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Krishn Baldev Vaid

1927 - 2020 | پنجاب

کی

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باعتبار

अगर इनसान पैसे और शोहरत का मोह छोड़ दे तो वह ख़तरनाक हो जाता है, कोई उसे बरदाश्त नहीं कर पाता, सब उससे दूर भागते हैं, या उसे पैसा और शोहरत देकर फिर मोह के जाल में फाँस लेना चाहते हैं।

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पीते वक़्त ख़्वाहिश होती है अच्छा संगीत सुनूँ, और संगीत के इर्द-गिर्द ख़ामोशी हो।

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पुराने दोस्त पी लेने के बाद और पराए हो जाते हैं। पी लेने के बाद दोस्तों की ज़बान खुल जाती है, दिल नहीं।

अगर इस दुनिया को ईश्वर का ख़्वाब समझ लिए जाए तो ईश्वर से अपेक्षा कम हो जाए, हमदर्दी ज़्यादा।

यादों का सुख दुख के बग़ैर नहीं होता।

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पीते वक़्त भी निपट अकेला होता हूँ, लिखते वक़्त भी।

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हर वक़्त रिश्तेदारों और बच्चों के लिए तड़पने वाले बूढ़े सुखी नहीं होते।

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महफ़िल में पीना दूसरे दर्जे का पीना है, महफ़िल के लिए लिखना दूसरे दर्जे का लिखना।

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पीते वक़्त अगर लिखने की-सी कैफ़ियत पैदा हो जाए तो पीना सिर्फ़ पीना नहीं रहता।

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अचानक उसने कहा—बताओ तो तुमने जीवन से क्या दानाई हासिल की? मैंने कहा—मेरा सारा लेखन संशय केंद्रित है।

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डायरी में भी सब कुछ दर्ज नहीं किया जाता। उस डायरी में भी नहीं जो छपवाई नहीं जानी है। मतलब यह कि ख़ुफ़िया डायरी पर भी यह ख़ौफ़ हावी रहता है कि कोई मुझे पढ़ लेगा।

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बदसूरती आम हिंदुस्तानी आँख को दिखाई ही नहीं देती।

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अंत का इंतज़ार ही नहीं करना चाहिए, उसका इंतज़ाम भी करना चाहिए।

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यह कड़वी हक़ीक़त कि हम हिंदी के लेखक एक-दूसरे को शौक़, प्यार और उदारता से नहीं पढ़ते। अक्सर तो पढ़ते ही नहीं। पढ़ भी लें तो बता नहीं देते कि पढ़ लिया है।

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यादों को भी पानी की ज़रूरत होती है—आँसुओं के पानी की।

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चेहरा दिखाने की ख़्वाहिश? चेहरे देखने की ख़्वाहिश? ग़लत ख़्वाहिश।

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लिखते वक़्त अगर बग़ैर पिए पीने का-सा सरूर जाए तो लिखने में भी पीने की-सी कैफ़ियत पैदा हो जाती है।

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बहुत कम यादें पछतावे से अछूती होती हैं।

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ज़िंदगी का राज़ या अर्थ तो शायद ही हाथ लगे, फूलों और पत्तों और परिंदों से ही प्यार करते रहना चाहिए।

मंच का मोह मुझे नहीं, भय है। इस भय ने मुझे कई प्रलोभनों से बचाया है।

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मैं बाद अज़मर्ग कामयाबी का मुरीद हूँ।

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जीते जी मर जाने को यह मतलब नहीं कि आप कोई हरकत ही करें या किसी भी हरकत पर हैरान या परेशान हों।

यादों का दूसरा नाम पछतावा।

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कड़वाहट का गोला जब गले में पिघलता है तो आँखों में आँसुओं की चुभन शुरू हो जाती है।

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मैं पैदाइशी ‘अछूत’ हूँ। मुझे किसी संस्था में कोई आस्था नहीं। बकवास और ख़ुराफ़ात मुझसे बरदाश्त नहीं होते। स्याह को सफ़ेद या भूरा मैं नहीं कह सकता। खेल मैं नहीं खेलता।

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मैं पैसे और शोहरत के मोह से मुक्त होने की कोशिश में हूँ, इसीलिए बहुत से लोग मुझसे दूर भागते रहते हैं।

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मौत में ही मुक्ति है। जीवनमुक्त लोगों से ईर्ष्या होती है, मैं उन लोगों में नहीं हो सकता क्योंकि मैं लेखक हूँ।

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हर शाम अपने मन को साफ़ करता हूँ, ताकि अगली सुबह साफ़ मन से लिख सकूँ।

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अहं से आज़ादी आसान तो नहीं, लेकिन बतौर आदर्श यह ज़रूरी है।

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ग़ुरबत और ग़लाज़त दो बहनें : दुनिया भर में।

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बुढ़ापे में ख़ामोशी किसी-किसी को ही नसीब होती है।

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बीमारी और बुढ़ापा—एक भयानक जोड़ा।

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नाम का नशा नुक़सानदेह।

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साहित्य अकादेमी का माहौल मुझे हमेशा असाहित्यिक लगा है।

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मेरा काम हमेशा नासाज़ हालात में ही हुआ है, साज़गार हालात में नहीं।

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मुझे कामयाबी से बेईमानी की बू आती रहती है।

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पीता ज़्यादा नहीं। ज़्यादा पी ही नहीं सकता।

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हिंदुस्तानी डाकख़ाना एक डरावनी जगह है। उस माहौल में काम करने वाले बाबू पागल क्यों नहीं हो जाते?

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नशा उतर जाने के बाद हदें फिर हावी हो जाती हैं। लेकिन क्षणिक या अस्थायी ‘बेहदी’ भी बुरी नहीं होती।

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मरने से पहले सबको मुआफ़ कर देना चाहिए, सब से मुआफ़ी माँग लेनी चाहिए, ख़ुद को भी मुआफ़ कर देना चाहिए। मरने से पहले मुराद मरने से दो मिनट पहले नहीं।

दुख गहराई और शांति देता है, मरने में मदद करता है, हलीमी सिखाता है, सुख का सतहीपन सामने लाता है। मुझे दुख का शुक्रगुज़ार होना चाहिए।

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अनासक्ति और संवेदनशून्यता में भी फ़र्क़ है।

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प्रार्थना अपनी लाचारी के इक़बाल का दूसरा नाम।

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अपने बीवी-बच्चों से, दोस्तों से, कोई अपेक्षा नहीं होनी चाहिए, अपने आपसे भी।

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दुखों के भी कई वर्ग होते हैं।

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अपने अहं को मार देने और अपने आत्मसम्मान को मार देने में फ़र्क़ है।

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ख़्वाहिशें ख़त्म नहीं होती। वे हो भी जाएँ, ख़्वाहिश ख़त्म नहीं होती।

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बच्चों के साथ रहते हुए तन थक जाता है, मन मौज में रहता है; काम की चिंता के बावजूद। कभी-कभी मन भी मैला हो जाता है।

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जो याद रह जाता है वही शायद रखने के क़ाबिल होता है।

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जब इनसान मर जाता है तो उस पर किसी प्रशंसा प्रताड़ना ख़ामोशी ख़फ़गी का कोई असर नहीं होता।

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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