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बाल साहित्य

बाल साहित्य के अंतर्गत

बच्चों और किशोरों के लिए लिखी गई रचनाएँ संकलित की गई हैं। ‘हिन्दवी’ ने यहाँ बाल साहित्य के अर्थ को कुछ व्यापक करने की कोशिश की है। इस क्रम में न सिर्फ़ यहाँ बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य संकलित है, बल्कि उन रचनाओं को भी यहाँ सहेजा गया है जिन्हें ख़ुद बच्चों ने ही रचा है। इसके अतिरिक्त हिंदी की जिन महत्वपूर्ण कविताओं में समय-समय पर बच्चे आएँ हैं, उन कविताओं का भी एक चयन यहाँ प्रस्तुत है।

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बच्चा एक अनकही कहानी होता है, उसकी कहानी हमारे दिए शब्दों में नहीं कही जा सकती। उसे अपने शब्द ढूँढ़ने का समय और स्थान चाहिए, ढूँढ़ने के लिए ज़रूरी आज़ादी और फ़ुर्सत चाहिए। हम इनमें से कोई शर्त पूरी नहीं करते। हम उन्हें अपने उपदेश सुनने से फ़ुर्सत नहीं देते, उन्हें सुनने की फ़ुर्सत हमें हो–यह संभव ही नहीं।

कृष्ण कुमार
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हम बाल अधिकार की बात भले करें, रचना का बुनियादी अधिकार देने की मनस्थिति में हम फ़िलहाल नहीं हैं, क्योंकि रचना का अर्थ होता है–अपना मन ख़ुद बनाने का अधिकार। इस अधिकार का उपयोग करना करना भी अधिकार में शामिल है।

कृष्ण कुमार
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बाल साहित्य एक आधुनिक चीज़ है जिसकी प्रेरणा के स्त्रोत लोक साहित्य निधि में पहचाने जा सकते है।

कृष्ण कुमार
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कहानी का आकर्षण बुनियादी स्वभाव का अंग है और इस अंग का विकास बचपन में अपने आप शुरू हो जाता है।

कृष्ण कुमार
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बाल साहित्य बच्चों के जीवन में पढ़ाई के वर्चस्व को चुनौती दे सकता है। वह पढ़ाई की जगह पढ़ने के माहौल की माँग करता है।

कृष्ण कुमार
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बच्चों की शिक्षा यदि वैचारिक गहराई की जगह सतही रुझान भर दे तो इसके दूरगामी परिणाम होने लाज़िमी हैं।

कृष्ण कुमार
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शिल्पचर्चा का प्रारंभिक पाठ होता है शिल्पबोध, जैसे शिशु-शिक्षा का प्राथमिक पाठ होता है बालबोध।

अवनींद्रनाथ ठाकुर
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गुलिवर इसीलिए क्लासिक है क्योंकि वह बच्चों की स्वाभाविक इच्छाओं का प्रतिबिंब पेश करता है।

कृष्ण कुमार
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बाल-साहित्य बचपन का साहित्य होता है, उसके लिए साहित्य की स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं–बच्चे की स्वतंत्रता भी चाहिए।

कृष्ण कुमार

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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