Font by Mehr Nastaliq Web
noImage

Hari Krishna Premi

1908 - 1974 | گوالیار, مدھیہ پردیش

کی

2
Favorite

باعتبار

नारी पुरुष से पूजा नहीं चाहती। वह जीवन में सहयोग चाहती है दुःख और सुख के साथ। तन और मन का विलीनीकरण। दो जीवनों का एक होना।

दया और क्षमा भी मानव के धर्म हैं, तो शक्तिवान होना और उपयुक्त समय पर देश और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग करना भी धर्म है।

  • विषय :
    اور 4 مزید

सारे ही धर्म एक समान बात कहते हैं। मनुष्यता ऊँचे गुणों को विकसित करना ही धर्म का उद्देश्य है।

  • विषय :
    اور 2 مزید

नारी के हृदय का स्नेह उसका सबसे बड़ा बंधन है।

  • विषय : 1
    اور 1 مزید

जो केवल ऐश्वर्य के पालने में पले हैं, वे ग़रीबों के दुःखों को नहीं जान सकते।

  • विषय : 1
    اور 1 مزید

मानव की वाणी की अपेक्षा उसका कर्म अधिक अच्छा नेतृत्व कर सकता है।

वे सब, जिन्हें समाज घृणा की दृष्टि से देखता है, अपनी शक्तियों को एकत्र करें तो इन महाप्रभुओं और उच्च वंशाभिमानियों का अभिमान चूर कर सकते हैं।

  • विषय :
    اور 5 مزید

हम दुर्बल मनुष्य राग-द्वेष से ऊपर रहकर कर्म करना नहीं जानते, अपने अभिमान के आगे जाति के अभिमान को तुच्छ समझ बैठते हैं।

  • विषय :
    اور 4 مزید

कला का स्वाभाविक विकास स्वतंत्र वायुमंडल में हो सकता है—वह सीमा में बाँधी नहीं जा सकती, देश-काल के बंधन भी उसे संकुचित करते हैं, कोयल की भाँति वह अपने स्वरों से धरा-आकाश को भर देना देना चाहती है, लेकिन किसी के आदेश पर तान छेड़ने में उसे संकोच होता है।

  • विषय : 1
    اور 2 مزید

संपूर्ण पृथ्वी ही माँ का खप्पर है। अखिल विश्व ब्रह्मांड ही सर्वव्यापिनी, सर्वशक्तिमती, सृष्टि और मरण की क्रीड़ा में निरत माँ भवानी का मंदिर है।

  • विषय :
    اور 4 مزید

दुःख से डरना कायरता है।

  • विषय : 1
    اور 2 مزید

मृत्यु क्षणिक अंधकार है, इस अन्धकार के पीछे जीवन का सूर्योदय है।

महत्त्वाकांक्षा की प्रेरणा मनुष्य को साहस, लगन और दृढ़ता प्रदान करती है, जिन गुणों के अभाव में मानव निर्जीव हो जाता है।

  • विषय :
    اور 2 مزید

हिंसा का अहिंसा से प्रतिशोध करने के लिए महाप्राण चाहिए।

परिस्थितियाँ ही मनुष्य में साहस का संचार करती हैं।

  • विषय :
    اور 1 مزید

त्याग में सुख अवश्य है किंतु त्याग का अर्थ कायरता नहीं होना चाहिए।

  • विषय : 1

मनुष्य वह है जो दूसरे के लिए कष्ट सहे—आवश्यकता पड़ने पर प्राण भी दे दे।

  • विषय :

भोग की जीवन में आवश्यकता है, किंतु भोग ही जीव का आदि-अंत नहीं है।

निश्चय ही अभाव में आनंदानुभव करना तप है।

  • विषय :

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

रजिस्टर कीजिए