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आकाश पर उद्धरण

आकाश का अर्थ है आसमान,

नभ, शून्य, व्योम। यह ऊँचाई, विशालता, अनंत विस्तार का प्रतीक है। भारतीय धार्मिक मान्यता में यह सृष्टि के पाँच मूल तत्वों में से एक है। पृथ्वी की इहलौकिक सत्ता में आकाश पारलौकिक सत्ता के प्रतीक रूप में उपस्थित है। आकाश आदिम काल से ही मानवीय जिज्ञासा का विषय रहा है और काव्य-चेतना में अपने विविध रूपों और बिंबों में अवतरित होता रहा है।

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हवा ने बारिश को उड़ा दिया, उड़ा दिया आकाश को और सारे पत्तों को, और वृक्ष खड़े रहे। मेरे ख़याल से, मैं भी, पतझड़ को लंबे समय से जानता हूँ।

ई. ई. कमिंग्स
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किंवदंती के अनुसार जब ईसा पैदा हुए तो आकाश में सूर्य नाच उठा। पुराने झाड़-झंखाड़ सीधे हो गए और उनमें कोपलें निकल आईं। वे एक बार फिर फूलों से लद गए और उनसे निकलने वाली सुगंध चारों ओर फैल गई। प्रति नए वर्ष में जब हमारे अंतर में शिशु ईसा जन्म लेता है, उस समय हमारे भीतर होने वाले परिवर्तनों के ये प्रतीक हैं। बड़े दिनों की धूप से अभिसिक्त हमारे स्वभाव, जो कदाचित् बहुत दिनों से कोंपलविहीन थे, नया स्नेह, नई दया, नई कृपा और नई करुणा प्रगट करते हैं। जिस प्रकार ईसा का जन्म ईसाइयत का प्रारंभ था, उसी प्रकार बड़े दिन का स्वार्थहीन आनंद उस भावना का प्रारंभ है, जो आने वाले वर्ष को संचालित करेगी।

हेलेन केलर
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यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दूसरों में रुचि का कारण मनुष्य की स्वयं में रुचि है। यह संसार स्वार्थ से जुड़ा है। यह ठोस वास्तविकता है लेकिन मनुष्य केवल वास्तविकता के सहारे नहीं जी सकता। आकाश के बिना इसका काम नहीं चल सकता। भले ही कोई आकाश को शून्य स्थान कहे…

रघुवीर चौधरी
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क्या जिसे हम क्षितिज कहते हैं, वह वास्तविकता है? या हम ऐसा कह रहे हैं? लेकिन हम अनंत को नहीं देख सकते, इसलिए हम ऐसी काल्पनिक सीमाओं को स्वीकार कर लेते हैं।

रघुवीर चौधरी
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आकाशगंगा चिकने आसमान में बारूद के धुएँ के निशान की तरह है।

सामंथा हार्वे
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स्पष्ट और शांत उसकी आवाज़ श्रोताओं के ऊपर तैरती रही, जैसे एक प्रकाश, जैसे एक तारा भरा आकाश।

हरमन हेस
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यद्यपि मेघ को किसी वस्तु की इच्छा नहीं है, ही उसमें स्वतः सामर्थ्य है, किसी के प्रति विशेष प्रेम है और किसी के साथ संसर्ग ही, फिर भी अति महान् वह जलद् संत्पत जनों के संताप को मिटाता ही है।

पण्डितराज जगन्नाथ
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चंद्रमा, सूरज, तारे, आकाश, घर की चीज़ों की तरह थे। चंद्रमा सूरज शाश्वत होने के बाद भी इधर-उधर होते थे।

विनोद कुमार शुक्ल
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धर्म आकाश से नीचे नहीं उतरता, धरती से ऊपर उठता है।

