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पराजय पर उद्धरण

जीवन-प्रसंगों में जय-पराजय

मनुष्य के प्रमुख मनोभावों में से एक है। यह किसी के हर्ष तो किसी के लिए विषाद का विषय है। यहाँ प्रस्तुत चयन में उन कविताओं का संकलन किया गया है, जिनमें ‘हार की जीत’ और ‘जीत की हार’ रेखांकित है।

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हार मन की एक अवस्था है, कोई भी तब तक पराजित नहीं होता, जब तक हार को सच में स्वीकार नहीं किया जाता है।

ब्रूस ली
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शास्त्रार्थ में कोई हारता नहीं, हराया जाता है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी
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अश्वत्थामा को पराजय ने भड़काया, अहंकार ने नहीं।

दुर्गा भागवत
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प्राणी जिस दिन से जन्म लेता है, उसी दिन उसके पीछे कर्म, मृत्यु, सुख-दुःख, जय-पराजय, लोभ, माया, आदि लग जाते हैं और उसे छेदते हैं।

चंदबरदाई
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बुद्धिमान क्रोध के वेग को जीत लेते हैं तथा क्षुद्र लोग क्रोध से तत्काल ही पराजित हो जाते हैं।

माघ
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जिसकी प्रजा सदा कर के भार से पीड़ित हो नित्य उद्विग्न रहती है और नाना प्रकार के अनर्थ उसे सताते रहते हैं, वह राजा पराभव को प्राप्त होता है।

वेदव्यास
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जिसका आत्म-बल पर विश्वास है, उसकी हार नहीं होती, क्योंकि आत्म-बल की पराकाष्ठा का अर्थ है मरने की तैयारी।

महात्मा गांधी
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लोकतंत्र में हमें जीतना तो आना ही चाहिए, साथ ही गरिमा के साथ हार को स्वीकार करना भी आना चाहिए।

जवाहरलाल नेहरू
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विजय-तृष्णा का अंत पराभव में होता है।

जयशंकर प्रसाद
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परास्त होने पर भी जीवन तो संघर्ष करता ही रहेगा।

श्री अरविंद
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अधर्म से पराजित किया जाने वाला कोई भी पुरुष अपनी उस पराजय के लिए दुःखी नहीं होता।

वेदव्यास
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मृत्यु मनुष्य की पराजय नहीं, पराजय है उसका मृत्यु से डरना।

रांगेय राघव
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आत्मा तर्क से परास्त हो सकती है, पर परिणाम का भय तर्क से दूर नहीं होता। वह पर्दा चाहता है।

प्रेमचंद
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मेरे निकट बिना मूल्य मिली जय से वह पराजय अधिक मूल्यवान ठहरेगी जो जीवन की पूर्ण शक्ति-परीक्षा ले सके।

महादेवी वर्मा
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पराजित होने वाले कभी पूज्य नहीं होते।

यशपाल

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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