जो मूल वादक की कृति की लय और छंद को बरक़रार रखते हुए; उसे एक भाषा से दूसरी भाषा में ले आए, वही है अनुवादक!
अर्थ का अनुवाद किया जा सकता है। शब्द का अनुवाद नहीं किया जा सकता है… संक्षेप में—शब्द का अनुवाद कर सकते हैं, उसकी ध्वनि का नहीं।
ईश्वर जब हमारी भाषाएँ नहीं समझता तो हमारी प्रार्थनाएँ क्या समझता होगा? पर अगर ईश्वर इतनी सारी भाषाओं में कवियों की प्रार्थनाएँ समझता है, तो ईश्वर सबसे बड़ा अनुवादक है। उसका अनुवाद अनुभाग, सर्वाधिक संवेदनशील और सबसे एक साथ संवाद जारी रखने में सक्षम एवं सक्रिय है। हो सकता है उसका कोई प्रवक्ता आकर कहे कि ईश्वर पर नहीं, अपनी भाषा पर संदेह करो।
किसी किताब से प्रेम किए बिना सच्चे अर्थों में उसका अनुवाद संभव नहीं।
बुरे अनुवादों के पीछे जितना हाथ प्रतिभाहीनता का है, उतना ही अनुवादक और पुस्तक के बीच बनने वाले अ-प्रेम के रिश्ते का भी।
एक अनुवादक में प्रेम करने की, करुणा की बहुत क्षमता होनी चाहिए। उसमें प्रेम करने का परिश्रम, धैर्य और समझदारी होनी चाहिए।
बिना एम्पॅथी के एक अनुवाद, किसी किताब के लेखक के सिर को अपने कंधों पर नहीं ढो सकता। वह तब कुली हो सकता है, लेखक का जुड़वाँ नहीं।
अँग्रेज़ी शब्द-समूह का हूबहू हिंदी अनुवाद निरर्थक ही नहीं—विपरीत अर्थ सृजित करनेवाला भी हो सकता है। वास्तव में भाषा का विकास ऐसे कृतिम उपायों से नहीं, संस्कृति और चिंतन के विकास के अनुरूप ही होता है।
अनुवाद में विश्वसनीयता और स्वतंत्रता, पारंपरिक तौर से परस्पर विरोधी प्रवृतियाँ मानी गई हैं।
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जब भाषा अपने निजीपन को खोकर भी; लक्ष्य-भाषा-संस्कृति में अपने स्वभाव-गुणों को क़ायम रखती है, तभी अनुवाद अच्छा कहलाएगा।
अनुवाद के माध्यम से हम भाषाई बंधनों से बाहर निकलते हैं और कई अन्य समुदायों तक पहुँचते हैं।
हमेशा पहले शासित लोगों की भाषा से शासक लोगों की भाषा में अनुवाद होना चाहिए।
लोग मेरी भाषा व वाक्यों पर अचरज जताते हैं, कई बार मेरा एक वाक्य बीस पेज लंबा होता है। मैंने अपनी हंगारी भाषा को इस तरह इस्तेमाल किया है कि उसे लोग ‘क्रास्ज़्नाहोरकाई हंगारी’ कहने लगे हैं। जब कोई इसे अँग्रेज़ी में अनुवाद करता है, तो उसे इसके लिए एक ख़ास किस्म की ‘क्रास्ज़्नाहोरकाई अँग्रेज़ी’ खोजनी पड़ती है।
जब हम किसी दूसरी भाषा की पुस्तक का अनुवाद भी अपनी भाषा में करते हैं, तब भी उसे अपनी भाषा की प्रकृति के अनुकूल बना लेते हैं।
मेरा ऐसा मानना है कि मैंने अपनी भाषा में अपनी किताब लिख दी, मेरा काम वहीं तक है। उसके बाद जब कोई उस किताब को दूसरी भाषा में अनुवाद करता है, तब वह मेरी किताब के आधार पर एक नई किताब की रचना करता है। वह किताब मेरी नहीं, उसकी होती है। उसकी भाषा, शब्द, सब कुछ उसके होते हैं।
जब मैं अपने अनुवादकों के साथ काम करता हूँ, तो ये देख पाता हूँ कि भाषा के तौर पर हंगेरियन भाषा में कितनी संभावनाएँ मौजूद हैं। अगर फ्रेंच या स्पेनिश में दो संभावनाएँ मौजूद हैं तो हंगेरियन में दस।
आज मुझे अंतर्राष्ट्रीय सम्मान और स्वीकृति मिल रही है इसका कारण सिर्फ़ मेरा लेखन नहीं है; बल्कि असली श्रेय तो उन अनुवादकों को है, जिन्होंने अंग्रेज़ी और दूसरी भाषाओं में मेरा साहित्य पहुँचाया है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere