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मुक्त पर उद्धरण

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जितने दिन तक मनुष्य कर्मकांड और सांप्रदायिक ज्ञान से मुक्त नहीं होता, उतने दिन तक वह सर्वमानव के उपयुक्त नहीं होता।

आचार्य क्षितिमोहन सेन
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सूरदास के काव्य में कृष्ण से राधा और दूसरी गोपियों का प्रेम, सामंती नैतिकता के बंधनों से मुक्त प्रेम है।

मैनेजर पांडेय
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भक्त कवियों की दृष्टि में मानुष-सत्य के ऊपर कुछ भी नहीं है—न कुल, जाति, धर्म, संप्रदाय, स्त्री-पुरुष का भेद, किसी शास्त्र का भय और लोक का भ्रम।

मैनेजर पांडेय
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मुक्ति का अर्थ किसी विद्यमान वस्तु का विनाश करना नहीं है, बल्कि केवल अविद्यमान और सत्य मार्ग के अवरोधक कोहरे का निवारण करना है। जब अविद्या का यह अवरोध हट जाता है, तभी पलकें ऊपर उठ जाती हैं—पलकों का हटना आँखों की क्षति नहीं कहा जा सकता।

रवींद्रनाथ टैगोर
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भाषा नदी की धारा जैसी होती है, उस पर किसी का नाम खोदकर नहीं रखा जा सकता।

रवींद्रनाथ टैगोर
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एक सुसंस्कृत दिमाग़ को अपने दरवाज़े और खिड़कियाँ खुली रखनी चाहिए।

जवाहरलाल नेहरू
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कबीर शास्त्रीय ज्ञान के बोझ से मुक्त है।

मैनेजर पांडेय
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भारतवर्ष में जितने वेदमतानुयायी दर्शनशास्त्र हैं, उन सबका एक ही लक्ष्य है और वह है—पूर्णता प्राप्त करके आत्मा को मुक्त कर लेना। इसका उपाय है योग। 'योग' शब्द बहुभावव्यापी है। सांख्य और वेदांत उभय मत, किसी किसी प्रकार से योग का समर्थन करते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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भक्तिकाव्य के बाहर भी अधिकांशतः प्रेम की वही कविता महत्त्वपूर्ण है, जो सम-विषम की रूढ़ि से मुक्त है।

मैनेजर पांडेय
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जो संप्रदाय में बद्ध हैं, वे चिरंतन साहित्यिक नहीं होते हैं। वे तो तात्कालिक साहित्यिक होते हैं। चिरंतन साहित्यिक तो वे होते हैं, जो सब पंथ, संप्रदाय वग़ैरह से भिन्न होते हैं, परे होते हैं।

विनोबा भावे
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इतिहास विज्ञान है, कल्प-कथा नहीं है। जब तक वैज्ञानिक दृष्टि से, धार्मिक द्वेष से मुक्त, तथ्यपरक इतिहास नहीं पढ़ाया जाएगा, तब तक साम्प्रदायिक द्वेष जा नहीं सकता।

हरिशंकर परसाई
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स्वर्ग-नरक तथा आकाश के परे, राज करने वाले शासकों से संबद्ध अनेक कथाओं अथवा अंधविश्वासों के द्वारा मनुष्य को भुलावे में डालकर, उसे आत्मसमर्पण के लक्ष्य की ओर अग्रसर किया जाता है। इन सब अंधविश्वासों से दूर रहकर, तत्वज्ञानी वासना के त्याग द्वारा जान-बूझकर इस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है।

स्वामी विवेकानन्द
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योगी को अधिक विलास और कठोरता—दोनों ही त्याग देने चाहिए।

स्वामी विवेकानन्द
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उत्पीड़ितों के लिए निहायत ज़रूरी है कि वे अपनी मुक्ति की सभी अवस्थाओं में, स्वयं को पूर्णतर मनुष्य बनने के सत्तामूलक तथा ऐतिहासिक कार्य में संलग्न मनुष्यों के रूप में देखें।

पॉलो फ़्रेरा
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सकारात्मक दृष्टि से मेरे सामजिक दर्शन को तीन शब्दों में समेटा जा सकता है : मुक्ति, समानता और भाईचारा।

भीमराव आंबेडकर
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घर-गृहस्थी के प्रति धार्मिक कट्टरता जैसा जुड़ाव, दरअसल बाहरी दुनिया के प्रति शत्रुता का ही दूसरा नाम है—और अनजाने में ही इससे बाहरी दुनिया के नुक़सान के साथ-साथ, घर-गृहस्थी का और उन उद्देश्यों का—जिनके लिए हम जी रहे होते हैं—नुक़सान होने लगता है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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संस्कारों की बाधाएँ टूटकर, जो मिलन स्वाभाविक हो उठता है―वही तपोवन का मिलन है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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आलोचना और स्वतंत्र चिंतन, क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण होते हैं।

भगत सिंह
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अवधूतों के मुँह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएँ निकली हैं।

हजारीप्रसाद द्विवेदी
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जब कोई पुरुष दूर जा रहा है; वह समय उससे बात करने या उसके ज़्यादा क़रीब जाने की कोशिश करने का नहीं है, उसे दूर जाने दें। कुछ समय बाद वह लौट आएगा। जब वह लौटेगा, तो वह प्रेम और उत्साह से भरा हुआ होगा और इस तरह काम करेगा, मानो कुछ हुआ ही हो। तब आप उससे जी भरकर बातें कर सकती हैं।

जॉन ग्रे
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चौबीस तक घर से निकल जाना चाहिए; नहीं तो आदमी पर बहुत-से कुसंस्कार पड़ने लगते हैं, उसकी बुद्धि मलिन होने लगती है, मन संकीर्ण होने लगता है—शरीर को परिश्रमी बनाने का मौक़ा हाथ से निकलने लगता है।

राहुल सांकृत्यायन
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एक पूर्ण एवं मुक्त प्राणी, कभी किसी चीज़ की आकांक्षा नहीं करता।

स्वामी विवेकानन्द
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साहित्यिक किसी संप्रदाय के नहीं होते। साहित्यिकों का लक्षण ही यह है कि वे संप्रदायातीत होते हैं।

विनोबा भावे
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उत्पीड़ित लोग स्वयं पर भरोसा करना तभी शुरू करते हैं, जब वे उत्पीड़क को खोज लेते हैं और अपनी मुक्ति के लिए संगठित संघर्ष करने लगते हैं।

पॉलो फ़्रेरा
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अलग धर्म चलाना, अलग होना, हिंदू समाज से, वर्णवादी वर्चस्व से अलग होना, मुक्त होना। कबीर इस एजेंडे को देने वाले एक घनघोर राजनीतिक कवि की तरह आते हैं, जो एक ऐसे विचार को बना रहे हैं, जो दलित समाज को हिंदू समाज से बाहर ले जाएगा। दलित लिबरोन का विचार कबीर देते हैं।

सुधीश पचौरी
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जहाँ साधना निरंतर चलती रहती है; जहाँ जीवन-यात्रा सरल और निर्मल है, जहाँ सामाजिक संस्कार की संकीर्णता नहीं है, जहाँ व्यक्तिगत और जातिगत विरोध को दमन करने का प्रयास है, वहीं हम उस विद्या को प्राप्त कर सकते हैं—जिसे भारतवर्ष ने विशेष रूप से 'विद्या' का नाम दिया है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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हम अपनी सारी शक्तियों को किसी एक विषय की ओर लगा देने के फलस्वरूप उसमें आसक्त हो जाते हैं; तथा उसकी और भी एक दिशा है, जो नेतिवाचक होने पर भी उसके सदृश ही कठिन है—उस ओर हम बहुत कम ध्यान देते हैं—वह यह है कि क्षण भर में किसी विषय से अनासक्त होने की, उससे अपने को पृथक् कर लेने की शक्ति। आसक्ति और अनासक्ति, जब दोनों शक्तियों का पूर्ण विकास होता है, तभी मनुष्य महान् एवं सुखी हो सकता है।

स्वामी विवेकानन्द
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प्रेम जो मुक्ति देता है; वह आंतरिक पक्ष से देता है, लेकिन लोभ जब स्वातंत्र्य के लिए चेष्टा करता है, बलपूर्वक अपने उद्देश्य तक पहुँचने के लिए अस्थिर हो उठता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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कर्तव्य तो एक व्यर्थ की बकवास है। मैं मुक्त हूँ—मेरे सारे बंधन कट चुके हैं। यह शरीर कहीं भी रहे या रहे, इसकी मुझे क्या परवाह।

स्वामी विवेकानन्द
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जब समग्र मुक्ति घटित होती है, तब आपके पास देवी-देवता और कर्मकांड नहीं होता—आप एक मुक्त पुरुष होते हैं।

जे. कृष्णमूर्ति
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‘कर्तव्य’ में मैं विश्वासी नहीं हूँ, कर्तव्य तो संसारियों के लिए एक अभिशाप है—संन्यासियों का कोई कर्तव्य नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द
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हमारा मक़सद है मुक्ति पाना। फ़िलहाल हमारी और कोई दिलचस्पी नहीं है। अगर हम धर्मांतरण से मुक्ति पा सकते हैं, तो हम हिंदू धर्म में सुधार की ज़िम्मेदारी क्यों ढोते रहें। हम अपनी ऊर्जा, समय, श्रम और धन इस पर क्यों नष्ट करे?

भीमराव आंबेडकर
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जब आप समग्र रूप से सावधान होते हैं, तो वहाँ कोई 'स्व' नहीं हो सकता।

जे. कृष्णमूर्ति
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आकाश के समान अविरोधी, व्यापक और गति देने वाला होता है साहित्य।

विनोबा भावे
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मैं मुक्त हूँ, सदा मुक्त रहूँगा। मेरी अभिलाषा है कि सभी कोई मुक्त हो जाएँ—वायु के समान मुक्त।

स्वामी विवेकानन्द
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मुक्ति अकेले की नहीं होती। अलग से अपना भला नहीं हो सकता। मनुष्य की छटपटाहट है—मुक्ति के लिए, सुख के लिए, न्याय के लिए। पर यह बड़ी लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है।

हरिशंकर परसाई
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सब पर समान स्नेह रखना अत्यंत कठिन है, किंतु उसके बिना मुक्ति नहीं मिल सकती।

स्वामी विवेकानन्द
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जब तक हम प्रकृति के हाथ से अपना उद्धार नहीं कर लेते, तब तक हम ग़ुलाम हैं। प्रकृति जैसा कहती है, हम उसी प्रकार चलने को लाचार होते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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संस्कृति मनुष्य को जकड़ती नहीं, मुक्त करती है। संस्कृति वह जीवन-मूल्य है, जिसे अपनी विकास-यात्रा में मनुष्य, समाज विकसित और अंगीकार करता है। संस्कृति मनुष्य का उदात्तीकरण करती है, उसे क्षुद्रता से ऊँचा उठाती है।

हरिशंकर परसाई
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जब तक वास्तविकता की सही पहचान कराके सही चेतना का निर्माण नहीं किया जाता, मुक्ति दिलानेवाला ख़ुद उनके विरोध का शिकार होता है, जिन्हें वह मुक्त कराना चाहता है।

हरिशंकर परसाई
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हम जिससे मुक्त होकर बाहर निकलकर नहीं आएँगे, उसे हम नहीं प्राप्त कर पाएँगे।

रवींद्रनाथ टैगोर
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मुक्ति एक प्रसव है और यह प्रसव पीड़ादायक है।

पॉलो फ़्रेरा
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जो बंधन के कारण हैं, वे बंधन के मार्ग हैं। उनका नाश करने वाली आत्मा की शुद्ध अवस्था मोक्षमार्ग है कि जिससे भवभ्रमण का अंत होता है।

श्रीमद् राजचंद्र
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रूप में सत्य का आविर्भाव होते ही, सत्य उस रूप से ही मुक्ति दे देता है।

रवींद्रनाथ टैगोर
  • संबंधित विषय : सच
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जब सभी जगह शिथिलता हो और उस शिथिलता की निंदा होती हो; तब अपने को नियम-व्रत में बाँधना, बड़े पुरुषार्थी लोगों का ही काम है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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संसार की समस्त संस्थाएँ; चाहे वे आरंभ में कैसी भी लाभदायक रही हों, समय पाकर मनुष्य जाति की उन्नति में बाधा डालने लगती हैं और उस समय उनका विध्वंस कर देना ही बुद्धिमत्ता है।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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स्वतंत्रता यानी समग्र मुक्ति का अर्थ है—एक असीम अवकाश की उपलब्धि।

जे. कृष्णमूर्ति
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हमारे जीवन की एकमात्र साधना यही है कि हमारी आत्मा का जो स्वभाव है, उसी को हम बाधा मुक्त बना लें।

रवींद्रनाथ टैगोर
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मुक्ति शून्यता में नहीं, पूर्णता में है। यह पूर्णता सृष्टि करती है, ध्वंस नहीं करती।

रवींद्रनाथ टैगोर
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मुक्ति केवल उसके लिए है, जो दूसरों के लिए सर्वस्व त्याग देता है; परंतु वे लोग जो 'मेरी मुक्ति-मेरी मुक्ति' की अहर्निश रट लगाए रहते हैं, वे अपना वर्तमान और भावी वास्तविक कल्याण, नष्ट कर इधर-उधर भटकते रह जाते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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