लक्ष्मीनारायण मिश्र
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भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार सारा जगत् दो पदार्थों से निर्मित है। उनमें से एक का नाम है आकाश। यह आकाश एक सर्वव्यापी, सर्वानुस्यूत सत्ता है। जिस किसी वस्तु का आकार है; जो कोई वस्तु कुछ वस्तुओं के मिश्रण से बनी है, वह इस आकाश से ही उत्पन्न हुई है। यह आकाश ही वायु में परिणत होता है; यही तरल पदार्थ का रूप धारण करता है, यही फिर ठोस आकार को प्राप्त होता है।'

स्वामी विवेकानन्द
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रात ही हमें बताती है कि आकाश थ्री-डाइमेंशनल है। दिन में तो हमें उसकी लंबाई और चौड़ाई भर नज़र आती है। आकाश की मुटाई (या गहराई) का अनुभव तो रात में ही होता है। एक क्षुद्र तारा, पास होने के कारण विराट सूर्य लगता है। उससे करोड़ों गुना बड़े सूर्य, दूर होने के कारण तारे लगते हैं। तारे को सूर्य बनाना, सूर्यों को तारे बनाना—यह कमाल आकाश के थर्ड डाइमेंशन का है। रात में ही समझ में आता है कि आकाश थाली जैसा नहीं, घड़े जैसा है जिसमें करोड़ों आकाशगंगाएँ भरी हैं। फिर भी घड़ा खाली का खाली है। किसी कौए को अगर इस घड़े का पानी पीना हो, तो उसे इस घड़े में कितनी आकाशगंगाएँ डालनी पड़ेंगी।

अमृतलाल वेगड़
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हे माता! तुम्हारी यह धूलि, जल, आकाश और वायु—सभी मेरे लिए स्वर्ग तुल्य हैं। तुम मेरे लिए मर्त्य की पुण्य मुक्ति भूमि एवं तीर्थस्वरूपा हो।

नलिनीबाला देवी
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माता का गौरव पृथ्वी से भी अधिक हैं। पिता आकाश से भी ऊँचा है।

वेदव्यास
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आसमान का कोई रंग नहीं, उसका नीलापन फ़रेब है। बेवकूफ़ लोग बेवकूफ़ बनाने के लिए बेवकूफ़ों के ख़िलाफ़ बेवकूफ़ी करते हैं।

श्रीलाल शुक्ल
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आकाश हम छू रहे हैं, ज़मीन खो रहे हैं।

ज्ञानरंजन
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रात का आकाश और दिन के समय का आकाश––इनमें से एक भी आकाश का रंग अमिश्रित नीला होता है, यह छवि आँकते समय समझ में जाता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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सचराचर विश्व में हम सभी लोग आकाश को नीला कहते रहते हैं, किंतु, इतने ही ज्ञान से रंग लगाने वाले का काम नहीं चलता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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चंद्रमा का उचित स्थान आकाश ही है, पृथ्वी नहीं।

बाणभट्ट
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रात्रि का आकाश मानो टीवी का स्क्रीन है। (कितना बड़ा स्क्रीन!) उसमें चंद्र, तारे, ग्रह, नक्षत्र द्वारा खेला जा रहा नाटक हम यहाँ दूर पृथ्वी पर बैठे-बैठे देखते हैं। असली 'दूरदर्शन' तो यह है!

अमृतलाल वेगड़
  • संबंधित विषय : रात
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चंद्रमा को आकाश में देखें, झील में नहीं।

रूमी
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रात ही आकाश के कपाट खोलती है।

अमृतलाल वेगड़
  • संबंधित विषय : रात
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अपने तेज़ की अग्नि में जो सब कुछ भस्म कर सकता हो, उस दृढ़ता का, आकाश के नक्षत्र कुछ बना-बिगाड़ नहीं सकते।

जयशंकर प्रसाद
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आकाश में उड़ते पक्षियों की गति को जाना जा सकता है परंतु गुप्त रूप से कार्य करते हुए अर्थ-सबंधी कार्यो पर नियुक्त अधिकारियों की गति को जानना संभव नहीं है।

चाणक्य

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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