ईश्वर पर उद्धरण
ईश्वर मानवीय कल्पना
या स्मृति का अद्वितीय प्रतिबिंबन है। वह मानव के सुख-दुःख की कथाओं का नायक भी रहा है और अवलंब भी। संकल्पनाओं के लोकतंत्रीकरण के साथ मानव और ईश्वर के संबंध बदले हैं तो ईश्वर से मानव के संबंध और संवाद में भी अंतर आया है। आदिम प्रार्थनाओं से समकालीन कविताओं तक ईश्वर और मानव की इस सहयात्रा की प्रगति को देखा जा सकता है।
प्रत्येक सर्जक या विधाता, जीवन के चाहे जिस क्षेत्र की बात हो—‘विद्रोही’ और ‘स्वीकारवादी’ दोनों साथ ही साथ होता है।
अनुभव करो; किंतु अभिभूत मत हो पड़ो, अन्यथा चल नहीं पाओगे। यदि अभिभूत होना है, तो ईश्वरप्रेम में हो जाओ।
ईश्वर जीवन है, सत्य है, प्रकाश है। वह प्रेम है, वह सर्वोच्च शिव है—शुभ है।
नए मनुष्य को नीत्शे के मुख से यह सुनकर बड़ी ख़ुशी हुई थी कि ईश्वर की मृत्यु हो गई। किन्तु यह रहस्य अब खुला है कि ईश्वर की मृत्यु; ईश्वर की मृत्यु नहीं थी, उन मूल्यों की मृत्यु थी—जो मनुष्य और ईश्वर के बीच सेतु बनाये हुए थे।
ईश्वर के रूप में राम का परित्याग करके भारत का काम चल सकता है, लेकिन एक संस्कृति-पुरुष के नाते, एक काव्य-प्रतीक के नाते, राम का परित्याग करके कैसे काम चल सकता है? एक नास्तिक, विदेशी समाजशास्त्री जितनी संवेदना राम के चरित्र को दे सकता है; यदि उतनी भी हम देंगे, तो क्या राष्ट्र को तोड़ने के पाप के भागी बनेंगे?
विष्णु पोषण करते हैं इसलिए उनके अवतार राम और कृष्ण की पूजा भी कम नहीं होती।
मैं ईश्वर की पूजा भी केवल सत्य के रूप में करता हूँ।
अगर एक स्त्री अकेली सोती है तो यह सभी पुरुषों के लिए शर्मनाक है। ईश्वर के पास बड़ा दिल है, लेकिन एक ऐसा भी पाप है जिसे वह माफ़ नहीं करता : अगर एक स्त्री किसी पुरुष को बिस्तर पर बुलाती है और वह नहीं जाता।
ख़ुदा बस इतना ही करता है कि देखता रहता है हमें, और मार देता है—जब हम उबाऊ हो जाते हैं। हमको कभी भी, हो सके तो हर समय, उबाऊ होने से बचना चाहिए।
एक संगठित धर्माचार्यों और पुरोहितों की परंपरा; जब भगवान के नाम पर अज्ञान और अंधविश्वास का राज चलाए, और राजनैतिक सत्ता इसमें सहयोग दे क्योंकि उसकी भी इससे रक्षा होती है—तब ये दोनों सत्ताएँ क्रूर और मानव-प्रगति-विरोधी होती हैं।
धर्म कोई भी हो, भगवान या ख़ुदा का निवास काले धन की तिजोरी में और ग़ैरकानूनी शराब की बोतल में रहता है। भगवान क्षीर सागर में नहीं, ग़ैरकानूनी मदिरा सागर में विश्राम करते हैं।
ईश्वर इतना दूर है कि कोई भी उसके बारे में कुछ नहीं कह सकता है और यही कारण है कि ईश्वर के बारे में सभी विचार ग़लत हैं और साथ ही वह इतना क़रीब है कि हम उसे देख ही नहीं सकते, क्योंकि वह व्यक्ति में आधार या रसातल है। आप इसे जो चाहें कह सकते हैं।
स्मृति और पुराण; सीमित बुद्धिवाले व्यक्तियों की रचनाएँ हैं और भ्रम, त्रुटि, प्रमाद, भेद तथा द्वेष भाव से परिपूर्ण हैं। उनके केवल कुछ अंश जिनमें आत्मा की व्यापकता और प्रेम की भावना विद्यमान है—ग्रहण करने योग्य हैं, शेष सबका त्याग कर देना चाहिए। उपनिषद् और गीता सच्चे शास्त्र हैं और राम, कृष्ण, बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर आदि सच्चे अवतार हैं, क्योंकि उनके हृदय आकाश के समान विशाल थे और इन सबमें श्रेष्ठ हैं रामकृष्ण। रामानुज, शंकर इत्यादि संकीर्ण हृदय वाले, केवल पंडित मालूम होते हैं।
विभिन्न धर्म अलग-अलग भाषाएँ हैं, जिनमें प्रत्येक की अपनी सच्चाई हो सकती है और सच्चाई की कमी हो सकती है और ऐसा सोचना मूर्खतापूर्ण है कि ईश्वर किसी प्रकार से परिभाषित है, जिसके बारे में आप कुछ भी कह सकते हैं।
लेखक को अपनी पुस्तक में ब्रह्मांड में ईश्वर की तरह होना चाहिए, जो हर जगह मौजूद है और कहीं भी दिखाई नहीं देता है।
मुझे लगता है कि व्यक्ति ईश्वर से आता है और ईश्वर के पास वापस जाता है, क्योंकि शरीर की कल्पना की जाती है और जन्म होता है, यह बढ़ता है और घटता है, यह मर जाता है और ग़ायब हो जाता है; लेकिन जीवात्मा शरीर और आत्मा का मेल है, जिस तरह एक अच्छी तस्वीर में आकार और विचार का अदृश्य संगम होता है।
ईश्वर संसार को समझाने के लिए स्वप्न में देखा गया एक शब्द मात्र है।
हर आदमी भगवान की छवि में बना है, भले ही उसमें इसे भूलने की प्रवृत्ति हो।
मैं ईसा को महान् कलाकार मानता हूँ; क्योंकि उन्होंने सत्य की उपासना की, उसे ढूँढ़ा और अपने जीवन में उसे प्रगट किया।
हर किसी के अंदर एक गहरी लालसा होती है। हम हमेशा किसी न किसी चीज़ के लिए लालायित रहते हैं और हम मानते हैं कि हम जिस चीज़ के लिए लालायित रहते हैं वह यह या वह है, यह व्यक्ति या वह व्यक्ति, यह चीज़ या वह चीज़ है; लेकिन वास्तव में हम ईश्वर के लिए लालायित रहते हैं, क्योंकि मनुष्य सतत प्रार्थना है। व्यक्ति अपनी लालसा के माध्यम से एक प्रार्थना है।
जब कोई नए ईश्वर की रचना करता है; तो समझ लेना चाहिए कि ईश्वर के रूप में मनुष्य, अपनी एक नई मूर्ति गढ़ रहा है।
हम ईश्वर को देख नहीं सकते। यदि हम ईश्वर को देखने का प्रयत्न करते हैं, तो हम ईश्वर की एक विकृत और भयानक आकृति बना डालते हैं।
जब मनुष्य ईश्वर को देखता है, तो वह उसे मनुष्य रूप में देखता है। इसी प्रकार अन्य प्राणी भी ईश्वर को अपनी-अपनी कल्पना, अपने-अपने रूप के अनुसार देखते हैं।
सुसंगत ढंग से विकसित थियोलॉजी की परिणति सर्वेश्वरवाद में होती है। वैदिक सर्वेश्वरवाद, उपनिषदों के ईश्वरवाद का तर्कसम्मत नतीजा है। सर्वेश्वरवादी रूप में थियोलॉजी अपने को ही खा जाती है, क्योंकि सुसंगत सर्वेश्वरवाद नास्तिकवाद की ओर ले जाता है।
पहले ईश्वर-प्राप्ति करो, उसके उपरांत गृहस्थाश्रम में भी रहा जा सकता है। गार्हस्थ्य जीवन की गंध लग जाने पर ईश्वर प्राप्ति कठिन हो जाती है।
कबीर प्रत्येक लौकिक और अलौकिक वस्तु को जुलाहे की नज़र से देखते हैं। उनके लिए ईश्वर भी एक बुनकर ही है और उसकी यह दुनिया तथा मानव काया—‘झिनी-झिनी बीनी चदरिया है।’
मानव-हृदय पर संगीत का इतना प्रबल पड़ता है कि यह क्षण-भर में चित्त की एकाग्रता ला देता है।
मैं सब धर्मो को सच मानता हूँ। मगर ऐसा एक भी धर्म नहीं है जो संपूर्णता का दावा कर सके। क्योंकि धर्म तो हमें मनुष्य जैसी अपूर्ण सत्ता द्वारा मिलता है, अकेला ईश्वर ही संपूर्ण है। अतएव हिंदू होने के कारण अपने लिए हिंदू धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए भी मैं यह नहीं कह सकता कि हिंदू धर्म सबके लिए सर्वश्रेष्ठ है; और इस बात को तो स्वप्न में भी आशा नहीं रखता कि सारी दुनिया हिंदू धर्म को अपनाए। आपकी भी यदि अपने ग़ैर-ईसाई भाइयों की सेवा करनी है तो आप उनकी सेवा करनी है तो आप उनकी सेवा उन्हें ईसाई बनाकर नहीं, बल्कि उनके धर्म की त्रुटियों को दूर करने में और उसे शुद्ध बनाने में उनकी सहायता करके भी कर सकते हैं।
भगवान में विश्वास करने से इनकार करने में बहुत गर्व शामिल है।
धर्म कुछ संकुचित संप्रदाय नहीं है, केवल बाह्याचार नहीं है। विशाल, व्यापक धर्म है ईश्वरत्व के विषय में हमारी अचल श्रद्धा, पुनर्जन्म में अविरल श्रद्धा, सत्य और अहिंसा में हमारी संपूर्ण श्रद्धा।
ये तीन दुर्लभ हैं और ईश्वर के अनुग्रह से ही प्राप्त होते हैं—मनुष्य जन्म, मोक्ष की इच्छा और महापुरुषों की संगति।
अपने देश के प्रति मेरा जो प्रेम है, उसके कुछ अंश में मैं अपने जन्म के गाँव को प्यार करता हूँ। और मैं अपने देश को प्यार करता हूँ पृथ्वी— जो सारी की सारी मेरा देश है—के प्रति अपने प्रेम के एक अंश में। और मैं पृथ्वी को प्यार करता हूँ अपने सर्वस्व से, क्योंकि वह मानवता का, ईश्वर का, प्रत्यक्ष आत्मा का निवास-स्थान है।
शोषकों के वर्ग-स्वार्थों को जब कोई चुनौती देता है; तो उस वर्ग के प्रवक्त्ता कहते हैं, यह आदमी ख़ुदा से लड़ रहा है। ख़ुदा को प्राइवेट संपत्ति का रक्षक और शोषण का एजेंट तभी से बना लिया गया था—जब मनुष्य ने उसके होने की कल्पना की थी।
सूरसागर में कृष्ण के चरित्र में मनोवैज्ञानिक विश्वसनीयता और रहस्यात्मकता का पुट है, मानवीय चरित्र तथा दिव्य लीला का सामंजस्य है।
माया के परदे को हटाने का ही अर्थ है—सृष्टि के रहस्य को अनावृत्त करना। जो इस प्रकार सृष्टि का अनावरण कर देता है, केवल वही सच्चा अद्वैत्वादी है। अन्य सब केवल मूर्तिपूजक हैं।
सूरदास के काव्य में प्रेम के तीन प्रकार है—मानवीय, ईश्वरीय और प्राकृतिक।
ईश्वर विवरण में है।
ईश्वर और कल्पना एक ही हैं।
मैं उसके साथ छह महीने रहा। उस दिन से—ईश्वर मेरा साक्षी है!—मुझे किसी चीज़ से डरने की ज़रूरत नहीं पड़ी। सिवाय एक चीज़ के कि शैतान या भगवान, उन छह महीनों की स्मृति मेरे मन से मिटा देगा।
ईश्वर अपना रूप पल-पल बदलता रहता है। ख़ुशक़िस्मत हैं वे जो उसे उसके तमाम रूपों में भी चीन्ह सकते हैं।
अशुद्ध आत्मा परमात्मा के दर्शन करने में असमर्थ है।
ऐसा नहीं है कि हमें संदेह है कि भगवान हमारे लिए सबसे अच्छा करेंगे, हम सोच रहे हैं कि सबसे अच्छा कितना दर्दनाक होगा।
मेरा यह विश्वास है कि अगर हम मनुष्य से डरना छोड़ दें और केवल ईश्वर के सत्य की ही शोध करें, तो हम सब ईश्वर के दूत बन सकते हैं।
अपनी कल्पना के इस सत्य की आराधना करते हुए मनुष्य अंतिम शुद्ध सत्य तक पहुँच ही जाता है। और वही परमात्मा है।
मैं स्वर्ग के पार उड़ गया और भगवान को काम करते हुए देखा। मैंने पवित्र कष्ट सही।
वस्तुतः स्त्रियों को अपने इष्ट व्यक्ति (प्रियतम) के प्रवास से उत्पन्न दुःख अत्यंत असह्य होते हैं।
आप परमेश्वर से तब तक प्रेम नहीं करते हैं, जब तक आप किसी व्यक्ति से पूरी तरह प्रेम नहीं करते हैं।
ईश्वर नहीं, बल्कि उसमें विश्वास मायने रखता है।
ईश्वर जब हमारी भाषाएँ नहीं समझता तो हमारी प्रार्थनाएँ क्या समझता होगा? पर अगर ईश्वर इतनी सारी भाषाओं में कवियों की प्रार्थनाएँ समझता है, तो ईश्वर सबसे बड़ा अनुवादक है। उसका अनुवाद अनुभाग, सर्वाधिक संवेदनशील और सबसे एक साथ संवाद जारी रखने में सक्षम एवं सक्रिय है। हो सकता है उसका कोई प्रवक्ता आकर कहे कि ईश्वर पर नहीं, अपनी भाषा पर संदेह करो।
सब धर्म ईश्वर की देन हैं, परंतु उनमें मानव की अपूर्णता की पुट है, क्योंकि वे मनुष्य की बुद्धि और भाषा के माध्यम से गुज़रते हैं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
संबंधित विषय
- अकेले
- अस्तित्व
- अहिंसा
- आत्म
- आत्मा
- आवाज़
- आस्तिक
- ईमानदार
- ईश्वर
- कृपा
- गुरु
- गांधीवाद
- चेतना
- जंगल
- ज्ञान
- जीवन
- दर्दनाक
- देह
- धन
- ध्यान
- नास्तिक
- नींद
- प्रेम
- पुरुष
- प्रार्थना
- पिता
- बच्चे
- ब्रह्म
- बुरा
- भक्ति
- भक्ति काव्य
- भाषा
- मृत्यु
- मदद
- मंदिर
- मनुष्य
- महात्मा गांधी
- रवींद्रनाथ ठाकुर
- राम
- लोक
- विनाश
- विविध
- विश्वास
- शक्ति
- शब्द
- शाश्वत
- संघर्ष
- सच
- स्त्री
- स्वप्न
- संसार