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संगीत पर उद्धरण

रस की सृष्टि करने वाली

सुव्यवस्थित ध्वनि को संगीत कहा जाता है। इसमें प्रायः गायन, वादन और नृत्य तीनों शामिल माने जाते हैं। यह सभी मानव समाजों का एक सार्वभौमिक सांस्कृतिक पहलू है। विभिन्न सभ्यताओं में संगीत की लोकप्रियता के प्रमाण प्रागैतिहासिक काल से ही प्राप्त होने लगते हैं। भर्तृहरि ने साहित्य-संगीत-कला से विहीन व्यक्ति को पूँछ-सींग रहित साक्षात् पशु कहा है। इस चयन में संगीत-कला को विषय बनाती कविताओं को शामिल किया गया है।

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संगीत का विशेष, पनपता-बढ़ता इसलिए है कि स्वर और स्वर के संबंध—जिनसे संगीत बनता है—उनकी उधेड़बुन, हर परंपरा की अपनी होती है।

मुकुंद लाठ
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बंबई के सिनेमा वाले संगीत का सलाद तैयार करने में परम निपुण हैं।

श्रीलाल शुक्ल
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जन-रागिनी और उसकी अंत:श्रद्धा जाने कितनी घटनाओं को अपनी गहराई के जादू से दैवी रूप प्रदान कर देती है, इतिहास विफल रहता है, कला समय का आघात बर्दाश्त नहीं कर पाती और साहित्य कभी-कभी पन्नों में सोया रह जाता है, किन्तु लोक-रागिनी का स्वर आँधी-पानी के बीच समय की उद्दाम-धारा के बहाव के बीच, विस्मृति के कितने अभिचारों के बीच भी शाश्वत बना रहता है और यद्यपि यह नहीं पता चलता कि किस युग से, किस घटना से और किस देश से उसका संबंध है और यह भी नहीं पता चलता कि उसके कितने संस्करण अपने-आप अनजाने कण्ठों द्वारा हो गए हैं, पर उसमें जो सत्य सत्त बनकर खिंच आता है, उसे कोई भी हवा उड़ा नहीं पाती, क्योंकि वह सत्य बहुत भारी होता है।

विद्यानिवास मिश्र
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केवल हिंदुस्तान में दर्शन संगीत के रूप में कहा गया। जब दर्शन और संगीत का जोड़ हो जाए तो मज़ा ही आएगा।

राममनोहर लोहिया
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जो शोर की जगह संगीत, आनंद की जगह ख़ुशी, आत्मा की जगह सोना, रचनात्मक कार्य की जगह व्यापार, और जुनून की जगह मूर्खता चाहता है, उसे इस साधारण दुनिया में कोई घर नहीं मिलता।

हरमन हेस
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हर रचना अपने निजी विन्यास को लेकर व्यक्त होती है, जैसे हर राग-रागिनी का ठाट बदल जाता है, वैसे ही हर चित्र, कविता के सृजन के समय उसका साँचा बदल जाता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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मानव-हृदय पर संगीत का इतना प्रबल पड़ता है कि यह क्षण-भर में चित्त की एकाग्रता ला देता है।

स्वामी विवेकानन्द
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अँधेरे में संगीत दो व्यक्तियों को कितना पास खींच लाता है!

निर्मल वर्मा
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गोष्ठी-समवाय का आयोजन; वेश्या के घर पर अथवा अन्य समान विद्या, बुद्धि, शील, धन वाले समवयस्क मित्रों के घर पर करना चाहिए। सभा में विद्या और कलाओं में निपुण वेश्याओं के साथ वार्तालाप करते हुए, साहित्य, काव्य-समस्या, कथा-आख्यायिक, नृत्य, गीत, कला एवं नाट्यकला आदि विषयों पर चर्चा करनी चाहिए। इस प्रकार समान अनुराग, परिहासपूर्वक मधुर वार्तालाप के साथ गोष्ठी में व्यवहार करते हुए गोष्ठी-समवाय का आनंद लेना चाहिए।

वात्स्यायन
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संगीत प्यार है जिसे एक शब्द की तलाश है।

कोलेट
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चेहरे के समान धुन की भी एक शक्ल होती है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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विचार के साथ और विचार के बिना बोलने की तुलना संगीत को विचार के साथ, और विचार के बिना बजाने से ही करनी चाहिए।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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क्या हमें किसी ऐसे व्यक्ति की कल्पना नहीं करना चाहिए, जिसने कभी संगीत नहीं सुना हो, और जो एक दिन अचानक शोपां की कोई अंतर्गुम्फित रचना सुने और यह मान बैठे कि यह एक ऐसी गुप्त भाषा है, जिसके अर्थों को दुनिया उससे छुपाए रखना चाहती है?

