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स्त्रीवाद पर उद्धरण

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भारतीय पातिव्रत्य की नैतिकता को चुनौती देकर, राधा ने एकनिष्ठ प्रीति का चाँदनी से भरा हुआ पूरा सौंदर्य उद्घाटित किया।

दुर्गा भागवत
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नितांत बर्बर समाज में स्त्री पर पुरुष वैसा ही अधिकार रखता है, जैसा वह अपनी अन्य स्थावर संपत्ति पर रखने को स्वतंत्र है।

महादेवी वर्मा
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जब तक स्त्रीवादी विचारों को केवल कुछ शिक्षित लोग ही समझेंगे, तब तक कोई जन-आधारित स्त्रीवादी आंदोलन नहीं होगा।

बेल हुक्स
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घुमक्कड़-धर्म ब्राह्मण-धर्म जैसा संकुचित धर्म नहीं है, जिसमें स्त्रियों के लिए स्थान नहीं हो। स्त्रियाँ इसमें उतना ही अधिकार रखती हैं, जितना पुरुष।

राहुल सांकृत्यायन
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एक सफल विवाह में ऐसा कभी नहीं होता कि सभी अधिकार सिर्फ़ एक तरफ़ हैं, और सारी आज्ञाकारिता दूसरी तरफ। अगर कहीं ऐसा है तो वह एक असफल विवाह है और उससे दोनों को ही मुक्ति मिलनी चाहिए।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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पतित कही जाने वाली स्त्रियों के प्रति समाज की घृणा, हाथी के दाँत के समान बाह्य प्रदर्शन के लिए हैं और उसका उपयोग स्वयं उसकी मिथ्या प्रतिष्ठा की रक्षा तक सीमित है।

महादेवी वर्मा
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विवश आर्थिक पराधीनता; अज्ञात रूप में व्यक्ति के मानसिक तथा अन्य विकास पर ऐसा प्रभाव डालती रहती है, जो सूक्ष्म होने पर भी व्यापक तथा परिणामतः आत्मविश्वास के लिए विष के समान है।

महादेवी वर्मा
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आम स्त्रियों में पाई जाने वाली विशिष्ट प्रवृत्तियाँ और चारित्रिक दुरूहताएँ उन हालात का परिणाम होती हैं, जिनमें उनका पालन-पोषण होता है—ये प्राकृतिक क़तई नहीं होतीं।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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ठंडे जल के पात्र के पास रखा हुआ उष्ण जल का पात्र; जैसे अनजानें में ही उसकी शीतलता ले लेता है, उसी प्रकार चुपचाप शिक्षित महिला-समाज ने, पुरुष-समाज की दुर्बलताएँ आत्मसात् कर ली हैं और अब वे उनकी दुरवस्था में ही चरम सफलता की प्रतिच्छाया देखने लगी हैं।

महादेवी वर्मा
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पुरुष अगर अपनी पूरी सत्ता का इस्तेमाल करता है तो स्त्री निसंदेह कुचली जाती है, पर अगर वह भरपूर लाड़-प्यार में सत्ता स्त्री के हाथों में सौंप देता है, तो स्त्री द्वारा अधिकारों की अतिक्रमण की कोई सीमा नहीं रहती।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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जब किसी महिला को अहसास होता है कि वह सचमुच प्रेम पाने की हक़दार है, तो वह एक दरवाज़ा खोल रही है; ताकि पुरुष उसे प्रेम दे सके, लेकिन जब विवाह में दस बरस तक महिला ही प्रेम देती रहती है और उसे बदले में कुछ नहीं मिलता, तब जाकर उसे यह अहसास होता है कि वह ज़्यादा की हक़दार है।

जॉन ग्रे
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स्त्री के लिए एक दुर्वह बंधन घर में है और उससे असह्य दूसरा बाहर—यह मानना असत्य ही नहीं, अपने प्रति तथा समाज के प्रति अन्याय भी होगा।

महादेवी वर्मा
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स्त्रियों को पुरुषों के साथ खुली प्रतियोगिता करने देना, अन्यायपूर्ण और एक तरह का सामाजिक अपराध है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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वर्तमान समाज जिस स्त्री को निर्वासन-दंड देना चाहता है; उसके फूटे कपाल को ऐसे लोहे से दाग देता है, जिसका चिह्न जन्म-जन्मांतर के आँसुओं से भी नहीं धुल पाता।

महादेवी वर्मा
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हमारे समाज में नारी की ग़ुलामी के कारण ऐसी भावना व्याप्त हो गई है कि पुरुष केवल 'नर' है और स्त्री केवल 'मादा', जो एक-दूसरे के पास केवल प्रजनन के प्रयोजन से आते हैं। वे और किसी कारण से, किसी और स्तर पर मिल ही नहीं सकते—यह पशु-स्तर की स्थिति है।

हरिशंकर परसाई
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असंख्य युगों से असंख्य संस्कार और असंख्य भावनाओं ने भारतीय स्त्री की नारी-मूर्ति में जिस देवत्व की प्राण-प्रतिष्ठा की थी, उसका कोई अंश बिना खोए हुए वह इस यंत्रयुग की मानवी बन सकेगी, ऐसी संभावना कम है।

महादेवी वर्मा
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घुमक्कड़ी-धर्म छुड़ाने के लिए ही पुरुष ने बहुत से बंधन नारी के रास्ते में लगाए हैं। बुद्ध ने सिर्फ़ पुरुषों के लिए घुमक्कड़ी करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि स्त्रियों के लिए भी उनका वही उपदेश था।

राहुल सांकृत्यायन
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स्त्री के जीवन की अनेक विवशताओं में प्रधान, और कदाचित् उसे सबसे अधिक जड़ बनाने वाली—अर्थ से संबंध रखती है और रखती रहेगी, क्योंकि वह सामाजिक प्राणी की अनिवार्य आवश्यकता है।

महादेवी वर्मा
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आपदग्रस्ता नारी के सम्मान की रक्षा में मिट जाने वालों की संख्या नगण्य ही है, परंतु अपनी कुचेष्टाओं से उसका अनादर करने वाले पग-पग पर मिलेंगे।

महादेवी वर्मा
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पुरुष समाज का न्याय है, स्त्री दया, पुरुष प्रतिशोधमय क्रोध है, स्त्री क्षमा, पुरुष शुष्क कर्तव्य है, स्त्री सरस सहानुभूति और पुरुष बल है, स्त्री हृदय की प्रेरणा।

महादेवी वर्मा
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यदि हम कटु सत्य सह सकें, तो लज्जा के साथ स्वीकार करना होगा कि समाज ने स्त्री को जीविकोपार्जन का साधन निकृष्टतम दिया है। उसे पुरुष के वैभव की प्रदर्शनी तथा मनोरंजन का साधन बनकर ही जीना पड़ता है, केवल व्यक्ति और नागरिक के रूप में उसके जीवन का कोई मूल्य नहीं आँका जाता।

महादेवी वर्मा
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मैं ख़ुद इस बात का घोर समर्थक हूँ कि विवाह के बाद सभी हितों का मिलन ही एक आदर्श स्थिति है, लेकिन हितों के मिलन का अर्थ यह नहीं हुआ कि जो मेरा है, वह तुम्हारा है; पर जो तुम्हारा है, वह सिर्फ़ तुम्हारा है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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जहाँ तक सामाजिक प्राणी का संबंध है; स्त्री उतनी ही अधिक अधिकार-संपन्न है, जितना पुरुष—चाहे वह अपने अधिकारों का उपयोग करे या करे।

महादेवी वर्मा
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हमें किसी पर जय चाहिए, किसी से पराजय; किसी पर प्रभुता चाहिए, किसी का प्रभुत्व। केवल अपना वह स्थान, वे स्वत्व चाहिए जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परंतु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग बन नहीं सकेंगी।

महादेवी वर्मा
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स्वत्वहीन धनिक महिलाओं को यदि सजे हुए खिलौने का सौभाग्य प्राप्त है, तो साधारण श्रेणी की स्त्रियों को क्रीतदासी का दुर्भाग्य।

महादेवी वर्मा
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हम पुरुषों की वर्गीय तहों के जितना नीचे जाएँगे, उतना ही पुरुषों का 'पुरुष होने का घमंड' बढ़ता दिखेगा। और यह सबसे ज्यादा उन पुरुषों में मिलेगा, जिनमें पत्नी और बच्चों को छोड़कर और किसी पर राज करने की तो हिम्मत है, योग्यता।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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यह पूजा-परस्ती जो आज की सबसे झूठी पूजाओं में से एक है; शायद तब तक क़ायम रहेगी, जब तक कोई ठोस मनोविज्ञान इस 'इंस्टिंक्ट' का पर्दाफ़ाश नहीं कर देता, जिसे 'प्रकृति का इरादा' और 'ईश्वर का आदेश मान कर नतमस्तक हुआ जा रहा है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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अग्नि में बैठकर अपने आपको पति-प्राणा प्रमाणित करने वाली स्फटिक-सी स्वच्छ सीता में, नारी की अनंत युगों की वेदना साकार हो गई है।

महादेवी वर्मा
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मध्य-युग के जीवन की हल्की-सी समझ भी यह बताती है कि निर्बलों की पराधीनता को कितना प्राकृतिक समझा जाता था, और उनमें से किसी की समानता की इच्छा को कितना अप्राकृतिक।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र या किसी समाज की स्वतंत्रता की भावना को कैसे समझ सकता है, जबकि घर में तो वह अपने बीवी-बच्चों का तानाशाह बना बैठा है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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मानवीय समाज के शायद अन्य किसी भी समूह के हिस्से में इतनी लंबी ग़ुलामी नहीं आई है, जितनी यह औरत के हिस्से में आई है।

ललित कार्तिकेय
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अगर कोई हिंदू रियासत शक्तिशाली, न्यायपूर्ण और आर्थिक रूप से ठोस होती थी; अगर बिना दमनकारी नीतियों के क़ानून और व्यवस्था बरक़रार रहती थी और अगर कृषि-क्षेत्र प्रगति पर और आम लोग संपन्न होते थे—तो चार में से तीन संभावनाएँ थीं कि उस रियासत पर किसी स्त्री का शासन हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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जिसे आज 'स्त्री का स्वभाव' कहा जाता है, वह एक नक़ली चीज़ है और कुछ दिशाओं में बाध्यतापूर्ण दमन, और कुछ दिशाओं में अप्राकृतिक फैलाव का परिणाम है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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मानव-स्वभाव की कुरूपताएँ तभी तक मर्यादा में रहती हैं, जब तक उनके सामने कोई सीमा-रेखा खिंची हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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हमें उन पुरुषों की भावनाओं का सुराग़ भी मिल जाता है, जो स्त्रियों की समान स्वतंत्रता के नाम से चिढ़ते हैं। मेरे ख़्याल में उन्हें डर लगता है, इस बात से नहीं कि स्त्रियाँ विवाह से इन्कार कर देंगी—क्योंकि मुझे नहीं लगता कोई सचमुच ऐसा सोचेगा, बल्कि इस बात से कि वे चाहेंगी कि विवाह बराबरी की शर्तों पर तय हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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समाज ने स्त्री के संबंध में अर्थ का ऐसा विषम विभाजन किया है कि साधारण श्रमजीवी वर्ग से लेकर, संपन्न वर्ग की स्त्रियों तक की स्थिति दयनीय ही कही जाने योग्य है। वह केवल उत्तराधिकार से ही वंचित नहीं है, वरन् अर्थ के संबंध में सभी क्षेत्रों में एक प्रकार की विवशता के बंधन में बंधी हुई है।

महादेवी वर्मा
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हमारी राष्ट्रीय जागृति इसे प्रमाणित कर चुकी है कि अवसर मिलने पर गृह के कोने की दुर्बल बंदिनी, स्वच्छंद वातावरण में बल प्राप्त पुरुष से शक्ति में कम नहीं।

महादेवी वर्मा
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मेरा विश्वास है कि अधिकारों की समानता के बाद; स्त्री की आत्म-आहुति का बढ़ा-चढ़ाकर बनाया गया मिथक ज़मीन पर उतरेगा, और तब एक श्रेष्ठ स्त्री श्रेष्ठतम पुरुष से ज़्यादा त्यागमयी नहीं होगी, पर साथ ही तब पुरुष भी आज की तुलना में ज़्यादा निस्वार्थ और आत्म-त्यागी होंगे, क्योंकि उन्हें बचपन से यह नहीं सिखाया जाएगा कि उनकी ज़िद दूसरों के लिए क़ानून के समान है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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जब महिलाएँ समस्याओं के बारे में बोलती हैं, तो आम तौर पर पुरुष प्रतिरोध करते हैं। पुरुष को लगता है कि महिला उसके सामने अपनी समस्याओं का दुखड़ा इसलिए रो रही है, क्योंकि वह उसे ज़िम्मेदार ठहरा रही है।

जॉन ग्रे
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कोई भी इस बात का दावा नहीं कर सकता कि अगर स्त्रियों की प्रकृति को सहज रूप से विकसित होने दिया जाता, अगर उसे एक बनावटी स्वरूप देने के प्रयास किए गए होते—तो भी स्त्री और पुरुष के चरित्र और क्षमता में कोई व्यावहारिक अंतर, या शायद कुछ भी अंतर होता।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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आधुनिक सभ्यता और शिक्षा ने मानवीय विकास में जो भूमिका निभाई है; वह तब तक अधूरी और अपूर्ण ही रहेगी, जब तक कि ताक़त के क़ानून वाली पुरानी सभ्यता के गढ़ पर हमला नहीं किया जाता। और वह गढ़—गृहस्थ और दांपत्य-जीवन है।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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संसार की प्रगति से अनभिज्ञ, अनुभव-शून्य, पिंजरबद्ध पक्षी के समान अधिकार-विहीन, रुग्ण, अज्ञान नारी से फिर शक्ति-संपन्न सृष्टि की आशा की जाती है, जो मृगतृष्णा से तृप्ति के प्रयास के समान ही निष्फल सिद्ध होगी।

महादेवी वर्मा
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समाज की दो आधार शिलाएँ हैं—अर्थ का विभाजन और स्त्री-पुरुष का संबंध। इनमें से यदि एक की भी स्थिति में विषमता उत्पत्र होने लगती है, तो समाज का संपूर्ण प्रासाद हिले बिना नहीं रह सकता।

महादेवी वर्मा
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कोई भी महिला इस नकारात्मक और ग़लत धारणा के प्रति विशेष रूप से अति संवेदनशील होती है कि वह प्रेम पाने के योग्य नहीं है। यदि बचपन में उसने बुरा बर्ताव देखा है या वह स्वयं इसका शिकार हो चुकी है, तो प्रेम पाने के योग्य नहीं होने के अहसास के प्रति वह और भी अधिक संवेदनशील होती है। इससे उसके लिए अपना महत्त्व तय करना कठिन हो जाता है। महत्त्वहीन होने का यह अहसास अचेतन मन में छिपा होता है, जिससे यह डर उत्पन्न होता है कि उसे अन्य लोगों की ज़रूरत होगी। उसके मन के एक कोने में कहीं यह कल्पना पैदा होती है कि उसे समर्थन नहीं मिलेगा।

जॉन ग्रे
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आधुनिक स्त्री जितनी अकेली है; उतनी प्राचीन नहीं, क्योंकि उसके पास निर्माण के उपकरण मात्र हैं—कुछ भी निर्मित नहीं।

महादेवी वर्मा
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समाज ने किसी ऐसी स्थिति की कल्पना ही नहीं की, जिसमें स्त्री पुरुष से सहायता बिना माँगे हुए ही जीवन-पथ पर आगे बढ़ सके।

महादेवी वर्मा
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'पतिव्रता' शब्द स्पष्ट रूप से स्त्री-पराधीनता की स्थिति को दर्शाता है। केवल इसलिए कि इसका अभिप्राय ऐसी पत्नी से है जो, 'अपने पति को भगवान का दर्जा देती है; पति की दासी बनकर रहने को ही जो अपना 'संकल्प' (व्रत) मान लेती है, और अपने पति के अलावा वह किसी अन्य पुरुष का विचार तक नहीं रखती।' इसलिए भी कि 'पति' शब्द का आशय ही स्वामी, रहनुमा और सर्वेसर्वा से है।

पेरियार ई. वी. रामासामी
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नारी में परिस्थितियों के अनुसार अपने बाह्य जीवन को ढाल लेने की जितनी सहज प्रवृत्ति है, अपने स्वभावगत गुण छोड़ने की आंतरिक प्रेरणा उससे कम नहीं—इसी से भारतीय नारी भारतीय पुरुष से अधिक सतर्कता के साथ अपनी विशेषताओं की रक्षा कर सकी है।

महादेवी वर्मा
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बिना किसी झिझक के यह कहा जा सकता है कि ताक़त के क़ानून के तहत जितना ज़्यादा अंतर स्त्री के मूलभूत चरित्र में आया है, उतना किसी भी दूसरे दमित वर्ग के चरित्र में नहीं आया।

जॉन स्टुअर्ट मिल
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महिलाओं के लिए सिर्फ़ दूसरों की आवश्यकता दुविधाजनक होती है, बल्कि निराश होना या परित्याग होना खास तौर पर दर्द भरा होता है—सबसे छोटे तरीक़ों से भी। दूसरों पर निर्भर होना और फिर नज़रअंदाज़ किया जाना, भुला दिया जाना या ख़ारिज किया जाना, किसी महिला के लिए आसान नहीं होता। दूसरों की ज़रूरत महिला को संवेदनशील और असुरक्षित स्थिति में रख देती है। नज़रअंदाज़ किए जाने या निराश किए जाने से उसे ज़्यादा चोट पहुँचती है, क्योंकि इससे उसके अंदर की यह ग़लत धारणा पुष्ट होती है कि वह महत्त्वहीन है।

जॉन ग्रे

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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