सुख पर उद्धरण
आनंद, अनुकूलता, प्रसन्नता,
शांति आदि की अनुभूति को सुख कहा जाता है। मनुष्य का आंतरिक और बाह्य संसार उसके सुख-दुख का निमित्त बनता है। प्रत्येक मनुष्य अपने अंदर सुख की नैसर्गिक कामना करता है और दुख और पीड़ा से मुक्ति चाहता है। बुद्ध ने दुख को सत्य और सुख को आभास या प्रतीति भर कहा था। इस चयन में सुख को विषय बनाती कविताओं का संकलन किया गया है।
अपने सुख में सुखी होने की और अपने दु:ख में दु:खी होने की तन्मयता कवि को हो, तो वह कवि नहीं बन सकता।
अपने जीवन से मनुष्य को सबसे बड़ी शिक्षा यह लेनी चाहिए कि संसार में दुःख है, किंतु उसे सुख में बदलना उसके हाथ में है।
घर आए अतिथि को प्रसन्न दृष्टि से देखे। मन से उसकी सेवा करे। मीठी और सत्य वाणी बोले। जब तक वह रहे उसकी सेवा में लगा रहे और जब वह जाने लगे तो उसके पीछे कुछ तक जाए- यह सब गृहस्थ का पाँच प्रकार की दक्षिणा से युक्त यज्ञ है।
सत्यकाव्य का प्रणयन पुरुषार्थचतुष्टय एवं कलाओं में निपुणता, आनंद और कीर्ति प्रदान करता है।
कोई कुछ भी कहे, जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ ख़ुश रहना है।
सुख देखते ही तीनों लोकों में दुःख के चिन्ह लुप्त हो जाते हैं, एवं दुःख उपस्थित होते ही कहीं भी लेशमात्र भी सुख दिखाई नहीं देता।
जो लोग ख़ुशी की तलाश में घूमते हैं, वे अगर एक क्षण रुकें और सोचें तो वे यह समझ जाएँगे कि सचमुच ख़ुशियों की संख्या, पाँव के नीचे के दूर्वादलों की तरह अनगिनत है; या कहिए कि सुबह के फूलों पर पड़ी हुई शुभ्र चमकदार ओस की बूँदों की तरह अनंत है।
जाओ, उड़ो, तैरो, कूदो, उतरो, पार करो, अज्ञात से प्रेम करो, अनिश्चित से प्रेम करो, जिसे अब तक नहीं देखा है—उससे प्रेम करो… किसी से भी प्रेम मत करो—तुम जिसके हो, तुम जिसके होगे—अपने आपको खुला छोड़ दो, पुराने झूठ को हटा दो, जो नहीं किया उसे करने की हिम्मत करो, वही करने में तुम्हें ख़ुशी मिलेगी… और प्रसन्न रहो, डर लगने पर वहाँ जाओ जहाँ जाने से डरते हो, आगे बढ़ो, ग़ोता लगाओ, तुम सही मार्ग पर हो।
मुझसे सीखें, यदि मेरे उपदेशों से नहीं, तो मेरे उदाहरण से सीखें कि ज्ञान की खोज कितनी ख़तरनाक है और वह व्यक्ति जो अपने मूल शहर को ही दुनिया मानता है, वह उस व्यक्ति की तुलना में कितना ख़ुश है जो अपनी शक्ति से बड़ा होने की आकांक्षा रखता है।
हम प्राचीन देशवासियों के पास अपना अतीत है—हम अतीत के प्रति आसक्त रहते हैं। उन, अमेरिकियों का एक सपना है: वे भविष्य के वादे के बारे में उदासी महसूस करते हैं।
नारी पुरुष से पूजा नहीं चाहती। वह जीवन में सहयोग चाहती है दुःख और सुख के साथ। तन और मन का विलीनीकरण। दो जीवनों का एक होना।
ख़ुशी का अनुभव करते हुए हमें उसके प्रति चेतन होने में कठिनाई होती है। जब ख़ुशी गुज़र जाती है और हम पीछे मुड़कर उसे देखते और अचानक से महसूस करते हैं—कभी-कभार आश्चर्य के साथ—कितने ख़ुश थे हम।
ख़ुशी के साथ प्रायः दुःख का पुछल्ला लगा रहता है।
किसी के शब्दों की लय में झूलना एक सुखद, लेकिन अचेतन निर्भरता हो सकती है।
मुँह टेढ़ा करके देखने मात्र से अतिथि का आनंद उड़ जाता है।
केवल एक चीज़ ने उसे ख़ुश किया और अब जब वह चीज़ चली गई तो हर चीज़ ने उसे ख़ुश कर दिया।
निस्संदेह मैं तो हिंदू युवकों को वीरों और हुतात्माओं के उस गौरवमय पागलखाने में प्रविष्ट कराना चाहता हूँ जहाँ त्याग को लाभ, ग़रीबी को अमीरी और मृत्यु को जीवन समझा जाता है। मैं तो ऐसे पक्के और पवित्र पागलपन का प्रचार करता हूँ। पागल! हाँ, मैं पागल हूँ। मैं ख़ुश हूँ कि मैं पागल हूँ।
नागरक को चाहिए कि वह महीने में एक-दो बार किसी निश्चित तिथि को सुंदर वेश-भूषा से सज-धज कर, घोड़े पर चढ़कर, नौकर-चाकरों तथा वेश्याओं के साथ उद्यान-यात्रा के लिए प्रस्थान करे। वहाँ पहुँच कर नित्यकर्म का संपादन कर मुर्ग़ा, तित्तर, बटेर, बुलबुल आदि पालतू पक्षियों की युद्धकला देखे; जूआ, शतरंज आदि खेलों को खेलते हुए वेश्याओं के साथ मनोरंजन का सुख अनुभव करे, फिर शाम को घर लौट आए।
प्रकृति मानव के समस्त सुख-दुःख में 'अनंत' का स्वर मिलाए रखती है।
कामोपभोग का लक्ष्य सुखप्राप्ति है तथा धर्म और अर्थ का फल भी सुखप्राप्ति है।
बिल्लियाँ इंसानों से ज़्यादा ख़ुश रहती हैं, इसकी एक वजह तो यह है कि वे अख़बार नहीं पढ़तीं।
मनुष्य के अंत:करण का धर्म यही है कि वह परिश्रम से केवल सफलता नहीं, बल्कि आनंद भी प्राप्त करता है।
हम प्रायः अपनी सनातन धारणा का जितना अधिक मूल्य समझते हैं, उतना दूसरे व्यक्ति के अभाव और दुःख का नहीं। यही कारण है कि जब तक व्यक्तिगत असंतोष सीमातीत होकर हमारे संस्कार-जनित विश्वासों को आमूल नष्ट नहीं कर देता, तब तक हम उसके अस्तित्व की उपेक्षा ही करते रहते हैं।
संसार से तटस्थ रहकर; शांति-सुखपूर्वक लोक-व्यवहार-संबंधी उपदेश देनेवालों का उतना अधिक महत्त्व हमारे हिंदू-धर्म में नहीं है, जितना संसार के भीतर घुसकर उसके व्यवहारों के बीच सात्विक सौंदर्य की ज्योति जगानेवालों का है।
किसी भी इंसान की ख़ुशी के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि उसे अपनी स्वाभाविक इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने की स्वतंत्रता हो।
साधारणतः लोग कहते हैं कि वेदांत, दर्शन और धर्म, इस जगत् और उसके सारे सुखों एवं संघर्षों को छोड़कर इसके बाहर जाने का उपदेश देते हैं। पर यह धारणा एकदम ग़लत है। केवल ऐसे अज्ञानी व्यक्ति ही; जो प्राच्य चिंतन के विषय में कुछ नहीं जानते और जिसमें उसकी यथार्थ शिक्षा समझने योग्य बुद्धि ही नहीं है, इस प्रकार की बातें कहते हैं।
कामना, भय, लोभ अथवा जीवन-रक्षा के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। धर्म नित्य है जबकि सुख-दुःख अनित्य हैं, जीव नित्य है तथा बंधन का हेतु अनित्य है।
जो लोग पूरी तरह से समझदार और ख़ुश हैं, दुःख की बात है वे अच्छा साहित्य नहीं लिखते हैं।
घोर अंधकार में जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सुशोभित होता है उसी प्रकार दुःख का अनुभव कर लेने पर सुख का आगमन आनंदप्रद होता है किंतु जो मनुष्य सुख भोग लेने के पश्चात् निर्धन होता है वह शरीर धारण करते हुए भी मृतक के समान जीवित रहता है।
मानसिक सुख के साथ शारीरिक दुःख उपेक्षणीय हो सकता है और शारीरिक सुख के साथ मानसिक पीड़ा सहनीय, परंतु दोनों सुख या दोनों दुःख—मनुष्यों को जड़ बनाए बिना नहीं रहते।
यदि समग्र भाव से समस्त नारी जाति के दुःख-सुख और मंगल-अमंगल की तह में देखा जाए, तो पिता, भाई और पति की सारी हीनताएँ और सारी धोखेबाज़ियाँ क्षण भर में ही सूर्य के प्रकाश के समान आप से आप सामने आ जाती हैं।
कवि के लिए, मौन स्वीकार्य ही नहीं, बल्कि ख़ुश करने वाली प्रतिक्रिया है।
वह अपने उदास रोगियों से कहा करते थे : ‘आप इस नुस्ख़े से चौदह दिनों में ठीक हो सकते हैं। हर दिन यह सोचने की कोशिश करें कि आप किसी को कैसे ख़ुश कर सकते हैं।’
विचार सबसे बड़ा सुख है—ख़ुशी स्वयं केवल कल्पना है—क्या आपने कभी अपने सपनों से अधिक किसी चीज़ का आनंद लिया है?
जल्दी-जल्दी में लिखी गईं गोपनीय नोटबुक्स और तीव्र भावनाओं में टाइप किए गए पन्ने, जो ख़ुद की ख़ुशी के लिए हों।
सुखी है वह मनुष्य जो अतिथि को देखकर कभी मुँह नहीं लटका लेता है, अपितु हर अतिथि का प्रसन्नतापूर्वक स्वागत करता है।
ख़ुशी किसी को अपनी बाँहों में भर लेने और यह जानने में है कि पूरी दुनिया आपकी बाँहों में है।
मैं अपनी ख़ुशी के लिए पढ़ती हूँ और यही वह क्षण होता है, जब मैं सबसे ज़्यादा सीखती हूँ।
सुख का साहस है और दुख का भी साहस है।
ख़ुशी का मतलब है कि आप जिससे प्यार करते हैं, उसके क़रीब रहना; बस इतनी-सी बात है।
ज़्यादा हमेशा बेहतर नहीं होता, वास्तव में सच इसका उलट है; हम कम के साथ ज़्यादा ख़ुश होते हैं।
एक विपरीत ख़ुशी भी होती है, एक डरावनी ख़ुशी, जो औरों का बुरा करने से मिलती है।
यह सब झूठ था, सब बदबू कर रहा था, झूठ की बदबू, यह सब अर्थ, ख़ुशी और सुंदरता का भ्रम देता था।
ख़ुशी पहले प्रत्याशा में मिलती है, बाद में स्मृति में।
क्या आप दुखी होने पर भी ख़ुश रह सकते हैं?
मैं नहीं मानता कि ख़ुशी संभव है, लेकिन मुझे लगता है कि शांति संभव है।
अगर मैं ख़ुश हो सकता हूँ, तब मैं खुश हो जाऊँगा; अगर मुझे मुझे दुखी होना है, तब मुझे दुख उठाना ही पड़ेगा।
ख़ुद को ख़ुश करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है, किसी और को ख़ुश करने की कोशिश की जाए।
ख़ुशी का पूरा आनंद लेने के लिए आपके पास इसे बाँटने वाला कोई होना चाहिए।
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