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शिल्प पर उद्धरण

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कहना होगा कि शिल्प की दृष्टि से शमशेर हिंदी के एक अद्वितीय कवि है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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अपने स्वयं के शिल्प का विकास केवल वही कवि कर सकता है, जिसके पास अपने निज का कोई ऐसा मौलिक-विशेष हो, जो यह चाहता हो कि उसकी अभिव्यक्ति उसी के मनस्तत्वों के आकार की, उन्हीं मनस्तत्वों के रंग की, उन्हीं के स्पर्श और गंध की ही हो।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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शिल्प का जो संसार होता है, वह अगर सच्ची कल्पना के द्वारा सजीव नहीं, तो वह फेन बुद्बुद के ऊपर प्रतिबिंबित संसार-चित्र की तरह मिथ्या और क्षणभंगुर है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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कला, मात्र का कला के रूप में बोध भाव की एक ऐसी द्रष्टा की सी दृष्टि या तटस्थ-से भाव को समोए रहता है, जिसके बिना बोध को कला या शिल्प का बोध कहने में ही असमंजस होगा।

मुकुंद लाठ
  • संबंधित विषय : कला
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एक फ़ोटोग्राफ़र का जो कौशल होता है, उसका योग वस्तु के बाह्य रूप के साथ होता है और एक शिल्पी का जो योग होता है, वह उसके भीतर-बाहर के साथ वस्तु के भीतर-बाहर का योग होता है, और उस योग का पंथ होता है कल्पना और यथार्थ घटना—दोनों का समन्वय कराने वाली साधना।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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शिल्प या भाषा वहीं कठिनाई उत्पन्न करते हैं, जहाँ वे कविता के रचनात्मक तर्क से निकले हुए नहीं लगते—कथ्य पर उपर से आरोपित लगते हैं, या फिर वहाँ; जहाँ कवि के पास भाषा और शिल्प तो हो, पर ज़रूरी कुछ कहने को हो।

कुँवर नारायण
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शिल्प का प्राण होती है कल्पना, अविद्यमान की धड़कन, श्वासोच्छ्वास।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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साहित्य की समस्त महान कृतियाँ किसी शैली (genre) की स्थापना करती हैं या विसर्जन—अन्य शब्दों में यों कहें, कि वे विशिष्ट घटनाएँ हैं।

वाल्टर बेंजामिन
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शिल्प को परे खिसका कर कथ्य कुछ भी नहीं रह जाता, लेकिन यदि शिल्प को अधिक महत्व दिया जाए—यह सोचते हुए कि इस शिल्प को तोड़कर ऐसा करेंगे—तो यह चीज़ों को देखने का एक बहुत ही ग़लत तरीक़ा है।

ऋत्विक घटक
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एक व्यक्ति तो प्रलाप की तरह अंट-संट बकता चला जा रहा है और एक व्यक्ति कुछ भी नहीं कह रहा है या सीधी बातें कह रहा है—शिल्पजगत् में इन दोनों के ही लिए कोई स्थान नहीं।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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आत्मसंस्कृति ही शिल्प है। इस शिल्प के द्वारा मनुष्य सारे संसार को छंदोंमय बना लेते हैं।

राधावल्लभ त्रिपाठी
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कोई भी कृति, शिल्प या कला के रूप में हमारे लिए उपस्थित होने के लिए ही, हमारे बोध में एक ऐसी वृत्ति की अपेक्षा रखती है, जिसमें शांत और अद्भूत के लक्षण देखे जा सकते है।

मुकुंद लाठ
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यदि शिल्प मुँहज़ोर है, तो वह कला की शुद्धता को नष्ट कर देगा। आधारभूत तत्व कथ्य है। कथ्य के भीतर पैठ जाएँ, तो शिल्प स्वतः उभरेगा, बिंब स्वतः उभरेंगे, ध्वनि स्वतः उभरेगी। यह सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है कि अब नया कुछ करें—ये काले आदमियों पर भूरा रंग पोत रहे हैं, तो हम नीला पोत दें। मुझे भूरे रंग की ज़रूरत महसूस होगी, तो मैं उसे ही इस्तेमाल करूँगा। नीले की ज़रूरत होगी, तो उसे इस्तेमाल करूँगा।

ऋत्विक घटक
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किसी शिल्पकार्य, संगीत और किसी अन्य विषय में प्रवीणता तब तक नहीं होती और हो सकती है, जबतक इंद्रियों की अनेक नित्य एवं सहज क्रियाओं में कुछ बदलाव किया जाए।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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एक शिल्पी जिसे छू लेता है, वही सोना हो जाता है। हालाँकि बेचारा किसी भी दिन अपने बाल-बच्चों के शरीर को उस सोने से कभी लाद नहीं पाता।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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शिल्प का एक मूलमंत्र होता है—‘नालमतिविस्तरेण’ : अति विस्तार नहीं करना चाहिए। अति विस्तार में अपार रस रहता है, ऐसा नहीं है। अमृत तो एक बूँद होता है, लेकिन तृप्ति देता है असीम!

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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सभी कलाओं में चित्रकला और मूर्तिशिल्प ही ऐसे कला-उपन्यास हैं, जिनके पास रचना-सामग्री की विपुलता है।

प्रयाग शुक्ल
  • संबंधित विषय : कला
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शमशेर के शिल्प के संबंध में यह बात भी मुझे कहनी है कि प्रसंगबद्ध भावना की प्रसंग-विशिष्टता सुरक्षित रखकर, प्रसंग को पार्श्वभूमि में हटाते हुए उसको बिल्कुल ही उड़ा देने से, काव्य के रसास्वादन में कुछ तो बाधा होती ही है।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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शिल्प का विकास, काव्य-व्यक्तित्व से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है और उस शिल्प में व्यक्तित्व की क्षमता और सीमा, भाव और अभाव, सामर्थ्य और कमज़ोरी, ज्ञान और भ्रम—सभी प्रत्यज्ञ-अप्रत्यक्ष रूप से प्रकट होते हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध
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मूर्तिशिल्प में 'कायांतरण' अधिक प्रत्यक्ष होता है, चित्र के मुक़ाबले वह त्रि-आयामी भी होता है और यथार्थ जीवन में चलने-फिरनेवाली चीज़ों के समकक्ष भी। इसलिए उसके प्रति आकर्षण भी एक अलग तरह का होता है।

प्रयाग शुक्ल
  • संबंधित विषय : कला
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एक शिल्पी की अपेक्षा संसार में एक कारीगर की ही वाहवाह अधिक होती है, क्योंकि एक कारीगर वाहवाही पाकर ही कुछ गढ़ता है, और एक शिल्पी गढ़ता चलता है अपने काम के साथ, अपने को खिलता हुआ महसूस करते-करते।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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बात जब सीधे-सीधे खड़ी रहती है तो केवल अर्थ को प्रकट करती है। लेकिन उसी बात को जब तिरछी भंगिमा और विशेष गति दी जाती है, तब वह अपने अर्थ से भी अधिक कुछ प्रकट करती है।

रवींद्रनाथ टैगोर
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चयन और सुसज्जित—प्रत्येक काव्य की प्राथमिक विशेषताएँ हैं।

श्यामसुंदर दास
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अपने यहाँ की मूर्ति-कला पर और चाहे जो कुछ कहा जाए, उसके विरुद्ध कोई यह नहीं कह सकता कि हमारे देश की मूर्तियों में लिंग-भेद का कोई घपला है।

श्रीलाल शुक्ल
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अगर एक वास्तुशिल्पी किसी पुराने नींव के पत्थर को मज़बूती देना चाहता है तो वह उस पर भार बढ़ा देता है, ताकि जो हिस्से जोड़े गए हैं, वे और भी पास जाएँ। इसी तरह अगर चिकित्सक अपने किसी रोगी की मानसिक सेहत में बदलाव चाहता है; तो उसे व्यक्ति की मानसिक दिशा बदलते हुए, जीवन के अर्थ की ओर प्रेरित करने तनाव पैदा करने में संकोच नही करना चाहिए।

विक्टर ई. फ्रैंकल
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शिल्प की कोई जड़ अचल अवस्था नहीं होती है, इस पृथ्वी की तरह वह प्राचीन और नित्य चिरयौवना बनी रहती है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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इस देश में चित्रकला का इतिहास जितना विचित्र है, उतना मूर्ति-निर्माण का नहीं है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
  • संबंधित विषय : कला
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शिल्पी चाहे निम्न जाति का ही क्यों हो पर उसने शिल्प के साथ पाणिग्रहण किया है, इसी कारण शिल्पी सदा शुद्ध और पवित्र होता है—यह बात भारतवर्ष के ऋषि लोग कह गए हैं; किंतु जहाँ पर इस शिल्प का स्पर्श आजकल के हम मशीनी आदमियों ने कर लिया है—वहीं वह मलिन हो गया है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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शिल्पचर्चा का प्रारंभिक पाठ होता है शिल्पबोध, जैसे शिशु-शिक्षा का प्राथमिक पाठ होता है बालबोध।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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एक शिल्पी कितनी बड़ी कल्पना लेकर यथार्थ जगत् से परे हटकर खड़ा हो गया जब उसने निरे पत्थर, काठ और काग़ज़ से कथा कहलानी चाही।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
  • संबंधित विषय : कला
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पूर्वजों द्वारा संचित धन जिस क़ानून से हमारा हो जाता है, उस तरह से शिल्प पर हमारा अधिकार नहीं होता है, क्योंकि कला होती है, ‘नियतिकृत नियम रहिता’—विधाता के नियमों में भी वह नहीं आना चाहता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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शैली की दृष्टि से रामायण में आलंकारिकता अधिक है।

राधावल्लभ त्रिपाठी
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एक शिल्पी के कैशोर्य और यौवन की कथा भावमय कला होती है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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सारे शिल्प कर्म की एक दिशा होती है और वह है भाव और रस की दिशा।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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'अलसस्य कुतो शिल्पं, अशिल्पस्य कुतो धनम्!'—एक आलसी के लिए शिल्प कहाँ, एक शिल्प-विहीन के लिए धन कहाँ।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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बिना रसबोध के रसशास्त्र पढ़ते जाने का जो फल होता है, शिल्प का ज्ञान प्राप्त किए बिना शिल्पचर्चा करने का भी प्रायः वही फल मिलता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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कला शिल्प का अधिकार ख़ुद अर्जित करना पड़ता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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शिल्प का यह भी एक अनोखा व्यापार है—जैसा-तैसा जो भी माध्यम मिला, उसी पर सवार होकर संसार में जो नहीं है, उसी का जाकर आविष्कार कर डालना।

शिल्प का यह भी एक अनोखा व्यापार है—जैसा-तैसा जो भी माध्यम मिला, उसी पर सवार होकर संसार में जो नहीं है, उसी का जाकर आविष्कार कर डालना।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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