पुनर्जन्म पर उद्धरण
भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक
अवधारणा में पुनर्जन्म मृत्यु के बाद पुनः नए शरीर को धारण करते हुए जन्म लेना है। यह अवधारणा अनिवार्य रूप से भारतीय काव्य-रूपों में अभिव्यक्ति पाती रही है। प्रस्तुत चयन उन कविताओं का संकलन करता है, जिनमें इस अवधारणा को आधार लेकर विविध प्रसंगों की अभिव्यक्ति हुई है।
धर्म कुछ संकुचित संप्रदाय नहीं है, केवल बाह्याचार नहीं है। विशाल, व्यापक धर्म है ईश्वरत्व के विषय में हमारी अचल श्रद्धा, पुनर्जन्म में अविरल श्रद्धा, सत्य और अहिंसा में हमारी संपूर्ण श्रद्धा।
मेरा मानना है कि कुछ ऐसे लोग हैं जिनमें चीज़ों को आपस में मिलाकर उन्हें पुनर्जीवित करने की ताक़त होती है।
मैं नर्क की तुलना में पुनर्जन्म में विश्वास करती हूँ। अगर लौटने का विकल्प हो, तब पुनर्जन्म का विचार और भी अधिक सहनीय हो जाता है।
हिंसा मनुष्य द्वारा स्वयं का पुनर्निर्माण है।
आत्मवाद के मानने वालों ने पुनर्जंम का आधार सूक्ष्म शरीर माना है।
भूलना पुनर्जन्म की तरह है।
हे जगत्पति! मुझे न धन की कामना है, न जन की,न सुंदरी की और न कविता की। हे प्रभु! मेरी कामना तो यह है कि जन्म-जन्म में आपकी अहैतुकी भक्ति करता रहूँ।
भय का हेतु क्या है? पूर्व जन्मों में किए हुए शुभाशुभ कर्म। परम आश्रय कौन है? भगवान् श्री हरि का भक्त। माँगने योग्य वस्तु क्या है? श्री हरि की भक्ति। सुख क्या है? उन्हीं श्री हरि की भक्ति का परम प्रेम।
जिस-जिस मनुष्य ने अपने-अपने पूर्वजन्मों में जैसे-जैसे कर्म किए हैं, वह अपने ही किए हुए उन कर्मों का फल सदा अकेले ही भोगता है।
अगला जन्म अगर होता है, तो मैं उसमें भी कवि होना चाहूँगा—सबसे बेहतर कवि। अन्यथा ख़ुद से तो बेहतर होना ही चाहूँगा।
धर्म आध्यात्मिक परिवर्तन है, एक अंतर्मुखी रूपांतरण है। यह अंधकार से प्रकाश की ओर जाना है, आत्मोद्धारहीनता से आत्मोद्धार की स्थिति में पहुँचना है। यह एक जागरण है. एक प्रकार की पुनर्जन्मता है।
मृत्यु से जीव बराबर डरते हैं और यत्नपूर्वक पुनर्जन्म चाहते हैं। प्रवृत्ति होने पर मृत्यु निश्चित है। वे जिससे डरते हैं, उसी में डूबते हैं।
पूर्वजन्म से स्वजन को छोड़कर मनुष्य यहाँ आता है, फिर यहाँ भी (स्वजन की) डग कर वह यहाँ से (परलोक) चला जाता है, वहाँ भी जाकर वहाँ से अन्यत्र चला जाता है, इस प्रकार परित्याग करने वाले मनुष्य में आसक्ति क्यों की जाए।
इस निस्सार संसार से भयभीत साधु पुरुष, क्लेशों का समापन करके, संन्यासरूपी शांति के मार्ग पर चलता है। यदि तुम उन्नयन चाहते हो तो अन्याय का परित्याग कर, दुर्दम्य व्याधियों के अधीन इस जन्म को काट डालो, अर्थात् जन्म के कारण ही अनेकानेक व्याधियाँ सहनी पड़ती हैं। फलतः ऐसा कर्म करो कि पुनर्जन्म ही न हो, जिससे व्याधियों से मुक्ति मिल जाए।
मेरी दृष्टि से पुनर्जन्म शास्त्रीय प्रयोगों और अनुभव से सिद्ध वस्तु है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere