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पिता पर उद्धरण

पारिवारिक इकाई में पिता

एक विशिष्ट भूमिका का निर्वाह करता है और यही कारण है कि जीवन-प्रसंगों की अभिव्यक्ति में वह एक मज़बूत टेक की तरह अपनी उपस्थिति जताता रहता है। यहाँ प्रस्तुत है—पिता विषयक कविताओं का एक विशेष संकलन।

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स्त्रियों को तर्कसंगत प्राणी और स्वतंत्र नागरिक बनाएँ, और अगर पुरुष पतियों और पिता के कर्त्तव्यों की उपेक्षा नहीं करते हैं तो वे जल्द ही अच्छी पत्नियाँ बन जाएँगी।

मैरी वोलस्टोनक्राफ़्ट
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सहस्रों माता-पिता और सैकड़ों पुत्र व पत्नियाँ युग-युग में हुए। सदैव के लिए वे किसके हुए और आप किसके हैं?

बाणभट्ट
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माता-पिता के प्रेम को हम तब तक नहीं समझ पाते, जब तक स्वयं माता-पिता नहीं बन जाते।

हेनरी वार्ड बीचर
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माता-पिता से वंचित हो जाना—क्या स्वतंत्रता वहीं से शुरू होती है?

जूलिया क्रिस्तेवा
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जो भी हो, यह हमेशा सही माना जा सकता है कि साधारणतः बच्चों के बारे में; ज़िम्मेवारी अपरिहार्य रूप से प्रथम स्थान में माता-पिता की, विशेषतः माता की होनी चाहिए।

हेवलॉक एलिस
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जैसे-जैसे हम ज्ञान पाते हैं, हम अपने पिताओं को मूर्ख समझते हैं। निस्संदेह हमारे अधिक बुद्धिमान पुत्र हमें भी ऐसा ही समझेंगे।

अलेक्ज़ेंडर पोप
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पुत्र का अपने पिता की प्रतिकृति जैसा प्रतीत होना—इस अभिप्राय का प्रयोग भी वाल्मीकि ने ही प्रारंभ किया।

राधावल्लभ त्रिपाठी
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मित्र तो वही है जिस पर पिता की भाँति विश्वास किया जा सके, दूसरे तो साथी मात्र हैं।

वेदव्यास
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बड़ा भाई, पिता तथा जो विद्या देता है, वह गुरु—ये तीनों धर्म-मार्ग पर स्थित रहने वाले पुरुषों के लिए पिता के तुल्य माननीय हैं।

वाल्मीकि
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अपनी शक्ति के अनुसार उत्तम खाद्य पदार्थ देने, अच्छे बिछौने पर सुलाने, उबटन आदि लगाने, सदा प्रिय बोलने तथा पालन-पोषण करने और सर्वदा स्नेहपूर्ण व्यवहार के द्वारा माता-पिता पुत्र के प्रति जो उपकार करते हैं, उसका बदला सरलता से नहीं चुकाया जा सकता।

वाल्मीकि
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जो माता-पिता की आज्ञा मानता है, उनका हित चाहता है, उनके अनुकूल चलता है, तथा माता-पिता के प्रति पुत्रोचित व्यवहार करता है, वास्तव में वही पुत्र है।

वेदव्यास
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ज्ञान की प्रथम गुरु माता है। कर्म का प्रथम गुरु पिता है। प्रेम का प्रथम गुरु स्त्री है और कर्त्तव्य का प्रथम गुरु संतान है।

चतुरसेन शास्त्री
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माता का गौरव पृथ्वी से भी अधिक हैं। पिता आकाश से भी ऊँचा है।

वेदव्यास
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पुत्र को सभा में अग्रिम स्थान में बैठने योग्य बनाना पिता का सबसे बड़ा उपकार होगा।

तिरुवल्लुवर
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स्वामी का कार्य, गुरु भक्ति, पिता के आदेश का पालन, यही विष्णु की महापूजा है।

संत तुकाराम
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घर में माता-पिता और बच्चे का संबंध, प्रायः चारों ओर की सामाजिक संरचना की वस्तुपरक सांस्कृतिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करता है।

पॉलो फ़्रेरा
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पालन-पोषण और शिक्षण में, लड़के और लड़की में भेद करनेवाले और लड़की के प्रति कम कर्तव्य-बुद्धि रखनेवाले माता-पिता पाप करते हैं।

महात्मा गांधी
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जिस तरह माँ अपने बेटे को हमेशा दुबला ही समझती है, उसी तरह बाप भी बेटे को हमेशा नादान समझा करता है। यह उनकी ममता है, बुरा मानने की बात नहीं है।

प्रेमचंद
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जो पुत्र इस लोक में दुर्गम संकट से पार लगाए अथवा मृत्यु के पश्चात् परलोक में उद्धार करे... सब प्रकार पिता को सार दे, उसे ही विद्वानों ने वास्तव में 'पुत्र' कहा है।

वेदव्यास
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जो माता पिता बिना अनुमति के अपने बालकों के पत्र पढ़ने की अच्छा रखते हैं, वे माता-पिता नहीं बल्कि ज़ालिम हैं।

महात्मा गांधी
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आप इस चराचर जगत् के पिता और गुरु से भी बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अप्रतिम प्रभाव! तीनों लोकों में आप के समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक श्रेष्ठ कैसे होगा?

वेदव्यास
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परिश्रम ही हर सफलता की कुंजी है और वही प्रतिभा का पिता है।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर
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पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नहीं है।

वाल्मीकि
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कन्या का पिता होना बहुत वंदनीय है।

भास
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मैं माता पिता की तुलना में निंदक का अधिक स्नेह मानता हूँ। विचार करके देखिए—माता पिता तो हमारे मलमूत्र को हाथ से धोते हैं, किंतु निंदक तो जीभ से हमारे मलमूत्र को धोते हैं।

दयाराम
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यौवन का आरंभ होते ही कन्याओं के पिता संताप-अग्नि के ईंधन बन जाते हैं।

बाणभट्ट
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हे जन्मभूमि! हम उन आगामी वर्षों में अपना प्रेम और कठोर परिश्रम तुझे अर्पित करते हैं जब हम बड़े होकर अपनी जाति में पुरुषों और स्त्रियों के रूप में अपना स्थान ग्रहण करेंगे।

जोसेफ रुडयार्ड किपलिंग
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बाप के कुएँ में तैरना तो चाहिए, पर डूब मरना तो न चाहिए।

महात्मा गांधी
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मैं इस जगत् का माता, पिता, धारणकर्ता, पितामह, ज्ञेय, पवित्र वस्तु, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद हूँ। मैं अंतिम गति, पोषणकर्ता, स्वामी, साक्षी, निवासस्थान, शरण जाने योग्य, मित्र, उत्पत्तिकर्ता, लयकर्ता, मध्य की अवस्थिति, भंडार और अविनाशी बीज हूँ।

वेदव्यास
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गौरव में उपाध्याय दस आचार्यों से बड़ा, पिता दस उपाध्यायों से बड़ा और माता दस पिताओं से बड़ी है। माता अपने गौरव से सभी पृथ्वी को भी तिरस्कृत कर देती है। अतः माता के समान कोई दूसरा गुरु नहीं है।

वेदव्यास
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ज्ञानियों ने ज्येष्ठ भ्राता को पिता के समान कहा है।

भास
  • संबंधित विषय : भाई
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रथ के जिस जुए को बड़ा बैल खींचता है, उसे पिताजी द्वारा छोटे से बछड़े के कंधे पर डालना ठीक नहीं है।

कालिदास
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पिता के प्रति पुत्र का प्रत्युपकार लोगों से यह कहलाना ही है कि न मालूम इसके पिता ने ऐसे पुत्र की प्राप्ति के लिए कैसा तप किया।

तिरुवल्लुवर
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सेवाएँ अनेक हैं, किंतु अपने माता-पिता की सेवा करना उन सब का मूल है।

कन्फ्यूशियस
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हम अपने माता-पिता को अपने असली अपमानों के कहीं आस-पास भी फटकने नहीं दे सकते हैं।

एलिस मुनरो
  • संबंधित विषय : माँ
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कायर पिता संतान को अच्छे नहीं लगते।

स्वदेश दीपक

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere