ख़ून पर उद्धरण
ख़ून शरीर की नसों में
बहने वाला लाल तरल पदार्थ है जिसके लिए अन्य प्रचलित शब्द रक्त, रुधिर, लहू, शोणित आदि हैं। ख़ून से संलग्न कई मुहावरें भाषा में लोकप्रिय रहे हैं। अत्यंत क्रोध, हत्या, हिंसा, प्रतिरोध आदि कई प्रसंगों में भी ख़ून एक प्रतीक का निर्माण करता है।
जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का ख़ून बिना छना पी जाते हैं।
केवल वही पुस्तक लिखने योग्य है जिसे लिखने का हममें साहस नहीं है। जिस पुस्तक को हम लिख रहे होते हैं, वह हमें आहत करती है, हमें कँपाती है, शर्मिंदा करती है, ख़ून निकालती है।
पृथ्वी स्वयं इस नए जीवन को जन्म दे रही है और सारे प्राणी इस आनेवाले जीवन की विजय चाह रहे हैं। अब चाहे रक्त की नदियाँ बहें या रक्त के सागर भर जाएँ, परंतु इस नई ज्योति को कोई बुझा नहीं सकता।
वे कभी इस बात पर ग़ौर नहीं करेंगे कि ये कलाकृतियाँ मुश्किल घड़ियों और बहुत नाज़ुक पलों में बनाई गईं, कि ये कलाकृतियाँ कोरी आँखों से बिताई गईं रातों का नतीजा हैं, कि इन कलाकृतियों ने मुझसे मेरे ख़ून की क़ीमत वसूली है और मेरी शिराओं को कमज़ोर किया है… हाँ, वे कभी इस बात पर ग़ौर नहीं करेंगे।
ख़ून का वह आख़िरी क़तरा जो वतन की हिफ़ाज़त में गिरे दुनिया की सबसे अनमोल चीज़ है।
आँधी से भी भयानक होती है रक्त की वह हलचल जिसे मनुष्य ने प्रेम की संज्ञा दी हैं।
दूसरे के रक्त को समझ सकना कोई सरल काम नहीं है।
स्वाधीनता का वृक्ष समय-समय पर देशभक्तों तथा अत्याचारियों के रक्त से अवश्य सींचा जाना चाहिए। यह इसकी प्राकृतिक खाद है।
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शहीदाने वतन का ख़ून इक दिन रंग लाएगा
चमन में फूट निकलेगा यह बरगे अर्गवाँ होकर।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere