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Harishankar Parsai

1924 - 1995 | ہوشنگ آباد, مدھیہ پردیش

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बेईमानी इतनी पुरानी बात हो गई है कि अब कोई बेईमानी की बात करे, तो लगता है बड़ा पिछड़ा हुआ आदमी है।

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साहित्य-सृजेता को स्वतंत्र होना ही चाहिए, तभी उसका स्वर निर्भय और स्वतंत्र होगा। शासन का पिछलग्गू साहित्य, समाज को पतन की ओर ले जाएगा।

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एम.ए. करने से नौकरी मिलने तक जो काम किया जाता है, उसे रिसर्च कहते हैं।

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जनता की, जनता के द्वारा, जनता के लिए सरकार कैसे अपने ही लिए हो जाती है—यह अब्राहम लिंकन को नहीं मालूम था, हमें मालूम है।

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जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का ख़ून बिना छना पी जाते हैं।

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साहित्य में बुढ़ापा सफ़ेद बालों या झुर्रियों का नाम नहीं है। साहित्य में बुढ़ापे का अर्थ है—नवीन चेतना ग्रहण करने की शक्ति का लोप। अपनी मान्यताओं और मूल्यों को बदलने की भीरुता, आज के बदले विगत कल में ही जीने का मोह, प्रतिभा का शैथिल्य—यह सब हो, तो साहित्य में बूढ़ा आदमी परिपक्व कहलाता है।

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बेइज़्ज़ती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो, तो आधी इज़्ज़त बच जाती है।

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हिंदी में सबसे प्रचलित और लोकप्रिय पद्धति है—अपनों की प्रशंसा और परायों की निंदा।

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राजनीति से संन्यास, उससे बड़ी राजनीति करने के लिए लिया जाता है।

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भारत में जितना व्यवस्थित धंधा ब्राह्मण का है, उतना मारवाड़ी का भी नहीं।

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प्रजातंत्र में सबसे बड़ा दोष है; तो यह कि इसमें योग्यता को मान्यता नहीं मिलती—लोकप्रियता को मिलती है। हाथ गिने जाते हैं, सिर नहीं तौले जाते।

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एक संगठित धर्माचार्यों और पुरोहितों की परंपरा; जब भगवान के नाम पर अज्ञान और अंधविश्वास का राज चलाए, और राजनैतिक सत्ता इसमें सहयोग दे क्योंकि उसकी भी इससे रक्षा होती है—तब ये दोनों सत्ताएँ क्रूर और मानव-प्रगति-विरोधी होती हैं।

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अच्छा भोजन करने के बाद मैं अक्सर मानवतावादी हो जाता हूँ।

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ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, सब माया है—यह शंकराचार्य सिखाते हैं, पर सोने के सिंहासन पर बैठते हैं और सोने के कमंडल से पानी पीते हैं।

यह ‘मिसफिट्स’ का युग है भाई। जिसे जुआड़ख़ाना चलाना चाहिए, वह मंत्री है। जिसे डाकू होना चाहिए, वह पुलिस अफ़सर है। जिसे दलाल होना चाहिए, वह प्रोफ़ेसर है।जिसे जेल में होना चाहिए, वह मज़िस्ट्रेट है। जिसे कथावाचक होना चाहिए, वह उपकुलपति है। जिसे जहाँ नहीं होना चाहिए, वह ठीक वहीं है।

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धर्म कोई भी हो, भगवान या ख़ुदा का निवास काले धन की तिजोरी में और ग़ैरकानूनी शराब की बोतल में रहता है। भगवान क्षीर सागर में नहीं, ग़ैरकानूनी मदिरा सागर में विश्राम करते हैं।

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इस देश में कोई युवक नहीं जानता कि उसका आख़िर होगा क्या? वह यह भी जानता है बी. ए. करने से कुछ होता नहीं है। जब तक फेल होता जाता है, विद्यार्थी कहलाता है—जब पास हो जाएगा तब बेकार कहलाएगा।

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तबादले की एक बँधी-बँधाई नैतिक पद्धति है। अफ़सर या मंत्री से संबंध होने से तबादले होते हैं। फिर तबादले करने के रेट बँधे हैं। लोककर्म विभाग के रेट ऊँचे हैं, शिक्षा-विभाग के रेट कम हैं—यह एक ईमानदार प्रक्रिया है।

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पुजारी जानता है; भगवान चाहे कहीं और हों, मगर मंदिर में तो क़तई नहीं है। मुसलमान जानता है कि ख़ुदा कहीं होगा तो मस्जिद के बाहर होगा, यहाँ तो नहीं है। मगर अपना धंधा इसी में सुरक्षित है कि लोगों को विश्वास दिलाएँ कि यज्ञ से उनका कल्याण होगा। मंदिर और मस्जिद में की गई पुकार भगवान एकदम सुनता है—सीधी ‘हॉट लाइन’ है।

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हमारे समाज में नारी की ग़ुलामी के कारण ऐसी भावना व्याप्त हो गई है कि पुरुष केवल 'नर' है और स्त्री केवल 'मादा', जो एक-दूसरे के पास केवल प्रजनन के प्रयोजन से आते हैं। वे और किसी कारण से, किसी और स्तर पर मिल ही नहीं सकते—यह पशु-स्तर की स्थिति है।

महान सभ्यता जब बीच में आकर सड़ती है, तब उसमें अछूत-प्रथा, सती-प्रथा और दहेज-प्रथा की बीमारियाँ पैदा होती हैं।

सारे धार्मिक अनुष्ठान मुनाफ़ाख़ोर, कालाबाज़ारी, जमाख़ोर, शोषक कराते हैं—ये आम आदमी को निष्क्रिय और मूर्ख बनाते हैं।

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हर तरह के चोर कर्म—घूस, कालाबाज़ारी, मुनाफ़ाख़ोरी, राजनैतिक बेईमानी, पाखँड—सबकी साधना धर्म की मदद से होती है

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लेखन; व्यापार कतई नहीं है—वह जीविका का साधन हो सकता है, लेकिन वह बहुत अंशों में तपस्या है। इसलिए जिसे आत्मा पर बंधन महसूस होते हों, तो वह छोड़कर चला जाए।

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कोई इंजीनियर रद्दी माल लगाकर ग़ैर-ज़िम्मेदारी से कच्चे पुल का निर्माण करे; तो वह जिस अपराध का भागी होगा, उसी अपराध का भागी वह कवि भी होगा, जो राष्ट्रीयता की सच्ची भावना की अनुभूति के बिना रस्म-अदाई के लिए ओजहीन राष्ट्रीय-काव्य रचेगा।

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इतिहास विज्ञान है, कल्प-कथा नहीं है। जब तक वैज्ञानिक दृष्टि से, धार्मिक द्वेष से मुक्त, तथ्यपरक इतिहास नहीं पढ़ाया जाएगा, तब तक साम्प्रदायिक द्वेष जा नहीं सकता।

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शोषकों के वर्ग-स्वार्थों को जब कोई चुनौती देता है; तो उस वर्ग के प्रवक्त्ता कहते हैं, यह आदमी ख़ुदा से लड़ रहा है। ख़ुदा को प्राइवेट संपत्ति का रक्षक और शोषण का एजेंट तभी से बना लिया गया था—जब मनुष्य ने उसके होने की कल्पना की थी।

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गाँधीवाद, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता की जो बात की जाती है, वह ख़ास अर्थ नहीं रखती। मूल है, जो भी हाथ पड़ जाए, सत्ता पा लेना।

रस सिद्धांतवाले काइयाँ आचार्य के पास जब शोध छात्राएँ आती हैं, तब वह तुलसीदास के हवाले से जानता है कि प्रभु 'उमा-रमन' के बाद ही 'करुणायतन' होते हैं।

प्रशंसा चाहना शायद देवत्व है, तभी तो हर देवता की प्रशंसा के लिए दुनिया की हर भाषा में अगणित ग्रंथ रचे गए हैं।

समाज के सामने शोभा बनाने की भावना बड़ी बलवती होती है। किसी भी समय आदमी इसे नहीं भूलता कि दूसरे उसे देख रहे हैं और उनकी नज़रों में उसे जँचना चाहिए।

नवयुग का आवाहन, राष्ट्रीयता जैसे विषय पर लिखने के लिए अपने भीतर वैसी अनुभूति जगानी पड़ती है, सामाजिक चिंतनधारा में बहा जाता है—किनारे पर खड़े होकर लहरों का हिसाब नहीं किया जाता।

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कुछ उद्देश्य है कि लोग परिवर्तनकामी हों, वे सड़ी-गली व्यवस्था से विद्रोह करें। शोषक-वर्ग, सामान्य जन का बेखटके शोषण करता रहे। यह एक देशव्यापी षडयंत्र है—जिसमें राजनीतिज्ञ, सरमायेदार, बुद्धिजीवी आदि शामिल हैं।

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विश्वविद्यालयों में तो गुरु-कृपा से ही डिग्री मिलती है। सब जानते हैं, पढ़ने से कुछ नहीं होता। अगर आचार्य की कृपा हो जाए, तो प्रतिद्वंद्वी विद्यार्थी का अँगूठा काटकर वह प्रिय विद्यार्थी को दे देता है। राजा के लड़के और भील के लड़के में जो अंतर तब था, वही अब है।

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डॉक्टर कैंसर के रोगी को बताए कि उसे कैंसर है, तो वह स्वस्थ मानसिकता का है। पर अगर कैंसर के रोगी को डॉक्टर राग जयजयवन्ती सुनवाने लगे, तो डॉक्टर ज़रूर मानसिक रोग से ग्रस्त है। मैं जानता हूँ, कई लेखक इस देश में कैंसर से बीमार समाज को राग जयजयवन्ती सुनाते हैं।

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भक्ति, वीरता और सैक्स की मिली-जुली मानसिकता; फ़िल्मी हीरो को नेता, उद्धारक और पथ-प्रदर्शक बना देती है।

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साहित्य के आचार्यों की बात करनी चाहिए। ये रसवादी प्रकार के आचार्य हैं। ये रँडुए होकर भी अपने-आप हृदय में शृंगार रस जाने कैसे पैदा कर लेते हैं? इन्हें आलम्बन भी नहीं चाहिए शायद, क्योंकि आलम्बन और चेतना का द्वंद्व होने लगता है।

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धर्म का जन्म अज्ञान और डर से हुआ—आदिम मनुष्य के प्रकृति और जगत के बारे में अज्ञान और डर से। फिर धर्म संस्थागत हुआ, राजसत्ता के साथ मिला, शोषण का जरिया बना।

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धन उधार देकर समाज का शोषण करने वाले धनपति को जिस दिन 'महाजन' कहा गया होगा, उस दिन ही मनुष्यता की हार हो गयी। 'महाजन' कहना मनुष्यत्व की हीनता स्वीकार करके ही तो संभव हुआ।

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जिस जाति के धर्मगुरु कविता पर, साहित्य पर बंदिश लगाते हैं, उस जाति पर हम साधुओं को दया आती है। हमें उस जाति के भविष्य के बारे में भी चिंता होती है। कालिदास बच गए। उन्होंने 'कुमार संभव' में तो शिव-पार्वती के रमण का वर्णन किया है, तो शैव उन्हें त्रिशूल से मार डालते, पर तब धर्मगुरु संकीर्ण नहीं थे।

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किसी देश की जनता को अन्न और दवा से वंचित करके मार डालना, समस्या का शांतिपूर्ण हल खोजना है।

प्रंशसा के जाल में सरलता से फँसता है, मध्यम स्थिति का आदमी। जो बड़ा है—वह इसलिए कि प्रशंसा से उसका पेट आधा तो भर ही गया होगा, या इसलिए कि वह इस जाल को देख लेता है—फँसेगा नहीं। निपट निम्न श्रेणी का आदमी प्रशंसा को उपहास समझकर नाराज़ हो जाएगा, पर मध्यमार्गी जानता है कि वह निपट निकृष्ट नहीं है। उसके मन में बड़ा कहलाने की हविस भी होती है।

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कोई-कोई सनकी राजा ऐसे होते थे कि अपने नौकर को कोड़ों से ख़ूब पीटते थे, मगर उनकी चिकित्सा के लिए डॉक्टर तैयार रखते थे। अपनी सरकार भी सनकी ज़मींदार है। शिक्षक को ख़ूब कष्ट होने देगी, मगर कल्याण-निधि ज़रूर खोल देगी।

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जिस समाज में धन के साथ पाप का समझौता ही प्रतिष्ठा का कारण है, वहाँ समाज का गुरु अवहेलना का पात्र हो, यह आश्चर्य की बात तो नहीं है—दु:ख की अवश्य है। और वह इस देश के दुर्भाग्य पर है, जो एक बार किसी समय अपने ज्ञान के आलोक से संसार को चकाचौंध करके, अब धीरे-धीरे अंधकार ही पसंद करता जा रहा है।

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दो अवसरों पर आदमी का चेहरा बहुत विकृत और हास्यस्पद होता है—प्रशंसा स्वीकार करते समय और प्रणय-निवेदन करते समय। बुद्धिमान मनुष्य इन दोनों अवसरों पर बहुत मूढ़ लगता है।

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इस क़ौम की आधी ताक़त लड़कियों की शादी करने में जा रही है। पाव ताक़त छिपाने में जा रही है—शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में...बची हुई पाव ताक़त से देश का निर्माण हो रहा है तो जितना हो रहा है, बहुत हो रहा है। आख़िर एक चैथाई ताक़त से कितना होगा।

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अब कोई आदमी सुरक्षित नहीं है। एक दिन ऐसा आएग, जब इस देश के आधे आदमियों की जाँच हो रही होगी और बाक़ी आधे जाँच कमीशनों में होंगे।

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भ्रष्टाचार की बात अब करना वैसा ही है, जैसे सत्यवादी हरिश्चंद्र की कथा सुनाना। 'सत्यवादी' हरिश्चंद्र की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी है इस देश के भ्रष्टाचार की कथा।

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भ्रष्टाचार अगर अपने हाथ से हो, तो वह प्रजा के लिए हितकारी है। दूसरे के हाथ से भ्रष्टाचार हो, तो वह प्रजा के लिए दु:खदाई है। इसीलिए रैलियाँ निकालनेवाले, प्रदर्शन करने वाले ये दल चाहते हैं कि शासकीय भ्रष्टा-चार करने का अधिकार इन्हें मिल जाए। इनका भ्रष्टाचार इतना पवित्र होगा कि जनता अपने आप सुखी हो जाएगी।

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जो प्रेमपत्र में मूर्खतापूर्ण बातें लिखे, उसका प्रेम कच्चा है, उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। पत्र जिनता मूर्खतापूर्ण हो, उतना ही गहरा प्रेम समझना चाहिए।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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