जिस जाति के धर्मगुरु कविता पर, साहित्य पर बंदिश लगाते हैं, उस जाति पर हम साधुओं को दया आती है। हमें उस जाति के भविष्य के बारे में भी चिंता होती है। कालिदास बच गए। उन्होंने 'कुमार संभव' में तो शिव-पार्वती के रमण का वर्णन किया है, तो शैव उन्हें त्रिशूल से मार डालते, पर तब धर्मगुरु संकीर्ण नहीं थे।

हरिशंकर परसाई
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व्यंग्य ख़त्म होते ही शब्द खिलौना बन जाता है।

रघुवीर चौधरी
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भ्रष्टाचार की बात अब करना वैसा ही है, जैसे सत्यवादी हरिश्चंद्र की कथा सुनाना। 'सत्यवादी' हरिश्चंद्र की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी है इस देश के भ्रष्टाचार की कथा।

हरिशंकर परसाई
  • संबंधित विषय : देश
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जब ग़ुलाम इतना सयाना और समझदार हो जाए कि बग़ावत पर आमादा हो जाए तो मालिक को नए सिरे से कल्पनाशील बनना पड़ता है।

कृष्ण कुमार
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जब कभी क्लर्क वैद्यजी को 'चाचा' कहता था, प्रिंसिपल साहब को अफ़सोस होता था कि वे उन्हें अपना बाप नहीं कह पाते।

श्रीलाल शुक्ल
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अपने मूल रूप को जितना अधिक ढाँकने में मनुष्य सफल हुआ है, वह उतना ही सभ्य कहलाया है।

हरिशंकर परसाई
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सच्चा व्यंग्य जीवन की समीक्षा होता है।

हरिशंकर परसाई

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere