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पृथ्वी पर उद्धरण

पृथ्वी, दुनिया, जगत।

हमारे रहने की जगह। यह भी कह सकते हैं कि यह है हमारे अस्तित्व का गोल चबूतरा! प्रस्तुत चयन में पृथ्वी को कविता-प्रसंग में उतारती अभिव्यक्तियों का संकलन किया गया है।

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जीवन केवल इसलिए दुखद है, क्योंकि पृथ्वी घूमती है और सूर्य अनवरत रूप से उगता है और अस्त होता है और एक दिन हम में से प्रत्येक के लिए सूर्य आख़िरी, आख़िरी बार अस्त हो जाएगा।

जेम्स बाल्डविन
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हे नारी! तुम्हारे स्पर्श से ही पृथ्वी को रूप मिला है और सुधा रस का स्पर्श मिला है! जीवन कुसुम को परिवेष्टित कर कवियों ने विश्व गुंजा दिया जिससे काव्य का सुरस विकसित हो उठा।

नलिनीबाला देवी
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पृथ्वी स्वयं इस नए जीवन को जन्म दे रही है और सारे प्राणी इस आनेवाले जीवन की विजय चाह रहे हैं। अब चाहे रक्त की नदियाँ बहें या रक्त के सागर भर जाएँ, परंतु इस नई ज्योति को कोई बुझा नहीं सकता।

मैक्सिम गोर्की
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जिसकी पत्नी पतिव्रता है, पति को प्राणों से भी अधिक प्यार करने वाली है तथा पति के ही हित में संलग्न है, वह पुरुष इस पृथ्वी पर धन्य है।

विष्णु शर्मा
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जल्द ही हम सभी पृथ्वी के नीचे सोएँगे, हम जो औरों को कभी भी इसके ऊपर सोने नहीं देते हैं।

मरीना त्स्वेतायेवा
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ग्रह पर रहने का मेरा किराया सक्रियतावाद है।

एलिस वॉकर
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देखा; किंतु मुझे उसकी सुंदरता के बारे में बताया गया है। मैं जानती हूँ कि उसकी सुंदरता सदैव ही अधूरी और टूटी-फूटी होती है। वह आसमान पर कभी भी पूर्णाकार में प्रकट नहीं होता। यही बात उन सभी चीज़ों के बारे में सही है जिन्हें हम पृथ्वी वाले जानते हैं। जिस तरह इंद्रधनुष का वृत्त खंडित होता है, उसी तरह जीवन भी अधूरा है और हममें से हरेक के लिए टूटा-फूटा है। हम ब्राउनिंग के इन शब्दों, ‘‘पृथ्वी पर टूटे हुए बिंब, स्वर्ग में एक पूर्ण चंद्र’’ का अर्थ तब तक नहीं समझ सकेंगे, जब तक हम अपने खंड जीवन से अनंत की ओर क़दम नहीं बढ़ा लेते।

हेलेन केलर
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हे राजन्! साध्वी स्त्रियाँ 'महाभाग्यशालिनी होती हैं तथा संसार की माता समझी जाती हैं। वे अपने पतिव्रत के प्रभाव से वन और काननों सहित इस पृथ्वी को धारण करती हैं।

वेदव्यास
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तुम्हारे हाथ स्वार्थमयी पृथ्वी की कलुष-कालिमा पोंछ देते हैं। प्रेम के दीप जलाकर, कर्तव्य की तपस्या से तुम संसार-पथ में गरिमा का वितरण करती हो।

नलिनीबाला देवी
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एक दिन पके बालों वाली स्त्रियों की सेना चुपचाप पृथ्वी पर क़ब्ज़ा कर सकती है!

ग्लोरिया स्टाइनम
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निर्मल चंद्रमा पर पड़ी पृथ्वी की छाया को लोग चंद्रमा का कलंक कहकर उसे बदनाम करते हैं।

कालिदास
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धरती का पुण्य उसकी सुषमा में व्यक्त है और सृष्टि का पुण्य नारी में।

कुबेरनाथ राय
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धर्म आकाश से नीचे नहीं उतरता, धरती से ऊपर उठता है।

लक्ष्मीनारायण मिश्र
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मैंने कोई भी बलिदान करने से इनकार कर दिया; क्योंकि पृथ्वी पर कुछ भी मेरे मन की शांति, मेरी ख़ुशी और मेरे सम्मान से अधिक मूल्यवान नहीं था।

जॉर्ज सैंड
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धरती पर वायरस मनुष्य से कहीं पहले से मौजूद रहे हैं, परिस्थितियों के अनुसार ख़ुद को बहुत तेज़ी से ढाल लेते हैं और हमारे जाने के बाद भी लंबे समय तक यहाँ रहेंगे।

वेंकी रामकृष्णन
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मैं ऐसे किसी समय की कल्पना नहीं कर सकता जब पृथ्वी पर व्यवहार में एक ही धर्म होगा।

महात्मा गांधी
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धरती और नारी दोनों की बुरी गति होती है, निर्बल के साथ रहने में।

लक्ष्मीनारायण मिश्र
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धरती की क़ैद में सीमित, हम मृत्यु की इच्छा का अनुभव करते हैं—जैसा कि प्लेटो के यहाँ होता है।

पीएत्रो चिताती
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माता का गौरव पृथ्वी से भी अधिक हैं। पिता आकाश से भी ऊँचा है।

वेदव्यास
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हर एक व्यक्ति की सोचने की एक जन्म-लब्ध वर्णमाला होती है और उसी वर्णमाला के आश्रय से वह मनुष्य, पृथ्वी और ईश्वर को पहचान सकता है, अन्यथा नहीं।

कुबेरनाथ राय
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हे माता! तुम्हारी यह धूलि, जल, आकाश और वायु—सभी मेरे लिए स्वर्ग तुल्य हैं। तुम मेरे लिए मर्त्य की पुण्य मुक्ति भूमि एवं तीर्थस्वरूपा हो।

नलिनीबाला देवी
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हमारी ज़मीन में रसायनों का ज़हर इस क़दर फैल चुका है कि प्रकृति का स्वतंत्र जीवन-चक्र अब उसमें चल ही नहीं सकता।

कृष्ण कुमार
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ईंधन से जलाई गई अग्नि कृषि योग्य पृथ्वी को जला भले ही देती है, किंतु उसे इस योग्य अवश्य कर देती है कि बीजों में अंकुर उपजा सके।

कालिदास
  • संबंधित विषय : आग
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हे माँ! तुममें ही कामधेनु की सामर्थ्य है। तुम मंगलधाम हो, तपस्वियों का अद्वैत हो। तुममें सागर की गंभीरता है, पृथ्वी की उदारता है। तुम्हारे नेत्रों में शांत चंद्रमा का तेज़ है और हृदय में मेघमालाओं का सघन वात्सल्य। हे मां! इन सब गुणों का वास तुम में ही है

यशवंत दिनकर पेंढरकर
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समुद्र धरती को बादल भेजता है। वह जानता है कि धरती उसकी कितनी तीव्रता से प्रतीक्षा कर रही है। इसीलिए वह उसे साधारण डाक से भेजकर, हवाई-डाक से भेजता है, रजिस्टर्ड ए. डी. से भेजता है। नदी मानो धरती की समुद्र को बादल मिलने की पावती है—एकनालेजमेंट है। नदियों के मटमैले पानी देखकर समुद्र आश्वस्त हो जाता है कि पानी के जो पार्सल उसने धरती को भेजे थे, वे उसे सही-सलामत मिल गए हैं।

अमृतलाल वेगड़
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हमारी धरती एक बहुत बड़ी वेदना से गुज़री है और हम उस वेदना से बेख़बर रहते हुए जिए चले जा रहे हैं।

कृष्ण कुमार
  • संबंधित विषय : देश
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धरती माता के अंचल की विशालता, अब केवल कविता ही में रह गई है।

श्रीलाल शुक्ल
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जैसे साँप बिल में रहने वाले चूहों को निगल जाता है, उसी प्रकार दूसरों से लड़ाई करने वाले राजा तथा विद्याध्ययन आदि के लिए घर छोड़कर अन्यत्र जाने वाले ब्राह्मण को पृथ्वी निगल जाती है।

वेदव्यास
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सूर्य ज़रूरी है, उसके बिना पृथ्वी का अस्तित्व ही होता। फिर वह जीवनदाता भी है। पृथ्वी तो हमारा घर है। थोड़ी-बहुत उपयोगिता चाँद की भी है, किंतु इन तीन के सिवा ये जो कोटि-कोटि तारे हैं, वे किस मर्ज़ की दवा है? उनका कोई उपयोग नहीं। कल यदि उनका अस्तित्व समाप्त हो जाए तो हमें क्या फ़र्क़ पड़ेगा? जिसने भी उन्हें बनाया, उसने अपनी शक्ति का और अपने संसाधनों का भयंकर अपव्यय किया।

अमृतलाल वेगड़
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जब पृथ्वी नहीं थी, सूर्य तब भी था। किंतु उसका उदय-अस्त नहीं था, दिन-रात नहीं थे, वर्ष नहीं थे, ऋतु-परिवर्तन भी नहीं था। ये सभी पृथ्वी के आने के बाद आए। सूर्य को सार्थकता पृथ्वी ने दी। अगर पृथ्वी होती तो सूरज अकारथ हो जाता। पृथ्वी होती तो सौर-मंडल में मौत का सन्नटा होता। सूर्य के और भी बालक हैं ज़रूर, पर वे तो मरे हुए जन्में थे। किसी में भी प्राण-प्रतिष्ठा हो सकी। सूर्य की जीवित संतान तो है एकमात्र पृथ्वी।

अमृतलाल वेगड़
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चंद्रमा का उचित स्थान आकाश ही है, पृथ्वी नहीं।

बाणभट्ट
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पतिव्रताओं के आँसू इस पृथ्वी पर व्यर्थ नहीं गिरते।

वाल्मीकि
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संपूर्ण पृथ्वी ही माँ का खप्पर है। अखिल विश्व ब्रह्मांड ही सर्वव्यापिनी, सर्वशक्तिमती, सृष्टि और मरण की क्रीड़ा में निरत माँ भवानी का मंदिर है।

हरिकृष्ण प्रेमी
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काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, रात, लव, मास, पक्ष, छह ऋतु, संवत्सर और कल्प इन्हें 'काल' कहते हैं तथा पृथ्वी को 'देश' कहा जाता है। इनमें से देश का तो दर्शन होता है किंतु काल दिखाई नहीं देता। अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि के लिए जिस देश और काल को उपयोगी मानकर उसका विचार किया जाता है, उसको ठीक-ठीक ग्रहण करना चाहिए।

वेदव्यास
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क्या पृथ्वी पर पानी बरसाने के लिए भगवान मेंढकों की टर्र-टर्र की प्रतीक्षा करता है।

कालिदास
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धरती के आँसू ही उसकी मुस्कानों को खिलाते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर
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जिस धनी पुरुष का जन्म याचक जन की इच्छा को पूर्ण करने के लिए नहीं है, उस पुरुष से ही यह पृथ्वी अत्यंत भार वाली है, कि पेड़ों या पर्वतों या समुद्रों से।

श्रीहर्ष
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या तो युद्ध में मरकर स्वर्ग प्राप्त करोगे अथवा जीत कर पृथ्वी को भोगोगे।

वेदव्यास
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इस पृथ्वी पर एक ख़ास तरह के आदमी हैं जो मानों फूस की आग हैं। वे झट से जल भी उठते हैं और फिर चटपट बुझ भी जाते हैं। उन लोगों के पीछे सदा-सर्वदा एक आदमी रहना चाहिए जो आवश्यकता के अनुसार उनके लिए फूस जुटा सके।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय
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जो कोई इस कृति के प्रति अवज्ञा दिखाते हैं वे जानते हैं कि उनके लिए मेरी कृति नहीं है। अवश्य ही मेरा कोई समानधर्मा पुरुष उत्पन्न होगा, क्योंकि काल तो अनंत है और पृथ्वी विशाल है।

भवभूति
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पत्तियों का झरना धरती के सौंदर्य की करुणतम् अवस्था है।

कुबेरनाथ राय
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हे पृथ्वी! तुम आज की नहीं, जन्म से ही चिरंतन सुंदरी हो! तुम मेरी अनन्त शांति की विश्रामस्थली और अतीत की स्वप्नलीला-भूमि हो।

नलिनीबाला देवी
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कैसा भीषण तांडव इस हृदय के अंदर हो रहा है। यह क्या पृथ्वी के किसी भी भूकंप से छोटा है?

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय
  • संबंधित विषय : दिल
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विश्व रूप वृक्ष के बीज के उत्पन्न होने के लिए मूल आधार रूप से स्थित और धारण करने की शक्ति से युक्त पृथ्वी रूप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।

अभिनवगुप्त
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जिनका सारा शरीर मन मिट्टी के ममता रस से सींचा हुआ है—इस पृथ्वी की नाव की पतवार ही हाथों में रहेगी।

क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम
  • संबंधित विषय : देह
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शिल्प की कोई जड़ अचल अवस्था नहीं होती है, इस पृथ्वी की तरह वह प्राचीन और नित्य चिरयौवना बनी रहती है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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जिसका जन्म याचकों की कामना पूर्ण करने के लिए नहीं होता, उससे ही यह पृथ्वी भारवती हो जाती है, वृक्षों, पर्वतों तथा समुद्रों के भार से नहीं।

श्रीहर्ष
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और ऐसे भी लोग हैं जो देते हैं, लेकिन देने में कष्ट अनुभव नहीं करते, वे उल्लास की अभिलाषा करते हैं और पुण्य समझ कर ही कुछ देते हैं।

वे देते हैं, जिस प्रकार विजय का फूल दशों दिशाओं में अपना सौरभ लुटा देता है।

इन्हीं लोगों के हाथों द्वारा ईश्वर बोलता है और इन्हीं की आँखों में से वह पृथ्वी पर अपनी मुस्कान छिटकता है।

ख़लील जिब्रान
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हे राजन्! तुम पृथ्वी रूपी गाय को दुहना चाहते हो, तो प्रजा रूपी बछड़े का पालन-पोषण करो। यदि तुम प्रजा-रूपी बछड़े का पालन अच्छी तरह करोगे, तो पृथ्वी, स्वर्गीय कल्पलता की तरह, आपको नाना प्रकार के फल देगी।

भर्तृहरि
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हम दोहरे हैं—स्वर्ग और धरती से बुने हुए।

पीएत्रो चिताती

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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