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चिंतन पर उद्धरण

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फ़ुरसत निकालना भी एक कला है। गधे हैं जो फ़ुरसत नहीं निकाल पाते। फ़ुरसत के बिना साहित्य चिंतन नहीं हो सकता, फ़ुरसत के बिना दिन में सपने नहीं देखे जा सकते। फ़ुरसत के बिना अच्छी-अच्छी, बारीक-बारीक, महान बातें नहीं सूझतीं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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भारतीय साहित्य में उन लोगों की वाणी को ही प्रधानता मिली है, जिन्होंने आध्यात्मिक असंतोषों और अतृप्तियों को दूर करने की दिशा में, विवेक-वेदना-स्थिति से ग्रस्त होकर काम किया है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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साहित्य में बुढ़ापा सफ़ेद बालों या झुर्रियों का नाम नहीं है। साहित्य में बुढ़ापे का अर्थ है—नवीन चेतना ग्रहण करने की शक्ति का लोप। अपनी मान्यताओं और मूल्यों को बदलने की भीरुता, आज के बदले विगत कल में ही जीने का मोह, प्रतिभा का शैथिल्य—यह सब हो, तो साहित्य में बूढ़ा आदमी परिपक्व कहलाता है।

हरिशंकर परसाई
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सबसे पहली कमी तो हमारे उपन्यासों में चिंतन और वैचारिकता की ही है।

श्रीलाल शुक्ल
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ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने से ही ज्ञान की विशेषताएँ टूटती रहेगी; उसकी सरहदें टूटती रहेंगी, लेकिन जिस दिन से आप केवल ज्ञात से ज्ञात की ओर जाएँगे, उस दिन आप केवल अपनी ही कील पर अपने ही आसपास घूमते रहेंगे।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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चिंतन में प्रेयसी का चिंतन सर्वश्रेष्ठ है।

भर्तृहरि
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जब आप किसी स्त्री को लेखन में उतार लेते हैं, तो वह आपको हज़ारों अन्य स्त्रियों के बारे में सोचने पर मजबूर कर देती है।

गुस्ताव फ़्लॉबेयर
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ख़ुद को किताब की समस्याओं में डुबाना प्यार के बारे में सोचने से बचने का अच्छा तरीक़ा है।

ओरहान पामुक
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अपने से ऊपर उठकर सोचने-समझने की शक्ति, भावना तथा मन की संवेदना—ये दो छोर हैं स्रष्टा मन के।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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जब तक स्त्रीवादी विचारों को केवल कुछ शिक्षित लोग ही समझेंगे, तब तक कोई जन-आधारित स्त्रीवादी आंदोलन नहीं होगा।

बेल हुक्स
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पेंटिंग विचार का मौन और दृष्टि का संगीत है।

ओरहान पामुक
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विभिन्न धर्म अलग-अलग भाषाएँ हैं, जिनमें प्रत्येक की अपनी सच्चाई हो सकती है और सच्चाई की कमी हो सकती है और ऐसा सोचना मूर्खतापूर्ण है कि ईश्वर किसी प्रकार से परिभाषित है, जिसके बारे में आप कुछ भी कह सकते हैं।

यून फ़ुस्से
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ईश्वर इतना दूर है कि कोई भी उसके बारे में कुछ नहीं कह सकता है और यही कारण है कि ईश्वर के बारे में सभी विचार ग़लत हैं और साथ ही वह इतना क़रीब है कि हम उसे देख ही नहीं सकते, क्योंकि वह व्यक्ति में आधार या रसातल है। आप इसे जो चाहें कह सकते हैं।

यून फ़ुस्से
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ऐसा बिंदु आता है, जब आप लिखना बंद कर देते हैं और अधिक सोचते हैं।

गुस्ताव फ़्लॉबेयर
  • संबंधित विषय : समय
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दोस्ती का जन्म उस समय होता है, जब एक आदमी दूसरे से कहता है : ‘‘अरे! तुम भी? मैं सोचता था कि मेरे सिवाय कोई और नहीं है।’’

सी. एस. लुईस
  • संबंधित विषय : समय
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नवयुग का आवाहन, राष्ट्रीयता जैसे विषय पर लिखने के लिए अपने भीतर वैसी अनुभूति जगानी पड़ती है, सामाजिक चिंतनधारा में बहा जाता है—किनारे पर खड़े होकर लहरों का हिसाब नहीं किया जाता।

हरिशंकर परसाई
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हम प्रायः अपनी सनातन धारणा का जितना अधिक मूल्य समझते हैं, उतना दूसरे व्यक्ति के अभाव और दुःख का नहीं। यही कारण है कि जब तक व्यक्तिगत असंतोष सीमातीत होकर हमारे संस्कार-जनित विश्वासों को आमूल नष्ट नहीं कर देता, तब तक हम उसके अस्तित्व की उपेक्षा ही करते रहते हैं।

महादेवी वर्मा
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क्या यह सोचना घमंड करना है कि हम विज्ञान और तकनीक का प्रयोग करके मृत्यु को धोखा दे सकते हैं? और अगर ऐसा ही है, तो फिर हमारा लक्ष्य इसके बजाए क्या होना चाहिए?

वेंकी रामकृष्णन
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प्यार साम्राज्य की तरह होता है : जिस विचार पर वह आधारित होता है, जब वह चकनाचूर हो जाए, तब प्रेम भी फीका पड़ जाता है।

मिलान कुंदेरा
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जब विद्वान लोगों में सत्या-असत्य का निश्चय नहीं होता; तभी अविद्वानों को महाअंधकार में पड़ कर बहुत दुःख उठाना पड़ता है, इसलिए सत्य के जय और असत्य के क्षय के अर्थ-मित्रता से वाद वा लेख करना, हमारी मनुष्यजाति का मुख्य काम है। यदि ऐसा हो तो मनुष्यों की उन्नति कभी हो।

दयानंद सरस्वती
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जो संप्रदाय में बद्ध हैं, वे चिरंतन साहित्यिक नहीं होते हैं। वे तो तात्कालिक साहित्यिक होते हैं। चिरंतन साहित्यिक तो वे होते हैं, जो सब पंथ, संप्रदाय वग़ैरह से भिन्न होते हैं, परे होते हैं।

विनोबा भावे
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भारतीयता, समकालीनता, स्थानीयता, सामाजिकता आदि के हम कला में क्या अर्थ लगाते हैं, यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि इनका आज हमारे जीवन में क्या अर्थ है।

कुँवर नारायण
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संसार-बंधन के दुःखों की रचना को विध्वंस करने हेतु; प्रलयाग्नि के सदृश ब्रह्मानंद पद में प्रवेश के उद्योग के बिना ,और बाक़ी सब वणिग्व्यापार है। प्रयोजनवाली बात केवल ब्रह्म का चिंतन है।

भर्तृहरि
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साधारणतः लोग कहते हैं कि वेदांत, दर्शन और धर्म, इस जगत् और उसके सारे सुखों एवं संघर्षों को छोड़कर इसके बाहर जाने का उपदेश देते हैं। पर यह धारणा एकदम ग़लत है। केवल ऐसे अज्ञानी व्यक्ति ही; जो प्राच्य चिंतन के विषय में कुछ नहीं जानते और जिसमें उसकी यथार्थ शिक्षा समझने योग्य बुद्धि ही नहीं है, इस प्रकार की बातें कहते हैं।

स्वामी विवेकानन्द
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मनुष्य जब मनुष्यता और उसके ऐतिहासिक रूपों की अंतर्वस्तु को अलग करने की ग़लती नहीं करता, तो चिंतन और कर्म उसके लिए अवश्य करणीय हो जाते हैं।

पॉलो फ़्रेरा
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विचार ही हमारी कार्य-प्रवृत्ति का नियामक है। मन को सर्वोच्च विचारों से भर लो; दिन पर दिन यही सब भाव सुनते रहो, मास पर मास इसी का चिंतन करो।

स्वामी विवेकानन्द
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एक कवि में अगर दूर तक सोच सकने की ताक़त नहीं; तो उसकी कविता या तो यथार्थ की सतह को खरोंचकर रह जाएगी, या किसी भी आदर्श से चिपककर।

कुँवर नारायण
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आदमियों की तरह यादों और विचारों की उम्र बढ़ती है। लेकिन कुछ विचार कभी बूढ़े नहीं हो सकते हैं और कुछ यादें कभी फीकी नहीं पड़ सकतीं।

हारुकी मुराकामी
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हर कोई सोचता है कि क्षमा करना महान विचार है, जब तक कि उसके पास क्षमा करने के लिए कुछ हो।

सी. एस. लुईस
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अगर प्रकृति आपको एक ही प्रयास में एक से अधिक बार विफल करती है, तो आपको यह सोचना शुरू करना पड़ सकता है कि क्या यह दुर्भाग्य के अलावा कुछ और है।

सामंथा हार्वे
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कितनी ही बार मैं घर के बारे में सोचते हुए, बारिश में किसी अजनबी छत पर सो चुका हूँ।

विलियम फॉकनर
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अपने विचारों को कार्य के साथ संतुलित करें।

ब्रूस ली
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अगर आप किसी चीज़ के बारे में सोचने में बहुत अधिक समय बिताते हैं, तो आप उसे कभी पूरा नहीं कर पाएँगे।

ब्रूस ली
  • संबंधित विषय : समय
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अगर आप सोचते हैं कि कोई चीज़ असंभव है, तो आप उसे असंभव ही बना देंगे।

ब्रूस ली
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हमलोग चीज़ों के 'क्या' पर ध्यान नहीं देते, बल्कि उसके 'क्यों' और 'कैसे' पर सोचते हैं। यही महाकाव्यात्मक रवैया है।

ऋत्विक घटक
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जब रुको तो शब्दों के बारे में मत सोचो, बल्कि उस दृश्य को और बेहतर करके देखो।

जैक केरुआक
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बुरे विचार फूलगोभी में कीड़े की तरह होते हैं!

अमोस ओज़
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सोचते रहो। उदास रहो और बीमार बने रहो।

राजकमल चौधरी
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जब आप ख़ुद के बारे में बुरा महसूस करते हैं, तो आप प्रेम के रास्ते में बाधा खड़ी कर लेते हैं और ऐसी स्थितियों तथा लोगों को आकर्षित करते हैं, जो आपको बुरा महसूस कराएँगे।

रॉन्डा बर्न
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साहित्य की चिंता, वैसे भी सही फ़ैसले की चिंता है, जो हमें एक ज़्यादा बड़े चिंतन-क्षेत्र में ले जाती है। जहाँ हम मनुष्य के कल्याण और समृद्धि के अर्थ को केवल भौतिक नहीं, उससे ज़्यादा बड़े परिप्रेक्ष्य में सोचते हैं।

कुँवर नारायण
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द्वंद्वात्मक चिंतन में विश्व और कर्म, बड़ी घनिष्ठता से परस्पर निर्भर होते हैं। लेकिन कर्म का मानवीय होना तभी संभव है; जब वह धंधे की तरह मन मार कर नहीं, बल्कि सोच-समझ कर पूरी तन्मयता के साथ किया जाए।

पॉलो फ़्रेरा
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सोचने की ‘आकांक्षा’ रखना एक बात है, सोचने की योग्यता होना दूसरी।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन
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संसार में रहते हुए मनुष्य को सदैव ईश्वर का चिंतन करना चाहिए, जैसे दासी दूसरे के घर का काम करते हुए भी, बराबर अपने बच्चों का ध्यान रखती है।

राम कृष्ण परमहंस
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हमारे प्रेम के पूरे ग्रीष्म काल में हमें यह महसूस होता है कि हमारा पार्टनर उतना आदर्श नहीं है, जितना हमने सोचा था और हमें अपने संबंध पर काम करना होगा। सिर्फ़ हमारा पार्टनर दूसरे ग्रह से आया है, बल्कि वह एक ऐसा इंसान भी है, जो ग़लतियाँ करता है और जिसमें कई दोष भी हैं।

जॉन ग्रे
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मौत के बारे में जानना इतना भयानक है कि हम अपने जीवन का ज़्यादातर हिस्सा इससे इनकार करने में ही बिता देते हैं और जब कोई मरता है, तो हमें इसे स्पष्ट रूप से कहने में संकोच होता है; और इसके बजाए हम इसे थोड़ा लाग-लपेट कर कहते हैं, जैसे—"वह चल बसे" या "गुज़र गए", जिससे ऐसा लगता है कि मृत्यु अंतिम नहीं है, बल्कि किसी दूसरी चीज़ में केवल परिवर्तन है।

वेंकी रामकृष्णन
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बाहरी अनुष्ठान की श्रेणी सबसे निकृष्ट है, जहाँ कि मनुष्य के लिए सूक्ष्म विचारों का होना प्रायः असंभव है।

स्वामी विवेकानन्द
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साहित्यिक किसी संप्रदाय के नहीं होते। साहित्यिकों का लक्षण ही यह है कि वे संप्रदायातीत होते हैं।

विनोबा भावे
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सत्कविता की प्राप्ति बड़े पुण्य से होती है। हृदय में कवित्व-बीज होने ही से मनुष्य सत्कवि हो सकता है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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दीखने में जो होता है, प्रकट होता है; उससे दीखने में जो होता है, वह बहुत बड़ा होता है। साहित्य दीखता नहीं। उसका जितना सूक्ष्म चिंतन करेंगे, उतना वह हमें व्यापक दर्शन देगा।

विनोबा भावे
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परंपरा वही होती है, जिसमें व्यक्ति और समाज के भीतर कला, शास्त्र, दर्शन आदि के गहन प्रश्नों के बारे में कौतूहल कार्यरत होता है।

श्याम मनोहर

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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