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कवि पर उद्धरण

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कवि को लिखने के लिए कोरी स्लेट कभी नहीं मिलती है। जो स्लेट उसे मिलती है, उस पर पहले से बहुत कुछ लिखा होता है। वह सिर्फ़ बीच की ख़ाली जगह को भरता है। इस भरने की प्रक्रिया में ही रचना की संभावना छिपी हुई है।

केदारनाथ सिंह
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अपनी व्यक्तिगत सत्ता की अलग भावना से हटाकर; निज के योगक्षेम के संबंध से मुक्त करके, जगत् के वास्तविक दृश्यों और जीवन की वास्तविक दशाओं में जो हृदय समय-समय पर रमता रहता है, वही सच्चा कविहृदय है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जायसी प्रेम के कवि के रूप में विख्यात हैं। उनके अनुसार संसार में प्रेम से अधिक सुंदर और काम्य कुछ भी नहीं है।

मैनेजर पांडेय
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प्रत्येक सर्जक या विधाता, जीवन के चाहे जिस क्षेत्र की बात हो—‘विद्रोही’ और ‘स्वीकारवादी’ दोनों साथ ही साथ होता है।

कुबेरनाथ राय
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अपने स्वयं के शिल्प का विकास केवल वही कवि कर सकता है, जिसके पास अपने निज का कोई ऐसा मौलिक-विशेष हो, जो यह चाहता हो कि उसकी अभिव्यक्ति उसी के मनस्तत्वों के आकार की, उन्हीं मनस्तत्वों के रंग की, उन्हीं के स्पर्श और गंध की ही हो।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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दरअसल इस संक्राति-युग में भी; जो कवि मध्यवर्गीय मनःस्थिति को लेकर भावुकता से भरी हुई अनेक सफल कविताएँ लिख लेते हैं, उनके बारे में यह समझना चाहिए कि या तो वे वास्तविकता का अतिसरलीकरण करते हैं, अथवा वे उसकी उलझनों से घबड़ाकर ऊपरी सतह की रंगीनियों में रस लेते हैं।

नामवर सिंह
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जायसी की दृष्टि में प्रेम अत्यंत गूढ़ और अथाह है। ज़ाहिर है, ऐसे प्रेम की कविता लिखना भी आसान नहीं होगा।

मैनेजर पांडेय
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एक सुभाषित है—'कवितारसमाधुर्य्यम् कविर्वेत्ति’, कविता का रस-माधुर्य सिर्फ़ कवि जानता है। ठीक उसी प्रकार सुर में सुर मिलना चाहिए, नहीं तो वाद्ययंत्र कहेगा ‘गा’ और गले से निकलेगा ‘धा’।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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कविता आदमी को मार देती है। और जिसमें आदमी बच गया है, वह अच्छा कवि नहीं है।

धूमिल
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भक्त कवियों की दृष्टि में मानुष-सत्य के ऊपर कुछ भी नहीं है—न कुल, जाति, धर्म, संप्रदाय, स्त्री-पुरुष का भेद, किसी शास्त्र का भय और लोक का भ्रम।

मैनेजर पांडेय
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सर्जक या रचनाकार के लिए ‘नॉनकन्फर्मिस्ट’ होना ज़रूरी है। इसके बिना उसकी सिसृक्षा प्राणवती नहीं हो पाती और नई लीक नहीं खोज पाती।

कुबेरनाथ राय
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कवि मात्र जन्म से ही कवि नहीं होता, उसे अभ्यास भी करना पड़ता है; किन्तु अभ्यास उन्हीं को फलता है, जो जन्म से भी कवि हैं।

रामधारी सिंह दिनकर
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अपने सुख में सुखी होने की और अपने दु:ख में दु:खी होने की तन्मयता कवि को हो, तो वह कवि नहीं बन सकता।

विनोबा भावे
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जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊँ?

जनकवि हूँ मैं, साफ़ कहूँगा, क्यों हकलाऊँ।

नागार्जुन
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कवित्व-शक्ति से विहिन व्यक्ति का शास्त्रज्ञान धनहीन के दान के समान, नपुंसक के अस्त्रकौशल के समान तथा ज्ञानहीन की प्रगल्भता के समान निष्फल होता है।

भामह
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एक कवि सब कलाकारों का आदिस्वरूप होता है। कविता सब कलाओं की कला है।

ऋत्विक घटक
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दिवंगत होने पर भी सत्काव्यों के रचयिताओं का रम्य काव्य-शरीर; निर्विकार ही रहता है और जब तक उस कवि की अमिट कीर्ति पृथ्वी और आकाश में व्याप्त है, तब तक वह पुणयात्मा देव-पद को अलंकृत करता है।

भामह
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जो कवि केवल सौंदर्य का प्रेमी है, वह शुद्ध कलाकार बन जाता है।

रामधारी सिंह दिनकर
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कवि को पंडित, आचार्य या संपादक होने की आवश्यकता नहीं है, उसके काव्य का सौंदर्य; उसके पांडित्य और आचार्यत्व पर निर्भर होकर, उसकी भाव-समृद्धि और अभिव्यक्ति-क्षमता पर निर्भर है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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जिन लोगों के मन में केशव के काव्य के बारे में रूखेपन और पाण्डित्य का भ्रम है, उन्हें कदाचित् यह पता नहीं है कि केशव हिंदी के उत्तर-मध्य युग के कवियों में सबसे अधिक व्यवहारविद्, लोक-कुशल और मनुष्य के स्वभाव के मर्मज्ञ कवि हैं।

विद्यानिवास मिश्र
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हे नारी! तुम्हारे स्पर्श से ही पृथ्वी को रूप मिला है और सुधा रस का स्पर्श मिला है! जीवन कुसुम को परिवेष्टित कर कवियों ने विश्व गुंजा दिया जिससे काव्य का सुरस विकसित हो उठा।

नलिनीबाला देवी
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मैं स्वयं को असफल मनुष्य, असफल कवि, असफल पशु, असफल देवता और असफल ब्रह्मराक्षस मानता हूँ। सफल होना मेरे लिए संभव नहीं है। मेरे लिए केवल संभव है—होना।

राजकमल चौधरी
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कवि के लिए संपूर्ण प्रकृति, गूढ़ संकेतों से भरी हुई प्रेरित होती है और आलोकपूर्ण नवीन ज्ञान का प्रभाव उसे स्वप्न में चौंका जाता है।

नामवर सिंह
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जो काव्य कवि की अनुभूत्ति से संबंध रखते हैं श्रोता की, उनमें केवल कल्पना और बुद्धि के सहारे भावों के स्वरूप का प्रदर्शन होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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किसी रचना का वही भाव जो कवि के हृदय में था; यदि पाठक या श्रोता के हृदय तक पहुँच सका, तो ऐसी रचना कोई शोभा नहीं प्राप्त कर सकती—उसे एक प्रकार से व्यर्थ समझना चाहिए।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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साहित्य के आचार्यों की बात करनी चाहिए। ये रसवादी प्रकार के आचार्य हैं। ये रँडुए होकर भी अपने-आप हृदय में शृंगार रस जाने कैसे पैदा कर लेते हैं? इन्हें आलम्बन भी नहीं चाहिए शायद, क्योंकि आलम्बन और चेतना का द्वंद्व होने लगता है।

हरिशंकर परसाई
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कवि अदृश्य का पुजारी होता है।

वॉलेस स्टीवंस
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टीकाकारों ने कवि का अर्थ मेधावी और प्रतिभाशाली किया है।

वासुदेवशरण अग्रवाल
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सच्चा कवि उसी व्यक्ति या वस्तु का स्वरूप कल्पना में लाएगा, जिसके प्रति उसकी किसी प्रकार की अनुभूति होगी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कोई इंजीनियर रद्दी माल लगाकर ग़ैर-ज़िम्मेदारी से कच्चे पुल का निर्माण करे; तो वह जिस अपराध का भागी होगा, उसी अपराध का भागी वह कवि भी होगा, जो राष्ट्रीयता की सच्ची भावना की अनुभूति के बिना रस्म-अदाई के लिए ओजहीन राष्ट्रीय-काव्य रचेगा।

हरिशंकर परसाई
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सूर के काव्य में प्रेम, कबीर से अधिक स्वाभाविक और जायसी से अधिक लौकिक है।

मैनेजर पांडेय
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कवि, परंपरा से प्राप्त विषयवस्तु को आत्मानुभूति, चिंतन और मनन द्वारा काव्यवस्तु बनाता है।

मैनेजर पांडेय
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जिस कवि में प्राकृतिक दृश्य और प्रकृति के कौशल देखने और समझने का जितना ही अधिक ज्ञान होता है, वह उतना ही बड़ा कवि भी होता है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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सच्चा कवि वही है; जिसे लोकहृदय की पहचान हो, जो अनेक विशेषताओं और विचित्रताओं के बीच से, मनुष्य जाति के सामान्य हृदय को अलग करके देख सके। इसी लोकहृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रसदशा है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कबीर शास्त्रीय ज्ञान के बोझ से मुक्त है।

मैनेजर पांडेय
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निराला का निजी संसार उनकी कविता का उतना ही आवश्यक हिस्सा है, जितना वह समाज जिसमें वे जी रहे थे।

कुँवर नारायण
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बुराइयों को जाने बग़ैर, अच्छाइयों की पहचान और उनका पोषण संभव नहीं। कवि को गर्हित, निकृष्ट, वर्जित और निषिद्ध का भी पीछा करना चाहिए।

लीलाधर जगूड़ी
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कबीर की कविता का लोक और उसका धर्म; दूसरे भक्त कवियों से अलग है, क्योंकि उनके जीवन का अनुभवलोक भी दूसरों से भिन्न है।

मैनेजर पांडेय
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एक कवि में अगर दूर तक सोच सकने की ताक़त नहीं; तो उसकी कविता या तो यथार्थ की सतह को खरोंचकर रह जाएगी, या किसी भी आदर्श से चिपककर।

कुँवर नारायण
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काव्य का उद्देश्य शुद्ध विवेचन द्वारा सिद्धांतनिरूपण नहीं होता, रसोत्पादन या भावसंचार होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कोई कवि यदि अपनी काव्य-कृति में; अपने स्थान और समय के अनुरूप बने नैतिक और अनैतिक के विचारों को आरोपित करे, तो यह ग़लत होगा क्योंकि उसका सृजन तो किसी युग की सीमाओं में बंधा होता है, ही किसी स्थान विशेष के।

पी. बी. शेली
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शिल्प या भाषा वहीं कठिनाई उत्पन्न करते हैं, जहाँ वे कविता के रचनात्मक तर्क से निकले हुए नहीं लगते—कथ्य पर उपर से आरोपित लगते हैं, या फिर वहाँ; जहाँ कवि के पास भाषा और शिल्प तो हो, पर ज़रूरी कुछ कहने को हो।

कुँवर नारायण
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परमत्त्व की गत्यात्मकता की बात वही कवि कह सकता है, जिसका युग वैज्ञानिक विकास के कारण अति गतिमय तथा शीघ्र-शीघ्र होने वाले परिवर्तनों से भरा हो।

नामवर सिंह
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कवि लोग अर्थ और वर्णविन्यास के विचार से जिस प्रकार शब्दशोधन करते हैं, उसी प्रकार अधिक मर्मस्पर्शी और प्रभावोत्पादक दृश्य उपस्थित करने के लिए, व्यापारशोधन भी करते हैं। बहुत-से व्यापारों में, जो व्यापार अधिक प्राकृतिक होने के कारण; स्वभावतः हृदय को अधिक स्पर्श करनेवाला होता है, भावुक कवि की दृष्टि उसी पर जाती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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छायावाद के कवि शब्दों को तोलकर रखते थे, प्रयोगवाद के कवि शब्दों को टटोल कर रखते थे, नई कविता के कवि शब्दों को गोलकर रखते थे—सन् साठ के बाद के कवि शब्दों को खोल कर रखते हैं।

धूमिल
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कवि, लेखक और कलाकार यदि ज्ञान में टुटपुँजिए हों, तो उनकी कृतियों में गंभीरता नहीं सकती।

राहुल सांकृत्यायन
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मूर्धन्य कवियों में कुछ ही ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अपनी कल्पनाओं के शुद्ध सौंदर्य को उसकी निर्वसन सत्यता और तेजस्विता में प्रस्तुत किया हो।

पी. बी. शेली
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काव्य का स्वरूप लेखक की मर्ज़ी पर नहीं, रसिक की मर्ज़ी पर ही निर्भर रहता है।

विनोबा भावे
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कवि का काम तो शिक्षा देना है और दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से तो वह गान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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कृष्णभक्त अपनी साधना के लिए एक ऐसे प्रेमक्षेत्र के भीतर अपने आराध्य की प्रतिष्ठा करते हैं, जो लोक से न्यारा है। जिसमें लोक मर्यादा चलती है, वेदमर्यादा।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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