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Raghuveer Chaudhari

1938 | گجرات

کی

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एक स्त्री पूज्य होने के बजाय स्वतंत्र रहना ज़्यादा पसंद करती है, लेकिन उसे यह कौन पूछेगा?

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शांति और मौन का अर्थ है—शोर का अभाव, यानी वास्तव में एक बेचैन करने वाली शांति।

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प्रेम के भ्रम में भी प्रेम की आंशिक स्वीकृति होती है। शायद प्रेम की समग्रता को स्वीकार करना बहुत दुर्लभ है।

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पुरुष को स्त्री को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उसने उसे परम रहस्य कहकर पुरस्कृत किया; लेकिन वास्तव में घमंड के बहाने उसके अधिकार की उपेक्षा की गई।

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स्वतंत्र होने की कोशिश में साहस निहित है। साहसिक कार्य आत्म-सम्मान का पोषण करता है और आत्म-सम्मान किसी भी जोखिम को लेने की इच्छा पैदा करता है। तो क्या अकेले रहने का साहस करने में जोखिम है? शायद, साहस का मतलब ही जोखिम है?

जो वरदान देता है, वह शाप भी दे सकता है।

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प्रेम एक घटना में वैसा नहीं होता जैसा कि दूसरी घटना में होता है। समान प्रतीत होने वाली अन्य घटनाओं का अनुभव भी भिन्न होता है।

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पृथ्वी अपनी गणना में अद्वितीय है। इसकी सुंदरता को केवल पैदल यात्री ही महसूस कर सकता

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दूरी रहस्य से भरपूर है।

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आँखें एक जैसी होने पर भी देखने-देखने में फ़र्क़ होता है।

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जानवर इंसानों जितने बुद्धिमान नहीं होते, इसलिए उन्होंने छिपने की कला नहीं सीखी है। लेकिन मनुष्य में और उनमें बुद्धि को छोड़कर बाक़ी सभी चीज़ें समान स्तर की होती हैं। उन्होंने अपनी कुटिल बुद्धि से वितरण की व्यवस्था बनाकर अपने पशुवत कर्मों को छुपाने के लिए सुरक्षित अंधकार पैदा कर लिया है।

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संतोष की भाषा धीमी होती है, क्योंकि वह शब्दों और मौन दोनों में व्यक्त होती है।

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कुछ भी इतना मधुर नहीं होना चाहिए कि सुनते ही नींद जाए और इतना प्रेरक भी नहीं कि समझने पर वैराग्य जाए।

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मनुष्य के लालच और आत्मघात का ज़हर धरती के केंद्र में काफ़ी जमा हो चुका है।

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प्रेम नाम का कोई शाश्वत सूत्र नहीं है जो जीवन भर अपनी उपस्थिति का यक़ीन दिलाता रहे।

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पहली नज़र को प्रेम मानकर समर्पण कर देना भी पागलपन है।

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यदि शंकाओं का उचित समाधान नहीं किया गया तो वे विनाश की ओर अग्रसर करती हैं।

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मौन निकटता की भावना लाता है। जैसे ही बात खुलती है, तीसरी उपस्थिति की मानो चेतावनी आती है।

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चेहरे को चेहरा कहने की अपेक्षा उसे अनंत सौंदर्य का दर्शन कहना सत्य के अधिक निकट होगा।

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यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दूसरों में रुचि का कारण मनुष्य की स्वयं में रुचि है। यह संसार स्वार्थ से जुड़ा है। यह ठोस वास्तविकता है लेकिन मनुष्य केवल वास्तविकता के सहारे नहीं जी सकता। आकाश के बिना इसका काम नहीं चल सकता। भले ही कोई आकाश को शून्य स्थान कहे…

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किसी के शब्दों की लय में झूलना एक सुखद, लेकिन अचेतन निर्भरता हो सकती है।

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त्यागने की संतुष्टि और अनुभव की संतुष्टि में बहुत बड़ा अंतर है।

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जो वास्तविक लगता है उसे सत् नहीं माना जा सकता, वास्तविकता और सत् के बीच बहुत अंतर है।

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मानव-हृदय की तरह, रेगिस्तान सागर बन जाता है और सागर रेगिस्तान बन जाता है।

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स्त्री-हृदय के मर्मकोष को जाने बिना ही बहुत कुछ कहा गया है।

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क्या जिसे हम क्षितिज कहते हैं, वह वास्तविकता है? या हम ऐसा कह रहे हैं? लेकिन हम अनंत को नहीं देख सकते, इसलिए हम ऐसी काल्पनिक सीमाओं को स्वीकार कर लेते हैं।

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जितना आप प्रकट होते हैं और जहाँ आप प्रकट होते हैं, अपने आप पर उतना ही और केवल वहीं विश्वास करें। जो देखा नहीं जा सकता, फिर भी अस्तित्व में है, सर्वत्र है और शाश्वत है। आख़िरकार हम वही हैं।

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मनुष्य की उपस्थिति में रेगिस्तान आभासी हो जाता है।

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समुद्र विशाल एवं अखंड है। जो ऊपर नहीं दिखता, वह भीतर है।

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मनुष्य अकेला नहीं है, वह समग्र से जुड़ा हुआ है, अनेकों पर उसकी निर्भरता अपरिहार्य है।

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शब्दों के ब्रह्मांड में सोलह-सोलह सूर्य प्रज्वलित रहे हैं। वहाँ कुछ भी बाधित नहीं है, सब कुछ पूर्ण है, प्रचुर है।

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स्त्रियाँ कभी क्रूरता पर नहीं रोतीं। वे दूसरों के दिए दर्द पर नहीं रोतीं। रोने के लिए उनका अपना दर्द ही काफ़ी होता है।

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कई बार बातों से भ्रम पैदा हो जाता है।

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अनिर्वचनीय है वह तो अखंड है। कहे जाने पर तो वह गल जाएगा।

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शरीर अंततः अवास्तविक है।

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सिर्फ़ विश्वास करने से काम नहीं चलता। आश्वस्त भी होना चाहिए—अनुभव से।

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मुग्धता एक भ्रामक तत्त्व है।

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आप जहाँ हैं, वहाँ आप नहीं हैं।

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एक ज़िंदगी किनारे की भी होती है, जो बह जाने वाले को भीगी आँखों से देखती है।

पूर्वकल्पित धारणाओं से किसी को समझना सही नहीं है। सच्ची पहचान उसके आचरण से ही मिल सकती है। लेकिन व्यवहार प्रासंगिक है। क्या यह व्यक्तित्व के सुसंगत पहलुओं का परिचय दे सकता है? अन्यथा व्यवहार भी भ्रामक है। धारणा भी भ्रामक है। अनुभव भी भ्रामक है… तो सच क्या है? लेकिन सत्य भी धारणा ही है, है ना? बिना धारणा के मैं दौड़ नहीं सकता।

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इस संसार में मनुष्य चैन की नींद नहीं सो सकता। कई बार पलकों तक आई नींद भी गायब हो जाती है।

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भय का अनुभव केवल उन्हें ही होगा जिनको विश्वास नहीं है।

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कुछ भी आकस्मिक नहीं है, सब कुछ क्रमिक है।

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प्रत्येक क्षण के पीछे पूरे अतीत का भार है।

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जो रहस्य से घिरा होता है, वह अधिक सुंदर दिखता है।

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स्त्रियों की सुरक्षा का विचार अभी भी पुरुषों के मन से नहीं गया है। यह आपकी स्त्री दयालुता और सुरक्षा में एक इच्छुक आधिपत्य का सुझाव देता है।

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व्यंग्य ख़त्म होते ही शब्द खिलौना बन जाता है।

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समय तो माँगा जा सकता है और ही दिया जा सकता है। यह निराकार, रंगहीन है। यह एक बिंदु से प्रारंभ होकर किसी बिंदु पर समाप्त नहीं हो सकता। वही अमरत्व है। इसे इस तरह बदलना हमारे हाथ में नहीं है। हम इससे तटस्थ रह सकते हैं और केवल वही विनिमय कर सकते हैं जो हमारे अधिकार में है

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ज्ञानी को कहना नहीं पड़ता, लेकिन ज्ञानी को ही कहने की इच्छा होती है।

रोकर दुख कम करना कायरों का काम है। दुख हमारी रीढ़ है।

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शून्य स्थान में ही स्थिरता संभव है।

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