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माया पर उद्धरण

‘ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या’—भारतीय

दर्शन में संसार को मिथ्या या माया के रूप में देखा गया है। भक्ति में इसी भावना का प्रसार ‘कबीर माया पापणीं, हरि सूँ करे हराम’ के रूप में हुआ है। माया को अविद्या कहा गया है जो ब्रह्म और जीव को एकमेव नहीं होने देती। माया का सामान्य अर्थ धन-दौलत, भ्रम या इंद्रजाल है। इस चयन में माया और भ्रम के विभिन्न पाठ और प्रसंग देती अभिव्यक्तियों का संकलन किया गया है।

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स्वर्ग-नरक तथा आकाश के परे, राज करने वाले शासकों से संबद्ध अनेक कथाओं अथवा अंधविश्वासों के द्वारा मनुष्य को भुलावे में डालकर, उसे आत्मसमर्पण के लक्ष्य की ओर अग्रसर किया जाता है। इन सब अंधविश्वासों से दूर रहकर, तत्वज्ञानी वासना के त्याग द्वारा जान-बूझकर इस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है।

स्वामी विवेकानन्द
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यदि आध्यात्मिक शिक्षा द्वारा नहीं; तो विज्ञान द्वारा ही सही, मनुष्य को यह दार्शनिक सत्य समझ लेना चाहिए कि भौतिक जगत् नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। उसका ताना-बाना भी केवल भ्रम है, माया है।

परमहंस योगानंद
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माया के परदे को हटाने का ही अर्थ है—सृष्टि के रहस्य को अनावृत्त करना। जो इस प्रकार सृष्टि का अनावरण कर देता है, केवल वही सच्चा अद्वैत्वादी है। अन्य सब केवल मूर्तिपूजक हैं।

परमहंस योगानंद
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हमारे अनुभव में घटमान विश्व केवल हमारी चेतना में अस्तित्ववान है, उस का कोई भौतिक आधार नहीं है।

एम. एन. राय
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जिस प्रकार सिनेमा के चित्र वास्तविक प्रतीत होते हैं; परंतु होते हैं मात्र प्रकाश और छाया के मिले-जुले चित्र, उसी प्रकार सृष्टि की विविधता भी एक भ्रम मात्र है।

परमहंस योगानंद
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हम भारतीयों ने बहुत-से भ्रम पाल रखे हैं, जैसे यही कि त्याग और सेवा जैसे आदर्श हमारी बपौती हों—त्याग और सेवा हर जाति के आदर्श रहे हैं।

हरिशंकर परसाई
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जब मनुष्य संसार की समस्त वासनाओं में; यहाँ तक कि प्यार में भी निराश हो जाता है, तभी क्षण भर के लिए यह भाव स्फुरित होता है कि यह संसार भी कैसा भ्रम है, कैसा स्वप्न के समान है।

स्वामी विवेकानन्द
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माया या अविद्या को बौद्धिक विश्वास या विश्लेषण के द्वारा कभी नष्ट नहीं किया जा सकता, केवल निर्विकल्प समाधि की आंतरिक स्थिति की प्राप्ति से ही उसे नष्ट किया जा सकता है।

परमहंस योगानंद
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आत्मभ्रांति के समान कोई रोग नहीं है। सद्‌गुरु के समान कोई वैद्य नहीं है। सद्‌गुरु की आज्ञा के समान कोई उपचार नहीं हैं। विचार और ध्यान के समान कोई औषधि नहीं है।

श्रीमद् राजचंद्र
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‘कर्तव्य’ में मैं विश्वासी नहीं हूँ, कर्तव्य तो संसारियों के लिए एक अभिशाप है—संन्यासियों का कोई कर्तव्य नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द
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विश्वास का अपना तर्क हाता है, और धार्मिक दर्शन की आलोचना का काम उस तर्क की भ्रामकता का स्पष्ट कर देना है।

एम. एन. राय
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शांति से क्रोष को जीतो, नम्रता से अभिमान को जीतो, सरलता से माया का नाश करो और संतोष से लोभ को वश में करो।

महावीर
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माया तभी विशाल रूप धारण करती है, जब हम उसकी ओर समस्त मन-प्राण से ताकते रहते हैं—चाहे इस एकाग्रता के पीछे क्रोध हो या अनुराग।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जो केवल अपने हृदय के द्वारा परिचालित होते हैं, उन्हें अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं, क्योंकि प्रायः ही उनके भ्रम में पड़ने की संभावना रहती है।

स्वामी विवेकानन्द
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जिसे हम साधारणतः जीवन कहते हैं, वह तो असल जीवन की भ्रूण-अवस्था मात्र है।

स्वामी विवेकानन्द
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इस संसार में मृत्यु रात-दिन गर्व से मस्तक ऊँचा किए घूम रही है, पर साथ ही हम सोचते हैं कि हम सदा जीवित रहेंगे।

स्वामी विवेकानन्द
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माया को 'भ्रम' के अर्थ में लेना ठीक नहीं।

स्वामी विवेकानन्द
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प्रायः लोग भ्रांतिवश माया को ‘भ्रम’ कहकर उसकी व्याख्या करते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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सूर्य के उदय-अस्त होने से दिन-दिन आयुष्य घटती जाती है, अनेक कार्यों के भार के कारण व्यापार में व्यतीत काल जाना नहीं जाता; और जन्म, वृद्धापन, विपत्ति तथा मृत्यु देखकर भी त्रास नहीं होता, इससे यह निश्चित हुआ कि मोहमयी प्रमादरूपी मदिरा पीकर जगत् मतवाला हो रहा है।

भर्तृहरि
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जैसे यह दृश्यमान भौतिक जगत्; सूक्ष्म जगत् की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र है, उसी प्रकार भौतिक शक्तियाँ भी सूक्ष्म शक्तियों की स्थूल अभिव्यक्ति मात्र हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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इस संसार की गति के तथ्यात्मक वर्णन का नाम माया है।

स्वामी विवेकानन्द
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जिस प्रकार इन्द्रियों का प्राकृतिक बोध—ज्ञान नहीं—बल्कि एक भ्रान्त प्रतीति है—उसी प्रकार इंद्रियों द्वारा अनुभूत प्रत्येक आनन्द वास्तविक और सच्चा आनन्द नहीं है।

विजयदान देथा
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संसार में बहुत अधिक समय तक लिप्त रहने से दुर्बुद्धि का होना स्वाभाविक है।

स्वामी विवेकानन्द
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दुनिया एक रहस्यमय और उलझन भरी जगह है। अगर तुम उलझन में नहीं पड़ना चाहते, तो तुम बस किसी और के दिमाग़ की नक़्ल बन जाते हो।

नोम चोम्स्की
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हमारा अतीत एक व्याख्या है, और हमारा भविष्य एक भ्रम है।

शम्स तबरेज़ी
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हर वस्तु माया और सत्य के द्वित्व से पूर्ण है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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अपने ही मन को फँसानेवाले रंगीन कुहरीले सपनों या भावों या विचारों की महान परंपरा पहले भी थी और आज भी है; किंतु अपना ही मन सोद्देश्य रूप से फँस जाता है और वे भी सोद्देश्य रूप से फँसा लेते हैं—मानो दोनों, फँसने-फँसाने के लिए तैयार बैठे हों।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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हे मन! मायाजाल में मत फँसो, काल अब ग्रसना ही चाहता है।

संत तुकाराम
  • संबंधित विषय : समय
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यथार्थ और भ्रम के अपने-अपने आकर्षण हैं। यथार्थ को जानते हुए भ्रम में रहना एक तीसरा रास्ता है, और उसके आकर्षण कम नहीं।

कृष्ण कुमार
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माया कोई विशेष सिद्धांत नहीं है। वह तो यह संसार जैसा है, केवल उसका तथ्यात्मक कथन है।

स्वामी विवेकानन्द
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जिन्हें शरीर होने पर भी, शरीर-रहित दशा वर्तती है, उन ज्ञानी के चरणों में अगणित बार वंदन हो।

श्रीमद् राजचंद्र
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जिन्होंने अपने अंतर में सांसरिक मोह को त्याग दिया है, वे सतिगुरु से मिलकर मुक्त हो गए।

गुरु नानक
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जब ज्ञान के अधिकारी अपने स्वरूप को संशय भ्रम के अभावपूर्वक अपरोक्ष जानता है, तब संदेह ही (शरीर सहित ही) उस अधिकारी को भ्रम रूप बंधन की निवृत्ति रूप जीवनमुक्ति समीप ही है।

श्री पीताम्बर पंडित
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जो अमृत रूपी मदिरा का व्यापारी होता है, वह तुच्छ सांसारिक मद से क्यों प्रेम करे?

गुरु नानक
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मनुष्य का प्रकृत स्वरुप एक ही है, वह अनंत और सर्वव्यापी है और यह प्रतीभासिक जीव, मनुष्य के इस वास्तविक स्वरुप का एक सीमाबद्ध भाव मात्र है।

स्वामी विवेकानन्द
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प्रभु ने कहीं पुरुष बना दिए तो कहीं नारियाँ—ये सारे भी छल रूप हैं, जो इस पति-पत्नी वाले संबंध के छल से भ्रमित होकर नष्ट हो रहें।

गुरु नानक
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इस जगत में कहीं इन राजाओं के शामियाने महल हैं, ये भी छल रूप हैं और इनमें रहने वाला राजा भी छल ही है।

गुरु नानक
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जब सारा जगत झूठन समान अथवा स्वप्न समान जानने में आए, तब ज्ञानीपना प्रगट हुआ—ऐसा कहा जाता है। इनके अतिरिक्त सभी को कहने मात्र का ज्ञान है।

श्रीमद् राजचंद्र
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माया से द्वैत भाव; जगत् के चित्त में आकर बस जाता है। काम, क्रोध, अहंकार से होता है विनाश।

गुरु नानक
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कोई नाम रूप को सत्य मानकर उसका विलय कहते हैं, परंतु सत्य का विलय हो नहीं सकता है। अतः माया से कल्पित नाम रूप का विलय होता है।

श्री पीताम्बर पंडित
  • संबंधित विषय : सच
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जितना भी मोह, प्रेम एवं स्वाद है—ये सभी हमारे मन को लगे हुए कालिख के केवल दाग़ ही हैं।

गुरु नानक
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ये धारणाएँ कि मैं पुरुष हूँ, स्त्री हूँ, रोगी हूँ, स्वस्थ हूँ, बलवान हूँ, निर्बल हूँ अथवा वह कि मैं घृणा करता हूँ, मैं प्रेम करता हूँ, अथवा मेरे पास इतनी शक्ति है—सब भ्रम मात्र है। इनको छोड़ो।

स्वामी विवेकानन्द
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ये सारा जगत है तो छल, पर यही छल सभी जीवों को प्यारा लग रहा है, शहद की तरह मीठा लग रहा है, इस तरह यह छल सारे जीवों को डुबो रहा है।

गुरु नानक
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सभी वहम ख़ूबसूरत नहीं होते।

कृष्ण बलदेव वैद

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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