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विवाह पर उद्धरण

स्त्री-पुरुष युगल को

दांपत्य सूत्र में बाँधने की विधि को विवाह कहा जाता है। यह सामाजिक, धार्मिक और वैधानिक—तीनों ही शर्तों की पूर्ति की इच्छा रखता है। हिंदू धर्म में इसे सोलह संस्कारों में से एक माना गया है। इस चयन में विवाह को विषय या प्रसंग के रूप में इस्तेमाल करती कविताओं को शामिल किया गया है।

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मुझे लगता है कि एक लड़की के लिए किसी ऐसे व्यक्ति से शादी करना आसान होगा जिसे वह नहीं जानती, क्योंकि जितना अधिक आप पुरुषों को जानोगे; उनसे प्यार करना उतना ही कठिन होगा।

ओरहान पामुक
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प्रेम-मिलन में वर और कन्या दोनों ही परस्पर के पूरक हैं। तुलना की तो वहाँ पर बात ही नहीं उठती, वहाँ दोनों ही—'वागर्थाविव सम्स्पृक्तौ"—वाणी और अर्थ की तरह मिले हुए हैं।

आचार्य क्षितिमोहन सेन
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गृहिणी का सद्गुण ही गृहस्थ की मांगलिक शोभा है और सुपुत्र उसका आभूषण।

तिरुवल्लुवर
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गृहिणी सद्गुण संपन्न है तो गृहस्थ को किस वस्तु का अभाव? और यदि वैसी नहीं है तो उसके पास है ही क्या?

तिरुवल्लुवर
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एक सफल विवाह में ऐसा कभी नहीं होता कि सभी अधिकार सिर्फ़ एक तरफ़ हैं, और सारी आज्ञाकारिता दूसरी तरफ। अगर कहीं ऐसा है तो वह एक असफल विवाह है और उससे दोनों को ही मुक्ति मिलनी चाहिए।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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तीन रात तक संयम धारण करने के बाद; पति को एकांत स्थान केलिगृह में पत्नी के पास जाकर, मीठी-मीठी मनोरञ्जक बातें और स्पर्श आदि मृदु उपचारों से नवविवाहिता वधू में विश्वास पैदा करने और उसकी लज्जा दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। उस समय संयत भाव से कोमलता एवं मधुरता का व्यवहार करने की आवश्यकता होती है, ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं करनी चाहिए। ज़ोर-ज़बर्दस्ती करने से कटुता बढ़ती है और दाम्पत्य जीवन दुःखमय बन जाता है। इसलिए पत्नी की इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं करना चाहिए।

वात्स्यायन
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छाया का कार्य आधार में अपने आपको इस प्रकार मिला देना है, जिसमें वह उसी के समान जान पड़े और संगिनी का अपने सहयोगी की प्रत्येक त्रुटि को पूर्ण कर, उसके जीवन को अधिक से अधिक पूर्ण बनाना।

महादेवी वर्मा
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जब किसी महिला को अहसास होता है कि वह सचमुच प्रेम पाने की हक़दार है, तो वह एक दरवाज़ा खोल रही है; ताकि पुरुष उसे प्रेम दे सके, लेकिन जब विवाह में दस बरस तक महिला ही प्रेम देती रहती है और उसे बदले में कुछ नहीं मिलता, तब जाकर उसे यह अहसास होता है कि वह ज़्यादा की हक़दार है।

जॉन ग्रे
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प्रत्येक भारतीय पुरुष; चाहे वह जितना सुशिक्षित हो, अपने पुराने संस्कारों से इतना दूर नहीं हो सका है कि अपनी पत्नी को अपनी प्रदर्शिनी समझे। उसकी विद्या, उसकी बुद्धि, उसका कला-कौशल और उसका सौंदर्य—सब उसकी आत्मश्लाघा के साधन मात्र हैं।

महादेवी वर्मा
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आजकल तलाक़ बहुत आम हैं, इसलिए यह और भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि पुरुष आश्वासन देने का ध्यान रखें। जिस तरह छोटे परिवर्तन करके; पुरुष महिलाओं का समर्थन कर सकते हैं, उसी तरह महिलाओं को भी करना चाहिए।

जॉन ग्रे
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जो नायक नवविवाहिता कन्या को अत्यंत लज्जावती समझकर उसकी उपेक्षा करता है, स्त्रियों के अभिप्राय को समझने वाला वह पुरुष—पशुओं के समान तिरस्कृत होता है।

वात्स्यायन
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मैं ख़ुद इस बात का घोर समर्थक हूँ कि विवाह के बाद सभी हितों का मिलन ही एक आदर्श स्थिति है, लेकिन हितों के मिलन का अर्थ यह नहीं हुआ कि जो मेरा है, वह तुम्हारा है; पर जो तुम्हारा है, वह सिर्फ़ तुम्हारा है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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पहले ईश्वर-प्राप्ति करो, उसके उपरांत गृहस्थाश्रम में भी रहा जा सकता है। गार्हस्थ्य जीवन की गंध लग जाने पर ईश्वर प्राप्ति कठिन हो जाती है।

राम कृष्ण परमहंस
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युवती कन्या; वर-प्राप्ति के लिए उपाय करती हुई जिस नायक को आश्रय के योग्य, रतिसुख का हेतु, अपने अनुकूल एवं वशीभूत समझे—उस नायक का वरण कर ले।

वात्स्यायन
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जहाँ तक सामाजिक प्राणी का संबंध है; स्त्री उतनी ही अधिक अधिकार-संपन्न है, जितना पुरुष—चाहे वह अपने अधिकारों का उपयोग करे या करे।

महादेवी वर्मा
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जब नायक को यह विश्वास हो जाए कि मनोभिलाषित कन्या मुझे चाहती है, तो वह उस कन्या की प्राप्ति के लिए उपाए करे।

वात्स्यायन
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चुम्बन की बाज़ी में यदि स्त्री हार जाए; तो वह सिसकती हुई हाथ को इधर-उधर कंपित करे, नायक को ठेलकर दूर कर दे, दाँतों से काटे और करवट बदल ले। यदि नायक ज़बरदस्ती अपनी ओर करना चाहे, तो उससे विवाद करे और कहे कि फिर से बाज़ी लगा लो और उसमें भी यदि हार जाए, तो दुगुना हाथ-पैर पटके और रोने लगे। इस प्रकार के चुम्बन-कलह से रागोद्दीपन होता है।

वात्स्यायन
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यह सब संसार असार क्षणिक है। पक्षी आँगन में दाना चुगने के लिए आते हैं और चुग कर उड़ जाते हैं।लड़कियाँ घरौंदे बनाती हैं, गुड्डों-गुड़ियों के विवाह करती हैं और फिर सब खिलौनों को तोड़ डालती हैं। यात्री आकर किसी वृक्ष के नीचे रात को विश्राम लेते हैं और प्रातःकाल होते ही उठकर चले जाते हैं। मार्ग में बहुत से लोगों से भेंट होती है परंतु इन लोगों से कोई मोह या संबंध नहीं जोड़ता। इसी प्रकार जब तक इस संसार में प्रारब्धानुसार जीवित रहता है तब तक उदासीन अलिप्त रहना चाहिए।

संत एकनाथ
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चुम्बन की बाज़ी में नायक के विश्वास के साथ असावधान हो जाने पर, मौक़ा पाकर नायिका नायक के अधर को पकड़कर, अपने दाँतों के अंदर दबोच कर अपनी जीत पर हँसे, ज़ोर से चिल्लाए, धमकाए, ताना मारे, व्यंग्य कसे और नाचने लगे तथा भौहों को नचाती, चंचल नेत्रों से हँसती हुई, मुख से बार-बार, तरह-तरह के व्यंग्य वचन बोले। इस प्रकार के प्रणय-कलह से कामेच्छा जागृत होती है और अनुराग में वृद्धि होती है।

वात्स्यायन
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हमारे अतीत की भावनाएँ केवल तभी नहीं उभरती हैं, जब हमारा प्रेम प्रसंग शुरू होता है। यह बाक़ी समय भी होता है, जब हम सचमुच अच्छा, ख़ुश या प्रेमपूर्ण महसूस कर रहे हों। इन सकारात्मक समय में दंपति बिना कारण लड़ते दिख सकते हैं, जबकि उन्हें ख़ुश होना चाहिए।

जॉन ग्रे
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जब ग़लतफ़हमियाँ पैदा हों, तो याद रखें कि हम अलग भाषाएँ बोलते हैं; पार्टनर की बात का असली अर्थ क्या है या वह सचमुच क्या कहना चाहता है, उसका अनुवाद करने में थोड़ा समय लगाएँ। इसके लिए निश्चित रूप से अभ्यास की ज़रूरत होती है, लेकिन यह इतना महत्त्वपूर्ण काम है कि आपको इसे करना चाहिए।

जॉन ग्रे
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आधुनिक सभ्यता और शिक्षा ने मानवीय विकास में जो भूमिका निभाई है; वह तब तक अधूरी और अपूर्ण ही रहेगी, जब तक कि ताक़त के क़ानून वाली पुरानी सभ्यता के गढ़ पर हमला नहीं किया जाता। और वह गढ़—गृहस्थ और दांपत्य-जीवन है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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दंपतियों को बहस नहीं करनी चाहिए। जब दो लोगों में सेक्स का संबंध हो, तो बहस या वाद-विवाद करते समय विरक्त और तटस्थ रहना ज़्यादा आसान होता है। लेकिन पति-पत्नी भावनात्मक रूप से और ख़ास तौर पर शारीरिक रूप से जुड़े होते हैं, इसलिए जब वे बहस करते हैं, तो वे आसानी से चीज़ों को बहुत व्यक्तिगत रूप से ले सकते हैं और लेते भी हैं। बुनियादी सलाह : कभी बहस मत करो। इसकी बजाय किसी भी मसले के सभी पहलुओं पर चर्चा करें। आप जो चाहते हैं, उसके लिए ज़ोर दें, लेकिन कभी बहस करें।

जॉन ग्रे
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हमें उन पुरुषों की भावनाओं का सुराग़ भी मिल जाता है, जो स्त्रियों की समान स्वतंत्रता के नाम से चिढ़ते हैं। मेरे ख़्याल में उन्हें डर लगता है, इस बात से नहीं कि स्त्रियाँ विवाह से इन्कार कर देंगी—क्योंकि मुझे नहीं लगता कोई सचमुच ऐसा सोचेगा, बल्कि इस बात से कि वे चाहेंगी कि विवाह बराबरी की शर्तों पर तय हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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मैंने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी, मुझे उस स्वतंत्रता के बिना कष्ट हुआ; भले ही मैं एक प्रेमपूर्ण विवाह में थी।

ऐनी एरनॉ
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विपत्तिकाल में, पीड़ा के अवसरों पर, युद्धों में, स्वयंवर में, यज्ञ में अथवा विवाह के अवसर पर स्त्रियों का दिखाई देना उनके लिए दोष की बात नहीं है।

वाल्मीकि
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घर-गृहस्थी के प्रति धार्मिक कट्टरता जैसा जुड़ाव, दरअसल बाहरी दुनिया के प्रति शत्रुता का ही दूसरा नाम है—और अनजाने में ही इससे बाहरी दुनिया के नुक़सान के साथ-साथ, घर-गृहस्थी का और उन उद्देश्यों का—जिनके लिए हम जी रहे होते हैं—नुक़सान होने लगता है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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प्रणय-कलह के समय नायक को युक्त्तिपूर्वक प्यार भरी मीठी-मीठी बातों से, अथवा नायिका के पैरों पर गिरकर और अनुनय-विनय के द्वारा, उसे अपने अनुकूल करके प्रसन्नचित होकर शय्या पर बिठाना चाहिए।

वात्स्यायन
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स्त्री-पुरुष का संभोगसुख, लज्जा और लोकभय से परतंत्र होता है अर्थात् उनमें लोक-लज्जा और लोक-भय होता है, वे स्वतंत्र रूप से संभोग में प्रवृत्त नहीं होते। अतः उसके लिए उपायों की अपेक्षा होती है और उन उपायों का ज्ञान शास्त्र से होता है।

वात्स्यायन
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स्त्रियों के प्रति किसी पुरुष के दृष्टिकोण से यह बात भी पता चलती है कि ख़ुद उसकी पत्नी कैसी है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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जिस संबंध से पति-पत्नी दोनों को समान सुख की अनुभूति हो; परस्पर खेल, हँसी-विनोद करे, एक-दूसरे को बराबर समझें—वह संबंध विवाह करने योग्य होता है।

वात्स्यायन
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प्रणय बस युवाओं की कल्पना को भड़काने के काम आते हैं, उनसे सत्य में कुछ भी बढ़ावा नहीं होता है

केट शोपैं
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अगर वह शादी कर रहा है, तब वह दिलचस्प नहीं रह गया है।

कोलेट
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शादी पृथ्वी पर सबसे अधिक शोचनीय दृश्य है।

केट शोपैं
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स्वप्न जीवन की मधुरता है तथा प्रणय उसकी शक्ति, परंतु उनको यथार्थ समझ लेना जीवन की संजीवनी जड़ी है—यह भूलना चाहिए।

महादेवी वर्मा
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दाम्पत्य जीवन में संभोग-सुख को आनंदमय बनाने के लिए चौंसठ कलाओं का ज्ञान आवश्यक है।

वात्स्यायन
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विवाह दैनंदिन संसार की भूमिका है, वह नियमबद्ध समाज का अंग हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जिस कन्या में मन और आँखें लग जाएँ, उस कन्या से विवाह करने पर ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है। उससे इतर कन्याओं की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए।

वात्स्यायन
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यज्ञ, विवाह, संकट और वन में स्त्रियों का देखना है |

भास
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बाल-विवाह का समर्थन किसी भी शास्त्र में नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द
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नई-नवेली वधू की चित्तवृत्ति को जानकर पति समुचित उपायों से उसका विश्वास प्राप्त कर लेता है, तो वह बाला पति पर अनुरक्त हो जाती है और पति के प्रति विश्वस्त हो जाती है।

वात्स्यायन
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स्वाभाविक रूप से विवाह में किसी व्यक्ति के साहचर्य की इच्छा प्रधान होनी चाहिए, आर्थिक कठिनाइयों की विवशता नहीं।

महादेवी वर्मा
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बेटा-बेटी किसी के भी हो, विवाह के नाम से मैं घृणा करता हूँ। अहमकों! तुम क्या यह कहना चाहते हो कि मैं किसी को बंधन में डालने में सहायता करूँ? यदि मेरे भाई-बहन विवाह कर ले, तो मैं उसे दूर कर दूँगा। इस संबंध में मैं दृढ़संकल्प हूँ।

स्वामी विवेकानन्द
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जिस प्रकार 'राजा है' अर्थात् राजा की विद्यमानता को जानकर दूर रहने वाली प्रजा, राजा के अनुशासन का उल्लंघन नहीं करती, उसी प्रकार कामशास्त्र को बिना पढ़े ही लोग कामशास्त्र के अनुशासन का पालन करते हैं।

वात्स्यायन
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ज़्यादातर दंपति किसी चीज़ के बारे में बहस शुरू करते हैं, और पाँच मिनट के भीतर वे इस बारे में बहस करने लगते हैं कि वे किस तरह से बहस कर रहे हैं।

जॉन ग्रे
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जब तक दांपत्य संबंध में पशुत्व देवत्व में घुलकर नहीं आता और देवत्व साकार बनकर नहीं अवतीर्ण होता, तब तक वह अपूर्ण ही रहेगा।

महादेवी वर्मा
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यह सत्य है कि विवाह जैसे उत्तरदायित्व के लिए समाज पुरुषों की भी योग्यता-अयोग्यता की चिंता नहीं करता, परंतु उनके लिए बंधन विनोद का साधन है, जीविका का नहीं।

महादेवी वर्मा
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हम वे पुरुष बन रही हैं, जिनसे हम शादी करना चाहती थीं।

ग्लोरिया स्टाइनम
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हमारे यहाँ लड़के का बाप दाँत निपोरकर, बेशर्मी का संकोच करते हुए लड़की के बाप से कहता है, 'कौन हम माँगते हैं आपसे, जो देंगे अपनी लड़की को ही तो देंगे। हम भी आधुनिक विचारों के हैं। हम भी प्रगतिशील हैं। मगर धर्म थोड़े ही छोड़ा जाता है, बाप-दादों की रीति है।'

हरिशंकर परसाई
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स्त्रियों को विवाह करना ही चाहिए—यह मिथ्या भ्रम है। उसे भी यावज्जीवन ब्रह्मचर्य पालने का अधिकार है।

महात्मा गांधी

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere