हमारे आलस्य में भी एक छिपी हुई, जानी-पहचानी योजना रहती है।
असंभव कहकर किसी काम को करने से पहले, कर्मक्षेत्र में काँपकर लड़खड़ाओ मत।
पुरुष का जीवन संघर्ष से आरंभ होता है और स्त्री का आत्मसमर्पण से।
अपनी व्यक्तिगत सत्ता की अलग भावना से हटाकर; निज के योगक्षेम के संबंध से मुक्त करके, जगत् के वास्तविक दृश्यों और जीवन की वास्तविक दशाओं में जो हृदय समय-समय पर रमता रहता है, वही सच्चा कविहृदय है।
पाखंडी लोग कितनी आसानी से इस जगत् को धोखे में डाल देते हैं। सभ्यता के प्राथमिक विकास-काल से लेकर भोली-भाली मानव-जाति पर, न जाने कितना छल-कपट किया जा चुका है।
अभिव्यक्ति का अभ्यास कलाकार का एक मुख्य कर्त्तव्य है।
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सक्षम सुंदर अभिव्यक्ति तो अविरत साधना और श्रम के फलस्वरूप उत्पन्न होती है।
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बिना आत्मशुद्धि के प्राणिमात्र के साथ एकता का अनुभव नहीं किया जा सकता है और आत्मशुद्धि के अभाव से अहिंसा धर्म का पालन करना भी हर तरह नामुमकिन है।
हमारे पूर्वजों ने अधिकारों के लिए संघर्ष किया, आज की पीढ़ी को कर्तव्य के लिए संघर्ष करना है।
आम स्त्रियों में पाई जाने वाली विशिष्ट प्रवृत्तियाँ और चारित्रिक दुरूहताएँ उन हालात का परिणाम होती हैं, जिनमें उनका पालन-पोषण होता है—ये प्राकृतिक क़तई नहीं होतीं।
प्यार की शुरुआत बसंत की तरह होती है। हमें ऐसा महसूस होता है कि हम हमेशा सुखी रहेंगे। हम अपने पार्टनर से बेइंतहा प्यार करते हैं और कल्पना भी नहीं कर सकते कि कभी ऐसा दिन भी आएगा, जब हम उससे प्यार नहीं करेंगे। यह मासूमियत का समय है। प्रेम अमर लगता है। यह जादुई समय होता है, जब हर चीज़ आदर्श दिखती है और बिना प्रयास के अच्छी तरह काम करती है। हमारा पार्टनर हमें आदर्श नज़र आता है। हम बिना प्रयास के एक लय में रहते हैं और अपनी ख़ुशक़िस्मती पर आनंदित होते हैं।
स्त्री के लिए एक दुर्वह बंधन घर में है और उससे असह्य दूसरा बाहर—यह न मानना असत्य ही नहीं, अपने प्रति तथा समाज के प्रति अन्याय भी होगा।
असंख्य युगों से असंख्य संस्कार और असंख्य भावनाओं ने भारतीय स्त्री की नारी-मूर्ति में जिस देवत्व की प्राण-प्रतिष्ठा की थी, उसका कोई अंश बिना खोए हुए वह इस यंत्रयुग की मानवी बन सकेगी, ऐसी संभावना कम है।
जिन स्त्रियों की पाप-गाथाओं से समाज का जीवन काला है; जिनकी लज्जाहीनता से जीवन लज्जित है, उनमें भी अधिकांश की दुर्दशा का कारण अर्थ की विषमता ही मिलेगी।
जीवनकाल में वृद्धि के सामाजिक परिणाम बहुत गंभीर हैं। रिटायरमेंट के बाद के लिए, सरकारी सहायता वाले लगभग सभी कार्यक्रमों में यह माना जाता है कि लोग अधिकतम पैंसठ साल की उम्र में काम करना बंद कर देंगे। यह मानक तब तय किया गया था, जब लोग रिटायर होने के बाद कुछ ही साल जीवित रहते थे, लेकिन आज वे इसके बाद आमतौर पर दो दशक तक ज़िंदा रहते हैं।
विलगाव की स्थिति में, आधुनिक जीवन की अधिकाधिक यांत्रिक और जनसंकुल परिस्थितियों में, मानव समुदायों के आस्तित्विक और सांस्कृक्तिक लयभंग के मानसोपचार की ज़रूरत के तकाज़े से ही; प्रकृति के साथ मानवीय चेतना के संबंधों की खोज, जीवन की औपन्यासिक पुनर्रचना में और भी गहरे और भी सूक्ष्मतम घरातलों पर अनिवार्य उठती है।
जब कोई परिक्षीण अर्थात् दरिद्री होता है, तब एक पसर यव की इच्छा करता है और वही मनुष्य जब सर्वसंपन्न अर्थात् धनिक अवस्था में हो जाता है, तब पृथ्वी को तृण के समान गिनता है, इस कारण यही दोनों चंचल अवस्थाएँ; पुरुष को गुरु और लघु बनाती हैं, वस्तुओं को भी फैलाती और समेटती हैं।
यह जगत् न आशावादी है, न निराशावादी—वह दोनों का मिश्रण है और अंत में हम देखेंगे कि सभी दोष प्रकृति के कंधों से हटाकर, हमारे अपने ऊपर रख दिया जाता है।
साहित्यशक्ति, शब्द-शक्ति मनुष्य तभी प्रकट कर सकता है, जब वह सामान्य मन से ऊपर उठकर जनता के मानस की तरफ़ देखे।
जब कोई पुरुष तनाव में होता है, तो वह सिर्फ़ एक ही समस्या पर अपना ध्यान केंद्रित करता है और बाक़ी समस्याओं को भूल जाता है। दूसरी तरफ़; जब कोई महिला तनाव में होती है, तो वह अपनी समस्याओं को फैला लेती है और उनके बोझ से दबी हुई महसूस करती है।
अगर हम अपने समय की सबसे बड़ी चुनौतियों—जलवायु के संकट से लेकर एक-दूसरे के प्रति हमारे उत्तरोत्तर बढ़ते जा रहे आविश्वास तक—से निपटना चाहते हैं, तो मुझे लगता है कि इसकी शुरुआत हमें मनुष्य के स्वभाव के बारे में, अपने दृष्टिकोण को बदलने के साथ करने की ज़रूरत है।
संसार-बंधन के दुःखों की रचना को विध्वंस करने हेतु; प्रलयाग्नि के सदृश ब्रह्मानंद पद में प्रवेश के उद्योग के बिना ,और बाक़ी सब वणिग्व्यापार है। प्रयोजनवाली बात केवल ब्रह्म का चिंतन है।
साधारणतः लोग कहते हैं कि वेदांत, दर्शन और धर्म, इस जगत् और उसके सारे सुखों एवं संघर्षों को छोड़कर इसके बाहर जाने का उपदेश देते हैं। पर यह धारणा एकदम ग़लत है। केवल ऐसे अज्ञानी व्यक्ति ही; जो प्राच्य चिंतन के विषय में कुछ नहीं जानते और जिसमें उसकी यथार्थ शिक्षा समझने योग्य बुद्धि ही नहीं है, इस प्रकार की बातें कहते हैं।
लोक में फैली दुःख की छाया को हटाने में; ब्रह्म की आनंदकला जो शक्तिमय रूप धारण करती है, उसकी भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता, प्रचंडता में भी गहरी आर्द्रता साथ लगी रहती है। विरुद्धों का यही सामंजस् कर्मक्षेत्र का सौंदर्य है, जिसकी ओर आकर्षित हुए बिना मनुष्य का हृदय नहीं रह सकता।
मनुष्य का सबसे उत्तम परिचय यह है कि 'मनुष्य स्रष्टा है', किंतु आज की सभ्यता उसे मज़दूर बनाती है, मिस्त्री बनाती है, महाजन बनाती है, लोभ दिखाकर स्रष्टा को छोटा बनाती है।
आत्मघाती प्रवृत्तियाँ अंततः अमानवीय सामाजिक परिस्थितियों की ही मानस-उत्पाद हैं।
संसार से तटस्थ रहकर; शांति-सुखपूर्वक लोक-व्यवहार-संबंधी उपदेश देनेवालों का उतना अधिक महत्त्व हमारे हिंदू-धर्म में नहीं है, जितना संसार के भीतर घुसकर उसके व्यवहारों के बीच सात्विक सौंदर्य की ज्योति जगानेवालों का है।
जब बड़ी और हानिकारक तकनीकें सामने आती हैं, तो हम हमेशा उनके लंबे समय के असर को समझ नहीं पाते।
दूसरे सभी क्षेत्रों में मनुष्य द्वारा किया जा रहा विकास; दुनिया को जिस तरफ़ ले जा रहा है, उसके लिए मनुष्य की नैतिक तैयारी अभी न के बराबर है।
मेरे लिए सिनेमा और कुछ नहीं, सिर्फ़ एक अभिव्यक्ति है। ये मेरे लिए अपने लोगों के कष्टों और दु:खों को लेकर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर करने का माध्यम है। कल को सिनेमा के अलावा भी इंसान की बुद्धि शायद कुछ ऐसा बना ले; जो सिनेमा से भी ज़्यादा मज़बूती, बल और तात्कालिकता से लोगों की ख़ुशियों, दु:खों, आकाँक्षाओं, सपनों, आदर्शों को अभिव्यक्त कर सके—तब वो ही आदर्श माध्यम बन जाएगा।
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श्रीकांत वर्मा का 'मगध'; राजनीतिक कुचक्र में फँसे एक संवेदनशील मन का इतिहास में संतरण है, जहाँ से वह वर्तमान को एक धुँध की तरह चित्रित करता है।
कोई भी क़ानून तब तक हमारे जीवन का हिस्सा नहीं हो सकता, जब तक कि वह हमारी सोच और हमारी भावनाओं का हिस्सा न हो।
उत्पीड़ितों के लिए निहायत ज़रूरी है कि वे अपनी मुक्ति की सभी अवस्थाओं में, स्वयं को पूर्णतर मनुष्य बनने के सत्तामूलक तथा ऐतिहासिक कार्य में संलग्न मनुष्यों के रूप में देखें।
पक्षी अंडे से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करता है। अंडा ही दुनिया है। जो जन्म लेना चाहता है उसे एक दुनिया को नष्ट करना होगा।
आदर्श का उपासक; निराशाओं के प्रति उपेक्षा की दृष्टि से देखता है, उसका जीवन युद्धमय है। समझौते का उपासक; व्यावहारिक कठिनता की दुर्दमनीयता का विकराल रूप देखकर घबराता है, वह अपने को चतुर और नीतिकुशल के नाम से पुकारता है—वह मरना नहीं जानता।
अतीत की मुश्किलों, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक धारणाओं को छोड़ दें। आप ही इकलौते व्यक्ति हैं; जो उस जीवन का निर्माण कर सकते हैं, जिसके आप हक़दार हैं।
भक्त कवियों ने प्रेममार्ग की जिन बाधाओं का वर्णन किया है, वे भी लोकजीवन में प्रेम की अनुभूति की बाधाएँ हैं।
मज़े में ख़ुशहाल होकर जीना है, तो डिस्कवर नहीं हो सकते।
महिला का दुखड़ा सुनना, पुरुष के लिए कई बार इतना ज़्यादा मुश्किल या दूभर होता है। जब वह किसी चीज़ पर निराश या दु:खी होती है; तो पुरुष को ऐसा महसूस होता है, जैसे वह असफल हो गया हो।
जो पहले से मन में पूर्ण हो, उस प्रवाह को बह जाने से रोकने के लिए संघर्ष करो।
मानव-चरित्र रचने के लिए मानव को देखना पड़ता है, मानव को समझना पड़ता है, उसके सुख-दु:ख, आशा, आकांक्षा, द्वंद्व, कुँठा सबको देखना होता है। जन-जीवन का बारीक अवलोकन करना होता है और साथ ही संवेदनात्मक दृष्टि रखनी पड़ती है।
चीज़ों के सही या ग़लत होने के परे एक मैदान है, मैं वहाँ तुमसे मिलूँगा।
आगे बढ़ो, किंतु माप कर देखने न जाओ कि कितनी दूर बढ़े हो। ऐसा करने से पुनः पीछे रह जाओगे।
किसी न किसी तरह की तपस्या का ख़याल; हिंदुस्तानी विचारधारा का एक अंग है और ऐसा ख़याल न सिर्फ़ चोटी के विचारकों के यहाँ है, बल्कि साधारण अनपढ़ जनता में फैला हुआ है।
लोगों के जीवन में जब बदहाली होती है, असुरक्षा होती है, तब गोडसे के बग़ैर भी गोडसे पैदा हो जाते हैं।
उत्पीड़ित लोग स्वयं पर भरोसा करना तभी शुरू करते हैं, जब वे उत्पीड़क को खोज लेते हैं और अपनी मुक्ति के लिए संगठित संघर्ष करने लगते हैं।
प्रत्येक स्त्री के समय और विचारों पर व्यावहारिक होने का बहुत ज़्यादा दबाव होता है।
आज हम मनुष्यों में स्वार्थ, आत्म-केंद्रिता और अन्यायपूर्ण पक्षपात के जो दोष देखते हैं, उनकी जड़ में असमान स्त्री-पुरुष संबंध ही हैं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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