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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मैंने तस्वीर में रंग भरे और रंगों में लय के साथ संगीत झंकृत होने लगा। हाँ, मैंने देखा था कि मैंने तस्वीर में रंग ही भरे थे।

एडवर्ड मुंक
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हल्ली नृत्य, गायन, रासलीला आदि देखने से, राग से चंचल एवं अश्रुपूर्ण नेत्रों से चंद्रमंडल को देखने से रति में वृद्धि होती है।

वात्स्यायन
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अकारण और अंतहीन : संगीत, लय और नृत्य।

जूलिया क्रिस्तेवा
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कविता का संगीत शब्द-ध्वनि का संगीत नहीं है, अर्थ-संकेत (इसे रीतिकालीन ‘अर्थ-संकेत’ के अर्थ में ग्रहण नहीं किया जाए) और अर्थ-विस्तार का संगीत है।

राजकमल चौधरी
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संध्या के समय प्रदोषकाल में संगीत का आयोजन उपयुक्त होता है। अतः नागरक को संगीत-गोष्ठी में सम्मिलित होकर संगीत का आनंद लेना चाहिए। तत्पश्चात् सुसज्जित तथा सुगंधित धूपादि से सुवासित, वासगृह में अपने सहायकों के साथ शय्या पर बैठकर अभिसारिका (प्रेमिका) की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

वात्स्यायन
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संगीत में जीवनकाल की कोई सीमा नहीं है।

नदीन गोर्डिमर
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साहित्य और संगीतशास्त्र तथा कला से जो मनुष्य हीन है—वह पूँछ और सींगरहित पशु है।

भर्तृहरि
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धुन का भाषा से मेल होता है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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संगीत के महत्त्व को अधिसंख्य प्रेक्षक नहीं समझते। यह एक दुःखद स्थिति है।

ऋत्विक घटक
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किसी शिल्पकार्य, संगीत और किसी अन्य विषय में प्रवीणता तब तक नहीं होती और हो सकती है, जबतक इंद्रियों की अनेक नित्य एवं सहज क्रियाओं में कुछ बदलाव किया जाए।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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हिंदू संगीत स्वानुभूतिपरक, आध्यात्मिक तथा व्यक्ति कला है, जिसका लक्ष्य वाद्यवृंद की प्रतिभा प्रदर्शित करना नहीं, बल्कि परम-आत्मा के साथ अपना मेल बिठाना है।

परमहंस योगानंद
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काव्य एक बहुत ही व्यापक कला है। जिस प्रकार मूर्त विधान के लिए कविता चित्र विद्या की प्रणाली का अनुसरण करती है, उसी प्रकार नादसौष्ठव के लिए वह संगीत का कुछ-कुछ सहारा लेती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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संगीत सर्वोत्तम कला है और जो उसे समझते हैं, उनके लिए वह सर्वोत्तम उपासना भी है।

स्वामी विवेकानन्द
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वीणा तो देखी जा सकती है किंतु सुर को नहीं देखा जा सकता है; किंतु उस सुर से यह पहचाना जा सकता है कि वीणा बज रही है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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जिस प्रकार हर रंग और रेखा चित्र नहीं है, हर ध्वनि संगीत नहीं है, शरीर की हर भाव-भंगिमा नृत्य नहीं है, वस्तु की हर आकृति शिल्प नहीं है, हर शब्द साहित्य नहीं है—उसी प्रकार हर ध्वनि, हर मुद्रा, हर रंग रेखा और हर आकृति से प्राप्त होने वाला आनन्द कला का आनन्द नहीं है।

विजयदान देथा
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मानव जाति के विकास क्रम में एक स्थिति ऐसी भी थी जब उसके सामूहिक गान में कविता, नृत्य, संगीत—तीनों सम्मिश्रित थे।

विजयदान देथा
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जितने भी अधिक से अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य होते हैं वे सब अनायास ही नम्रतापूर्वक और बिना किसी आडंबर के हुआ करते हैं। तो हल चलाने का कार्य और इमारत बनाने या पशु चराने या सोचने के कार्य ही वर्दी पहनकर, दीपों की चमक-दमक में और तोपों की गर्जन के बीच किए जा सकते हैं। इसके विपरीत दीपों की जगमगाहट, तोपों की गड़गड़ाहट, संगीत, वर्दी, सफ़ाई और चमक-दमक यह प्रकट करते हैं कि उनके बीच जो कुछ भी हो रहा है वह सब महत्तवहीन है। महान और सच्चे कार्य सदा सरल और विनम्र होते हैं।

लियो टॉल्स्टॉय
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धूल चाटने वाले लोग संगीतशास्त्र की रचना नहीं कर सकते, वे गणित के फेर में नहीं पड़ सकते और उन्हें दर्शनों की बात नहीं सूझ सकती।

गणेश शंकर विद्यार्थी
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हिंदी के भक्तिकाव्य में काव्य और संगीत का जैसा समन्वित स्वरूप प्रकट हुआ है, वैसा अन्यत्र अनुपलब्ध है।

मैनेजर पांडेय
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संगीत, कथा-वार्त्ता, चित्रकला, नृत्य, नाटक, सिनेमा आदि ललित-कलाएँ यदि उचित सीमा में रहें तो वे जन-समाज के निर्दोष मनोरंजन, ज्ञान-प्राप्ति तथा भावना–विकास के साधन हो सकती है।

महात्मा गांधी
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कल्पना गीत गाती है और उस गीत से प्राण-वीणा में नृत्य छंद बज उठता है।

नलिनीबाला देवी
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जिस तरह से शब्द, सुर और लय वैसे ही रंग, रेखा और रूप––तीनो मिलकर एक होना चाहते हैं। जो रूपांकन में दक्ष होता है; वह इन तीनों को एक करने का उपाय जानता है, किंतु जो इसमें ज़रा भी दक्ष नहीं है; वह तीनों को अलग-अलग रखता है, नहीं तो इन्हें बड़ी खींच-तान के बाद इस तरह मिलाता है, जिससे इनकी अपनी श्री, अपना छंद-पर्यंत नष्ट होकर एक भद्दी वस्तुओं की समष्टि बन जाति है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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विफलता को लेकर ही इस जीवन-संगीत की मैंने रचना की है। दोनों आँखों से आँसू की बूंदें टपकती हैं। इस विशाल विश्व में केवल नयनाश्रुओं से ही मेरा सागर-तट भर गया।

नलिनीबाला देवी
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जिनके पास विद्या, तप, दान, शील, गुण और धर्म नहीं है, वे इस नश्वर-संसार में मनुष्यों के रूप में भार होकर, विचरण करते हुए साक्षात् पशु ही हैं।

भर्तृहरि
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पीते वक़्त ख़्वाहिश होती है अच्छा संगीत सुनूँ, और संगीत के इर्द-गिर्द ख़ामोशी हो।

कृष्ण बलदेव वैद
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अंधविश्वास जीवन की कविता है।

जोहान वोल्फ़गैंग वॉन गोएथे
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भारतीय संगीत के इतिहास में भक्ति के आने के साथ भजन और कीर्तन से एक नए संगीत की शुरुआत हुई।

नामवर सिंह
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जनसंचार के माध्यमों के तीन मुख्य प्रकार्य हैं—मनोरंजन, सूचना और शिक्षा। तीनों संस्कृति को प्रभावित करते हैं।

श्यामाचरण दुबे
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कल्पना, मनुष्य-प्राण की मानसी वीणा का चिरंतन संगीत है।

नलिनीबाला देवी
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यह संगीत ही है जो दिल का विस्तार करता है और श्रोता को परमानंद और भय से शांत कर देता है।

कार्सन मैक्कुलर्स
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गाय की कुरबानी फ़र्ज़ नहीं है, यह समझकर मुसलमान गाय की कुरबानी बंद कर दे तो यह उनका परम सत्कृत्य समझा जाएगा।

महात्मा गांधी
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कविता, संगीत, चित्रकला जहाँ पर स्वतः स्फूर्त नहीं होती हैं, किंतु यंत्रशक्ति का परिचय देते हुए, विस्मय का उद्रेक करती हैं, वहाँ पर मन अभिभूत हो जाता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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संगीत और काव्य का सम्मिलित स्वरूप कलाओं के लिए हितकर अवश्य हुआ है, किंतु उसका सीमा से अधिक आग्रह करने से उससे हानि भी हुई है।

श्यामसुंदर दास
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संगीतकार, लेखक या चित्रकार का समय, ऐतिहासिक समय से बहुत अलग होता है।

यू. आर. अनंतमूर्ति
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वाद्य-संगीत कविता के अभाव की पराकाष्ठा है तो आधुनिक गद्य-गीत, संगीत के अभाव का परला किनारा है।

विजयदान देथा
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नूपुर पदचाप के छंद से मधुर बजता है, पालतू कुत्ता जब उसे लेकर खींच-तान करता है, तब वह विरक्ति उत्पन्न करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करता।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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कई शिक्षक ध्वनि को सिर्फ़ लय या ताल से जोड़ते हैं, अतः वे कविता को संगीत के साथ गवाकर पढ़ाते हैं। ऐसा करने से कविता कुछ सजीव हो जाती है। पर आधुनिक कविता प्रायः गेय नहीं होती। उसे पढ़ने या पढ़ाने के लिए इस बात पर ध्यान देना उपयोगी होगा कि ध्वनि हर शब्द में होती है।

कृष्ण कुमार

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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