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संवेदना पर उद्धरण

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आत्मा की सब अनुभूतियाँ ऐस्थेटिक नहीं होतीं, इसलिए वे काव्य-रूप में व्यक्त नहीं होतीं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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दरअसल इस संक्राति-युग में भी; जो कवि मध्यवर्गीय मनःस्थिति को लेकर भावुकता से भरी हुई अनेक सफल कविताएँ लिख लेते हैं, उनके बारे में यह समझना चाहिए कि या तो वे वास्तविकता का अतिसरलीकरण करते हैं, अथवा वे उसकी उलझनों से घबड़ाकर ऊपरी सतह की रंगीनियों में रस लेते हैं।

नामवर सिंह
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यदि लेखक के पास संवेदनात्मक महत्व-बोध नहीं है, या क्षीण है, तो विशिष्ट अनुभवों की अभिव्यक्ति क्षीण होगी।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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अंतःकरण की वृतियों के चित्र का नाम कविता है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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आँख वाले प्रायः इस तरह सोचते हैं कि अंधों की, विशेषतः बहरे-अंधों की दुनिया, उनके सूर्य प्रकाश से चमचमाते और हँसते-खेलते संसार से बिलकुल अलग हैं और उनकी भावनाएँ और संवेदनाएँ भी बिलकुल अलग हैं और उनकी चेतना पर उनकी इस अशक्ति और अभाव का मूलभूत प्रभाव है।

हेलेन केलर
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मानवीय संवेदना के मूल स्वभाव को ठीक से समझे बिना सब कुछ को ख़ारिज कर देने का औद्धत्य कभी फलप्रसू नहीं होता।

कृष्ण बिहारी मिश्र
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उपन्यास भावनाओं को साँचा देते हैं, समय का ऐसा अनुमान देते हैं जिसे औपचारिक इतिहास नहीं दे सकता।

डोरिस लेसिंग
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वासनात्मक अवस्था से भावात्मक अवस्था में आया हुआ राग ही अनुराग या प्रेम है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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मौन निकटता की भावना लाता है। जैसे ही बात खुलती है, तीसरी उपस्थिति की मानो चेतावनी आती है।

रघुवीर चौधरी
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साहित्य अपने काल का प्रतिबिम्ब होता है। जो भाव और विचार लोगों के हृदयों को स्पंदित करते हैं, वही साहित्य पर भी अपनी छाया डालते हैं।

प्रेमचंद
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लेखक के साथ आप तब रह सकेंगे; जब आप में इतनी मानव-श्रद्धा हो कि लेखक-वर्ग में हृदय-समृद्धि, प्रतिभा-शक्ति और विकास तथा उन्नति की संभावनाएँ हैं—यह मानकर चलें। इसका अर्थ यह है कि आप लेखक की विरोधी और युक्तियुक्त आलोचना न करें। इसका अर्थ यह है कि आप उस मनोवैज्ञानिक स्थिति-परिस्थिति को, उस साइकोलॉजिकल सिच्युएशन को समझें कि जो लेखक के साहित्य-सृजन का प्रारंभ-बिंदु बनती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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जिस प्रकार एक बालक अपनी प्रसन्नता को सहज रूप से व्यक्त करता है, उसी प्रकार आदिम मनुष्य भी अपने परिवेश से प्रभावित होकर; अपनी भावनाओं को भाषा, हाव-भाव, चित्रकला अथवा मूर्तिकला के माध्यम से अभिव्यक्त करता है और अंततः वह स्वयं उन सबके संयुक्त प्रभाव तथा उनसे जुड़ी अपनी आशंकाओं का प्रतिरूप बन जाता है।

पी. बी. शेली
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पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं, यह समझे बिना महिलाएँ बड़ी आसानी से पुरुषों की प्रतिक्रियाओं की ग़लत व्याख्या कर सकती हैं। एक आम दुविधा तब उत्पन्न होती है, जब वह कहती है 'चलो बात करते हैं,' लेकिन यह सुनते ही वह तुरंत भावनात्मक दूरी बढ़ा लेता है।

जॉन ग्रे
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जिन मनोवृत्तियों का अधिकतर बुरा रूप हम संसार में देखा करते हैं, उनका भी सुंदर रूप कविता ढूँढ़कर दिखाती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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काव्य का उद्देश्य शुद्ध विवेचन द्वारा सिद्धांतनिरूपण नहीं होता, रसोत्पादन या भावसंचार होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कविता हमारे मनोभावों को उच्छ्वसित करके, हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जो काव्य न कवि की अनुभूत्ति से संबंध रखते हैं न श्रोता की, उनमें केवल कल्पना और बुद्धि के सहारे भावों के स्वरूप का प्रदर्शन होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कविता सार्वभौमिक होती है। उसके भीतर वह बीज निहित रहता है, जो मानवीय स्वभाव की असंख्य संभावनाओं और कृत्यों से संबद्ध होता है।

पी. बी. शेली
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संवेदना, सरोकार और सौंदर्य की आकांक्षा के अभाव में सृजन संभव ही नहीं है।

ललित कार्तिकेय
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कवि लोग अर्थ और वर्णविन्यास के विचार से जिस प्रकार शब्दशोधन करते हैं, उसी प्रकार अधिक मर्मस्पर्शी और प्रभावोत्पादक दृश्य उपस्थित करने के लिए, व्यापारशोधन भी करते हैं। बहुत-से व्यापारों में, जो व्यापार अधिक प्राकृतिक होने के कारण; स्वभावतः हृदय को अधिक स्पर्श करनेवाला होता है, भावुक कवि की दृष्टि उसी पर जाती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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भाव और विभाव, दोनों पक्षों के सामंजस्य के बिना पूरी और सच्ची रसानुभूति हो नहीं सकती।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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सच्चा कवि उसी व्यक्ति या वस्तु का स्वरूप कल्पना में लाएगा, जिसके प्रति उसकी किसी प्रकार की अनुभूति होगी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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साहित्य में आध्यात्मिक भावबोध या उसकी ज़रूरत का अहसास, दर्शन को अनुभूति के भीतर चरितार्थ करके या दर्शन को अनुभूति में घुलाकर ही संभव और कृतिकार्य हो सकता है।

रमेशचंद्र शाह
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सच्चा कवि वही है; जिसे लोकहृदय की पहचान हो, जो अनेक विशेषताओं और विचित्रताओं के बीच से, मनुष्य जाति के सामान्य हृदय को अलग करके देख सके। इसी लोकहृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रसदशा है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जिसमें भाव का पता देनेवाला अथवा भाव जाग्रत करनेवाला, कोई शब्द या वाक्य अथवा प्रस्तुत प्रसंग के प्रति किसी प्रकार का भाव उत्पन्न कराने में समर्थ अप्रस्तुत वस्तु या व्यापार न हो, केवल दूर की सूझ या शब्दासाम्यमूलक विलक्षणता हो, वह उक्ति काव्याभास होगी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जो भावुक या सहृदय होते हैं, अथवा काव्य के अनुशीलन से जिनके भावप्रसार का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है—उनकी वृत्तियाँ उतनी स्वार्थबद्ध नहीं रह सकतीं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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हृदय-विनिमय प्रेम का लक्षण है और तुम यदि उसी हृदय को गोपन करते हो, तो यह निश्चित है कि तुम स्वार्थभावापन्न हो, उनको केवल बातों से प्रेम करते हो।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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भावजगत की वस्तु को आकार देने का प्रयास—ऐसा आकार देने का प्रयास; जिससे कि वह भाव अधिक से अधिक संप्रेष्य बन सके और अन्य चित्रों में भी वैसी ही दीप्ति या द्युति उत्पन्न कर सके—कलाकार का लक्ष्य होता है।

देवीशंकर अवस्थी
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अनुभूति की जिस तीव्रता में; बाहर-भीतर सर्वत्र अंधकार ही अंधकार दिखाई पड़े, वह नितांत ऐंद्रिय संवेदन कही जाएगी।

नामवर सिंह
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किसी रचना का वही भाव जो कवि के हृदय में था; यदि पाठक या श्रोता के हृदय तक न पहुँच सका, तो ऐसी रचना कोई शोभा नहीं प्राप्त कर सकती—उसे एक प्रकार से व्यर्थ समझना चाहिए।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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जो आलम्बन मनुष्य जाति की सामान्य प्रकृति से संबंध नहीं रखता; आश्रय की विशेष प्रकृति या स्थिति से ही संबंध रखता है, उसके प्रति आश्रय के भाव का भागी श्रोता या पाठक, पूर्णरूप से नहीं हो सकता।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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कवि का काम न तो शिक्षा देना है और न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से तो वह गान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे।

महावीर प्रसाद द्विवेदी
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जो किसी मुख के लावण्य, वन-स्थली की सुषमा, नदी या शैलतटी की रमणीयता, कुसुमविकास की प्रफुल्लता, ग्रामदृश्यों की सरल माधुरी देख मुग्ध नहीं होता, जो किसी प्राणी के कष्ट-व्यंजक रूप और चेष्टा पर करुणार्द्र नहीं होता; जो किसी पर निष्ठुर अत्याचार होते देख क्रोध से नहीं तिलमिलाता—उसमें काव्य का सच्चा प्रभाव ग्रहण करने की क्षमता कभी नहीं हो सकती।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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हृदय के मर्मस्थल का स्पर्श तभी होता है; जब जगत् या जीवन का कोई सुंदर रूप, मार्मिक दशा या तथ्य मन में उपस्थित होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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संभवतः मेरे जीवन का अस्ल मक़सद मेरे शरीर, मेरी संवेदनाओं और मेरे विचारों को लेखन बनाने के लिए हो, दूसरे शब्दों में : कुछ समझ में आने लायक़ और सार्वभौमिक हो, जिससे मेरा अस्तित्व अन्य लोगों के जीवन और मस्तिष्क में विलीन हो जाए।

ऐनी एरनॉ
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जल्दी-जल्दी में लिखी गईं गोपनीय नोटबुक्स और तीव्र भावनाओं में टाइप किए गए पन्ने, जो ख़ुद की ख़ुशी के लिए हों।

जैक केरुआक
  • संबंधित विषय : सुख
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जब बुराई को अच्छाई के साथ प्रतिस्पर्धा करने दी जाती है, तो बुराई में भावात्मक जनवादी गुहार होती है जो तब तक जीतती रहती है जब तक कि अच्छे पुरुष और स्त्रियाँ दुर्व्यवहार के ख़िलाफ़ एक अग्र-दल के रूप में खड़े न हो जाएँ।

हाना आरेन्ट
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शमशेर का अकेलापन एक ईमानदार रचनाकार की अनिवार्य नियति का अकेलापन है।

कुँवर नारायण
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उसे अपनी प्राथमिकता मत बनाओ जिसके लिए तुम सिर्फ़ एक विकल्प हो।

माया एंजेलो
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कविता का उत्स जैविक है, उसके लक्षण हमारे जीवाश्मों में बसे हैं—हमारे हृदय की गति और लय की तरह।

कुँवर नारायण
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जब मैं लिखती हूँ, तो मेरे मन में कहीं वह विलक्षण और बहुत सुखद भावना सिर उठाती है जो कि मेरा अपना दृष्टिकोण है…

वर्जीनिया वुल्फ़
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जो भावुक और रसज्ञ न होकर; केवल अपनी दूर की पहुँच दिखाना चाहते हैं, वे कभी-कभी आधिक्य या न्यूनता की हद दिखाने में ही फँसकर, भाव के प्रकृत स्वरूप को भूल जाते हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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मैंने अपनी उम्र के साथ यह अनुभव किया है कि क्रोध सबसे ज़्यादा उसका ही नुक़सान करता है जो इसे अपने हृदय में पालता है।

कैथरीन ग्राहम
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भावप्रसूत वचनरचना में ही भाव या भावना तीव्र करने की क्षमता पाई जाती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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किसी वस्तु के प्रत्यक्ष ज्ञान या भावना से; हमारी अपनी सत्ता के बोध का जितना ही अधिक तिरोभाव और हमारे मन की उस वस्तु के रूप में जितनी ही पूर्ण परिणति होगी, उतनी ही बढ़ी हुई हमारी सौंदर्य की अनुभूति कही जाएगी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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एक वक़्त के बाद स्मृतियाँ बोझ बनने लगती हैं।

लॉरी कोलविन
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कविता ही हृदय को प्रकृत दशा में लाती है; और जगत् के बीच क्रमशः उसका अधिकाधिक प्रसार करती हुई, उसे मनुष्यत्व की उच्च भूमि पर ले जाती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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भाव के विषय का कैसा ही यथातथ्य चित्रण क्यों न हो, यदि उसके वर्णन के अंतर्गत ही उक्त भाव को शब्द और चेष्टा द्वारा प्रकट करनेवाला न होगा, तो (शास्त्रीय दृष्टि से) रस कच्चा ही समझा जाएगा।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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मनुष्य के कर्मों में जिस प्रकार दिव्य सौंदर्य और माधुर्य होता है, उसी प्रकार कुछ कर्मों में भीषण कुरूपता और भद्दापन होता है। इसी सौंदर्य या कुरूपता का प्रभाव; मनुष्य के हृदय पर पड़ता है और इस सौंदर्य या कुरूपता का सम्यक् प्रत्यक्षीकरण, कविता ही कर सकती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
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पुराने दोस्त की तरह जब कोई आपको बहुत अच्छी तरह से जान जाता है तो वह आपसे मिलना नहीं चाहता।

डोरिस लेसिंग

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere